हाँ, मैं एक शिक्षक हूँ!

सबसे पहले उस दिव्य आत्मा को नमन करता हूँ जिनकी आज जन्म तिथि है, हमारे देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति, राजनीतीज्ञ एवं दार्शनिक डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को. आज के ही दिन 1962 में जब वे राष्ट्रपति बने और पद का कार्यभार ग्रहण किया तो लोगो में विशेष तौर पर विद्यार्थियों ने उत्साह बस इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मानाने की शुरुआत की और यह परम्परा चल पड़ी. आज के दिन इस विषय पर लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है तो मैं आप सब से उन अनुभवों को साझा करना चाहूँगा की कैसे यह गुरु-शिष्य परंपरा आज टीचर्स-डे के रूप प्रतिफलित होकर समाज में स्थापित हो चुकी है. आज के दिन लगभग सभी विद्यालयों चाहे वह सरकारी हो अथवा गैर सरकारी सभी विद्यार्थियों द्वारा शिक्षको के सम्मान में उन्हें उपहार देकर कहीं-कहीं तो केक काटकर भी डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है.

मैं किसी भी ऐसी परम्परा का धुर विरोधी नहीं, परन्तु हमें साथ ही आज के दिन इस बात का प्रण भी लेना चाहिए की यदि हम एक शिष्य हैं तो सही मायने में अपना धर्म निभाएं और यदि हम शिक्षक है तो हमारी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि जिन्हें हम जो भी शिक्षा प्रदान कर रहे हैं उसका स्तर कैसा है?

आज विद्यार्थियों को ज्ञान सिर्फ अपने शिक्षक द्वारा पढाई गयी बातों से ही नहीं मिल रहा, अपितु ढेरो ऐसे माध्यम, खास कर तकनीकी माध्यम उपलब्ध हैं जिनसे वे लगातार भिन्न भिन्न प्रकार के गैर जरुरी/अनावश्यक ज्ञान भी चाहे अनचाहे प्राप्त कर ले रहे हैं. शिक्षक-विद्यार्थी सम्बन्ध बहुत ही व्यावसायिक हो गया है, जिसका प्रमुख कारण हमारी आधुनिक सामाजिक व्यवस्था है.

आजकल अनेक ऐसे मामले उजागर हो रहे हैं जिनके बारे में सोचता हूँ तो आश्चर्य हो आता है, पर इन सबके पीछे का सच जानने का समय ही नहीं किसी के पास, तो प्रश्न यह नहीं की आप कौन हैं अथवा क्या हैं, अपितु यह अवश्य है की आप जो और जैसे भी हैं, जो आपकी जिम्मेदारियां हैं, जिनके लिए आप कटिबद्ध हैं, उसे आप किस हद तक पूरा कर पा रहे हैं, और यदि नहीं कर पा रहे हैं तो आप उन कमियों की पहचान कितनी जल्द कर उसे दूर कर रहे हैं.

सच ही कहा गया है की हम जैसा सोचते हैं या जिन विचारों का हम पर प्रभाव पड़ता है हम वैसे ही बन जाते हैं. अब यदि विद्यार्थी ये सोचे की इन्हें तो हम पैसे देते हैं तो यह पढ़ाते हैं, या फिर शिक्षक ये सोचें की इतनी पगार में इससे ज्यादा नहीं पढ़ा सकता, दोनों ही सोच गलत है. यदि आप पढने पढ़ाने की बात करते हैं तो विद्यार्थी का यह सोचना काम नहीं उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपनी पढाई समय पर पूरी हो, जो भी पढाया जा रहा हो वह उसे समझ सके हों, इतने भर से होना चाहिए, वहीं दूसरी ओर शिक्षक पढ़ाते समय यह कदापि न सोचें की कितनी पगार मिलती है, यदि आपकी पगार आपकी गुणवत्ता के अनुरूप नहीं तो उसके अलग कारण हो सकते हैं, इसका सामने बैठे विद्यार्थी से कोई सम्बन्ध नहीं, उसका कोई दोष नहीं.

आपको अपना धर्म निभाना चाहिए और आप किसी भी पेशे से सम्बन्ध रखते हों, आपको हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ ही देना होता है, यदि आप ऐसा नहीं करते तो आपके ही हुनर को जंग लगती है, क्योंकि विद्या वह लोहा होती है जिसे यदि आप लगातार नहीं रगड़ेंगे तो उसपर जंग लग जाता है. नुकसान आपका ही होता है.

विद्या ददाति विनयम || इस संस्कृत के वाक्य का मतलब यहाँ बताने की आवश्यकता नहीं क्योंकि मुझे पता है जो मेरा यह लेख पढ़ रहे हैं उन्हें भली प्रकार मालूम है, परन्तु आज बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है की आज इस श्लोक के मायने बदल गए हैं – विद्या ददाति धनम || अर्थात विद्या है तो धन आयगा ही, जरुर आयगा पर उस विद्या के सही उपयोग से न कि उसे कुंठित करके.

आज हम शिक्षकों के ऊपर ही सम्पूर्ण जिम्मेदारी है कि हम समाज की किस दिशा में लेकर जाएँ. मतलब स्पष्ट है कि बड़े आसानी से हम किसी को भी किसी बात के लिए जिम्मेदार बना देते हैं पर उसके पीछे का सच यही है कि उसकी परवरिश सही नहीं, और उसके लिए समाजिक परिवार के अभिभावक शिक्षक ही होते हैं.

हो सकता हैं शब्दों और समय के अभाव के कारण मैं अपनी बात आप तक सही से नहीं पहुंचा पाया होऊं, पर इतना विश्वाश के साथ कह सकता हूँ एक सही मायनो में शिक्षक होना किसे कहते हैं, इसे जानना है तो आप स्वयं से पूछें की जो आप बच्चों के सामने परोसते हैं उसके बारे में आपने स्वयं कितना अध्ययन किया हुआ होता है? उस विषय की पकड़ और उसकी तैयारी कि आप सभी को संतुष्ट कर सकें आदि कुछ ऐसी बाते हैं जो हम सभी जानते हैं पर फिर भी हम इनका अनुपालन नहीं कर पाते हैं और अपेक्षा रखते हैं सामने वाले से को वो ऐसा क्यों नहीं करते. इन बातों को जिस दिन आपने समझ लिया उस दिन आप गर्व महसूस करेंगे और कहेंगे : हाँ, मैं एक शिक्षक हूँ!

संपादक

नीरज पाठक, संपादक, फुसरो ई-पत्रिका. 9934109077
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