कौन?

कौन?

दरवाजे पर! था कोई…

आहट से सुनी थी मैंने,

शायद, हवा ने अपना

रास्ता बदला हो…

और आहट सुना गयी मुझको.

मचा

शरीर और मन में

अंतर्द्वंद,

मन कहता

उठ कर देखो,

रहने दो हवा होगी

शरीर समझाता..

आखिर जीत!

मन की हुई.

तीली सुलगाई,

लगभग ख़त्म हो चुकी मोमबत्ती

के बत्ती को टटोल कर जलाया,

तो अँधेरा जरुर

थोडा दूर हो गया था,

पर परछाइयों में वह

अब भी मुस्कुरा रहा था..

मनो कह रहा हो

मुझसे पीछा छुड़ाना

इतना भी सरल नहीं.

भरी कदमो से दरवाजे तक

पहुंचा ही था कि..

पट अचानक खुल गए,

मोमबत्ती बुझ गयी.

मुस्कान, अट्टहास में

परिवर्तित हो गया.

सामने धुंध था

भोर होने को थी,

मगर

कोहरे उसे रोक रहे थे…

सच है!

कमरे का अन्धकार तो

मोमबत्ती हटा भी दे,

पर मन का तिमिर ‘कौन’ दूर करे…