तेजपत्ता

तेजपत्ता

तेजपत्ता,

जी साहब! यह वो चीज़ है जो आपके भोजन के लिए बनाये गए व्यंजनों में जब शामिल होता है तो उसका स्वाद बढ़ा देता है, पर सबसे पहले थाली में से इसे ही बाहर कर दिया जाता है. यह इसका दुर्भाग्य है या यह सीधा प्राकृतिक व्यवस्था की भेंट चढ़ जाता है, विचार का विषय हो सकता है कि कोई तेजपत्ता अथवा उस जैसी प्राकृतिक व्यवस्था का शिकार क्यों हो.

किसी भी निर्माण में चाहे वह समाज (यहाँ समाज से तात्पर्य स्वच्छ, स्वस्थ्य एवं निष्पक्ष समाज से है) के निर्माण की बात हो, अपने देश के या फिर भोजन के ही, सभी घटकों, कारकों व वस्तुओं की अपनी एक निश्चित भूमिका होती है अथवा आवश्यकता होती ही है, चाहे वह छोटी ही सी चीज़ ही क्यों न हो?

पीढ़ियों से हम जिस अलगाव को झेलते रहे हैं उसका निवारण जितनी भी कट्टरपंथी विचारधारा के समर्थक हैं जो पुराणपंथी विचारधाराओं से चिपके रहने को बेहतर भविष्य कि सीढ़ी मानते हैं, तो सनद रहे कि यह सीढ़ी उन्हें आकाश को नहीं ले जाती है, यह उन्हें कुएं से होती रसातल में ले जाती है.

आवश्यकता अनुरूप सामाजिक योगदान देना उपादेयता का सर्वप्रथम लक्षण होता है, जो कि किसी के लिए भी उसके सामाजिक वर्चस्व को प्रतिष्ठापित करने के साथ सुदृढ़ता का मुख्य कारक होता है. आपकी जितनी क्षमता है उतना योगदान करें, आप पेट नहीं भर सकते किसी का तो उसका मन भरें. आप हजार कमाते हैं तो दहाई में तो मदद करें, यदि लाख, तो सैकड़े में और यदि करोड़ों के स्वामी है तो हजारों में तो मदद कर ही सकते हैं.

तेजपत्ता के गुणों से हमारा समाज पूरी तरह नावाकिफ है ऐसा बिलकुल नहीं और उन्हें भी स्वयं को तेजपत्ता कहने कि आवश्यकता नहीं होनी चाहिए क्योकि उपमाएं और भी दी जा सकती हैं. पर हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि जब हम घर में भोजन करते हैं और बाहर में भोजन करते हैं तो कुछ हद तक स्वयं को उपलब्धता के आधार पर संतुलित कर ही लेते हैं. उसी प्रकार हम उनके बीच भी सामंजस्य स्थापित कर ही सकते हैं.

पीढियां नयी हैं, आज हमे उनके मस्तिष्क में अपनी रूढ़िवादी मान्यताओं को नहीं भरना चाहिए, समय कि मांग के मुताबिक चलना चाहिए. आज क्यों उन्हें तेजपत्ता समझ कर सिर्फ भोजन में ही प्रयुक्त किया जा रहा है, इस बात को सिरे से समझना और समझाना आवश्यक है. उन्होंने ने स्वयं ही अपनी यह पहचान बना रखी है यदि वो स्वयं को तेजपत्ता समझ कर कुंठित हो रहे हैं तो उनकी ही भूल है, वो महज भोजन में प्रयुक्त होने भर के लिए नहीं बल्कि समाज के हर क्षेत्र में प्रयुक्त होने के लिए हैं, और यह बात उन्हें अपनी मेहनत और लगन से साबित करनी होगी और वे कर भी रहे हैं.

कोई नवजात जब जन्म लेता है तो वह पहले क्या होता है? यदि वह किसी धर्म विशेष का होता है अथवा माना जाता है तो वह ऐसे परिवार में जन्मा है जहाँ धार्मिक कट्टरता चरम पर है और बच्चा निसंदेह चरमपंथी ही बनेगा, उसे किसी धर्म विशेष का नहीं मान कर इन्सान का बच्चा माना जाना चाहिए. हम बाते तो बड़ी आसानी से कह जाते हैं पर अनुसरण में सबसे पीछे हो जाते हैं. जब सभी धर्म समभाव की बात करते हैं तो दुनिया में इतने अलग अलग धर्म क्यों है?

हमें तेजपत्ता को भोजन भर के लिए प्रयुक्त नहीं करना चाहिए, हमें उसके गुणों को पहचान कर उसके काबिल स्थान पर उसका उपयोग भी करना चाहिए ताकि उस वर्ग विशेष को यह आभास हो कि वह महज भोजन में अथवा चाय में मिलाकर बाहर करने के लिए नहीं बल्कि अन्य  स्थानों पर भी उनका महत्व है, जिससे सामंजस्यपूर्ण परिवेश का आरम्भ होगा और एक नए समाज कि अवधारणा का जन्म भी.