सोच की आजादी

हमारा सम्पूर्ण जीवन हमारे विचारों के द्वारा नियंत्रित होता है | हमारे जैसे विचार होते हैं , हमारी जैसी सोच होती है ; हमारी जैसी चिंतन धारा होती है ; वैसी ही हमारी प्रवृति होती है | जैसी प्रवृति होगी व्यवहार ठीक उसी के अनुकूल होगा ;व्यवहार के अनुरूप ही हमारे जीवन का निर्माण होता है | निष्कर्षतः मनुष्य का समग्र जीवन उसकी सोच व विचारधाराओं के गीर्द ही घूमती है | अब देखने की जरूरत यह है कि व्यक्ति की विचारधारा कैसी है ? यदि व्यक्ति सकारात्मक विचारों का स्वामी है तो उसके जीवन में पवित्रता स्थाई रूप से रहेगी | विचारधार दूषित है तो जीवन भी दूषित हो जाता है | नदी किनारे एक कुंभकार मिट्टी को आकार दे रहा था | वह मिट्टी से चिलम बना रहा था | अचानक उसके विचार बदले और उसने चिलम की जगह घड़ा बनाना शुरू कर दिया | पास बैठी कुम्हारिन ने पूछा मिट्टी का आकार क्यों बदल गया ? कुम्हार ने कहा कि बस यूँ ही मेरा विचार बदल गया | माटी ने तत्तक्षण कहा तुम्हारे विचार क्या बदले मेरा तो संसार ही बदल गया |

वस्तुतः किसी व्यक्ति के जीवन की ऊँचाई उसके नजरिये की ऊँचाई पर निर्भर करती है | यदि सोच स्वस्थ है तो व्यक्ति का जीवन मानवता का आदर्श बन जाता है और सोच यदि नकारात्मक है तो पूरी मानव जाति के लिए कलंक बन जाता है हम चाहें तो अच्छे नजरिये के बल पर अपने भीतर सकारात्मकता को प्रकट कर अपने जीवन में अहोभाव का अलग आनंद उत्पन्न कर अभिनव उल्लास की अभिव्यक्ति कर सकते हैं |

सोच तीन प्रकार की मानी गई है – भौतिक सोच व्यवहारिक सोच व  आध्यात्मिक सोच |

भौतिक सोच वाले व्यक्ति भोगवादी मनोवृति से ग्रसित होने के कारण इनके जीवन में दुखों का अम्बार लग जाता है | भौतिक सोच मनुष्य की चिंतनधारा को संकीर्ण बना देती है | ऐसे लोग स्वार्थी मनोवृति के धारक बन जाते हैं,

व्यावहारिक सोच में जीने वाले लोग इस बात के प्रति सजग रहते हैं कि उनके किसी बर्ताव से सामने वाला आहत न हो बल्कि विशेष रूप से प्रभावित हो |

सर्वश्रेष्ठ सोच अध्यात्मिक सोच को माना गया है | अध्यात्मिक सोच से प्रभावित व्यक्ति बुराई में भी अच्छाई ढूँढ लेता है | वह दूसरों पर दोषारोपण की जगह स्वयं को उस हालात में स्थापित कर सूक्ष्मता से विचार करता है | राम और रावण के अंतर का कारण क्या था राम अध्यात्मिक सोच से भरे थे , उनका त्यागमय और मार्यादित जीवन ही उन्हें ईश्वरत्व की महिमा से मंडित कर दिया | जबकि रावण की भौतिक सोच ही उसे संसार में घृणा का पात्र बना दिया | यह अतीत में राम और रावण की घटना ही नहीं आज भी एसा ही होता है |

सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति अपनी चिंतनधारा व प्रर्वृति के बल पर अपने जीवन का उत्कर्ष कर लेता है और जीवन को मंदिर बना लेता है |

प्रभावशाली व ऐतिहासिक व्यक्ति वही माना गया है जिसकी सोच स्वतंत्र रही है | जो किसी की थोपी गई विचारधारा को अपने जीवन का मार्ग नहीं बनाता बल्कि अपने जीवन की इमारत की भव्यता स्वयं गढ़ता है और अखंड विश्वास के साथ लक्ष्य को प्राप्त कर इतिहास रचता है | कहा भी गया है सुने सबकी, करें वही, जिसकी अनुमति आपकी आत्मा देती हो | आत्मा की आवाज सुन कर अपने जीवन को गति देनें वाला प्राणी कभी भी असफलता का न तो मुख देखता है न ही हताशा, निराशा व अवसाद का शिकार होता है , प्रारब्ध को ही अपने जीवन का श्रेष्ठ परिणाम समझ प्रफुल्लित मन से स्वीकार कर लेता है | हाँ , जीवन पथ संघर्ष व चुनौतियों भरे अवश्य होंगे किन्तु आजाद चिंतन वाले व्यक्ति कभी विचलित नहीं होते | स्वतंत्र चिंतन, मनन मंथन ही श्रेष्ठ व सत्य मार्ग दिखलाने का कार्य करता है | स्वतंत्र व सम्यक चिंतन से जुड़ने की कोशिश हमारे जीवन में सार्थक उपलब्धियाँ अर्जित कराता है हमारे सफल संतुष्ट जीवन का मूलाधार हमारी सोच की धुरी पर केन्द्रित है |

कुछ नया करने का साहस और जुनून आजाद ख्याल की टोलियों में पाए जाने वाले कुछ चुनिंदे लोगों में ही होते हैं , ऐसे लोग न आग से खेलने में घबराते हैं न ही झुलस जाने के परिणाम की चिंता करते हैं | निश्कर्षतः ऐसे व्यक्ति जमाने की परवाह किए बिना एक ऐसी लकीर खींच डालते हैं जिसे भावी पीढ़ी मिटा तो नहीं पाती बल्कि उस पथ की अनुगामिनी अवश्य हो जाती है | ऐसे ही विरले लोग खुले आसमान में ऊँची उड़ान तय करते हैं , सपनों में मनचाहा रंग भरते हैं और धरती को एक चमत्कार भेंट स्वरूप सौंप देते हैं | हमारी धरती के जितने भी आविष्कर्ता हुए जिनकी खोजों की बदौलत मानव सम्यता ने सुई से लेकर चाँद तक के सफर की यात्रा तय की है , निःसंदेह उनके मन की उड़ान , आसमान को छूने के लिए फड़फडाते पंखों ने कभी विश्राम नहीं लिया होगा , ऐसे ही आजाद लोग दुनिया की तस्वीर बदलने का ज़ज्बा रखते हैं |

अंततः विलक्षण व्यक्ति सत चिंतन व स्वतंत्र सोंच की बुनियाद पर ही अपने जीवन के साथ संसार में भी व्यापक परिवर्तन का निमित माना गया है | कहते हैं कि सोच तेरी बदली तो नजारा बदल गया, किश्ती ने बदला रूप तो किनारा बदल गया |

ओम प्रकाश यादव

 

 

 

 

 

लेखक डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल
झुमरीतिलैया, कोडरमा, के प्राचार्य हैं.

चिन्तन – ०४

शैक्षणिक प्रतिबद्धताएँ –

बच्चों के छेत्र में कार्य करने वालों में विशेष कर शिक्षकों में अपेक्षित प्रमुख शीलगुणों ( Traits ) में- कोमल हिर्दय, संवेदनशील, मृदुभाषी व्यक्तित्व, परानुभूति संपन्न व्यक्तित्व, वात्सल्यता, ममत्व, बच्चों की तरह सोचने वाले, त्वरित निर्णय और बाल हित में सोचने वाले, समय देने वाले, आपातस्थिति में उपलब्ध होने वाले, परिपक्व मस्तिष्क वाले व्यक्तित्व, ज्ञानवान आदि होने चाहिए। साथ ही नेतृत्व का कमान उन्हें दी जानी चाहिये जो कुशलता के साथ समदर्शी भाव से पूरी टीम के साथ समयोजनशीलता, तारतम्य व समझ विकसित करें, तब जाकर ही नेतृत्व शैली प्रगाढ़ बन पाएगी।

बच्चों के छेत्र में कार्य करने वाले व्यक्तित्व के चुनाव में ध्यान दिये जाने की जरूरत है- लिखित परीक्षा, मौखिक परीक्षा। साथ साथ Aptitude Test से व्यक्ति के अंदर छिपे भाव को भी जाना जा सकता है। बच्चे देश के कर्णधार माने गये हैं, इस परिपेक्ष्य में बच्चों के अधिकार व सरंक्षण कर रहे व्यक्तियों के पारदर्शिता से चुनाव किये जाने से ज़िले, राज्य और राष्ट्र में इसका व्यापक प्रभाव दिख पायेगा।

शिक्षा व्यवसाय नहीं अपितु जीवन ध्येय है। शिक्षक के चरित्र, ज्ञान व प्रतिबद्धता से ही छात्रों के व्यक्तित्व का समग्र विकास एवं चरित्र निर्माण संभव है। शिक्षक में चार तरह की प्रतिबद्धता अतिआवश्यक है-

पहला- छात्रों के प्रति प्रतिबद्धता- यहां पाठ्यक्रम के विषयों को रोचक बनाना, छात्रों में मूल्य बोध कराना, साथ ही साथ छात्रों के जीवन को दिशा दिये जाने प्रथम प्रतिबद्धता है।

दूसरा- शिक्षक का विषय के प्रति प्रतिबद्धता- विषय पर नियंत्रण व प्रभावी ढंग से अभिव्यक्ति, साथ ही साथ नियमित अभ्यास अनिवार्य रूप से छात्रों को कराया जाना दूसरी प्रतिबद्धता के अंतर्गत आती है।

तीसरा- समाज के प्रति प्रतिबद्धता- शिक्षक को विद्यालय, महाविद्यालय एवं यूनिवर्सिटी के छात्रों में सामाजिक जागरूकता, चेतना, संवेदना जगाने एवं उसमें राष्ट्र भक्ति के संस्कार देने के संभावित प्रयास किये जाने चाहिए।

चौथा- स्वयं के प्रति प्रतिबद्धता- शिक्षा देना व्यवसाय नही, अपितु ध्येय है। शिक्षा देना यह मनुष्य के निर्माण का कार्य है।

उपरोक्त चार तरह की प्रतिबद्धता से छात्रों के व्यक्तित्व का समग्र, सर्वांगीण एवं चहुमुँखीं विकास की जा सकती है। शिक्षक अगर ज्ञानवान, प्रखर, ओज वान, कौशल विकास में निपुण, अभिप्रेरणात्मक स्तर बढ़ाने में निपुण, प्रतिस्पर्धात्मक चुनौती से छात्रों का सामना करवाने में निपुण होंगे, तो छात्रों के परिष्कृत व्यक्तित्व निर्माण में शिक्षक अपनी अद्वितीय भूमिका का निर्वहन कर पाएंगे। जैसे शिक्षक होंगे, वैसे समाज का सृजन होता दिखेगा।

गम न करें – १७

बे-मौके सब शरीफ

मतलब यह नहीं कि यह सीधे तौर पर आपके बारे में हैं. मतलब यह है कि यह उन सभी के बारे में है जो मौके पर शरीफ बनने का ढोंग रचते हैं और समय आने पर दूसरों को आगे कर खुद उनका समर्थन अथवा उनके साथ अथवा उनके पीछे चलने को तुरंत तैयार हो जाते हैं. इसलिए बे-मौके सब शरीफ से हमारा तात्पर्य यह है कि मौका आने पर अपनी शराफत दिखाने से कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता, पर यह कि सिर्फ ख़बरों में आने के लिए या कि सिर्फ दिखावे के लिए.

आप कथनी और करनी में जितना कम अंतर रख पाते हैं उतने ही आप चरित्रवान होते हैं, यह नहीं कि आप चरित्रवान तो हों पर अवसर आने पर आप खिसक लें. यहाँ मेरा यह सब लिखना आप में से बहुतों को खल रहा होगा पर क्या करें तारीफ बनती भी होगी तो आप इसे मेरा दंभ न समझ ले इसलिए यह साफ करना जरुरी है कि मै इस लेख के माध्यम से आप सब को कुंठित नहीं करना चाहता हूँ. मेरा उद्देश्य बस इतना है कि हम अपने चरित्र के स्तर को उस ऊँचाई तक ले जा सकें जहाँ हम सचमुच ही अपने कथनी और करनी अंतर नहीं कर सकें अर्थात जैसा भी हम सोचें अथवा कहें उसपर चल भी सकें.

थोड़ी देर के लिए यह लेख आपको गप्पबाजी लग सकती है पर आप जरा ध्यान देकर इन बातों को सोचेंगे तो यही पाएंगे कि हम में से कितने ही अवसर आने पर किसी जन-कल्याणकारी कार्यों के लिए समय निकल पाते हैं? अधिकतर का उत्तर यही होगा कि अपने काम से फुर्सत मिले तभी ना. सही भी है, पर यह तभी संभव हो पाता है जब आप समय निकालना चाहें. क्या आप अपने परिवार के लिए समय नहीं निकाल पाते, क्या आप अपने किसी निजी कार्य के लिए समय नहीं निकाल पाते यदि आपका उत्तर हाँ है तो समस्या यह है कि समय आपको निकालना होता है इससे पहले कि समय आपको निकाल दे.

महत्वपूर्ण यह नहीं कि आप किन बातों अथवा कार्यों के लिए समय निकाल पाते हैं अपितु यह कि आप किन बातों अथवा कार्यों के लिए स्वयं को अनुकूल पाते हैं. यदि नहीं तो फिर आप चाहें कि उक्त कार्यों के लिए भी आप समय निकालें. क्योंकि यह आपके ही हाथों में होता है पूर्णरुपेण. आप टालमटोल के शिकार महसूस होते हैं यदि आप चाह कर भी समय प्रबंधन नहीं कर पाते और इसका ठीकरा दूसरों के सर फोड़ने को उद्दत रहते हैं.

आईये इस उधेड़बुन से निकालें जीवन बहुत खुबसूरत है, इसका आनंद लीजिये, नहीं समझ आ रहा हो तो किसी मनोवैज्ञानिक से जरुर मिलें, आप पागल नहीं हैं पर इस स्थिति में अधिक देर रहना आपको जल्द ही उस श्रेणी में ला खड़ा कर सकता है, इसलिए कि कही और अधिक देर न हो जाये, अपने आपको, अपने लिए कुछ ऐसा करें जिससे आपके मन, आत्मा और चित्त को प्रसन्नता होती हो, साथ ही दूसरों की प्रसन्नता का कारण हो ऐसे कृत्यों में स्वयं को उलझाएँ.

इसलिए गम न करें खुश रहें.

चिन्तन – ०३

सुप्रभात, आज का दिन मंगलमय हो एवं उमंग, सार्थक चिंतन, हर्षोल्लास में व्यतीत हो।

देश की आजादी सही मायने में तभी चरितार्थ हो सकती है जब देश मे लिंग भेद के नाम पर वर्गीकरण न हो, महिलाओं, बच्चों के अधिकारों की रक्षा हो व सम्मान मिले, शिक्षा व आजादी मिले। जीवन की दिशा तय करने का अधिकार मिले, अपने रुचि के मुताबिक अपने कैरियर को संवारने का मौका मिले, आजाद भारत में किसी भी महिला/बच्चों को अपना कैरियर चुनने का अधिकार भारतीय संविधान के मूल में वर्णित है जिस पर सारगर्भित अमल की जा सके। जीवन में महिलाएं / बच्चे इतना सक्षम बनें की अपनी जिंदगी की जरूरतों को खुद पूरा कर सकें, परजीवी प्रवृति त्यागकर आत्मनिर्भर, स्वाबलंबन की ओर उन्मुख हों।

महिलाएं/बच्चे इसके लिये माता-पिता, परिवार पर आश्रित न रहें, बल्कि अपना खुद का अस्तित्व बनायें। किसी के ऊपर आश्रित रहने से जरूरतें पूरी होती हैं, सपने नहीं। जीवन का आत्मस्वाभिमान सपनों को पंख दिये जाने में निहित है। खुद के सपनों को साकार बनाने के लिये पतंग की डोर अपने हाथों में रखनी जरूरी है। 21 वी सदी में महिलाओं, बच्चों को पितृसत्तात्मक व्यवस्था से निकलकर खुद आत्मनिर्भरता की ओर उन्मुख होने पर बल दिये जाने की जरूरत है, ताकि भारत उन्नति के बहुआयामी आयाम को छू पायें।

जिस देश की महिलाएं, बहनें, पत्नियाँ, माँ, बच्चे ताकतवर होंगे, वह देश समृद्धता की ओर उन्मुख होगा, अतुल्यता की ओर बढ़ेगा। देश के संविधान में लिंग भेद के नाम पर असमानता को दूर किये जाने पर बल, भातृत्व भावना को प्रबल किये जाने पर जोर, विश्व बंधुत्व की भावना पर बल आदि को तवज्जो दिये जाने की जरूरत है। किसी देश की संविधान से वहाँ के नागरिकजनों को मार्गदर्शन प्राप्त होता है।  जय हिंद, जय भारत।

चिन्तन – ०२

शुभ प्रभात , आज का दिन मंगलमय और हर्षोल्लास में व्यतीत हो। जीवन की सार्थकता मौलिक चिंतन, सर्जनात्मक अभिव्यक्ति , निष्काम कर्म, सत्यग्राही , श्रमशीलता, सद्व्यवहार, शालीनता, उदारता, ईमानदारी, सच्चरित्रता, न्यायनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ, धर्मनिष्ठ, आध्यात्मिक चिंतन, अन्तःकरण की शुद्धता आदि में निहित है। उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तव्य की एक परिष्कृत जीवन पद्धति है जिसे आत्मसात करने पर व्यक्ति के भीतर आत्म संतोष और बाहर सम्मान प्राप्त होता है। वेदों में, आत्मा के परिष्कृत स्तर को परमात्मा की संज्ञा दी गयी है और उत्कृष्टता से भरा पूरा अन्तःकरण ही ब्रह्मलोक है। विवेकानंद का एक विचार दिल में आह्लादन की स्थिति लता है जो “कोई भी समाज अपराधियों की सक्रियता की वजह से गर्त में नही जाता, बल्कि अच्छे लोगों की निष्क्रियता इसकी वजह होती है।” निडर बनें, कुछ प्रतिबद्ध लोग ही देश के लिये भलाई का कार्य कर सकते हैं।

इंसान के अंदर नैसर्गिक गुण- ममत्व, वात्सल्य, परानुभूति, कोमल हृदय, सच्चरित्र, बौद्धिक चातुर्य, निर्णय लेने की छमता, मर्यादा को पालन करने वाला, अपनी परिसीमाओं को समझने वाला, कुशल व्यवहार, परोपकारी, समाज के लिये लोकोपयोगी आदि हैं। इन नैसर्गिक गुणों से निर्मित व्यक्ति समाज के सृजनात्मक कार्यों में अपनी अद्वितीय भूमिका का निर्वहन करते हैं। व्यक्ति के किये गये कर्म से ही इंसानी स्वभाव या पशु अथवा दानव प्रवृति का बोध कराती है।

नेतृत्व के नैसर्गिक गुण जन्मजात होते हैं, इसे अर्जित नहीं किया जाता है। मनोवैज्ञानिको ने नेतृत्व के शीलगुण (Traits) सिद्धांत में इस संप्रत्यय की पुष्टि की है। मार्टिन लूथर किंग, महात्मा गाँधी, हिटलर, नेपोलियन आदि कई जन्मजात नेतृत्व योग्यता वाले व्यक्तियों को हम याद करते हैं। नेतृत्व के शीलगुणों में व्यक्ति के शारीरिक गुण- ऊँचाई, वजन, स्फूर्ति व अच्छा स्वास्थ्य /व्यक्तित्व शीलगुणों में- बुद्धि, आत्मविश्वास, शब्दाडंबर, प्रभुत्व, समायोजन, सामाजिकता, परिश्रम प्रियता, कल्पना व दूरदर्शिता, चमत्कार, संकल्प शक्ति/ईमानदार / अच्छा चरित्र / कर्मठ व निष्ठावान / प्रजातांत्रिक शैली से कार्य / कार्य उन्मुखी / समूह उन्मुखी / सहनशीलता / धैर्यवान / निर्भीक आदि होते हैं। नेतृत्व की कुशलता से ही समाज में परिवर्तन की अपेक्षा की जा सकती है।

चिन्तन – ०१

शुभ प्रभात, आज का दिन मंगलमय हो एवं उमंग, सार्थक चिंतन, आत्मोत्थान की ओर अग्रसर एवं हर्षोल्लास मे व्यतीत हो।

आज का विषय : शिक्षा

अनुशासन, ईमानदारी, विवेक, विनम्रता, त्याग, शिष्टाचार, सत्यता, सदाचार, सच्चरित्र, परानुभूति, मिर्दुभाषी, कोमल ह्रदय, धैर्यवान, कर्तव्यनिष्ठ, कुशल नेतृत्व संचालन आदि शीलगुणों ( Traits ) सरीखे संस्कार, मूल्याधारित शिक्षा में अनिवार्य रूप से लागू की जानी चाहिए। मूल्याधारित नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रमों में अनिवार्य रूप से क्रियान्वित किया जाना चाहिए, जो व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिये अनिवार्य घटक सिद्ध होगा।

ऐसे संस्कार निर्मित किये जाने से व्यक्ति के आत्मशक्ति को उन्नत किया जा सकता है। शैशवावस्था में बच्चों का मन कोरा कागज की तरह होता है, परिवार बच्चों की प्रथम पाठशाला है, यह समाजीकरण का प्रथम स्तर है, जहाँ अभिभावक व अन्य पारिवारिक सदस्यों का आचरण आदर्श-उदत्त भावना से परिपूर्ण होने चाहिए। मूल्यपरक शिक्षा के प्रति सकारात्मक नजरिया राष्ट्रीय प्रगति के लिये आवश्यक सोपान है। समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ाने के हरसंभव प्रयास किये जाने चाहिये।

आजकल नैतिक मूल्यों में (अवमूल्यन) कमी, एकल परिवारों (Nuclear Family) का चलन, समाजीकरण (Socialization) की शुद्ध प्रक्रिया का अभाव, भौतिकवादी उपयोग में बढ़ावा, परिवार में विघटन की स्थिति, कर्तव्यनिष्ठ न होना, घर का दोषपूर्ण वातावरण, आनुवंशिक दोष आदि के चलते नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन दिख रहा है। एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिये नैतिक शिक्षा को संपूर्ण राष्ट्र के सभी Education Institutions (शैक्षणिक संस्थानों) में अनिवार्य रूप से लागू किये जाने पर बल दिया जाना चाहिये, ताकि आध्यात्मिक प्रखरता का अद्यतन विकास हो पाये। संतुलित व्यक्तित्व के लिये व्यक्ति मे IQ (Intelligence Quotient) (बुद्धि-लब्धि), EQ (Emotional Quotient) (भावनात्मक-लब्धि) एवं SQ (Spiritual Quotient) (आध्यात्मिक-लब्धि) तीनों गुणों का संतुलित समन्वय होना जरूरी है।

गम न करें – १०

गम करना बेमानी है. करना है तो जतन करें, जिससे ग़मज़दा लोगों की जिंदगी से गम के बादल दूर हों, और वह भी आपकी जमात में शामिल हो खुश रहना सीख ले.

किसी शायर ने खूब कहा है कि “दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है, औरों का गम देखा तो, मैं अपना गम भूल गया.”

मतलब साफ़ है, गम तो है पर उससे कहीं ज्यादा खुश रहने के बहाने मौजूद है, जरुरत उसको पहचानने भर की है. जब सभी को पता है कि गम से कुछ हासिल नहीं हो सका है किसी को अब तक तारीख़ में तो भला हमें कैसे हासिल हो सकता है.

हम अक्सर ही दूसरों की ख़ुशी का कारण पता करने लग जाते हैं, बजाय इसके कि आप उसकी ख़ुशी में दिल से शामिल हो सकें. आप दूसरों के दुःख में शामिल होते हैं, पर उसमे आप ख़ुशी का अनुभव नहीं कर पाते हैं.

कहा भी गया है चिंता से चतुराई घटे, दुःख से घटे शरीर…

आप तय कर लें, गम करना है कि गम के कारणों को ढूंढ कर उसको ख़ुशी तब्दील करने का जरिया तलाशना है. सबसे बड़ी बात होती है कोशिश, जिसने की नहीं वो गम कर सकता है, वरना कोशिश करने वालों का तो कुदरत भी साथ देती है. हालात जैसे भी हों उसपर तंज कसना और उसका रोना-रोना बहुत आम बात है, ख़ुशी तो इस बात में है कि आप गमगीन भी हैं इस बात का पता औरों को लगता तक नहीं, और आप उसके सामने से गुजर जाते है.

हर हाल में खुश रहना आपको आपके बुरे हाल से निकलने में मददगार होता है बजाय इसके कि आप झख मारते फिरें. अपना रोना कभी न रोयें, इससे लोग आपके गम को कम तो कर नहीं पाएंगे उलटे आपसे और कन्नी काटने लगेंगे. जितना हो सके सरलता से पेश आयें. ऐसा भी नहीं कि डींगे ही मारने लगें.

हमें संतुलित व्यवहार को तरजीह देनी चाहिए. एक मुकम्मल इंसान बनने के रास्ते में मुश्किलें तो आयेंगी, पर उन मुश्किलों को पार करने के लिए ख़ुशी की राह अपनाएं, गम का नहीं. गम नहीं करने से सीधा मतलब है बेकार की चिंता, ऐसा बिलकुल न समझें की चिंतन जरुरी नहीं या सोच जरुरी नहीं, पर गम? उसका इससे कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए, तभी आप चिंतन-मनन-सोच-विचार आदि कर भी पाएंगे.

इसलिए गम न करें, सोचें और शुक्र अदा करें, कि देने वाले ने जो भी आपको दिया है, क्या उतना भी किसी के पास है भी क्या?

जारी….