आहत होती संवेदनाएं और हम

अब तक देखा गया है कि किसी भी फिल्म के प्रदर्शित होने पर प्रतिक्रियाएं आतीं थी और विवाद होने पर उचित/अनुचित विरोध हुआ करता था. वस्तुतः किसी भी फिल्म जो कि विशेष कर ऐतिहासिक मूल्य के विषय वस्तुओं पर आधारित हो तो उनके स्वप्न दृश्यों का फिल्मांकन बहुत ही सावधानी से किया जाना चाहिए. कहने को तो महिषासुर ने भी माता के विषय में अपमानजनक बातें कहीं थीं तो क्या हम इसी को बार बार दुहराते हैं? महिमा मंडित करते हैं? नहीं, हम फिल्मो के माध्यम से अच्छी बातों को प्रचारित-प्रसारित करते हैं.

एक समय था फिल्मे समाज का दर्पण होतीं थी अर्थात जो समाज में घटित होता था उनका ही चित्रण किया जाता था परन्तु आज-कल परिदृश्य कुछ और ही है, आज समाज में वही हो रहा दिखलाई पड़ जाया करता है जो कुछ भी फिल्मो में दिखाया जाता है. सचमुच हमारा समाज पूरी तरह से फ़िल्मी हो चला जान पड़ता है.

इन सबका सामाजिक सरोकार से जितना भी गहरा वास्ता हो पर, इतना तो तय है कि जब तक इनको हवा नहीं मिलती तब तक विवाद गहराता नहीं, इतिहास भरा पड़ा है ऐसे विवादित फिल्मो से पर आज कल तो लगता है कि सब कुछ फिल्मे ही तय करेंगी. क्या राजश्री प्रोडक्शन की फिल्मे बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलतीं? क्या ऐसी फिल्मे दर्शकों को पसंद नहीं आतीं? क्या दर्शक फिल्मो में हिंसा और नग्नता ही देखना पसंद करते हैं? ऐसा बिलकुल नहीं है.

आप पब्लिक डोमेन में किसी भी ऐसे प्रस्तुतिकरण से विचलित हो उठते हैं फिर आप पर्दों पर वही देखना चाहते हैं, फिल्मकारों के अनुसार किये गए सर्वे से यही अनुमानित है कि हिंसक दृश, उत्तेजक दृश्य, दुर्घटनाओं वाले दृश्य आदि दर्शकों में काफी लोकप्रिय है. मैं कहता हूँ क्या खाक लोकप्रिय हैं. क्या कैमरे की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए? क्या जिन दृश्यों को हम आम जीवन में सबके सामने देखना-सुनना नहीं पसंद करते उन्ही दृश्यों को हम परदे पर भला कैसे देख सकते हैं, हमें अपनी ही सोच बदलनी होगी वरना हमें वही परोसा जाता रहेगा और उसका ठीकरा भी हमारे सर फोड़ा जाता रहेगा यदि हम अब भी नहीं चेते.

फिल्म (ध्वनि समानांतर चित्रों का अपलक प्रक्षेपित अवलोकन) जिसमे किसी भी ऐसे दृश्य का समावेशन नहीं किया जाना चाहिए जो किसी भी प्रकार से दर्शकों को विचलित, असामान्य रूप से उत्तेजित अथवा भयभीत करती हो. यह एक सामान्य मापदंड है. जिसका अनुपालन आजकल की फिल्मो में शायद ही होता है.

आपको शायद याद हो आज से वर्षों पहले बन रही फिल्मों के दृश्यांकन में जिस प्रकार बंदूक की गोलियों से बने घाव, घूंसों की आवाज, बलात्कार के सांकेतिक दृश्य, तथा अन्य हिंसक दृश्यों को जिस प्रकार फिल्माया जाता था उनको देखने से दर्शक असहज नहीं हुआ करते थे, परन्तु  तकनीक के विकास के साथ-साथ उनके परिष्कृत होने से वही दृश्य और भी ज्यादा सजीव होते गए और हमारी संवेदनाएं निर्जीव. आज हम सड़क पर हुए हादसों के दृश्य तुरंत शेयर करने लग जाते हैं बजाये इसके कि उस दुर्घटना की सूचना पुलिस को देने और सहायता के लिए उद्दत होने के. इसका कारण एक मात्र यही है कि हमारा मस्तिष्क आदी हो चुका है ऐसे दृश्यों को देखने/झेलने को, तो इसका जिम्मेवार कौन है? जी सही कहा, हम स्वयं अपनी संवेदनाओं के हत्यारे हैं.

अपने विवेक से काम लें, हिंसा नहीं करें.

मजबूरीनामा

|| मजबूरीनामा ||

बापू से संबंधित जानकारी आपको इस इंटरनेट की दुनिया में बड़ी आसानी से उपलब्ध हो सकती है, पर आज हम उत्तर गांधी काल की दो अलग-अलग अवधारणाओं पर चर्चा करेंगे, जो आज के वर्तमान समाज की रूपरेखा को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित करती हैं. पहली अवधारणा गाँधी को अहिंसा के परम पुरोधा के रूप में प्रस्तुत करती है, वहीं दूसरी अवधारणा उन्हें भिरू स्वभाव का सिद्ध करती है जिसके कारण ही उन्होंने अन्यान्य अवसरों पर अपने मौन को न तोड़ना उचित समझा, जिस कारण अंततोगत्वा उनकी हत्या कर दी गई थी.

विचारकों के मतानुसार गांधी अपने आप में स्वयं एक अवधारणा के वाहक थे और कईयों के लिए शोध का विषय भी. अहिंसा के पुजारी के लिए अहिंसा से लेश मात्र भी अलग कोई भी व्यवहार हिंसा की श्रेणी में आता था, और उनके इसी सोच ने उनको समकालीन क्रांतिकारियों से अलग कर रखा था, जो किसी भी कीमत पर आजादी चाहते थे. नेहरू और जिन्ना दोनों ही प्रिय थे उनको, जैसे किसी पिता को अपनी संतान प्रिय होती है. परन्तु संतानों ने उनकी कितनी मानी ये पूरा विश्व जानता है. उनके जिद के आगे बापू ने घुटने टेक दिए थे, विभाजन का कलंक हमारे इतिहास के साथ जुड़ चुका था. देश आजाद तो हो चुका था पर यह उनके सपनो का भारत नहीं था.

 लोगों को कहीं न कहीं उनकी बातों में विरोधाभास भी देखने को मिलता है, एक ओर वे कहते थे की ‘अहिंसावादी बनो‘, दूसरी ओर “अन्याय न करो, और न ही सहो‘” तो, न करो तक तो ठीक, पर न सहो के फेर में लोग भ्रमित हो गए थे, उन्हें लगा की अनशन करना- अन्याय सहना है, और फिर कुछ लोगों की सहनशीलता जवाब दे गयी, और वे गाँधी मार्ग से अलग होते चले गए, अंततः देश के विभाजन का दंश उनकी समाधी में परिणत हुई. जहाँ एक ओर उत्तर गाँधी काल में बुद्धिजीवियों ने स्वयं को गाँधी का समर्थक और उनके विचारों का पोषक के रूप में प्रस्तुत किया वहीं दूसरी ओर युवाओं ने स्वयं को असहनशील रखा और गाँधीवाद को गांधीगिरी की संज्ञा दे डाली. अब “मैं गाँधी नहीं.”, मुझे गाँधी मत समझना, कोई एक गाल पर थप्पड़ जड़े तो तुम उसके दोनों गाल पर जड़ दो, आदि संवादों ने समाज में अपनी जगह बनानी शुरू की.

 इन सबसे अलग गाँधीवाद आज भी जिन्दा तो है परन्तु वह मात्र किताबों, विचारों, आदर्शो के गलियारों में भटकता हुआ. हम सभी तस्वीरों पर हार तो चढ़ा आते हैं पर उनके आदर्शों को अपनाने में हार जाते हैं, हम तो कृष्ण को भी चोर कह जाते हैं पर शायद यह नहीं सोचते की उनके द्वारा किये सत्कार्य का एक प्रतिशत भी कभी हम नहीं कर सकते, किंचित, नकारात्मकता अधिक आकर्षक होती है, रामायण के बारे में  बच्चे भी जानते हैं पर उनमें से बिरले ही राम की नक़ल उतारते नजर आते हैं अधिकतर तो रावण की हँसी को ही दुहराते दिख जाते हैं. हम एक पल के लिए गाँधी को उनके ही वाद का सही प्रतिरूप न माने, यह भले ही स्वीकार हो परन्तु यह क्या! हम तो अहिंसा को ही नकारते दिख रहे हैं.

 आज, यदि अहिंसा से कुछ प्राप्त नहीं होता दिख रहा तो भला कौन सा कार्य हिंसा (आतंकवाद/नक्सलवाद/अलगाववाद/उग्रवाद) से होता दिख रहा हो कोई बताये मुझे. अहिंसा कोई गाँधी की थाती नहीं थी, वे तो उसके समर्थक और प्रबल पोषक भर थे दीगर बात यह है की उसमे वो कितने सफल अथवा विफल रहे! अथवा प्रश्न यह होना चाहिए की हम अपने आपको कहाँ पाते हैं? सच पूछिये तो हम मौके के यार भर हैं, बाते तो खूब बड़ी-बड़ी करेंगे पर जब अपने पर आयगी तो निकल लेंगे. गाँधी नोट पर हैं. सच पूछिये अगर वो वहां नहीं होंगे तो कुछ दिन बाद लोग उनका नाम तक भूल जायेंगे, अवधारणाओं की तो बात ही क्या है. अब जहाँ साम-‘दाम’-दंड-भेद में से पहले पर बात नहीं बनती तो दूसरा विकल्प (मजबूरी) और फिर गाँधी जिन्दाबाद! तीसरे और चौथे तक जाने की नौबत ही नहीं आती है. प्रश्न है यह मजबूरी किसने बनायी? हम क्यों मजबूर हो गए और गाँधी को उसका प्रतिरूप बना बैठे.

 आवश्यकता, इस बात के अर्थ को समझने की है की किसी भी चीज का सही अनुप्रयोग कैसे, कब और कहाँ हो सकता है अथवा होना चाहिए इस बात के प्रति हमारी अपनी जागरूकता. हम जितने किसी भी चीज़ के प्रति जागरूक होंगे उतने ही हम उस चीज़ से लाभान्वित भी हो पाएंगे, यह अलग बात है की हम पहले तो जागरूक होना ‘चाहें’. भला ये कोई जबरदस्ती की चीज़ थोड़े ही है. बात गाँधी से से चल कर आगे दूसरी दिशा में न निकल जाये (लगभग निकला ही समझिये) इससे पहले साफ-साफ शब्दों में यही कहना चाहता हूँ की आज गाँधी जी हमारे बीच जिस रूप में भी हैं उन्हें स्वीकार करिए, स्वीकार करिए उनके आदर्शो को और ऐसे ही सलाह देते रहिये दूसरों को कि ‘वो‘ उनके आदर्शों को अपनाएँ, क्योंकि ‘आपने’ तो मजबूरीनामा पर पहले ही हस्ताक्षर कर दिए हैं.

“मजबूरी का नाम- महात्मा गाँधी”
आखिर क्यों जुड़ा बापू के नाम से यह अनचाहा तमगा?

जीविका के लिए जोखिम

मेलों में अक्सर देखने को मिल जाते हैं ऐसे कलाकारों के समूह जो आजीविका के लिए इतने जोखिम भरे व्यवसाय को अपनाते हैं. बहुत दुःख होता है की अपने देश में ऐसे कला की कोई कद्र नहीं. महज कुछ रुपये खर्च कर हम उस रोमांच का अनुभव तो कर लेते हैं परन्तु उसके पीछे के सत्य से मुह भी मोड़ लेते हैं.

14 वीं शताब्दी के रोम में/से लैटिन शब्द सर्कुलर लाइन से आहरित शब्द सर्कस एक सर्कुलर लाइन अर्थात रेखांकित घेरे के अन्दर किसी प्रतियोगिता अथवा करतब का आयोजन, सर्कस कहलाने लगा.

विदेशो खास कर रूस, चीन एवं जापान आदि में इसके लिए अलग, स्थायी रूप से निर्मित स्थान हैं जहाँ नित्य नए करतब दिखाए जाते हैं. वहां मनोरंजन के विशिष्ट साधन के रूप में इसे ख्याति प्राप्त है. अपने यहाँ सिनेमा घरों को छोड़ (अब पीवीआर) दूसरा सार्वजनिक मनोरंजन के नाम पर कोई विकल्प नहीं दिखता है, ऐसे में मेलों में अक्सर ऐसे व्यवसाय को ही लगाना पसंद किया जाता है जो कोई भी पूरे वर्ष चक्र में नहीं देख पाता हो, और लोग बरबस खिंचे चले जाते हैं.

ऐसे ही एक मेले में जो दुर्गा पूजा के अवसर पर सेंट्रल कॉलोनी, मकोली में इस वर्ष भी प्रतिवर्ष की भांति आयोजित हुआ जिसमे इस वर्ष बच्चों के पुरजोर आग्रह पर विवश होकर ‘दुर्गेश्वरी मारुती सर्कस‘ के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत ‘मौत का कुआँ’ देखने का अवसर (अवसर नहीं मैं तो सौभाग्य कहूँगा) प्राप्त हुआ तो मैं उसे अपने कमरे में रिकॉर्ड करने से खुद को नहीं रोक पाया. और बच्चो के आग्रह पर इसे आप सबके साथ अपने अनुभव को बाँटने से भला कैसे रोक पाता.

अंत में बस यही कहना चाहूँगा की महँगी-महँगी फिल्मो से जो मनोरंजन मिलता है उसकी एक अपनी अलग पहचान और महत्व है मैं कदापि उसे नकार नहीं रहा परन्तु जिस कला को आप सामने लाइव देखते हैं, उसका एक अलग ही आनंद है. तो आपको जब भी मौका मिले ऐसे अवसरों को मत चूकिए, क्योंकि ये आपका मनोरजन तो करते हैं पर अपनी जीविका के लिए जो जोखिम उठाते हैं उसका कोई सानी नहीं.

मन दुखी है!

आजकल के बच्चों को यह क्या होता जा रहा है कि पहले तो वो अपने स्कूल की जहाँ कि वो पढ़े हैं कभी या अभी भी पढ़ रहे हैं उनके पूर्व या वर्तमान में जो शिक्षक हैं उनके व्यंगात्मक फोटो व टिप्पणियों को खुलेआम धरल्ले से पोस्ट कर रहे हैं और उस पोस्ट को शेयर, फॉरवर्ड व लाइक किया जा रहा है. बिना इस बात की चिंता किये की इसके क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं?

चलिए धोड़ी देर के लिए इसे बच्चों द्वारा मन की खीज निकालने का माध्यम भर मान लेते हैं, पर यह कैसा बेबुनियाद आरोप है? और है तो कार्रवाई का यह कौन सा तरीका है? लोगो से बात की तो सबने सोशल मिडिया की ही बात की और कहा उन्हें यहीं से इसकी जानकारी हुई, और महज सोशल मिडिया पर यह बात फैला भर देने से हम भी किसी को कसूरवार मान ले यह तो कोई सभ्य समाज का लक्षण नहीं जान पड़ता. अब यदि तथाकथित रूप से उनपर यह आरोप लगा भी है तो क्यों नहीं यह मामला उचित कार्रवाई के रूप में सामने आया? इस रूप में क्यों भद्दे-भद्दे पोस्ट बनाकर उसे सोशल मिडिया पर पोस्ट किया जा रहा है?

विद्यालय के परीक्षा विभाग के प्रमुख एवं सेकंड इन कमांड पर लगाया गया तथाकथित आरोप न सिर्फ बेबुनियाद है बल्कि एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत बहुत बड़ी साजिश है. और इस साजिश को अंजाम तक पहुचाने का काम यहाँ के ही बच्चे कर रहे हैं और बड़ों को भी बरगला कर उनके सामाजिक पकड़ का फायदा उठाया रहे है और इस बात में साथ दे रहे हैं उस स्कूल के ही बच्चे जिन्होंने जैसे बीड़ा ही उठा रखा है की कौन दोषी है और उसको वो फेसबुक पर ही सजा दे डालेंगे.

स्पष्ट है कि अब तक आपके मन में यह विचार आ चूका होगा की आखिर क्यों? आखिर क्यों कोई भी इस प्रकार के दोषारोपण का दुस्साहस करेगा, वो भी समाज के किसी सम्मानित व्यक्ति के विरुद्ध. आपकी सोच को सलाम करते हुए यह बहुत ही स्पष्टता के साथ बताना चाहता हूँ की शिक्षक, जिनपर यह झूठा आरोप लगाया जा रहा है वे विगत २० से भी अधिक वर्षों से विद्यालय में कार्यरत हैं और अब कुछ गिने चुने वर्ष बचे हैं उनके कार्यकाल पूरे होने को, ऐसे में कोई शिक्षक इस तरह की हरकत करना तो दूर, सोच भी कैसे सकता है, विचारणीय है.

मेरे कार्यकाल में मैंने उन्हें कभी भी अभद्र भाषा तक का प्रयोग करते न तो देखा न सुना. यहाँ मेरे से तात्पर्य केवल मेरे नहीं बल्कि तत्संबधी जिन जिन लोगो से मैंने बात की उन्होंने इसे सोची समझी साजिश का ही नाम दिया और कहा की कई बार विद्यालय के लगभग पुराने शिक्षको में शुमार उनके नाम और समाज में लोगो से पहचान जान के कारण प्रायः लोग नामांकन के लिए उनसे संपर्क करने आ जाया करते थे.

यहाँ एक बात और स्पष्ट कर दूं की ऐसे लोगों में मैं स्वयम भी शामिल रहा, पर शिक्षक के सुझाये रास्ते अर्थात सामान्य प्रक्रिया का अनुसरण कर ही मैं चला और कई विद्यार्थियों के नामांकन करवाए भी जबकि बहुतों का नही भी हो सका. नामांकन के सिलसिले में उनसे तथाकथित व्यक्तियों द्वारा ऑफर्स भी दिए गए जिन्हें शिक्षक ने विनम्रता से अस्वीकार कर दिया था, परन्तु बहुत कहने पर भी जब उन्होंने प्रक्रिया से आने की सलाह दी तो उक्त लोगों द्वारा उन्हें धमकी भी दी गयी, पर शिक्षक ने उन्हें नजरंदाज कर दिया, क्योंकि यह उनके लिए दिनचर्या की बात थी, और अब ऐसे ही लोगों द्वारा अपनी दी गयी धमकी को सार्थक सिद्ध करने के लिए समाज के ही कमजोर/अबोध कड़ियों को कन्धा बनाकर शिक्षक के सम्मान की अर्थी उठाई जा रही है, और अब भी हम चुप बैठे तो वह दिन दूर नहीं जब आये दिन ऐसी शिकायतों को बतौर हथियार की तरह उपयोग में लाना आम बात हो जायगी. और शिक्षक जैसे सम्मानित और मर्यादित लोगों का समाज में जीना दूभर हो जायगा.

आग्रह है की ऐसे बच्चों के अभिभावाक जागें और देखें की उनके बच्चे जिन्हें वे प्रायः घर के अन्दर ही पाकर समझ लेते हैं की उनकी संगती अच्छी है, भ्रम में जी रहे हैं, सनद रहे की सोशल मिडिया के दुष्परिणाम से सम्बंधित अभी तक हजारो ऐसे मामले देखने को मिलते रहे हैं.

 मेरी समाज के सभी बुद्धिजीवियों से अपील है की वे आगे आयें और चाहे वह विद्यालय प्रशासन हो अथवा नागरिक प्रशासन उन पर यह दवाब बनायें की ऐसे अभद्र टिप्पणियों को सार्वजनिक कर किसी के मर्यादा को ठेस पहुचाने का काम कर रहे समाज के उन शरारती तत्वों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करे जिससे की आगे से कोई भी इस तरह की गैरजिम्मेदाराना हरकत करने से पहले सौ बार नहीं हजार बार सोचे.

हैप्पी बर्थ डे, डियर – हिंदी

यूं तो हिंदी भाषा का जन्म कब हुआ यह कोई नहीं बता सकता, फिर प्रश्न यह भी है कि फिर हम यह दिवस क्यों मानते हैं? तो इसके पीछे का तर्क यही दिया जा सकता है की इन दिवसों से हम किसी भी सम्बंधित चीज का इतिहास जान पाते हैं तथा उनकी उपयोगिता को पुनः स्थापित कर अपना हृदयोद्गार अभिव्यक्त कर पाते हैं, जिससे की भावी पीढियां उनके महत्व से अवगत होती रहें.

14 सितम्बर, 1949 को संविधान सभा में हिन्दी की स्थिति को लेकर हो रही बहस जो की 12 सितंबर, 1949 को 4 बजे दोपहर में शुरू हुई और दो दिन बाद अर्थात आज ही के दिन 14 सितम्बर 1949 को समाप्त हो सकी, जिस दौरान तत्कालीन प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने इसकी महत्ता को बताया वो भी अंग्रेजी में भाषा का प्रयुक्त करते हुए, अपने संक्षिप्त वक्तव्य में उन्होंने कहा कि:

“अंग्रेज़ी से हम नजदीक आए हैं, क्योंकि वह एक भाषा है. अंग्रेज़ी के जगह पर हमने एक भारतीय भाषा को अपनाया है. इससे अवश्य हमारे संबंध प्रगाढ़ होंगे, विशेषतः इसलिए कि हमारी परंपराएँ एक ही हैं, हमारी संस्कृति एक ही है और हमारी सभ्यता में सब बातें एक ही हैं. अतएव यदि हम इस सूत्र को स्वीकार नहीं करते तो परिणाम यह होता कि या तो इस देश में बहुत-सी भाषाओं का प्रयोग होता या वे प्रांत पृथक हो जाते जो बाध्य होकर किसी भाषा विशेष को स्वीकार करना नहीं चाहते थे. हमने यथासंभव बुद्धिमानी का कार्य किया है और मुझे हर्ष है, और मुझे आशा भी है कि भावी पीढ़ी इसके लिए हमारी सराहना करेगी.”

प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने भी संविधान सभा से भाषा संबंधी बहस में भाग लेते हुए कहा कि:

“किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता. क्योंकि कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती. भारत के हित में, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्मविश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिंदी को अपनाना चाहिए.”

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस निर्णय को ऐतिहासिक बताया और संविधान सभा से अनुरोध किया कि वह ‘इस अवसर के अनुरूप निर्णय करे और अपनी मातृभूमि में राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में वास्तविक सहयोग दे.”

इस प्रकार 14 सितंबर भारतीय इतिहास में हिन्दी दिवस के रूप में जाना जाने लगा.

ये तो हो गयी इसके दिवस के रूप में मनाये जाने की कहानी, अब बात करते हैं आज-कल की इसकी स्थिति के बारे में जिसमे हम पाते हैं की यूं तो इसे सभी कार्यालयों में चाहे वह सरकारी हो अथवा गैर सरकारी हो धरल्ले से इसका इस्तेमाल हो रहा है सभी कागजों में अनुवाद के रूप में वो भी पृष्ठों के पीछे की ओर, दरअसल समस्या हिंदी कि नहीं समस्या हमारी है कि हम व्यवहार में नहीं लाने के कारण या फिर जिस रूप में हम हिंदी को व्यवहृत करते हैं वो कार्यालयी कार्यों के निष्पादन में नहीं चलती.

मेरे विचार से इसका मूल कारण है कि जब वह अत्यधिक शुद्धता से प्रयुक्त होती है तो तत्सम के करीब चली जाती है और तद्भव में थोड़ा समझना तो आसन हो जाता है पर समझाने में हालत ख़राब हो जाती है. चलिए इसे एक उदाहरण से समझने का प्रयत्न करते हैं, क्योंकि जब आप इसे पढने यहाँ तक आये हैं तो हम आपकी बुद्धिमत्ता पर संदेह तो कदापि नहीं कर सकते.

आपको शायद याद हो वह सामाजिक सन्देश अग्रसारित करने वाला अनुप्रयोग जिसे आंग्ल भाषा में (whatsapp) कहा जाता है, बीते दिनों उस पर एक सन्देश हिंदी भाषा के प्रयोग में होने वाली कठिनाईयों को दर्शाने वाला व्यंग के रूप में प्रचारित किया गया जिसमे एक व्यक्ति ऑटो चालक से कहता है कि “हे! त्रिचक्रीय वाहन चालक, पूरे नगर के परिभ्रमण में कितनी मुद्राएँ व्यय करनी होंगी?” अब देखिये इन महाशय को, इन्होने हिंदी भाषा का प्रयोग इतने चरम पर किया कि सामने वाला सकपका के रह गया.

दरअसल हमें हिंदी कि व्यापकता को समझते हुए उसको प्रयोग में लाना होगा जैसा कि हम अन्य भाषाओं के साथ करते हैं, आप देखेंगे कि सामान्य अंग्रेजी और न्यायालयों में प्रयुक्त अंग्रेजी में भी तो फर्क होता है.  मेरे हिसाब से देखेंगे तो यही पाएंगे कि हिंदी का जो फैलाव है उसमे हमें उपयोग कि सीमा, स्थान व सामने वाले की पकड़ का ध्यान रखना होता है. यह नहीं कि बस झाडे चले गए, हमें भाषा का उद्देश्य समझना ही होगा कि भाषा का प्रयोग हम अपनी बातों के भावों को सामने वाले तक स्पष्टता के साथ पहुंचाने के लिए करते हैं न कि अपनी विद्वता दिखाने के लिए, हाँ, विद्वता भी दिखाएँ जहाँ आवश्यकता हो, वहां ऐसे-ऐसे हिंदी के क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग करें कि जो कोई अगर पढ़े अथवा सुने उसे बिना शब्दकोष के बात पल्ले ही न पड़े.

क्योंकि, अब यह हमारे ही उत्तरदायित्व के अंतर्गत है पूर्णरूपेण कि इसे इसका सम्मान मिल सके.

1949 से ही मान ले तो हिंदी अब तक वरिष्ठ नागरिक भाषा  बन चुकी है और हम अपने प्रयोग करने के तरीकों में यदि अब भी सुधार नहीं लाते तो जल्द ही यह बूढ़ी हो जायगी और इसी वर्ष की भांति प्रति वर्ष हम इसका दिवस ऐसे ही मानते भर रह जायेंगे.

 

तेजपत्ता

तेजपत्ता,

जी साहब! यह वो चीज़ है जो आपके भोजन के लिए बनाये गए व्यंजनों में जब शामिल होता है तो उसका स्वाद बढ़ा देता है, पर सबसे पहले थाली में से इसे ही बाहर कर दिया जाता है. यह इसका दुर्भाग्य है या यह सीधा प्राकृतिक व्यवस्था की भेंट चढ़ जाता है, विचार का विषय हो सकता है कि कोई तेजपत्ता अथवा उस जैसी प्राकृतिक व्यवस्था का शिकार क्यों हो.

किसी भी निर्माण में चाहे वह समाज (यहाँ समाज से तात्पर्य स्वच्छ, स्वस्थ्य एवं निष्पक्ष समाज से है) के निर्माण की बात हो, अपने देश के या फिर भोजन के ही, सभी घटकों, कारकों व वस्तुओं की अपनी एक निश्चित भूमिका होती है अथवा आवश्यकता होती ही है, चाहे वह छोटी ही सी चीज़ ही क्यों न हो?

पीढ़ियों से हम जिस अलगाव को झेलते रहे हैं उसका निवारण जितनी भी कट्टरपंथी विचारधारा के समर्थक हैं जो पुराणपंथी विचारधाराओं से चिपके रहने को बेहतर भविष्य कि सीढ़ी मानते हैं, तो सनद रहे कि यह सीढ़ी उन्हें आकाश को नहीं ले जाती है, यह उन्हें कुएं से होती रसातल में ले जाती है.

आवश्यकता अनुरूप सामाजिक योगदान देना उपादेयता का सर्वप्रथम लक्षण होता है, जो कि किसी के लिए भी उसके सामाजिक वर्चस्व को प्रतिष्ठापित करने के साथ सुदृढ़ता का मुख्य कारक होता है. आपकी जितनी क्षमता है उतना योगदान करें, आप पेट नहीं भर सकते किसी का तो उसका मन भरें. आप हजार कमाते हैं तो दहाई में तो मदद करें, यदि लाख, तो सैकड़े में और यदि करोड़ों के स्वामी है तो हजारों में तो मदद कर ही सकते हैं.

तेजपत्ता के गुणों से हमारा समाज पूरी तरह नावाकिफ है ऐसा बिलकुल नहीं और उन्हें भी स्वयं को तेजपत्ता कहने कि आवश्यकता नहीं होनी चाहिए क्योकि उपमाएं और भी दी जा सकती हैं. पर हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि जब हम घर में भोजन करते हैं और बाहर में भोजन करते हैं तो कुछ हद तक स्वयं को उपलब्धता के आधार पर संतुलित कर ही लेते हैं. उसी प्रकार हम उनके बीच भी सामंजस्य स्थापित कर ही सकते हैं.

पीढियां नयी हैं, आज हमे उनके मस्तिष्क में अपनी रूढ़िवादी मान्यताओं को नहीं भरना चाहिए, समय कि मांग के मुताबिक चलना चाहिए. आज क्यों उन्हें तेजपत्ता समझ कर सिर्फ भोजन में ही प्रयुक्त किया जा रहा है, इस बात को सिरे से समझना और समझाना आवश्यक है. उन्होंने ने स्वयं ही अपनी यह पहचान बना रखी है यदि वो स्वयं को तेजपत्ता समझ कर कुंठित हो रहे हैं तो उनकी ही भूल है, वो महज भोजन में प्रयुक्त होने भर के लिए नहीं बल्कि समाज के हर क्षेत्र में प्रयुक्त होने के लिए हैं, और यह बात उन्हें अपनी मेहनत और लगन से साबित करनी होगी और वे कर भी रहे हैं.

कोई नवजात जब जन्म लेता है तो वह पहले क्या होता है? यदि वह किसी धर्म विशेष का होता है अथवा माना जाता है तो वह ऐसे परिवार में जन्मा है जहाँ धार्मिक कट्टरता चरम पर है और बच्चा निसंदेह चरमपंथी ही बनेगा, उसे किसी धर्म विशेष का नहीं मान कर इन्सान का बच्चा माना जाना चाहिए. हम बाते तो बड़ी आसानी से कह जाते हैं पर अनुसरण में सबसे पीछे हो जाते हैं. जब सभी धर्म समभाव की बात करते हैं तो दुनिया में इतने अलग अलग धर्म क्यों है?

हमें तेजपत्ता को भोजन भर के लिए प्रयुक्त नहीं करना चाहिए, हमें उसके गुणों को पहचान कर उसके काबिल स्थान पर उसका उपयोग भी करना चाहिए ताकि उस वर्ग विशेष को यह आभास हो कि वह महज भोजन में अथवा चाय में मिलाकर बाहर करने के लिए नहीं बल्कि अन्य  स्थानों पर भी उनका महत्व है, जिससे सामंजस्यपूर्ण परिवेश का आरम्भ होगा और एक नए समाज कि अवधारणा का जन्म भी.

खिचड़ी

खिचड़ी,

जी हाँ, नाम सुनकर कई तो मुंह ही बना डालते हैं, खास कर वो जिन्हें सिर्फ उदर शांति से मतलब नहीं बल्कि जिह्वा पर स्वाद के कमल खिलाने भर से होता है, कुछ के मुंह का स्वाद ही बिगड़ जाता है तो कुछ खास पकाने के शौक़ीन उसमें विभिन्न चीजों का तड़का लगाकर इतना लज्जतदार बना डालते हैं की लोग उँगलियाँ भी चाट जाते है. यूं तो यह एक व्यंजन मात्र है पर इसकी उपमाएं भी कम नहीं, ‘खिचड़ी कर देना’ व ‘खिचड़ी पकाना’ जैसी कहावतें इसके अस्तित्व को चिरायु करती रही हैं. कहा भी गया है – खिचड़ी के चार यार- दही, पापड़, घी व अचार! लेकिन यही खिचड़ी जब मात्र दाल चावल और नमक के साथ सादी होती है तब अत्यधिक सुपाच्य होती है, और जितना व जैसे जैसे इसमें अन्य चीजों का तड़का लगता जाता है यह आकर्षक तो लगती है, पर इसका मूल खो जाता है.

अब बात करते हैं इसके असल मतलब की, जहाँ कहीं भी संदर्भित बातों के इतर ढेर सारी अन्य असंदर्भित बातों का मिश्रण हो वह कार्य अथवा संदर्भित अभिव्यक्ति खिचड़ी का रूप ले लेती है.

ऐसा बिलकुल नहीं की खिचड़ी हमारे समाज में स्वीकार्य नहीं, बल्कि आज आप जिस ओर अपनी नजर दौडाएं, आप पाएंगे की हर क्षेत्र में इसका प्रतिरूप समाहित है, अब चाहे वह अपना देश हो, अपना समाज हो, अपनी राजनीती हो, अपना खेल जगत हो, सिने जगत हो, व्यवसाय हो अथवा साहित्य हो हर जगह इसने अपना संक्रमण फैला रखा है.

यह चिरपरिचित बात है कि अपना देश तो कई संस्कृतियों की खिचड़ी है, वो भी ठंडी खिचड़ी, जैसे जम जाती है ठीक वैसे ही अपना देश कई संस्कृतियों व मान्यताओं को अपने में समाहित किये हुए एकता का आदर्श स्थापित करता आ रहा है और जमा हुआ है, पर कभी-कभी साम्प्रदायिकता का कंकड़ बीच में आ ही जाता है, अब सोचिये जरा यदि यह कंकड़ न आये तो खिचड़ी का स्वाद कभी न बिगड़े. तो हमें भी उन्हें चुनकर बाहर करना ही पड़ेगा जो हमारी खिचड़ी ख़राब कर रहे हैं, इसलिए इनको बख्शा नहीं जाना चाहिए.

आज के युवा समाज ने जो की खिचड़ी संस्कृति को अपनाने में उनकी खुद के संस्कृति से विलग होते जा रहे हैं, उनके आदर्श, विचार, पहनावे, रहन-सहन, बातचीत सभी भिन्न होते हैं, जो, जिन्हें वे आदर्श मानते हैं उनके विचार नहीं, जिनके पहनावे अपनाते हैं उन जैसा रहन सहन नहीं होता, बातचीत की तो बात ही न करें क्योंकि उसको सुनना तो जैसे उनके खिलाफ ही है. जो उम्र उनको सुनने में लगानी चाहिए, बोलने में निकल जाती है और जब बोलने की बारी आती है तो चुप पड़ जाते हैं की वो तो कभी सुना ही नहीं की कहा और कब कैसे बोलते हैं, इसलिए इस वर्ग को अभी बक्श ही दें तो ठीक रहेगा और अपने खिचड़ी वृतांत को आगे बढ़ाते हैं.

राजनीती में खिचड़ी का बड़ा महत्व है, कार्यकर्ताओं का सम्मेलन हो अथवा कोई रैली या रैला खिचड़ी एक सदाबहार व्यंजन है. खिचड़ी पार्टी की सरकारे अक्सर राज्यों व केंद्र में देखने को मिलती रही है. जिनकी खिचड़ी में जैसा तड़का वैसा उसका स्वाद-सुगंध दूर दूर तक फैलता रहता है, जिनकी यारी खिचड़ी के परिजनों सी होती है उनके पञ्च की कुर्सी टिकी रहती है पर जिनकी खिचड़ी में दही ज्यादा हो जाता है तो उनकी खिचड़ी फैलते देर नहीं लगती (क्षमा करें वैसे फैलता तो रायता है पर आपने गौर किया होगा की वो भी तभी फैलता है जब दही ज्यादा हो जाता है), अब अपने सुशाशन बाबु को ले लीजिये समय रहते निकल लिए, देर आये, पर दुरुस्ती का आलम आने अभी देर लगेगी साहब, क्योंकि खिचड़ी में दाल, मूंग, मसूर व अड़हर का तो समझ आता है, भला राजमे की खिचड़ी कैसी होती है? बिहार में लालू तो गए पर समोसे में अभी भी आलू डलता है, बाकी सब तो बिहार की जनता जानवे करती है सो अब उन्हें भी बक्श दिया जाय.

आप कहेंगे की खेल जगत में क्या है, भाई सबसे बड़ा खेल ही तो खिचड़ी है, लोगों को भले ही न पता हो के एक ओवर में कितनी बार एक ही गेंद को फेंकते है पर रन कितने बन रहे है जरुर पता हो जाता है, भला वो अपने को समाज में कम कैसे बता पाएंगे की उनको पता नहीं की क्रिकेट में क नहीं र आधा होता है. अब तक आप समाझ गए होंगे की मैंने क्रिकेट क्यों चुना? जी बिलकुल सही पकड़ा आपने, ये जो आई.पी.एल. है न जिसमें कई देशों के खिलाडी अपना जौहर दिखाते हैं, पर इनकी भी खिचड़ी सही ना हो तो खेल बिगड़ जाता है, मतलब रसोइया सही तरीके इन्हें न बनाये तो टीम खिचड़ी फ्लॉप हुई ही समझिये, अब भला सिर्फ दाल या सिर्फ चावल से तो दाल भात अलग अलग ही बनते हैं न? सही खिचड़ी नहीं बनेगी तो टीम चलेगी कैसे. यह बात सामान्य क्रिकेट टीम पर भी लागू होती है. जब तक सही क्रिकेटरों की खिचड़ी टीम इंडिया में नहीं होगी तब तक उनका स्वाद सुगंध दुनिया तक नहीं फैल पायगा.

हाँ तो संपादक महोदय ने सीमा दे रखी है 1000 शब्दों की, और मैंने 800 पार कर लिए हैं तो अपनी बातो को संक्षेप में आगे बढ़ाते हुए कहना चाहता हूँ की सिने जगत में भी खिचड़ी ने अपना परचम लहरा रखा है, फिल्मे, चाहे उनका फिल्मांकन कितना भी उच्चस्तरीय क्यों न हो पर निर्माताओं को यह भय सदा ही सताता रहता है, की यदि उसमे आइटम नंबर का तड़का नहीं डाला तो उसके फ्लॉप करने का खतरा बना रहता है, जिससे भयभीत हो आजकल जैसे परंपरा सी बन गयी है की फिल्मो में तेल भले ही नौ मन ना हो पर राधा को नचा ही डालते हैं.

आज कल सरकार भी सरकारी तंत्र को सम्हाल नहीं सकती सो इंटरप्रेन्योरशिप को बढ़ावा दे रही है और लोगों को अलग अलग व्यवसायों में एक साथ व्यस्त कर रही है, लोग बहुधन्धी होते जा रहे हैं. मतलब यहाँ भी खिचड़ी का ही व्यापर हो रहा है, जिस कारण लोगो को न तो ठीक से चावल और न ही ठीक से दाल के स्वाद का पता चल पर रहा है, बस सभी अपनी-अपनी खिचड़ी गलाने में लगे हैं, क्योंकि पक तो सभी की जाती है पर गलती किसकी ज्यादा है महत्व इसका है.

संपादक महोदय से क्षमा मांगते हुए आगे अंतिम पैराग्राफ की तरफ बढ़ता हूँ की अपना साहित्य जगत भी इससे अछूता नहीं रह गया है, अब इसी व्यथा की बात लीजिये, शनिवार का दिन था, धर्मपत्नी ने कहा, “आज खिचड़ी ही बनाउंगी” मैंने भी कहा “हाँ-हाँ जरुर क्यों नहीं”, आखिर तुम्हारी भी सप्ताह में एक दिन की छुट्टी बनती है जैसे कई संस्थानों में शनिवार को आधी और रविवार को पूरे दिन छुट्टी रहती है, वैसे तुम भी खिचड़ी पकाकर शोर्टकट में निपटा डालो, ताकि हम सब की क्षुधा शांत हो सके और इसी बीच मैं भी अपने मित्रों की मानसिक क्षुधा शांति के लिए एक लेख लिख लेता हूँ, और उसका विषय तो तुमने पहले ही दे दिया – खिचड़ी.

सूक्तियाँ

  • सम्मान, संयम, अनुशासन, नियंत्रण, संतुलन आदि कुछ ऐसे शब्द हैं, जिनमें से किसी एक के भी अर्थ मात्र जान लेने से आपका जीवन सार्थक हो सकता है.

 

  • जिस प्रकार विक्षों से पटे वन में दौड़ना कठिन होता है, उसी प्रकार हे मनु! अनावश्यक कोलाहल से अटे मष्तिस्क से हमारा प्रतिउत्पन्नमतित्व भी प्रभावित होता है.

 

  • जल से भरे किसी पात्र में यदि आप गुड़ डालेंगे तो अतिरिक्त जल बहार आयगा ही, यदि सुविचारों को आप्त करना हो, तो अन्य विचारों को त्यागना ही होगा.

 

  • जीवन में कोई कार्य घृणित हो ही नहीं सकता, यदि उद्देश्य सार्थक व सार्वभौम हो, अर्थात किसी कार्य का उदेश्य अर्थपूर्ण हो एवं बहुतों के लिए लाभकारी हो, तो ही वह करने योग्य हो सकता है.

 

  • किसी के चिढाने से यदि आप चिढ जातें हैं, खिजाने से आप खीज जाते हैं, तो उसका उदेश्य सफल हो जाता है, परन्तु आप मुस्कुराकर उसे परास्त कर सकते हैं!

 

  • अपेक्षाओं, उपेक्षाओं, इक्षाओं, समीक्षाओं से प्रभावहीन होना ही आपको प्रभावशाली बनाता है.

 

  • ज्ञान अर्जित तो कई करते हैं परन्तु उसका वहां एवं संवहन कुछ ही कर पाते है.

 

  • वस्तुतः साधारण होना ही आपको असाधारण बनाता है, हाँ यदि आप विशिष्ट बनना चाहते हैं तो आपको प्रथमतः शिष्ट होना चाहिए.

 

  • वायु के प्रवाह से तो बहाव निश्चित है, आनंद तो तब है जब बिना वायु प्रवाह के इत्र विसरित होकर अपनी उपस्थिति का भान कराता है.

 

  • जिस प्रकार अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी एवं आकाश अपना गुणधर्म नहीं बदलते हमें भी बिना बदले अपने धर्म का निर्बहन करना चाहिए.

 

  • धर्म सार्वभौम एवं संप्रभु होता है, इसे किसी जाति विशेष से जोड़ना ठीक नहीं, पृथ्वी पर जितने भी जीव हैं उनका जीव धर्म ही वास्तविक धर्म है तथा इसी वास्तविकता का संबहन आपको धार्मिक बनाता है.

 

  • आपका प्रकृति के संकेतों का ज्ञान ही आपको भूत-वर्तमान का आकलन कर भविष्य दर्शन करा सकता है, यही विशिष्ट ज्ञान ही विज्ञान कहलाता रहा है. दुखद है यह अत्यंत ही की विरले ही ऐसे ज्ञानी के दर्शन हो पातें हैं या उन ज्ञानियों को दुर्लभ ही शिष्य मिल पाते हैं.

 

  • गुरु वह पारस पाषाण होता है जिसके स्पर्श मात्र से लोहा कुंदन बन सकता है. परन्तु इसके लिए शिष्य की तत्परता भी लोहे सी होनी चाहिए.

 

  • आपकी सत्यवादिता की पराकाष्ठा उस क्षण प्रमाणिक हो पाती है जिस क्षण आपको पूर्ण अवसर तो प्राप्त होता है की अत्यंत सरलता से आप उस असत्यता को स्वीकार कर सकें, परन्तु आप ऐसे अवसर को दृढ़ता के साथ अस्वीकार कर पाते हैं.

 

  • हम सभी प्रतिदिन स्वयं को सज्ज होते हुए दर्पण अवश्य ही देखते हैं. हम यह नहीं देख पाते की दर्पण के अन्तः से स्वयं का प्रतिबिम्ब भी हमें देख रहा होता है. दर्पण में स्वयं को कुछ क्षण के लिए देखना आत्मदर्शन का प्रथम प्रयास होगा.

 

  • लक्ष्य साधना अथवा लक्ष्य की साधना तो सरल हो सकती है, परन्तु तब क्या जब आप अपना लक्ष्य स्वयं हो?

 

  • विचार भले जैसे हों, भाव का स्पष्ट होना अतिआवश्यक है. विचार व भाव लाभकारी व हितकारी हों तो वह सुविचार बन जाते हैं.

 

  • संसार में सभी प्रकार के कार्य हेतु स्थान एवं काल सुनिश्चित है, तथा उसी स्थान एवं काल में किया गया कार्य प्रशंसनीय व शोभनीय होता है. आप जिस क्षण इनमे से एक का भी विचार नहीं करते, असहज हो जाते हैं.

 

  • आप अपने जीवन में जितना समय बोलने में व्यतीत करते हैं उसके आधे के आधे के भी आधे सुनने में लगायें तो आप कई भूल सुधार सकते हैं. यह बात कदाचित आप समझ पायें यदि इतने भी के लिए आप तैयार हों.

 

  • सुविचार रुपी व्यंजनों का स्वाद भी आपको तभी आ सकता है जब आपकी जिह्वा पर अन्यर्थ का गुड़ न लगा हो.

 

  • आपका अत्यधिक कार्यवान होना, आपको अधिकार होना कुछ कर पाने का अथवा आपका अधिकारी होना, उन अधिकारों के बारे में बातें करना एवं उनके उपयोग की इच्छा को धारण करना सभी व्यर्थ हो जाते हैं जब आप उनका उपयोग नहीं करते तथा न कर पाने के दुःख को बढ़ी गरिमा से प्रकट करते हैं.

 

  • जब आप अपने अधिकारों के उपयोग में स्वयं को असमर्थ पाते हैं तब आपको यह मान लेना चाहिए की आप किसी के वश में हैं, चाहे वह परिस्थितियां ही सही परन्तु उसके जन्म का श्रेय भी आपको ही जाता है भले ही आपको यह भान होता रहे की वह तो परजन्य हैं.

 

  • कार्य का साध्य अथवा असाध्य प्रतीत होना उसके किये जाने के स्वयं की इक्षा पर निर्भर होता है. अन्य कारक सहायक हो भी सकते हैं अथवा नहीं.

 

  • संबंधों की व्यापकता आपके सामाजिक उपादेयता पर निर्भर होती है, होने को कुटुंब तो समस्त वसुधा भी होती है.

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बस हम ही नहीं बदले

सर्वप्रथम हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि, यह जो लेख यहाँ से नीचे तक जो भी लिखा है उसका किसी जाति अथवा धर्म से बिना किसी पूर्वाग्रह के/से प्रेरित हुए लिखा जा रहा है, यद्यपि किसी धर्म विशेष की धार्मिक भावना आहत होती हो तो हमें क्षमा करेंगे. मेरी जाति या धर्म क्या है इसे जाने बिना इस लेख को निष्पक्ष भाव से पढने की कृपा सराहनीय होगी.

उपर्युक्त वाक्यों को पढ़ कर आपसे यह अपेक्षा की जा सकती है कि अब आप पूर्णतया तैयार हैं. कुरआन-ए-शरीफ में ‘तीन तलाक’ को ‘पाप’ की संज्ञा दी गयी है, परन्तु फिर भी सदियों से एक परंपरा के रूप में इसको हम वहन करते रहे. तुलसीदास जी ने भी कह डाला था ‘ढोल, पशु अरु नारी, ये सब हैं तारण के अधिकारी’ तो क्या उनकी इस बात को हमारा समाज आज चरितार्थ करता है? जरा आज आप इस मान्यता के पक्ष में सरेआम बोल कर दिखा दें! सभी महिला अधिकार संरक्षण वाले आपको अदालत में ना घसीट डाले तो फिर कहें.

वैसे ही आज के समाज में चाहे वह ‘तीन तलाक’ का विषय हो अथवा ‘दहेज़-प्रथा’ या महिलाओं के किसी भी प्रकार के/से शोषण का मामला हो हमारा समाज चुप कैसे रह सकता है. आज हमारे समाज का एक वर्ग कहे की ‘दहेज़-प्रथा’ हमारे धार्मिक भावना से सम्बंधित है और हमारे धर्म में किसी की दखलंदाजी पसंद नहीं, तो हम समझते हैं की उससे जाहिल वर्ग और कोई दूसरा हो हो नहीं सकता, परन्तु फिर भी ‘दहेज़-प्रथा’ कमोवेश पूरे समाज में आज भी जिन्दा है, उसी प्रकार ‘तीन-तलाक’ (छः महीने के लिए पाबन्दी) भी छः महीने बाद यदि कोई कानून नहीं बन पाया तो फिर से जिन्दा होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

आज दिनांक 22-08-2017 के माननीय सर्वोच्च न्यायलय के पांच जजों के पीठ में से तीन जजों ने इसे असंवैधानिक बताया और कहा की यह संविधान की धारा 14 की अवमानना है तथा इससे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन होता है. जबकि दो जजों ने इसे धार्मिक भावना से सम्बंधित मामला बताकर संसद में कानून बनाने का सुझाव दिया है.

अब प्रश्न यह है की देश की 9 करोड़ महिलाएं अपने हक की आवाज किसे सुनाएँ, उन धर्म के ठेकेदारों को जो, जिनकी औलादें तो उच्च शिक्षा ग्रहण करती हैं पर उनके निगेहबानी में चल रहे मदरसों पर कडाई से धर्म के पालन पर बल दिया जाता है. ऐसा कतई नहीं की अन्य वर्ग की महिलाओं की स्थिति बहुत ही अच्छी है, पर ऐसा कहकर आप ‘तीन-तलाक’ को जायज तो नहीं कह सकते. समस्या विधवा विवाह को लेकर हमारे समाज में दोहरी राय रखने वालों से भी है. आज सायरा बानो की मेहनत रंग ले आयी, वो लगी रहीं अपने लक्ष्य को साधने में.

कुल मिलाकर आज की इस घटना ने पूरे समाज को आईना दिखा दिया की किसी भी काम को लगन से पूरा करने में जब आप लग जाते हैं तो पूरी कायनात आपके साथ हो लेती है. आखिर कब तक आप धर्म की आड़ में खुद को छिपाकर, खुद की रक्षा में लगे रहेंगे. ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ इसका अर्थ या यों कहे अनर्थ हम कब तक लगते रहेंगे? “धर्म उनकी ही रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करतें हैं.” तो, धर्म की रक्षा करना मतलब किसी धर्म में जो उनके/हमारे तथाकथित बाबा आदम ने कहा उसी से चिपके रहेंगे? आपने कभी किसी कंपनी का “जेनेरल टर्म्स एंड कंडीशन” यदि पढ़ा हो तो उसमे भी साफ़-साफ़ लिखा होता है, “किसी भी बिंदु पर समय-समय पर होने वाले परिवर्तन में आपको उसकी जिम्मेवारी स्वयं लेनी होगी”. ठीक उसी प्रकार, धर्म की रक्षा करना मतलब हथियार उठाकर सामने वाले को मार डालना नहीं होता है अपितु वैसों को धर्म की राह पर लाना होता है जो धर्म से भटक गए है.

धर्म में चलना (धर्मं चर) अर्थात वह सभी काम जिससे किसी का भला होता हो और साथ ही किसी का नुकसान भी न होता हो ऐसे कार्य ही धर्म की सूची में आ सकते है. ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए को हंसाया जाये’ तो भाई ये जिसने भी लिखा उसका तो फतवा बन भी गया होगा. भाई अगर ऐसा है तो आज से चाहे हम किसी भी वर्ग के हों अपनी धर्म नाम की गठरी अपने सर पर उठाकर नहीं चलें. उसे अपने घर के किसी कोने, न न, कोने नहीं, ऐसा भी क्या, किसी शानदार कोने में रख दे, क्योंकि जब आप अपने अपने घरों से बाहर होते हैं, तो आप सब का, हमारा भी एक ही धर्म होना चाहिए और वो है राष्ट्र धर्म सर्वोपरि.

वस्तुतः हमारे धर्म व धार्मिक पुस्तकें बहुत गूढ़ हैं हमारे समाज में उनका सही-सही विश्लेषण करने वालों के शख्त कमी है, जो जैसा चाहता है अपना नया अर्थ लगा लेता है, जिससे बेकार का विवाद उत्पन्न होता है, और हम जैसों को अवसर मिल जाता है कुछ कह ही डालने का, कि ठीक है ये सब पर अब क्या करें, “बस हम ही नहीं बदले, जमाना बदल गया.”

फुसरो के बारे में : भाग-1

फुसरो,
वर्तमान में झारखण्ड राज्य (पूर्व में बिहार राज्य) के उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल में बोकारो  जिला (1 अप्रैल 1991 से, पूर्व में हजारीबाग तत्पश्चात गिरिडीह जिला) के बेरमो अनुमंडल, प्रखंड सह अंचल एवं थाना के अंतर्गत एक छोटा किन्तु तीव्र गति से विकासशील शहर है. बेरमो विधानसभा (वर्तमान विधायक श्री योगेश्वर महतो ‘बाटुल’ जी) एवं गिरिडीह लोकसभा (वर्तमान सांसद श्री रविन्द्र कुमार पाण्डेय जी) क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला फुसरो राजनितिक रूप से भी अत्यंत सक्रीय है, पर फिर भी कई विडम्बनाओं से ग्रसित यह क्षेत्र अपनी सहनशीलता, भाईचारे एवं सौहार्द्रपूर्ण व्यवहार के लिए अपने आप में आसपास के क्षेत्रों के लिए एक मिसाल है.

यह अपने जिला मुख्यालय बोकारो से 35 कि.मी. पश्चिम में अवस्थित है तथा अपनी राजधानी राँची से 120 कि.मी. उत्तर-पश्चिम में स्थित है, यहाँ के डाक-घर (कम्प्यूटरीकृत) फुसरो बाज़ार का पिन कोड 829144 तथा भारत संचार निगम लिमिटेड, बेरमो के अंतर्गत इसका टेलीफोनिक एस.टी.डी. कोड 06549 है तथा फुसरो रेलवे स्टेशन का कोड (PUS) है. बोकारो जिला के अंतर्गत आने से यहाँ की जिन गाड़ियों का पंजीकरण होता है जिला शहर से होता हैं उनका ट्रांसपोर्ट व्हीकल रजिस्ट्रेशन कोड JH09 से शुरू होता है.

वर्ष मार्च 2008 में फुसरो नगर परिषद् के गठन के बाद से शहर में नगरीय प्रणाली के अनुपालन का प्रयास हो रहा है, हालाँकि इसकी गति सरकारी व्यवस्था के कारण कुछ धीमी ही है, परन्तु धैर्य के साथ फुसरो की जनता का साथ प्राप्त हो रहा है, जिससे यह एक बेहतर एवं स्वच्छ नगरीय वातावरण की दिशा में लगातार अग्रसर होता ही जा रहा है. फुसरो नगर परिषद् में बेरमो प्रखंड के छः पंचायत से फुसरो, ढोरी, करगली, अमलो, मकोली व कारो को लेकर वर्तमान में कुल 28 वार्ड बने हैं. जिसके बाद से ही अधिसूचित क्षेत्र समिति फुसरो के स्थान पर नगर परिषद फुसरो कहलाने लगा.

जनसांख्यिकी
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार फुसरो नगर परिषद् के अंतर्गत आने वाली कुल आबादी  करीब 89,178 है जिसमे से करीब 46,605 आबादी पुरुषों की तथा स्त्रियों की आबादी करीब 42,573 है, तथा जिनमे अनुसूचित जाति की आबादी  करीब 13,635 एवं अनुसूचित जनजाति की आबादी करीब 5,109 है. शिक्षित व्यक्तियों की कुल जनसख्या में हिस्सेदारी करीब 61,000 है जिनमे से करीब 35,000 पुरुष एवं करीब 26,000 महिलाएं शामिल हैं.

भौगोलिक स्थिति
फुसरो, लगभग 45.22 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला है तथा अक्षांश 23.77 डिग्री उत्तर तथा देशांतर 85.99 डिग्री पूर्व में स्थित है. भारतीय मानक समय (नैनी, इलाहाबाद +5:30 मिनट पूर्व) की समय सारणी में इसकी स्थिति +14 मिनट (पूर्व) है. इसके अधिकतर इलाके कोल इंडिया द्वारा वर्तमान व भावी कोयला खदानों को ध्यान में रखते हुए अधिसूचित किये गए हैं. कोयला खदानों में होने वाले बारूदी धमाको से घरों की खिड़कियाँ थर्रा उठती हैं तथा घरों की दीवारों में दरार आना यहाँ आम बात होती है.

परिसीमा
उत्तर की ओर यह राजमार्ग संख्या-2 (डुमरी) को जोड़ने वाले राज्यमार्ग से जुड़ा है जिसके किनारे मुख्य रूप से चपरी, मकोली, नवाडीह आदि जैसे इलाकों की बसावट है.
दक्षिण की ओर यह दामोदर नदी के किनारे बसे जरीडीह बाजार, बालू बंकर, अंगवाली, ढोरी बस्ती, मधुकनारी, राजाबेड़ा आदि जैसे इलाकों से घिरा है.
पूर्व में यह दामोदर नदी पर निर्मित हिंदुस्तान पुल, जिस पर से होकर  फुसरो-जैनामोर मुख्य मार्ग गुजरती है, से जुड़ा है, जिसके किनारे नया रोड बसा है, जो की फुसरो का सबसे सघन क्षेत्र माना जाता है.
पश्चिम में यह जारंगडीह – कथारा – बी.टी.पी.एस. (बोकारो थर्मल पॉवर स्टेशन) – स्वांग – गोमिया व तेनुघाट जाने वाली मुख्य मार्ग से जुड़ा है.
उत्तरपूर्व में यह चंद्रपुरा को जाने वाली सड़क से जुड़ा है जिसके किनारे राजेंद्र नगर, सिंह नगर, फुसरो स्टेशन, शांति नगर, खास ढोरी, शारदा कॉलोनी, कल्याणी व सबसे छोर पर भंडारीदह बसा है.
दक्षिण-पूर्व में दामोदर नदी के पूर्वी किनारे पर एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होने के लिए बहुप्रतीक्षित “हथिया पत्थर” नामक स्थान से जुड़ा है.
दक्षिण-पश्चिम में यह दामोदर के किनारे बसे जरीडीह बाज़ार से जुड़ा है जिसके उत्तर में जारंगडीह रेलवे स्टेशन है.
उत्तर-पश्चिम में कुरपनिया से सटे गांधीनगर से लेकर सुभास नगर, बेरमो सीम, 4 व 5 नंबर धौरा, अमलो बस्ती आदि जैसे इलाकों की बसावट है.