गम न करें – १७

बे-मौके सब शरीफ

मतलब यह नहीं कि यह सीधे तौर पर आपके बारे में हैं. मतलब यह है कि यह उन सभी के बारे में है जो मौके पर शरीफ बनने का ढोंग रचते हैं और समय आने पर दूसरों को आगे कर खुद उनका समर्थन अथवा उनके साथ अथवा उनके पीछे चलने को तुरंत तैयार हो जाते हैं. इसलिए बे-मौके सब शरीफ से हमारा तात्पर्य यह है कि मौका आने पर अपनी शराफत दिखाने से कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता, पर यह कि सिर्फ ख़बरों में आने के लिए या कि सिर्फ दिखावे के लिए.

आप कथनी और करनी में जितना कम अंतर रख पाते हैं उतने ही आप चरित्रवान होते हैं, यह नहीं कि आप चरित्रवान तो हों पर अवसर आने पर आप खिसक लें. यहाँ मेरा यह सब लिखना आप में से बहुतों को खल रहा होगा पर क्या करें तारीफ बनती भी होगी तो आप इसे मेरा दंभ न समझ ले इसलिए यह साफ करना जरुरी है कि मै इस लेख के माध्यम से आप सब को कुंठित नहीं करना चाहता हूँ. मेरा उद्देश्य बस इतना है कि हम अपने चरित्र के स्तर को उस ऊँचाई तक ले जा सकें जहाँ हम सचमुच ही अपने कथनी और करनी अंतर नहीं कर सकें अर्थात जैसा भी हम सोचें अथवा कहें उसपर चल भी सकें.

थोड़ी देर के लिए यह लेख आपको गप्पबाजी लग सकती है पर आप जरा ध्यान देकर इन बातों को सोचेंगे तो यही पाएंगे कि हम में से कितने ही अवसर आने पर किसी जन-कल्याणकारी कार्यों के लिए समय निकल पाते हैं? अधिकतर का उत्तर यही होगा कि अपने काम से फुर्सत मिले तभी ना. सही भी है, पर यह तभी संभव हो पाता है जब आप समय निकालना चाहें. क्या आप अपने परिवार के लिए समय नहीं निकाल पाते, क्या आप अपने किसी निजी कार्य के लिए समय नहीं निकाल पाते यदि आपका उत्तर हाँ है तो समस्या यह है कि समय आपको निकालना होता है इससे पहले कि समय आपको निकाल दे.

महत्वपूर्ण यह नहीं कि आप किन बातों अथवा कार्यों के लिए समय निकाल पाते हैं अपितु यह कि आप किन बातों अथवा कार्यों के लिए स्वयं को अनुकूल पाते हैं. यदि नहीं तो फिर आप चाहें कि उक्त कार्यों के लिए भी आप समय निकालें. क्योंकि यह आपके ही हाथों में होता है पूर्णरुपेण. आप टालमटोल के शिकार महसूस होते हैं यदि आप चाह कर भी समय प्रबंधन नहीं कर पाते और इसका ठीकरा दूसरों के सर फोड़ने को उद्दत रहते हैं.

आईये इस उधेड़बुन से निकालें जीवन बहुत खुबसूरत है, इसका आनंद लीजिये, नहीं समझ आ रहा हो तो किसी मनोवैज्ञानिक से जरुर मिलें, आप पागल नहीं हैं पर इस स्थिति में अधिक देर रहना आपको जल्द ही उस श्रेणी में ला खड़ा कर सकता है, इसलिए कि कही और अधिक देर न हो जाये, अपने आपको, अपने लिए कुछ ऐसा करें जिससे आपके मन, आत्मा और चित्त को प्रसन्नता होती हो, साथ ही दूसरों की प्रसन्नता का कारण हो ऐसे कृत्यों में स्वयं को उलझाएँ.

इसलिए गम न करें खुश रहें.

बाबा आम्टे नगरवासियों का ऐसे मना गणतंत्र दिवस

फुसरो नगर परिषद उपाध्यक्ष कृष्ण कुमार ने अपने चिर-परिचित अंदाज में मनाया गणतंत्र दिवस. 26 जनवरी 2018 को झंडोत्तोलन के पश्चात वे अपने सहयोगियों साथ निकल पड़े उस बस्ती की ओर जहाँ सभी विभिन्न मौकों पर गरीबों को दान देने जाया करते हैं. जी हाँ, आपने सही समझा, बाबा आमटे नगर जिसे पूर्व में कुष्ठ बस्ती के नाम से भी जाना जाता था. वहां के निवासियों के बीच अन्न का वितरण करते हुए उन्होंने अपने गणतंत्र दिवस की शुरुआत की और निकल पड़े सुभाष नगर की ओर जहाँ और भी गरीबों को अन्न का दान किया गया.

हमारे सभ्य समाज में अभी भी एक ऐसा तबका है जो इन अवसरों पर प्रायः ही याद कर लिया जाया करता है. कचरे चुन कर और कभी-कभी भिक्षाटन कर जीवन यापन करने वाले ऐसे ही कुछ गरीबों की बस्ती है, जिसे नाम तो दे दिया गया बाबा आमटे नगर, पर उनके दैनिक जीवन के सर्वजनिक उपयोग की सरकारी महकमो से मिलने वाली सुविधाओं का सदा से अभाव ही रहा है. सी.सी.एल. के लगे बोर्ड पर वहां की जनसांख्यिकी को दर्शाने भर से उनका अपने सामाजिक दायित्व को पूरा समझना आखिर कहाँ की दूरदर्शिता है.

कृष्ण कुमार वहां के लोगों से मिले और उनकी समस्याओं से अवगत हुए और भरोसा दिलाया कि जल्द ही उनके सभी समस्याओं के निवारण के उपाय होंगे. लोगों ने मिलकर सामूहिक रूप से पानी की समस्या से अवगत कराया और कहा कि एक जो पम्पसेट लगा भी है तो उससे पानी पूरा नहीं हो पाता है. वहां पहले से ही गड़े चापाकल पर मोटर लग जाने से पानी की सप्लाई को दुरुस्त किया जा सकता है, इसपर विचार कर जल्द ही इसे मूर्त रूप दिया जायगा जिसके लिए वे हर संभव प्रयास करेंगे.

बताते चलें की अभी हाल ही में फुसरो नगर परिषद द्वारा ओ.डी.एफ. (Open Defection Free) अर्थात खुले में शौच से मुक्ति की दिशा में पहल हुई है, पर बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस बस्ती में अभी तक शौचालय नहीं बन पाया है और लोग अभी भी खुले में शौच के लिए विवश हैं. जो शौचालय है भी उसकी दशा बहुत ही दयनीय है. ऐसे में हमारा तंत्र कैसे गणतंत्र मना पाता है, यह एक विचारनीय तथ्य है.

यह बस्ती हमारे सभ्य समाज के मखमल पर टाट का पैबंद नहीं बल्कि हमारे सामाजिक तंत्र पर एक ऐसा जंग लगा पुर्जा है जो कि सदा ही से ऐसा ही रहने के लिए बसाया गया है ताकि हम अपनी संवेदनाओं को ऐसे अवसरों पर सहलाते रहें और खुद को सामाजिक प्राणी कहलाने का दंभ पालते रहें. कहीं न कहीं कसूर उनका भी है जो यहाँ के निवासी हैं जिन्हें ऐसे ही जीवन यापन करने की विवशता अब सामान्य लगने लगी है.

हो जायें सावधान, जब बच्चा बोले, बस एक मिनट और!

आजकल घरों में प्रायः ही यह देखने को मिल जाता है कि जब आप अपने बच्चों को कोई काम कहें तो आपको उत्तर मिलता है- “बस एक मिनट और!” मतलब स्त्पष्ट है कि आपका बच्चा बहुत ही व्यस्त है, और उसकी यही व्यस्तता इस प्रकार के उत्तर का कारण भी. याद कीजिये अपना बचपन, जब आप पिताजी के बुलाने पर कहते थे “जी, पिताजी अभी आया”.

कुछ लोग कहेंगे, साहब! वह जमाना और था आज के ज़माने में कहाँ ये सब. ऐसे विचार रखने वालों से स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि मात्र संस्कारों का वहन ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसका संवहन भी अति आवश्यक है. अर्थात आपका संस्कारी होना ही काफी नहीं, बल्कि आप अपने संस्कार आने वाली पीढ़ियों तक कैसे पहुंचाते हैं इस पर विचार करना भी बहुत जरुरी है.

आईये, अब उन उत्तरदायी कारणों को पुनः एक बार समझने का प्रयास करते हैं जो इनसे सम्बंधित हो सकते हैं. पुनः एक बार से हमारा आशय स्पष्ट है कि, उन कारणों से हम भलीभांति परिचित होते हुए भी उन्हें नकारने का हर संभव प्रयास करते रहे हैं.

  1. गेम- आज के तकनीकी युग में सबसे अधिक प्रचलन में कंप्यूटर पर खेले जा सकने वाले गेम्स एक प्रमुख कारण है जो बच्चों को उनके मूल कर्म अर्थात अध्ययन से विमुख करता है. उनके सोचने समझने एवं निर्णय क्षमता पर सीधा प्रभाव डालता है. “ब्लू-व्हेल” नामक गेम के दुष्परिणाम से आप भली प्रकार परिचित हैं. माना कि आपका बच्चा वह गेम नहीं खेलता होगा, परन्तु यह कि जहाँ शारीरिक क्षमता विकसित करने के लिए हल्के-फुल्के दौड़-धूप वाले गेम खेलने के बजाय लम्बे समय तक कंप्यूटर पर आँखे गड़ाए रहना कितना हानिकारक हो सकता है, क्या यह आप सबसे से छिपा है?
  2. चैटिंग- सोशल मिडिया पर अधिक समय बिताना भी एक प्रमुख कारण है, जिससे की बच्चों की मानसिक दशा पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है. विशेषकर ऐसे लोगों से चैटिंग के माध्यम से जुड़ना जिन्हें वे जानते तक नहीं कि दूसरी तरफ कौन व किस उम्र का व्यक्ति उनसे चैटिंग कर रहा है. चैटिंग, में कई बार लोग ज्यादा ही खुल कर अपने विचारों को रख जाते हैं जिन्हें सीधे बोलने में शायद हिचक होती हो. ऐसी स्थिति आपके बच्चों की मनोदशा पर विपरीत प्रभाव छोड़ सकती हैं.
  3. मोबाइल- मोबाइल एक सूचना साझा करने का सबसे बेहतर उपकरण मात्र हो सकता है. पर यह कि सदैव उसके साथ ही समय बिताना आपकी कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल जाता है. यह आपको तब पता चलता है जब आपके बच्चे ऐसा करते हैं. सोचें, और ध्यान रखें कि आपके मोबाइल में कोई ऐसी सामग्री न हो, गलती से भी, कि जिसे बच्चे देख ले तो उनकी मनःस्थिति असंतुलित हो जाय.
  4. अन्य कारण- उपरोक्त कारणों के चलते असमय खाना-पीना, देर रात तक जागना, सुबह स्कूल जाने को समय पर तैयार न हो पाना, होमवर्क जैसे तैसे किसी की सहायता से या नक़ल कर पूरा करना आदि ऐसे व्यवहार के पीछे उत्तरदायी हो सकते हैं, पर जरा ध्यान दें कि इनके पीछे भी वही कारण हैं जो इस प्रकार के व्यवहार के कारक हैं.

इनके अतिरिक्त और भी कई कारण हैं जिन्हें हम भलीभांति समझ लेते हैं पर उनके निवारण के लिए कोई उपयुक्त व ठोस कदम नहीं उठा पाते. हमें इसके लिए सुनियोजित तरीके को अपनाना होगा, जहाँ तक संभव हो सके अपने आप को एक उच्चतम स्तर पर आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना होगा जिससे कि उन्हें प्रेरणा मिले और वह अनुकूल वातावरण में स्वयं को ढाल पायें, तथा एक सभ्य नागरिक बनने की दिशा में अग्रसर हो सकें, भले ही यह गति धीमी हो, यदि रास्ता सही होगा तो देर से ही सही, लक्ष्य अवश्य प्राप्त किया जा सकेगा.

  1. समय- सिर्फ पैसे कमाना ही आपका कर्तव्य नहीं, अपनी संतान को बेहतर जीवन देने की दिशा में आपका उसको दिया जाने वाला समय भी परमावश्यक है. सुनियोजित हो कर उन्हें समय, थोड़ा ही सही पर जरुर दें, किसी भी बहाने से, कभी पूछ ही लिया करें, कहाँ गए थे. क्या खाया? क्या पिया? होमवर्क बनाया लिया क्या? ताकि उन्हें भी लगे कि हाँ, पिताजी पूछते हैं. वे भी आपके प्रति उत्तरदायी होंगे. उनके साथ थोड़ा समय व्यतीत करें. आप बहुत काम करते हैं, थक जाना स्वाभाविक है. पर आपको चाहिए अपना मनोरंजन उनके बीच खोजें, उनसे ही अपना मन बहलायें. उनसे अपनी कोई बात साझा करें, प्रेरणास्पद घटनाओं के बारे में बताएं, महापुरुषों की जीवनी के बारे में बताएं, जिससे की उनका मनोबल ऊँचा हो सके.
  2. पैसा- उन्हें उम्र के मुताबिक खर्चने को पैसे भी दें, साथ ही उसका हिसाब भी लें, जिससे की वे अर्थव्यवस्था को समझें, कि पैसे की अहमियत क्या होती है, जब हो और जब किसी के पास न हों इसके बीच का अंतर भी, और पैसा लाने में कितना परिश्रम लगता है आदि.
  3. उपहार- छोटे-छोटे ही सही पर कभी-कभी कुछ उपहार भी दिया करें, पर उन उपहारों के कारणों को सटीकता से ढूंढें, जैसे तुमने अपना फलां काम बेहतर किया इसलिए तुम्हें दिया जा रहा है, अगली बार और बेहतर कर पाओ ऐसी आशा है. पूरी तरह से बेफिक्रे न हों. बच्चों को पता चलना ही चाहिए कि आप कौन हैं, उनसे आपकी क्या अपेक्षा है, और आप उनके लिए क्या कर रहे हैं.
  4. व्यवहार- सबसे महत्वपूर्ण है आपका उनके सामने प्रस्तुत होना कि आप किस रूप और हालत में उनके सामने जाते हैं अथवा उनका सामना कैसे करते हैं. आप तात्पर्य भली प्रकार समझ गए होंगे, परन्तु फिर भी जिक्र करना आवश्यक प्रतीत हो रहा है तो, यह कि यदि आप कोई व्यसन करते हैं तो उनके सामने करने से बचें, भले ही वो जानते हों पर फिर भी भूले से भी उनके सामने ऐसा न करें और हो सके तो स्वयं को व्यसनों से दूर रखें.

जब हम गर्भवती महिलाओं को व्यसनों से दूर रखने अथवा रहने की बात करते हैं तो ध्यान देना चाहिए कि संतान उत्पति के बाद पुरुषों को भी व्यसनों से दूर रहना चाहिए. एक बेहतर संतान की अपेक्षा सभी रखते हैं पर उसके लिए आदर्श वातावरण के निर्माण में अपनी भूमिका भूल जाते हैं.

उपरोक्त बातें चाहे कितनी भी बार आपने अलग-अलग माध्यमो से सुनी, पढ़ी अथवा देखी होंगी, पर इसके अनुपालन में हम ही पिछड़ रहे हैं, अपने बच्चों के प्रति चिन्तित होना, और इस हेतु कुछ कर न पाना, इस विडंबना से हमें बाहर आना ही होगा क्योंकि, आपके हमारे भविष्य की डोर हमारे आपके ही हाथों में है

बेरमो प्रखंड परिसर में प्रशासन की चेतवानी के बाद भी जारी है जुआ

फुसरो, शहीद निर्मल महतो चौक के पास, सुलभ शौचालय के पीछे, बेरमो प्रखंड कार्यालय के बगल में और बेरमो थाना के सामने प्रखंड कार्यालय के शौचालय के टंकी के ऊपर वर्षों से वहाँ खड़े करने वाले पिक-अप वैन के चालकों और कुछ स्थानीय लोगों द्वारा सरेआम जुआ खेला जाता है.

ऐसा नहीं है कि यह आज कल से खेला जा रहा है वर्षो पूर्व जब बाज़ार में सड़कों का चौडीकरण हुआ था और तब से ही ऑटो व पिक-अप वैन के चालकों ने बेरमो थाना एवं बेरमो प्रखंड के बीच सड़क के किनारे वाहनों को खड़ा करना शुरू किया. उस समय से ही ग्राहक की प्रतीक्षा में खड़े वाहनों के चालकों ने समय व्यतीत करने के लिए सबसे पहले लूडो खेलना शुरू किया. आगे जाकर वही लूडो का खेल शर्तों व रुपयों के खेल में परिणत हो गया जो की अब ताश की पत्तियों से सरेआम खेला जा रहा है.

आस पास लोग नजरें बचा कर गुजरते देखे जा सकते हैं. इस प्रकार खुले में यह खेल सामाजिक संस्कारों के विरुद्ध एक चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए. रोज कई बच्चे जो उस ओर से गुजरते हैं. इस प्रकार के परिवेश का क्या दुष्प्रभाव पड़ सकता है उनके जीवन में किसी को इस बात की चिंता नहीं है. हम समाज के इस रूप को कैसे सहन कर पाते हैं, यह एक विचारणीय विषय-वस्तु है. प्रशासन के नाक के नीचे चल रहे इस खेल को अब तक नहीं रोका जा सका है.

इसे रोकना इसलिए भी आवश्यक है कि जिस स्थान पर यह खेल खेला जाता है वह कोई मनोरंजन स्थल नहीं बल्कि रास्ता है जो कि प्रशासनिक क्षेत्र के परिसीमा में आता है. आने-जाने वालों को यह परिदृश्य कुप्रभावित करता है. यह खेल, खुले में शौच से भी बदतर है जो हमारी मानसिकता को प्रदूषित कर रहा है. ऐसे कृत्यों को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया जाना चाहिए.

विगत दिनों किये गए प्रशासनिक हस्तक्षेप का भी कोई असर नहीं दिखाई दे रहा और खेल बदस्तूर जारी है. यह खेल दिन-ब-दिन जिस प्रकार से गंभीर होता जा रहा है कभी-कभी लड़ाई झगड़े के रूप में तो कभी पी-खाकर गाली-गलौज के रूप में कि उस ओर से किसी भी संभ्रांत का गुजरना मुश्किल हो जाता है. यह समस्या प्रशासन व समाज में मुंह पर मुहांसे के सामान है और एक प्रश्नचिन्ह है. यदि समय रहते इसका हल न निकाला गया तो वह दिन दूर नहीं जब इसका प्रभाव हमारे बाल-बच्चों पर दिखने लगे.

अपेक्षा है कि समाज व प्रशासन की ओर से कुछ आवश्यक कदम उठाये जायेंगे ताकि इस प्रकार की गतिविधियों पर लगाम लग सके.

गम न करें – १०

गम करना बेमानी है. करना है तो जतन करें, जिससे ग़मज़दा लोगों की जिंदगी से गम के बादल दूर हों, और वह भी आपकी जमात में शामिल हो खुश रहना सीख ले.

किसी शायर ने खूब कहा है कि “दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है, औरों का गम देखा तो, मैं अपना गम भूल गया.”

मतलब साफ़ है, गम तो है पर उससे कहीं ज्यादा खुश रहने के बहाने मौजूद है, जरुरत उसको पहचानने भर की है. जब सभी को पता है कि गम से कुछ हासिल नहीं हो सका है किसी को अब तक तारीख़ में तो भला हमें कैसे हासिल हो सकता है.

हम अक्सर ही दूसरों की ख़ुशी का कारण पता करने लग जाते हैं, बजाय इसके कि आप उसकी ख़ुशी में दिल से शामिल हो सकें. आप दूसरों के दुःख में शामिल होते हैं, पर उसमे आप ख़ुशी का अनुभव नहीं कर पाते हैं.

कहा भी गया है चिंता से चतुराई घटे, दुःख से घटे शरीर…

आप तय कर लें, गम करना है कि गम के कारणों को ढूंढ कर उसको ख़ुशी तब्दील करने का जरिया तलाशना है. सबसे बड़ी बात होती है कोशिश, जिसने की नहीं वो गम कर सकता है, वरना कोशिश करने वालों का तो कुदरत भी साथ देती है. हालात जैसे भी हों उसपर तंज कसना और उसका रोना-रोना बहुत आम बात है, ख़ुशी तो इस बात में है कि आप गमगीन भी हैं इस बात का पता औरों को लगता तक नहीं, और आप उसके सामने से गुजर जाते है.

हर हाल में खुश रहना आपको आपके बुरे हाल से निकलने में मददगार होता है बजाय इसके कि आप झख मारते फिरें. अपना रोना कभी न रोयें, इससे लोग आपके गम को कम तो कर नहीं पाएंगे उलटे आपसे और कन्नी काटने लगेंगे. जितना हो सके सरलता से पेश आयें. ऐसा भी नहीं कि डींगे ही मारने लगें.

हमें संतुलित व्यवहार को तरजीह देनी चाहिए. एक मुकम्मल इंसान बनने के रास्ते में मुश्किलें तो आयेंगी, पर उन मुश्किलों को पार करने के लिए ख़ुशी की राह अपनाएं, गम का नहीं. गम नहीं करने से सीधा मतलब है बेकार की चिंता, ऐसा बिलकुल न समझें की चिंतन जरुरी नहीं या सोच जरुरी नहीं, पर गम? उसका इससे कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए, तभी आप चिंतन-मनन-सोच-विचार आदि कर भी पाएंगे.

इसलिए गम न करें, सोचें और शुक्र अदा करें, कि देने वाले ने जो भी आपको दिया है, क्या उतना भी किसी के पास है भी क्या?

जारी….

नक्सलियों के बंद का सामान्य प्रभाव : सरकारी प्रतिष्ठान बंद, निजी रहे खुले.

भाकपा माओवादी के ऑपरेशन “ग्रीन हंट” तथा हमले में सेना के अस्त्र-शस्त्र के उपयोग के विरोध में एक दिवसीय बंद के आह्वान का सामान्य प्रभाव लगभग समस्त कोयलांचल पर देखने को मिला. आज पूरे बेरमो अनुमंडल में बंद का सामान्य देखा गया. सी.सी.एल. के कथारा तथा बी.एंड.के. व ढोरी में कोयले एवं छाई का ट्रांसर्पोटिंग ठप रहा. जबकि कोलियरियों में कोयले का उत्पादन होता रहा. वहीं कोयले के डिस्पैच पर प्रभाव पड़ा.

 

नक्सलियों के बंद का सामान्य प्रभाव : सरकारी प्रतिष्ठान बंद, निजी रहे खुले.
नक्सलियों के बंद का सामान्य प्रभाव : सरकारी प्रतिष्ठान बंद, निजी रहे खुले. (छाया/सूत्र : बेरमो आवाज)

सरकारी बैंक बंद रहे, रेलवे का परिचालन सामान्य रहा, फुसरो बस स्टैंड में बिहार, औरंगाबाद, नवादा, छपरा, दरभंगा, सिवान आदि जाने वाली बसें नहीं चलीं, जिसके कारण यात्रियों को काफी कठिनाई का समाना करना पड़ा. इस दौरान कई निजि स्कूल बंद रहे. जबकि सरकारी कई विद्यालय खुले रहे. फुसरो बाजार, करगली बाजार, जरीडीह बाजार, में कई दुकाने खुली रही. वही फुसरो बाजार में पेट्रोल पंप बंद रहने कारण दोपहिया वाहन मालिको को कठिनाई का समाना करना पड़ा.

मालूम हो कि भाकपा माओवादी द्वारा इस प्रकार एक दिवसीय बंद का आह्वान प्रायः ही होता रहता है. पांच वर्ष पूर्व सन 2012 में जून के महीने में 12 तारीख को फुसरो बाज़ार पर हुए हमले को कोई नहीं भूला है अब तक, जिसका मुख्य कारण उनके बंद के आह्वान को हल्के में लेना रहा था. उस समय से ही जब भी इस प्रकार का आह्वान होता है तो सरकारी तंत्र अपनी सुरक्षा का हवाला देते हुए कामकाज ठप्प कर ही देते हैं, चाहे बैंक हो या अन्य सरकारी दफ्तर सभी जरा सी भी भनक लगती है की माओवादियों ने बंद बुलाया है बस हो गयी छुट्टी.

किसी भी नेता अथवा बड़े आयोजन पर पूरा प्रशासन जमा हो जाता है तो ऐसे बंद के आह्वान के दिन क्यों कमी पड़ जाती है उनकी. क्या प्रशासन को अपने ही सहभागी पुलिस पर भरोसा नहीं, कि उनके सुरक्षा चक्र में भीतर अपने काम काज को सुचारू रख सकें. हमारे समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो इस दिन का इन्तेजार भी करता है की कब बंद का आह्वान हो और छुट्टी मिले इस काम काज से. पर इन सबसे अलग बात करें कि क्यों नक्सलियों के मुख्यधारा में आने की सभी योजनाये कारगर सिद्ध नहीं हो पातीं. कहाँ कमी रह जाती है. क्यों ऑपरेशन ग्रीन हंट जैसी कार्रवाई के लिए सरकार विवश होती है. जिस प्रकार की मानसिकता वाले लोग नक्सलियों के बीच पाए जाते हैं उनसे निपटने के लिए क्यों नहीं कोई अहिंसक निति सरकार अपनाती है. ये कुछ ऐसे अनसुलझे प्रश्न हैं जो मन को विचलित कर जाते हैं….

 

विशाल हिन्दू सम्मलेन, ऐतिहासिक भीड़, साध्वी सरस्वती के उद्घोष पर जयघोष

हिन्दू कल्याण मंच, बेरमो, जिला- बोकारो, झारखण्ड द्वारा आयोजित विशाल हिन्दू सम्मेलन में उमड़ी भीड़ ऐतिहासिक थी. कोयलांचल की धरती पर ऐसा जन सैलाब विरले ही देखने को मिला है. गौ-वध निषेध हो, विधर्मी हुए हिन्दुओं की घर-वापसी हो और कश्मीर सहित आतंकवाद के मुद्दे पर खुल कर बोलीं विश्व हिन्दू परिषद की राष्ट्रीय प्रवक्ता साध्वी सरस्वती. जय-जय श्रीराम के जयघोष से गूँज उठा पूरा कोयलांचल. हिन्दू कल्याण मंच के अध्यक्ष रामू दिगार को अपनी तलवार भेंट करते हुए उन्होंने कहा कि अपने क्षेत्र में वे हिंदुत्व के प्रति सक्रियता इसी भांति दिखाते रहें.

साध्वी सरस्वती ने कहा कि हिन्दू धर्म की सनातनी परंपरा सदियों से चली आ रही है. सनातन धर्म हमारी जननी है. सनातन परंपरा का रक्षण करना हम सभी का धर्म है.  धन का लोभ देकर लोग धर्मांतरण कराते है. झारखंड एवं बिहार में ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म-परिवर्तन का काम किया जा रहा है जिसे रोका जाना नितांत आवश्यक है. पूरे भारत वर्ष में वर्षों से धर्म-परिवर्तन का कारोबार चला आ रहा है. इसके लिए ऐसी संस्थाओं को मुंहतोड़ जबाब देना है. जिसके लिए ऐसे ही युवाओं को आगे आना होगा.

विशाल हिन्दू सम्मलेन, ऐतिहासिक भीड़, साध्वी सरस्वती के उद्घोष पर जयघोष
विशाल हिन्दू सम्मलेन, ऐतिहासिक भीड़, साध्वी सरस्वती के उद्घोष पर जयघोष

गौ माता का दुश्मन कभी हमारा मित्र नहीं हो सकता. देश में गौ-हत्या पूर्ण रूप से बंद होना चाहिए. सभी हिन्दू अपने घरो में गौ-पालन करें. गाय में सभी देवों का वास होता है. हर घर में गौ-गीता-रामायण होनी ही चाहिए. “भारतीय संस्कृति किसी को नहीं छोड़ती, पूँछ में आग लगाओगे तो लंका जला डालेगें“, देश में हिन्दूत्व की भावना बढ़ रही है. भारत विभिन्न भाषा व त्योहारों का देश है. सभी एक साथ कार्य करते है तो हिन्दुत्व कहलाता है. सन्यास का काम भगवा पहनना नहीं है. देश के युवाओं का मार्ग दर्शन करना है.

इस सम्मलेन में युवाओं को भारतीय संस्कृति, सभ्यता व धर्म की रक्षा का संकल्प दिलाते हुए उन्होंने आगे कहा कि मुझे गर्व है कि मैं हिन्दू हूँ और हिन्दुओ से कहना चाहती हूँ, राम मंदिर को बनाने में आप आगे आईए. कहा कि हिन्दुओ की आस्था से राम मंदिर बनेगा. भारत में रहना है तो भारत को मां कहना पड़ेगा. कई वर्षों बाद भारत को अच्छा प्रधानमंत्री मिला है. महिलाओ के बल पर ही भारत विश्व गुरु बनेगा. हिन्दुओ को छेड़ने वाले को छोड़ेगे नहीं.

चित्रकूट से आये स्वामी श्री सीताराम शरण महाराज ने उपस्थित भीड़ से कहा कि “हाय-हेल्लो छोड़ीये और जयश्री राम कहिए”. अपनी शैली में बोलते हुए उन्होंने आगे कहा कि भारत अनादी काल से महापुरुषों संतो महात्माओ की भूमि रही है, जहाँ से अध्यात्मिक, सुमधुर वायु फैलाता रहा है. हमारा भारत पुनः विश्व गुरु के स्थान को प्राप्त कर सके, उसके लिए हम सब को प्रयास करना होगा.

इससे पूर्व बेरमो प्रखंड कार्यालय से विशाल जुलूस जय श्रीराम, जय-जय श्रीराम के जयघोष के साथ निकला जो फुसरो बाजार से पुराना बीडीओ आॅफिस होते हुए करगली फुटबाॅल मैदान, अपने निर्धारित सभा स्थल तक पहुंचा. कार्यक्रम में टी.राजा नहीं आ सके तो उनके इंतजार को विराम दे, सभा की शुरुआत की गयी. हजारों की संख्या में लोग भगवा ध्वज के साथ जयश्री राम का जयघोष करते चल रहे थे. यह दृश्य अदभुत था.

: निष्कर्ष

इस प्रकार के आयोजन से यह पता चलता है कि धर्म ने सभी को एकात्म किया है, क्योंकि इसमें सभी वर्गों के लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज की. हमें धार्मिक होना ही चाहिए, पर इसका तात्पर्य हमारे द्वारा किये गए सत्कार्य से होना चाहिए. सभा में कितने ऐसे थे जिन्होंने शायद पहली बार जयश्री राम बोला हो. पर इस प्रकार के सम्मलेन ने उन्हें एक राह दिखाई है उनके झिझक को तोड़ा है. इस प्रकार के सम्मेलनों के अभाव से ही हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं. सेल्फी की धूम रही, फोटो से पूरा सोशल मिडिया भरा पड़ा है. रोड पर अनाथ विचरती गायों का ख्याल रखने वाला कोई नहीं, सभी हिन्दू गायों का दूध निकाल कर उन्हें सड़कों पर घूमने को छोड़ देते हैं फिर चाहे उनका जो भी हो और गौ रक्षा की बात करते हैं, और तो और जो हिन्दू ऐसा करते हैं उनको बोलने वाला कोई हिन्दू सामने क्यों नहीं आता. सिर्फ जय श्री राम कहने से आप हिन्दू नहीं हो जाते राम चरित्र को अपनाना भी पड़ता है. अपने सामाजिक उतरदायित्व को समझ कर जब आप कोई काम करते हैं जिससे किसी अन्य का भला होता हो तो वह होगा असली हिंदुत्व. 

जय-जय श्री राम.

दिव्यान्ग्जनों के हितार्थ पाताल तक पहुंची ‘आस्था’

पाताल, जी हाँ सही सुना आपने, यह एक बहुत कम सुविधा सम्पन्न गाँव है जो झारखण्ड के हजारीबाग जिले में आता है, यह अपने जिले से लगभग 80-85 किलोमीटर, रांची से 80 और चतरा से 85 दूर अवस्थित है. पाताल नाम के गाँव तक पहुँचने का एक मात्र साधन रेलवे ही है, कोई पक्की सड़क नहीं है. यहाँ के मुख्य नजदीकी स्टेशन में कोले और हिन्देगिर आते हैं.

इस गाँव में दिव्यांगजनों की संख्या लगभग 80 है, यह जानकारी गाँव के मुखिया श्री इशाक एक्का ने हमें दी. सी.सी.एल. के पिपरवार क्षेत्र से नजदीक होने के कारण और मुखिया श्री इशाक एक्का ने दिव्यांग जनों की समस्या से अवगत कराया जिससे प्रभावित होकर आस्था पुनर्वास केंद्र के डॉ. शशि कान्त सिंह द्वारा सी.सी.एल.पिपरवार क्षेत्र के सहयोग से दिव्यांग जाँच शिविर में दिव्यांगों की जांच की गयी तथा जरुरतमंद दिव्यांग को सूचीबद्ध/चिन्हित किया गया.

श्री सिंह आस्था पुनर्वास केंद्र, फुसरो में बतौर मुख्य फिजिओथेरेपिस्ट विगत 10 वर्षों से कार्यरत हैं और अपने क्षेत्र में सिद्धहस्त होने के कारण इनके मेन रोड फुसरो, रहीमगंज स्थित क्लिनिक में दूर-दूर से लोग अपना इलाज करने आते रहे हैं. समय-समय पर कई जरुरत मंदों का इन्होने सामाजिक सहयोग और अपनी ओर से आर्थिक मदद द्वारा इलाज व अन्य सहायक उपकरण भी प्रदान किये हैं.

इसी क्रम में सी.सी.एल. पिपरवार क्षेत्र में आस्था द्वारा ही संचालित दिव्यांग निकेतन में अपनी सेवाएँ देने प्रायः ही जाया करते रहे हैं. इसकी जानकारी वहां के मुखिया श्री इशाक एक्का को होने पर उन्होंने सी.सी.एल. से इनकी मदद लेने की इच्छा जताई तथा सी.सी.एल. के आग्रह पर इन्होने ‘पाताल’ गाँव जाकर अपनी ओर से शिविर में भाग लिया और अपनी सेवाएँ दी.

बताया गया कि, चिन्हित दिव्यांग लोगों को जल्द ही समुचित उपकरण की सुविधा प्रदान की जायगी, जिन दिव्यांग जनों को जिस प्रकार के सहायक उपकरण की आवश्यकता है वैसी सूची तैयार कर ली गयी है, और 21 दिसम्बर 2017 को उनके बीच सहायक उपकरणों का वितरण किया जायगा, इस बावत उक्त क्षेत्र के अन्य जन पर्तिनिधियों को भी सूचित किया गया है.

बजबजाती नालियाँ और सूअरों का आतंक

आज के इस दौर में जो नालियों की व्ययवस्था है अपने शहर में उससे बढ़िया तो कभी हड़प्पा सभ्यता में हुआ करती थी, उसपर सूअरों का जमावड़ा जो उन्हें जुहू बीच का अहसास देता है. अब लगता है हमें ही तय करना होगा कि हम सूअरों की बस्ती में ही रहते हैं या हमारी बस्ती सूअर. अब हमें दोनों ही में से कोई भी स्थिति बर्दाश्त नहीं, और होना भी नहीं चाहिए. पूरे देश में चल रहे स्वच्छता अभियान को धता बताने वाला यह परिदृश्य आज कल पूरे करगली बाज़ार, रीजनल हॉस्पिटल कॉलोनी करगली, आंबेडकर कॉलोनी  और नोनिया पट्टी सहित कई आस पास के इलाकों में बिना किसी परिश्रम के राह चलते देखा जा सकता है, जिस प्रकार यहाँ आदमी से ज्यादा सूअर रास्तों पर आवारा घूमते नजर आ जाया करते हैं उससे तो यही लगता है कि स्वच्छता अभियान सिर्फ फोटो निकालने भर के लिए रह गया हो.

चमचमाती सड़कों से जब आप नीचे मोहल्ले के सड़कों पर जाते हैं तो वार्ड संख्या 15, 16, 18, 21, और 24 में इन दिनों सूअरों का जो आतंक है यह आज कल से पनपा नहीं है, यह समस्या बहुत पुरानी है. पर अब जबकि यहाँ के इलाके नगर परिषद् के अंतर्गत आने से लोगों में एक उम्मीद जगी कि अब कुछ उपाय होगा और इस प्रकार की गन्दगी और समस्याओं से मुक्ति मिलेगी. पर बहुत दुःख के साथ बताना पड़ता है कि अब तक कई बार विभागीय नोटिस दिए जाने के बाद भी सूअर पालकों के कान पर जूँ न रेंगी.

वार्ड 24 के कुछ नौजवानों ने सामूहिक बैठक कर कई लोगों के हस्ताक्षर युक्त आवेदन भी दिए हैं अपने वार्ड पार्षद को जो कि विचाराधीन है अब तक. पूछे जाने पर कोई भी संतोष जनक उत्तर प्राप्त नहीं हो सका है. सूत्रों के हवाले से पता चला है कि इन सूअर पालकों ने सूअरों के पहचान के लिए उनके अंग-भेदन कर रखें हैं. किसी के कान तो किसी की पूंछ तो किसी को लोहे की सलाखों से दाग कर निशान आदि बनाकर अपनी पहचान दे दी गयी है. वे किसी भी मानदंड का अनुपालन करने के लिए स्वयं को बाध्य नहीं पाते और ऐसे ही मुक्त तरीके से सूअर का पालन करते हैं. एक-एक सूअर दो से तीन हजार तक में बिक जाते हैं.

ऐसा बिलकुल नहीं कि वह परिवार जो सूअर पालन से जुड़ा है, बिलकुल ही गरीब है या यह उनके परिवार के उपार्जन का एकमात्र साधन है. बकायदे सम्पन्न हैं और यह उनके ऊपरी आय का एक जरिया भर है, क्योंकि इसके पालन में न तो हिंग लगती है न फिटकरी और रंग आता है चोखा.

बजबजाती नालियों और सूअरों के बीच रहने को विवश लोग अपनी किस गलती की सजा भोग रहे हैं, यह समझ से परे है, पर अब लगता है कि लोगों ने ठान लिया है कि अब वह इसे सहन नहीं करेंगे. नगर परिषद् के कूड़ेदान में जमा कचरों को आये दिन सूअर बिखेर देते हैं. बहुत जगह पर नालियां अब भी कच्ची हैं और यह मानो सूअरों का हम्माम बना पड़ा है.

सूअरों से होने वाली बिमारियों से हम सभी भलीभांति परिचित हैं, एक अध्ययन के अनुसार स्वाईन-फ्लू का यह सबसे आसन जरिया होता है. एच१, एन१ वायरस का फैलना और उससे ग्रसित होना ऐसे वातावरण में बहुत ही आम बात है. वैसे भी इस प्रकार के वातावरण में बिमारियों का होना कोई नयी बात नहीं. जिस प्रकार के दृश्य देखने को आ रहे हैं उससे यही लगता है कि लोग आदि हो चुके हैं सूअरों के साथ रहने को, एक पल को पता ही नहीं चलता है कि लोग सूअर के घर में रह रहे हैं या सूअर इन लोगों के घरों में. स्थिति गंभीर है और दिन-ब-दिन और गंभीर होती जा रही है, पानी सर से ऊपर जाने को ही है पर पता नहीं लोग किस बात का इन्तेजार कर रहे हैं कि अब तो बस डूबना ही बाकी बचा है शायद.

अब रुख करते हैं प्रशासन का, तो उनकी ओर से ही कागजी कार्रवाई में  बस इतना ही है कि नोटिस जरूर मिला है उन सभी कथित पालकों को जिनके सूअर खुलेआम सड़कों पर पलते हैं, पर उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया है अब तक, इस बात का सबसे बड़ा कारण है की खुले में पालन होना, क्योंकि आप आसानी से यह नहीं बता सकते कि कौन सा सूअर किनका है तो आप कार्रवाई किस पर करेंगे, अव्वल तो आप साबित ही नहीं कर पाएंगे कि वे जिन्हें नोटिस मिला है सूअर पालन से जुड़े भी हैं या नहीं.

नगर परिषद् ने सक्रियता दिखाते हुए कई लोगों को नोटिस भेजा भी है, जिनमे मुख्य नाम हैं.

  1. श्री लखन राम पिता स्व.बलि राम, करगली बाज़ार, हरिजन टोला
  2. श्री गडी पासी पिता श्री शम्भू पासी, ढोरी पंचायत
  3. श्री सिकंदर राम, पिता श्री दुर्बल राम, आंबेडकर कॉलोनी
  4. श्री नंदकिशोर राम, पिता स्व.बाढो राम, करगली बाज़ार, हरिजन टोला
  5. श्री मनोज राम, पिता श्री प्रसादी राम, करगली बाज़ार, हरिजन टोला
  6. श्री अजय पासी, पिता श्री तोलन पासी, ढोरी पंचायत
  7. श्री नवल राम, पिता श्री लालू राम, करगली बाज़ार, हरिजन टोला

सूची बहुत लम्बी है, इससे एक बात तो साबित है कि इस प्रकार के व्यवसाय से जुड़े लोगों के पास किसी भी प्रकार का कोई भी पशुपालन से सम्बंधित अनुक्रमणिका नहीं है और न ही जो कुछ अगर हो भी तो उसका अनुपालन ही किया जा रहा है. विभाग से की गयी बातचीत में यह भरोसा दिलाया गया कि बहुत जल्द ही आवारा पशुओं खास कर सूअरों की धरा-पकड़ी शुरू होगी और उन्हें दूर किसी अज्ञात स्थान पर रिहायशी इलाके से दूर छोड़ दिया जायगा अथवा अन्य किसी ऐसे पालक के सुपुर्द कर दिया जायगा जो उक्त पशु के पालन की समुचित व्यवस्था और तरीके का अनुपालन करते हों. आशा है कि विभाग जल्द ही कोई कार्रवाई करेगा और इनके आतंक से शहर वासियों को मुक्त कर पायेगा.

सफ़ेद आसमान पर हरा चाँद : फुसरो ने मनाई पैगम्बर साहब की जयन्ती

जी हाँ, ईद-ए-मिलादुन्नबी अर्थात पैगम्बर साहब के जन्मदिन के उपलक्ष्य मनाया जाने वाला समारोह. फुसरो शहर में निकले जुलुस में जिस सफ़ेद झंडे का उपयोग किया गया जिसपर हरे चाँद और सितारे लगे थे, ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अमन के आसमान पर खिले हरे चाँद और सितारे मोहमद साहब का पैगाम दे रहे हों कि जब तक चाँद और सितारे रहेंगे इस्लाम यूँ ही अमन और शांति का पैगाम दुनिया को देता रहेगा.

जानें :
मिलादुन्नबी यानी इस्लाम के संस्थापक पैगम्बर मोहम्मद साहब का जन्मदिन रबीउल अव्वल महीने की 12 तारीख को मनाया जाता है। हजरत मोहम्मद साहब का जन्म मक्का (सऊदी अरब) में हुआ था। उनके वालिद साहब का नाम अबदुल्ला बिन अब्दुल मुतलिब था और वालेदा का नाम आमेना था। उनके पिता का स्वर्गवास उनके जन्म के दो माह बाद हो गया था। उनका लालन-पालन उनके चाचा अबू तालिब ने किया।

हजरत मोहम्मद साहब को अल्लाह ने एक अवतार के रूप में पृथ्वी पर भेजा था, क्योंकि उस समय अरब के लोगों के हालात बहुत खराब हो गए थे। लोगों में शराबखोरी, जुआखोरी, लूटमार, वेश्यावृत्ति और पिछड़ापन भयंकर रूप से फैला हुआ था। कई लोग नास्तिक थे। ऐसे माहौल में मोहम्मद साहब ने जन्म लेकर लोगों को ईश्वर का संदेश दिया।

वे बचपन से ही अल्लाह की इबादत में लीन रहते थे। वे कई-कई दिनों तक मक्का की एक पहाड़ी पर, जिसे अबलुन नूर कहते हैं, इबादत किया करते थे। चालीस वर्ष की अवस्था में उन्हें अल्लाह की ओर से संदेश प्राप्त हुआ। अल्लाह ने फरमाया- ‘ये सब संसार सूर्य, चाँद, सितारे मैंने पैदा किए हैं। मुझे हमेशा याद करो। मैं केवल एक हूँ। मेरा कोई मानी-सानी नहीं है। लोगों को समझाओ।’

हजरत मोहम्मद साहब ने ऐसा करने का अल्लाह को वचन दिया। तभी से उन्हें नुबुवत प्राप्त हुई। हजरत मोहम्मद साहब ने खुदा के हुक्म से जिस धर्म को चलाया, वह इस्लाम कहलाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है- ‘खुदा के हुक्म पर झुकना।’
स्रोत : वेबदुनिया हिंदी

आज जिस तरह दुनिया में इस्लाम की बदनामी हो रही है या कुछ चरमपंथी तत्वों द्वारा ऐसा किया जा रहा है, ऐसे में यह बहुत जरुरी हो जाता है कि ऐसे मौकों पर और ऐसे जलसों द्वारा यह बताया जाये कि जो सही मायने हैं इस्लाम के वो क्या हैं. दुनिया का हर वो मुसलमान जो वास्तव में मुसलमान है अर्थात् जिसका इमान मुस्सल्लम है कभी इस्लाम से इतर सोच नहीं सकता, और जो इस्लाम के गलत मायने निकालते/समझाते फिरते हैं वो तो मुसलमान रह ही नहीं जाते.

इसलिए ये कहना कि दुनिया में आतंकवादी मुसलमान होते हैं न कहकर यह कहा जाना चाहिए कि जो मुसलमान आतंकवाद का रास्ता चुनते हैं वो फिर मुसलमान रह ही नहीं जाते जैसे किसी इन्सान ने अगर गलत रास्ता अख्तियार कर लिया तो हमारा समाज उन्हें इन्सान कह सकता है क्या? हम बेजा ही किसी धर्म को ही गलत बता बैठते हैं बगैर सोचे कि उसके बारे में हम जानते भी कितना हैं.

बात अच्छी चीजों के अमल में लाने से जुड़ी होनी चाहिए न कि वो अच्छी बातें हमें कहा से सिखने को मिल रही हैं यह सोचने के.