यह समर आज अंतिम होगा

यह समर आज अंतिम होगा
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यह समर आज अंतिम होगा

मत सोच कि यह मद्धिम होगा

मिट जाएगा अब सब अंतर

हर भय होगा अब छू-मंतर

हर दिशा आज संवाद करे

हर क्षण हर पल अनुनाद भरे

बिछड़े का होगा आज मिलन

बिन ब्याही बने नहीं दुल्हन

अब नहीं हो रही है हानि

सब दूर हो रही मनमानी

अब हुआ तिरोहित सब शोषण,

हर गांव-गली है अब रोशन

अब हो अमीर या हो गरीब

इक दूजे के होते करीब

जो भ्रष्ट बने सत्ताधारी, सिंहासन अब उनका डोले

जो बन बैठे थे मूक मगर, अब वे भी अपना मुंह खोले

अब अच्छे लोग चुने जाते

वो सबकी आज सुने जाते

अब सब मिलकर सब बाँट रहे

गहरी नींदे, ना खाट रहे

तौलें भी, अब ना बाट रहे

सबकी अब अच्छी ठाट रहे

अब कोई न बंदरबांट करे

सब अपनी-अपनी घाट रहे,

जो सोते आज बिना रोटी उनके घर आज सने आटा

दुःख दर्द भी अब इक दूजे का है मिलकर के सबने बाँटा।

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राजेश पाठक
प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
गिरिडीह सदर प्रखंड

शंखनाद

क्या शेष समर रह जाएगा,
क्या नहीं उबर वह पाएगा.
यह सोच कृष्ण मायूस हुए,
गम घटा के वे आगोश हुए.
मन ही मन कुछ वे सोच रहे,
अब लगा कि रण से लौट रहे.
पर अनाहूत होता न कुछ,
है पता मुझे अर्जुन का दु:ख .
मैं बतलाता अब अर्जुन को,
मैं पाता अब खोये धुन को.
तू जिधर देख तब तुझे दिखा,
हैं लोग वही जिनसे सीखा.
वे आज बने तेरा शत्रु,
पर मान रहा क्यों ना अब तू.
क्यों सोच तेरी उल्टी होती,
रण में न कोई गलती होती.
बस होता उसमें एक धरम,
हो शत्रु पक्ष तो करें भसम.
मैं चाह रहा बन समरजीत,
ना कर इनसे अब कोई प्रीति.
तू प्रीति इनसे करते आया,
बदले में अब तक क्या पाया.
वह नहीं आज तेरा होगा,
ना उसे मोह घेरा होगा.
फिर तू क्यों घिरता आज यहां,
फिर सिर क्यों फिरता आज यहां.
सिरफिरा न बन, बन सरफरोश,
अब भी तो आए तुझे होश.
जब खाली होता शब्द कोष,
तब समर का करता हूँ उद्घोष.
लाचार नहीं अब पड़े रहो,
गांडीव उठा कर खड़े रहो.
तुम नहीं आक्रमण शुरू करो,
हैं शत्रु भी तो गुरू कहो.
जब गुरू ही शत्रु बन जाता,
तब क्योंकर आज नहीं ठनता.
मैं चाहूं अर्जुन प्रण करता,
कर शंंखनाद वह रण करता….
…..राजेश पाठक