यह समर आज अंतिम होगा

यह समर आज अंतिम होगा
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यह समर आज अंतिम होगा

मत सोच कि यह मद्धिम होगा

मिट जाएगा अब सब अंतर

हर भय होगा अब छू-मंतर

हर दिशा आज संवाद करे

हर क्षण हर पल अनुनाद भरे

बिछड़े का होगा आज मिलन

बिन ब्याही बने नहीं दुल्हन

अब नहीं हो रही है हानि

सब दूर हो रही मनमानी

अब हुआ तिरोहित सब शोषण,

हर गांव-गली है अब रोशन

अब हो अमीर या हो गरीब

इक दूजे के होते करीब

जो भ्रष्ट बने सत्ताधारी, सिंहासन अब उनका डोले

जो बन बैठे थे मूक मगर, अब वे भी अपना मुंह खोले

अब अच्छे लोग चुने जाते

वो सबकी आज सुने जाते

अब सब मिलकर सब बाँट रहे

गहरी नींदे, ना खाट रहे

तौलें भी, अब ना बाट रहे

सबकी अब अच्छी ठाट रहे

अब कोई न बंदरबांट करे

सब अपनी-अपनी घाट रहे,

जो सोते आज बिना रोटी उनके घर आज सने आटा

दुःख दर्द भी अब इक दूजे का है मिलकर के सबने बाँटा।

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राजेश पाठक
प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
गिरिडीह सदर प्रखंड

आओ एक दीप जला जाओ!

आओ एक दीप जला जाओ
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तुम बनो आज अब उद्दीपक

तुम हो तो जल पाए दीपक

तुम हो तो दूर अंधेरा हो

जगमग प्रकाश से डेरा हो

मैं तुझे ही दीपक मान रहा

तू सदा जले यह ठान रहा

तुझमें घी बाती भरता हूँ

अब हो बयार ना डरता हूँ

तुम मंद – मंद ही जला करो

जलते – जलते भी भला करो

पर कभी – कभी मन डोल रहा

अंदर – अंदर ही बोल रहा

क्यों जले दीप ना हो प्रकाश

क्यों ज़िंदा पर ना चले सांस

यह सब वायु का दोष रहा

जो त्याज्य रहा सब पोस रहा

पहले वायु को शुद्ध करो

हो सके तो उससे युद्ध करो

जब शुद्ध पवन हो जाता है

सब अंधकार खो जाता है

दीपक की आयु बढ जाती

गिरती लौ भी तब चढ जाती

हो अंधकार जितना भी घोर

तब काली रात भी लगे भोर

दीपक की यही कहानी है

यह कर्ण -दधिचि -दानी है

खुद जलकर भी ना जलता है

औरों की तरह ना छलता है

अब हो अमीर या हो गरीब

दीपक -प्रकाश सबके करीब

यह सबके साथ करे प्रीति

है इक समान इसकी ज्योति

यह हर घर जगमग करता है

इसके मन ठग ना रहता है

आओ एक दीप जला जाओ

भारत की शान बढा जाओ.

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राजेश कुमार पाठक

प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
सदर प्रखंड, गिरिडीह.

वाह रे कैसी है सरकार

| | वाह रे कैसी है सरकार | |

रोज उखड़ती पटरी है

पर बुलेट ट्रेन तैयार,

वाह रे कैसी है सरकार,

डीजल-पेट्रोल लेने जाओ,

बढे दाम हर बार

वाह रे कैसी है सरकार,

घर से निकलो बाहर देखो

पता चलेगा यार,

वाह रे कैसी है सरकार,

मोदी को सोम को बुध कहे तो

कहते सभी बुधवार

वाह रे कैसी है सरकार,

अब विपक्ष कमजोर पड़ा है,

सुनु नहीं ललकार

वाह रे कैसी है सरकार,

रहे दवा पर मिले नहीं

सब दवा हुआ एक्सपायर

वाह रे कैसी है सरकार,

काम नहीं मिलता हो जब

तब उठा न ले हथियार

वाह रे कैसी है सरकार,

उचित दाम ना काम का मिलता

छोड़ रहा घर बार

वाह रे कैसी है सरकार,

कल नेता झोपड़ियों में थे

महल हुआ तैयार.

वाह रे कैसी है सरकार,

काम करे इक बार मगर

कहे उसे सौ बार

वाह रे कैसी है सरकार,

 

 

वीर

|| वीर ||

नमन करो उन वीरों को जो लौट कभी ना आये |
आँखों में सपनों के आंसू ले कर दीप जलाएं ||

चलो फिर आज कहता हूँ, कहानी मैं जवानों की|
कहानी है यही इनकी, कहानी जो दीवानों की||
कहर बनकर के जा टूटे, जो इनपे वार करता है|
अगर दुश्मन झुकाए सर, तो उनसे प्यार करता है||

कहानी और भी इनकी सुनाने आज आया हूँ |
मेरे सीने में जो दिल है लुटाने आज आया हूँ ||
लुटाऊं आज मैं सब कुछ बढाऊं हौसले हरदम |
रहे जो फासले अबतक हुए वो फासले भी कम ||

दिखाई सरफरोशी दे तुम्हारी है यही दौलत |
दिखे दुश्मन तू देता है, नहीं थोरी सी भी मोहलत ||
तेरे अंदाज से दुश्मन को पानी भी नहीं मिलता |
हिला देते हमेशा तुम, हिलाए जो नहीं हिलता ||

अपने हाथ से ही अपनी तू तक़दीर लिख डालो |
कोई न गीत गता हो, अपना गीत खुद गा लो ||
कोई जब मांग बैठे तो, न अपना गीत लौटना |
छिड़े जब जंग दुश्मन से, हमेशा जीत कर आना ||

तुझे कहता है जो शीशा, उसे कहने दो तुम शीशा |
उसे मालूम ना है कि, तेरा शीशा भी है कैसा ||
तेरे दम से ही तो अब आज, सब गम दूर होता है |
चले शीशे पे जो पत्थर वो पत्थर चूर होता है ||

निशाँ कदमो के तेरे हों वहां तक दिख रहा भारत |
बढाओ आज क़दमों को, लिखो न आज कोई ख़त ||
मैं चाहूं नाप लो धरती, जो कब्जे में हैं दुश्मन के |
नहीं तो आज जा कह दो, रहें भारत के ही बनके ||

राजेश पाठक
प्रखण्ड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
गिरिडीह सदर प्रखण्ड.

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बेटियां

|| बेटियाँ ||

नहीं बचाओ बेटी केवल उसे आज पढने दो,

चढ़ती है चोटी पर तो उसे आज चढ़ने दो,

बेटियां ही शक्ति का स्वरुप है,

बेटियां बिन छांव भी कभी धूप है,

चाहते क्यों न इन्हें आँगन मिले,

चाह लो माँ का इन्हें दामन मिले,

गिर रही जब बेटियां तुम थाम लो,

गर तुम गिरो तो बेटियों का नाम लो,

तुम नाम ले के देखो वो आयें नजर,

है पुत्र तो वो भूलता तेरी डगर,

है बेटियां तो दिख रही है शान्ति,

हो पुत्र ही सदा मिटाओ भ्रान्ति,

बेटियां ही सृष्टि का स्वरुप है,

उष्णता में भी वृष्टि का भी रूप है,

बेटियां बढ़े तो सारा जग बढ़े,

तब एक ना समस्त देखो पग बढ़े,

बेटियां हैं दूर तो भी पास हैं,

जैसे हो न सांस फिर भी आश है,

तुम देख लो दसो दिशा में जा कभी,

हर दिशा में बेटियां ही मिल रही,

बेटियां बढ़ाती आज मान है,

बेटियां बढ़ाती आज शान है,

बेटियां नहीं किसी से कम रही,

शोहरतें न आज उनकी थम रही,

काम करती आज भी बड़े-बड़े,

पुत्र तो रहे सदा डरे-डरे,

जिनके घर में आ रही हों बेटियां,

भर रही तिजोरियों से पेटियां,

बेटियां मिटाती अन्धकार है,

क्यों नहीं फिर आज वो स्वीकार है,

जन्म से पहले ही क्यों मरी है वो,

गर बच गयी तो आज क्यों डरी है वो,

जन्म से पहले उन्हें क्यों मारते,

तब जीत कर भी जंग को तुम हारते,

मैं चाहता तुम हार कर भी जीतते,

तो बुरे दिन आज तेरे बीतते.

राजेश पाठक
प्रखण्ड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
सदर प्रखण्ड, गिरिडीह, झारखण्ड.

शंखनाद

क्या शेष समर रह जाएगा,
क्या नहीं उबर वह पाएगा.
यह सोच कृष्ण मायूस हुए,
गम घटा के वे आगोश हुए.
मन ही मन कुछ वे सोच रहे,
अब लगा कि रण से लौट रहे.
पर अनाहूत होता न कुछ,
है पता मुझे अर्जुन का दु:ख .
मैं बतलाता अब अर्जुन को,
मैं पाता अब खोये धुन को.
तू जिधर देख तब तुझे दिखा,
हैं लोग वही जिनसे सीखा.
वे आज बने तेरा शत्रु,
पर मान रहा क्यों ना अब तू.
क्यों सोच तेरी उल्टी होती,
रण में न कोई गलती होती.
बस होता उसमें एक धरम,
हो शत्रु पक्ष तो करें भसम.
मैं चाह रहा बन समरजीत,
ना कर इनसे अब कोई प्रीति.
तू प्रीति इनसे करते आया,
बदले में अब तक क्या पाया.
वह नहीं आज तेरा होगा,
ना उसे मोह घेरा होगा.
फिर तू क्यों घिरता आज यहां,
फिर सिर क्यों फिरता आज यहां.
सिरफिरा न बन, बन सरफरोश,
अब भी तो आए तुझे होश.
जब खाली होता शब्द कोष,
तब समर का करता हूँ उद्घोष.
लाचार नहीं अब पड़े रहो,
गांडीव उठा कर खड़े रहो.
तुम नहीं आक्रमण शुरू करो,
हैं शत्रु भी तो गुरू कहो.
जब गुरू ही शत्रु बन जाता,
तब क्योंकर आज नहीं ठनता.
मैं चाहूं अर्जुन प्रण करता,
कर शंंखनाद वह रण करता….
…..राजेश पाठक

सुदर्शन

सुदर्शन

अब लगा सुदर्शन को भी यह,
हो कैसे अर्जुन की ही जय.
रण हो तो कौरब का हो क्षय,
दिनकर पर आये भले वलय.
पर वलय नहीं यह स्थायी,
हो जाती इसकी भरपाई.
क्षय होगा अब जब कौरब का,
हर शय होगा तब सौरभ का.
क्यों पड़ा धनुर्धर माया में,
विकराल काल की छाया में.
शत्रु भी मित्र नजर आये,
चाहूं कि राहु गुजर जाये.
पर नहीं गुजरता है राहु,
फैलाता जाता है बाहु.
अपनी बाहु में भर लेता,
ओझल नजरों से कर देता.
वह बात मेरी न सुन पाता,
सुनकर भी ना वह गुन पाता.
ऐरावत भी चिंघाड़ रहे,
रण करने को तैयार रहे.
जो बना आज कौरब का दल,
वह रहा उगलता आज अनल.
मैं चाह रहा अग्नि बुझती,
सद्बुद्धि अर्जुन में दिखती.
अब भी अर्जुन ना मान रहा,
सच क्या है यह ना जान रहा,.
सच यही, समय है शक्तिमान,
ना कोई है इसके समान.
अब समय भी देखो बीत रहा,
लग रहा कि कौरब जीत रहा….

आहत पंचकुला की अपील

आहत पंचकुला की अपील

मैं पूछूं जो सेवक प्रधान ,

क्या नहीं बचा इसका निदान.

क्यों जुबां पे बंद पड़ा ताला,

कहने को देश का रखवाला.

मन की बात क्यों करते हो,

जब “डेरा” से तुम डरते हो.

“डेरा” तुम पर क्यों भारी है,

बस कहने को तैयारी है.

कुछ नहीं किया तेरा दल-बल,

तेरी अपील का था कायल.

क्यों सोच रहे खोया प्रभाव,

गर बोले कल आता दवाब.

हो सकता तेरी बोली से,

मरते ना कोई गोली से.

संभव था तेरी बात सुने,

जो राह चुनी, वो नहीं चुने.

गर तुम अपील कर देते कल,

हो सकता था सब कुछ तब हल.

क्यों नहीं राष्ट्र-संदेश दिया,

जल जाने क्यों प्रदेश दिया.

तुम पर सबका विश्वास अटल,

परिदृश्य भी जाता आज बदल.

पर ऐसा तुमने नहीं किया ,

जोखिम को शायद नहीं लिया.

चिंता आगे सत्ता की थी,

कट जाए ना पत्ता की थी.

अब किस मुँह से तुम बोलोगे,

क्या पड़ी गांठ तुम खोलोगे.

है मेरे दिल की यह पुकार,

अब भी तो कर लो कुछ सुधार.

वरना बैठी जनता जो मौन,

तुम से पूछेगी – तुम हो कौन?

अमिट

अमिट !

नहीं मिटा सकते तुम मुझे.

मैं अमिट हूँ.

मैं अब तक

लिखा ही नहीं गया

फिर बता –

कैसै मिटाओगे मुझे!

जिसे तुम चाहते

मिटा देना है

उसे नहीं लिख सकते तुम.

और मैं वही हूं ,

जिसे तुम मिटा देना चाहते हो

लिखने से पहले.

तुझे भय है –

एक बार, सिर्फ एक बार!

मैं लिखा जाऊं तो

मिटाए नहीं मिट सकता.

तेरा यही भय

मुझे बना जाता है

अमिट!

और मैं बिना लिखाए

अमिट रहता हूँ

एक शाश्वत सृजन की तलाश में . . . !