बाबा आम्टे नगरवासियों का ऐसे मना गणतंत्र दिवस

फुसरो नगर परिषद उपाध्यक्ष कृष्ण कुमार ने अपने चिर-परिचित अंदाज में मनाया गणतंत्र दिवस. 26 जनवरी 2018 को झंडोत्तोलन के पश्चात वे अपने सहयोगियों साथ निकल पड़े उस बस्ती की ओर जहाँ सभी विभिन्न मौकों पर गरीबों को दान देने जाया करते हैं. जी हाँ, आपने सही समझा, बाबा आमटे नगर जिसे पूर्व में कुष्ठ बस्ती के नाम से भी जाना जाता था. वहां के निवासियों के बीच अन्न का वितरण करते हुए उन्होंने अपने गणतंत्र दिवस की शुरुआत की और निकल पड़े सुभाष नगर की ओर जहाँ और भी गरीबों को अन्न का दान किया गया.

हमारे सभ्य समाज में अभी भी एक ऐसा तबका है जो इन अवसरों पर प्रायः ही याद कर लिया जाया करता है. कचरे चुन कर और कभी-कभी भिक्षाटन कर जीवन यापन करने वाले ऐसे ही कुछ गरीबों की बस्ती है, जिसे नाम तो दे दिया गया बाबा आमटे नगर, पर उनके दैनिक जीवन के सर्वजनिक उपयोग की सरकारी महकमो से मिलने वाली सुविधाओं का सदा से अभाव ही रहा है. सी.सी.एल. के लगे बोर्ड पर वहां की जनसांख्यिकी को दर्शाने भर से उनका अपने सामाजिक दायित्व को पूरा समझना आखिर कहाँ की दूरदर्शिता है.

कृष्ण कुमार वहां के लोगों से मिले और उनकी समस्याओं से अवगत हुए और भरोसा दिलाया कि जल्द ही उनके सभी समस्याओं के निवारण के उपाय होंगे. लोगों ने मिलकर सामूहिक रूप से पानी की समस्या से अवगत कराया और कहा कि एक जो पम्पसेट लगा भी है तो उससे पानी पूरा नहीं हो पाता है. वहां पहले से ही गड़े चापाकल पर मोटर लग जाने से पानी की सप्लाई को दुरुस्त किया जा सकता है, इसपर विचार कर जल्द ही इसे मूर्त रूप दिया जायगा जिसके लिए वे हर संभव प्रयास करेंगे.

बताते चलें की अभी हाल ही में फुसरो नगर परिषद द्वारा ओ.डी.एफ. (Open Defection Free) अर्थात खुले में शौच से मुक्ति की दिशा में पहल हुई है, पर बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस बस्ती में अभी तक शौचालय नहीं बन पाया है और लोग अभी भी खुले में शौच के लिए विवश हैं. जो शौचालय है भी उसकी दशा बहुत ही दयनीय है. ऐसे में हमारा तंत्र कैसे गणतंत्र मना पाता है, यह एक विचारनीय तथ्य है.

यह बस्ती हमारे सभ्य समाज के मखमल पर टाट का पैबंद नहीं बल्कि हमारे सामाजिक तंत्र पर एक ऐसा जंग लगा पुर्जा है जो कि सदा ही से ऐसा ही रहने के लिए बसाया गया है ताकि हम अपनी संवेदनाओं को ऐसे अवसरों पर सहलाते रहें और खुद को सामाजिक प्राणी कहलाने का दंभ पालते रहें. कहीं न कहीं कसूर उनका भी है जो यहाँ के निवासी हैं जिन्हें ऐसे ही जीवन यापन करने की विवशता अब सामान्य लगने लगी है.