क्षणिकाएं : ०६

उनसे कहा तो, अच्छा नहीं होगा

आज हवाओं का रुख मेरी तरफ है,

सूरज की किरणें भी मेरी तरफ हैं.

आज जुल्फों के साये मेरी तरफ हैं,

आँचल की ओट भी मेरी तरफ है.

नहीं है तो सिर्फ, वो खुशबू नहीं है,

वो तेज, वो झीनापन नहीं है,

मैं हूँ इनका ये हैं मेरे,

भले ही लगे हो,

जितने भी पहरे,

मैं जानता हूँ

वो न हो सकेंगे मेरे,

हों भले किसी और के गिरेबां में,

उनके हाथों के घेरे,

मगर प्यार की हद में,

मुझे है रहना,

पड़े दर्द चाहे

कोई भी सहना,

रुक जाओ हवाओं,

ये उनसे न कहना,

राज की बात है,

राज ही रखना,

उनसे कहा तो, अच्छा नहीं होगा.

: नीरज पाठक

कौन?

कौन?

दरवाजे पर! था कोई…

आहट से सुनी थी मैंने,

शायद, हवा ने अपना

रास्ता बदला हो…

और आहट सुना गयी मुझको.

मचा

शरीर और मन में

अंतर्द्वंद,

मन कहता

उठ कर देखो,

रहने दो हवा होगी

शरीर समझाता..

आखिर जीत!

मन की हुई.

तीली सुलगाई,

लगभग ख़त्म हो चुकी मोमबत्ती

के बत्ती को टटोल कर जलाया,

तो अँधेरा जरुर

थोडा दूर हो गया था,

पर परछाइयों में वह

अब भी मुस्कुरा रहा था..

मनो कह रहा हो

मुझसे पीछा छुड़ाना

इतना भी सरल नहीं.

भरी कदमो से दरवाजे तक

पहुंचा ही था कि..

पट अचानक खुल गए,

मोमबत्ती बुझ गयी.

मुस्कान, अट्टहास में

परिवर्तित हो गया.

सामने धुंध था

भोर होने को थी,

मगर

कोहरे उसे रोक रहे थे…

सच है!

कमरे का अन्धकार तो

मोमबत्ती हटा भी दे,

पर मन का तिमिर ‘कौन’ दूर करे…

 

पिता

कौन हो तुम?
पिता . . . .
मासूम की किलकारी से
खुश होता . .
उसकी हंसी पर
प्यार लुटाता . .
क्रंदन पर
अचानक जागता पिता . .
उसकी अठखेलियों पर
जीवन की सच्चाइयाँ
बतलाता . .
सजग करता पिता . .
शरारत में कभी
साथ हो लेता
कभे समझाता पिता . .
पीढ़ियों की खाइयों को
पाटता
कभी उसको पटाता कभी
खुद पटता पिता . . .