गम न करें – ११

तुम्हें दुनिया में जो तकलीफ पहुँचती है, वो तुम्हारे पैदाईश से पहले ही एक रिकॉर्ड में दर्ज कर ली गयी है. कलम सोख चुका है, खाता बंद कर लिया गया, मामला तय पा गया, तक़दीर लिखी जा चुकी, वही हमें पहुँचता है जो हमारे लिए लिखा जा चुका. जो हमारे साथ हुआ वो टलने वाला न था, जिससे हम बच गए, वो हमें लाहक होने वाला न था. जब ये अकीदा (विश्वास) आपके दिल में अच्छी तरह बैठ जाये, तो तकलीफ अतिया और मुसीबत इनाम बन जाये, जो गुजरे उसे आप अच्छा समझें अल्लाह (भगवान) जिसके साथ भलाई चाहता है, उसे उसमें हिस्सा मिलता है.

अब जो भी आपको तकलीफ पहुंचे, बीमारी लाहक हो, कोई अपना मर जाय, माली नुकसान हो जाये, घर जल जाये तो समझ ले यही भगवान ने मुक्कदर में लिखा था. इसमें सारा अख्तियार खुदा के पास है, हाँ हम सब्र करेंगे तो उसका फल मिलेगा. लिहाजा जो मुसीबत के शिकार हैं, वो खुश हो जाएँ कि, सब कुछ खुदा के हुक्म से हो रहा है, जो देता भी है, लेता भी है, अता भी करता है, छीनता भी है, उससे उसके कामों का हिसाब नहीं लिया जा सकता.

अच्छी बुरी तक़दीर पर जब तक इमान न होगा, तब तक आपके मन और आत्मा को शुकून और शांति नहीं मिलेगी, उलझने ख़तम न होंगी, दिल के वशवशे दूर न होंगे. जो होना है वो होकर रहेगा, लिहाजा हसरत नदामत से क्या फायदा. ये मत सोचिये कि गिरती दिवार को आप बचा लेंगे, पानी के बहने को रोक देंगे, हवा के चलने को मना कर देंगे, शीशा को टूटने से बचा लेंगे, ये नहीं हो सकता. आपको, हमें, अच्छा लगे या बुरा जो लिखा है वो होकर रहेगा. जो चाहे मान लें, जो चाहे न माने. इसलिए भगवान (खुदा) के बनाये हुए तक़दीर पर सर तसलीम कर दें. गम न करें, खुश रहें.

जारी…

गम न करें – १०

गम करना बेमानी है. करना है तो जतन करें, जिससे ग़मज़दा लोगों की जिंदगी से गम के बादल दूर हों, और वह भी आपकी जमात में शामिल हो खुश रहना सीख ले.

किसी शायर ने खूब कहा है कि “दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है, औरों का गम देखा तो, मैं अपना गम भूल गया.”

मतलब साफ़ है, गम तो है पर उससे कहीं ज्यादा खुश रहने के बहाने मौजूद है, जरुरत उसको पहचानने भर की है. जब सभी को पता है कि गम से कुछ हासिल नहीं हो सका है किसी को अब तक तारीख़ में तो भला हमें कैसे हासिल हो सकता है.

हम अक्सर ही दूसरों की ख़ुशी का कारण पता करने लग जाते हैं, बजाय इसके कि आप उसकी ख़ुशी में दिल से शामिल हो सकें. आप दूसरों के दुःख में शामिल होते हैं, पर उसमे आप ख़ुशी का अनुभव नहीं कर पाते हैं.

कहा भी गया है चिंता से चतुराई घटे, दुःख से घटे शरीर…

आप तय कर लें, गम करना है कि गम के कारणों को ढूंढ कर उसको ख़ुशी तब्दील करने का जरिया तलाशना है. सबसे बड़ी बात होती है कोशिश, जिसने की नहीं वो गम कर सकता है, वरना कोशिश करने वालों का तो कुदरत भी साथ देती है. हालात जैसे भी हों उसपर तंज कसना और उसका रोना-रोना बहुत आम बात है, ख़ुशी तो इस बात में है कि आप गमगीन भी हैं इस बात का पता औरों को लगता तक नहीं, और आप उसके सामने से गुजर जाते है.

हर हाल में खुश रहना आपको आपके बुरे हाल से निकलने में मददगार होता है बजाय इसके कि आप झख मारते फिरें. अपना रोना कभी न रोयें, इससे लोग आपके गम को कम तो कर नहीं पाएंगे उलटे आपसे और कन्नी काटने लगेंगे. जितना हो सके सरलता से पेश आयें. ऐसा भी नहीं कि डींगे ही मारने लगें.

हमें संतुलित व्यवहार को तरजीह देनी चाहिए. एक मुकम्मल इंसान बनने के रास्ते में मुश्किलें तो आयेंगी, पर उन मुश्किलों को पार करने के लिए ख़ुशी की राह अपनाएं, गम का नहीं. गम नहीं करने से सीधा मतलब है बेकार की चिंता, ऐसा बिलकुल न समझें की चिंतन जरुरी नहीं या सोच जरुरी नहीं, पर गम? उसका इससे कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए, तभी आप चिंतन-मनन-सोच-विचार आदि कर भी पाएंगे.

इसलिए गम न करें, सोचें और शुक्र अदा करें, कि देने वाले ने जो भी आपको दिया है, क्या उतना भी किसी के पास है भी क्या?

जारी….