सुदर्शन

सुदर्शन

अब लगा सुदर्शन को भी यह,
हो कैसे अर्जुन की ही जय.
रण हो तो कौरब का हो क्षय,
दिनकर पर आये भले वलय.
पर वलय नहीं यह स्थायी,
हो जाती इसकी भरपाई.
क्षय होगा अब जब कौरब का,
हर शय होगा तब सौरभ का.
क्यों पड़ा धनुर्धर माया में,
विकराल काल की छाया में.
शत्रु भी मित्र नजर आये,
चाहूं कि राहु गुजर जाये.
पर नहीं गुजरता है राहु,
फैलाता जाता है बाहु.
अपनी बाहु में भर लेता,
ओझल नजरों से कर देता.
वह बात मेरी न सुन पाता,
सुनकर भी ना वह गुन पाता.
ऐरावत भी चिंघाड़ रहे,
रण करने को तैयार रहे.
जो बना आज कौरब का दल,
वह रहा उगलता आज अनल.
मैं चाह रहा अग्नि बुझती,
सद्बुद्धि अर्जुन में दिखती.
अब भी अर्जुन ना मान रहा,
सच क्या है यह ना जान रहा,.
सच यही, समय है शक्तिमान,
ना कोई है इसके समान.
अब समय भी देखो बीत रहा,
लग रहा कि कौरब जीत रहा….

राजेश पाठक

राजेश कुमार पाठक, राष्ट्रिय कवि-संगम, (प्रदेश सचिव, झारखण्ड ईकाई), प्रखण्ड साख्यिकी पर्यवेक्षक, सदर प्रखंड, गिरिडीह, सम्प्रति : दुमका प्रखण्ड, झारखंड

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