क्षणिकाएं : ०४

|| भगवान ||

भगवन इस संसार के कण-कण में तुम व्याप्त हो.

सर्वव्यापी, अंतर्गामी, फिर भी पहुँच के पार हो.

मैं वियोगी, प्रेमाभाव में माया-बद्ध जीवात्मा.

किस विधि मिलूं मैं काट के बंधन, दया करो परमात्मा.

योग न जानू, क्षेम न जानू, कर्म विधि न राग है.

न त्याग, ना ताप कि गरिमा, बड़ा कठिन वैराग्य है.

त्रिगुणित प्रकृतिप्राय तुम्हारी, पर गुणातिरेत समभाव है.

ताल विहीन बेसुर मैं प्राणी, मधुर प्रणय झंकार हो.

मैं मूढ़, विचलित मन मेरा, धीरज धर्म व ज्ञान हो.

भाव सागर बीच जीवन नैया , करुणा-सिन्धु पतवार हो.

चहुदिक हो धरा दिव्य सुवासित, अब तो वृष्टि समभाव हो.

ऐसी कृपा करो कृपानिधि, सत-पथ-गम संसार हो.

-: रचना :-
: रविन्द्र कुमार ‘रवि’ :
शिक्षक, कवि एवं संगीतज्ञ
नया रोड, फुसरो.