कविता
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|| भगवान ||

भगवन इस संसार के कण-कण में तुम व्याप्त हो.

सर्वव्यापी, अंतर्गामी, फिर भी पहुँच के पार हो.

मैं वियोगी, प्रेमाभाव में माया-बद्ध जीवात्मा.

किस विधि मिलूं मैं काट के बंधन, दया करो परमात्मा.

योग न जानू, क्षेम न जानू, कर्म विधि न राग है.

न त्याग, ना ताप कि गरिमा, बड़ा कठिन वैराग्य है.

त्रिगुणित प्रकृतिप्राय तुम्हारी, पर गुणातिरेत समभाव है.

ताल विहीन बेसुर मैं प्राणी, मधुर प्रणय झंकार हो.

मैं मूढ़, विचलित मन मेरा, धीरज धर्म व ज्ञान हो.

भाव सागर बीच जीवन नैया , करुणा-सिन्धु पतवार हो.

चहुदिक हो धरा दिव्य सुवासित, अब तो वृष्टि समभाव हो.

ऐसी कृपा करो कृपानिधि, सत-पथ-गम संसार हो.

-: रचना :-
: रविन्द्र कुमार ‘रवि’ :
शिक्षक, कवि एवं संगीतज्ञ
नया रोड, फुसरो.

  • Suresh Kumar

    Hari bol Hari bol

कविता
क्षणिकाएं : ०३

Please follow and like us: 6|| कर्मयोगी || दु:सह्य वेदना, असाध्यप्राय कार्य, श्याह लक्ष्य, निष्फल चेष्टा. शून्य प्रतिफल, व्यथा तेरे अंतर्मन की. हे! प्राण प्रतिष्ठित, किंचित न हो व्यथित, शांत कर उदवेदना, लक्ष्य का आह्वान कर, तू कर्मयोगी, माना भुक्तभोगी, भाग्य का सत्कार कर. क्या हुआ यदि गिर पड़ा, चोटिल …

कविता
क्षणिकाएं : ०२

Please follow and like us: 6|| वसुंधरा || सरस बरस रे मेघ तू, के रसहीन धरा हुई. न ओज है, न तेज है, असुध वसुंधरा हुई. कहाँ गई, मृदा की गंध, रंग की विचित्रता. पवन में वह सौम्यता, और पुष्प में मृदुलता. अतीत की घटामयी, सुखदायनी विस्मृतियाँ, थीं विश्व में …

कविता
क्षणिकाएं : ०१

Please follow and like us: 6|| यौवन || आरूढ़ रश्मि रथ पे, नवजीवन की किरण. प्रफुल्लित मन मृदुल, तृप्त अनावृत यौवन. उच्छृल नदी प्रतिविम्बित, समृद्ध रवि रक्त कण. समीर मंद वेग में, उन्मत्त च्यूत जिर्ण पर्ण. विस्तृत क्षिति निजभाववश, चहुँ दिक वृत्त नील वर्ण. खग-वृंद श्रृंगकलवरत, मदसिक्त भू आसक्त मन. …