क्षणिकाएं : ०३

|| कर्मयोगी ||

दु:सह्य वेदना,

असाध्यप्राय कार्य,

श्याह लक्ष्य,

निष्फल चेष्टा.

शून्य प्रतिफल,

व्यथा तेरे अंतर्मन की.

हे! प्राण प्रतिष्ठित,

किंचित न हो व्यथित,

शांत कर उदवेदना,

लक्ष्य का आह्वान कर,

तू कर्मयोगी, माना भुक्तभोगी,

भाग्य का सत्कार कर.

क्या हुआ यदि गिर पड़ा,

चोटिल हो निष्प्राण नहीं.

चल उठ,

तोड़ अतीत की बेड़ियाँ,

नए शौर्य से हुंकार भर,

क्या भयभीत है?

नहीं,

असंयमित है.

निश्छल मन तेरा,

ज्यों दिव्य दर्पण,

भूल का संधान कर,

जीत तेरी निश्चित,

बस!

शोक त्याग,

शुभान्त कर.

रविन्द्र कुमार 'रवि'

रविन्द्र कुमार ‘रवि’,
कवि, संगीतकार, गायक, साहित्यकार एवं एक शिक्षक
सेन्ट्रल कॉलोनी, मकोली, फुसरो, बोकारो, 829144
मोबाइल: 072098 17343

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