कविता
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|| कर्मयोगी ||

दु:सह्य वेदना,

असाध्यप्राय कार्य,

श्याह लक्ष्य,

निष्फल चेष्टा.

शून्य प्रतिफल,

व्यथा तेरे अंतर्मन की.

हे! प्राण प्रतिष्ठित,

किंचित न हो व्यथित,

शांत कर उदवेदना,

लक्ष्य का आह्वान कर,

तू कर्मयोगी, माना भुक्तभोगी,

भाग्य का सत्कार कर.

क्या हुआ यदि गिर पड़ा,

चोटिल हो निष्प्राण नहीं.

चल उठ,

तोड़ अतीत की बेड़ियाँ,

नए शौर्य से हुंकार भर,

क्या भयभीत है?

नहीं,

असंयमित है.

निश्छल मन तेरा,

ज्यों दिव्य दर्पण,

भूल का संधान कर,

जीत तेरी निश्चित,

बस!

शोक त्याग,

शुभान्त कर.

कविता
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क्षणिकाएं : ०४

Please follow and like us: 6|| भगवान || भगवन इस संसार के कण-कण में तुम व्याप्त हो. सर्वव्यापी, अंतर्गामी, फिर भी पहुँच के पार हो. मैं वियोगी, प्रेमाभाव में माया-बद्ध जीवात्मा. किस विधि मिलूं मैं काट के बंधन, दया करो परमात्मा. योग न जानू, क्षेम न जानू, कर्म विधि न …

कविता
क्षणिकाएं : ०२

Please follow and like us: 6|| वसुंधरा || सरस बरस रे मेघ तू, के रसहीन धरा हुई. न ओज है, न तेज है, असुध वसुंधरा हुई. कहाँ गई, मृदा की गंध, रंग की विचित्रता. पवन में वह सौम्यता, और पुष्प में मृदुलता. अतीत की घटामयी, सुखदायनी विस्मृतियाँ, थीं विश्व में …

कविता
क्षणिकाएं : ०१

Please follow and like us: 6|| यौवन || आरूढ़ रश्मि रथ पे, नवजीवन की किरण. प्रफुल्लित मन मृदुल, तृप्त अनावृत यौवन. उच्छृल नदी प्रतिविम्बित, समृद्ध रवि रक्त कण. समीर मंद वेग में, उन्मत्त च्यूत जिर्ण पर्ण. विस्तृत क्षिति निजभाववश, चहुँ दिक वृत्त नील वर्ण. खग-वृंद श्रृंगकलवरत, मदसिक्त भू आसक्त मन. …