क्षणिकाएं : ०२

|| वसुंधरा ||

सरस बरस रे मेघ तू, के रसहीन धरा हुई.

न ओज है, न तेज है, असुध वसुंधरा हुई.

कहाँ गई, मृदा की गंध, रंग की विचित्रता.

पवन में वह सौम्यता, और पुष्प में मृदुलता.

अतीत की घटामयी, सुखदायनी विस्मृतियाँ,

थीं विश्व में जो श्रेष्ठ, वो संस्कृतियाँ कहाँ गई.

ये कर्म क्षेत्र, जन्म भूमि, राम-कृष्ण-बुद्ध की,

आदि मानवता को ज्ञान दें, उन सैंकड़ो प्रबुद्ध की.

पुरुषार्थ में प्रवीणता, वो वीरता कहाँ गई.

-: रचना :-
: रविन्द्र कुमार ‘रवि’ :
शिक्षक, कवि एवं संगीतज्ञ
नया रोड, फुसरो.

रविन्द्र कुमार 'रवि'

रविन्द्र कुमार ‘रवि’,
कवि, संगीतकार, गायक, साहित्यकार एवं एक शिक्षक
सेन्ट्रल कॉलोनी, मकोली, फुसरो, बोकारो, 829144
मोबाइल: 072098 17343

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