कविता
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|| वसुंधरा ||

सरस बरस रे मेघ तू, के रसहीन धरा हुई.

न ओज है, न तेज है, असुध वसुंधरा हुई.

कहाँ गई, मृदा की गंध, रंग की विचित्रता.

पवन में वह सौम्यता, और पुष्प में मृदुलता.

अतीत की घटामयी, सुखदायनी विस्मृतियाँ,

थीं विश्व में जो श्रेष्ठ, वो संस्कृतियाँ कहाँ गई.

ये कर्म क्षेत्र, जन्म भूमि, राम-कृष्ण-बुद्ध की,

आदि मानवता को ज्ञान दें, उन सैंकड़ो प्रबुद्ध की.

पुरुषार्थ में प्रवीणता, वो वीरता कहाँ गई.

-: रचना :-
: रविन्द्र कुमार ‘रवि’ :
शिक्षक, कवि एवं संगीतज्ञ
नया रोड, फुसरो.

कविता
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क्षणिकाएं : ०४

Please follow and like us: 6|| भगवान || भगवन इस संसार के कण-कण में तुम व्याप्त हो. सर्वव्यापी, अंतर्गामी, फिर भी पहुँच के पार हो. मैं वियोगी, प्रेमाभाव में माया-बद्ध जीवात्मा. किस विधि मिलूं मैं काट के बंधन, दया करो परमात्मा. योग न जानू, क्षेम न जानू, कर्म विधि न …

कविता
क्षणिकाएं : ०३

Please follow and like us: 6|| कर्मयोगी || दु:सह्य वेदना, असाध्यप्राय कार्य, श्याह लक्ष्य, निष्फल चेष्टा. शून्य प्रतिफल, व्यथा तेरे अंतर्मन की. हे! प्राण प्रतिष्ठित, किंचित न हो व्यथित, शांत कर उदवेदना, लक्ष्य का आह्वान कर, तू कर्मयोगी, माना भुक्तभोगी, भाग्य का सत्कार कर. क्या हुआ यदि गिर पड़ा, चोटिल …

कविता
क्षणिकाएं : ०१

Please follow and like us: 6|| यौवन || आरूढ़ रश्मि रथ पे, नवजीवन की किरण. प्रफुल्लित मन मृदुल, तृप्त अनावृत यौवन. उच्छृल नदी प्रतिविम्बित, समृद्ध रवि रक्त कण. समीर मंद वेग में, उन्मत्त च्यूत जिर्ण पर्ण. विस्तृत क्षिति निजभाववश, चहुँ दिक वृत्त नील वर्ण. खग-वृंद श्रृंगकलवरत, मदसिक्त भू आसक्त मन. …