शंखनाद
कविता
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6
क्या शेष समर रह जाएगा,
क्या नहीं उबर वह पाएगा.
यह सोच कृष्ण मायूस हुए,
गम घटा के वे आगोश हुए.
मन ही मन कुछ वे सोच रहे,
अब लगा कि रण से लौट रहे.
पर अनाहूत होता न कुछ,
है पता मुझे अर्जुन का दु:ख .
मैं बतलाता अब अर्जुन को,
मैं पाता अब खोये धुन को.
तू जिधर देख तब तुझे दिखा,
हैं लोग वही जिनसे सीखा.
वे आज बने तेरा शत्रु,
पर मान रहा क्यों ना अब तू.
क्यों सोच तेरी उल्टी होती,
रण में न कोई गलती होती.
बस होता उसमें एक धरम,
हो शत्रु पक्ष तो करें भसम.
मैं चाह रहा बन समरजीत,
ना कर इनसे अब कोई प्रीति.
तू प्रीति इनसे करते आया,
बदले में अब तक क्या पाया.
वह नहीं आज तेरा होगा,
ना उसे मोह घेरा होगा.
फिर तू क्यों घिरता आज यहां,
फिर सिर क्यों फिरता आज यहां.
सिरफिरा न बन, बन सरफरोश,
अब भी तो आए तुझे होश.
जब खाली होता शब्द कोष,
तब समर का करता हूँ उद्घोष.
लाचार नहीं अब पड़े रहो,
गांडीव उठा कर खड़े रहो.
तुम नहीं आक्रमण शुरू करो,
हैं शत्रु भी तो गुरू कहो.
जब गुरू ही शत्रु बन जाता,
तब क्योंकर आज नहीं ठनता.
मैं चाहूं अर्जुन प्रण करता,
कर शंंखनाद वह रण करता….
…..राजेश पाठक
कविता
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क्षणिकाएं : ०४

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कविता
क्षणिकाएं : ०३

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कविता
क्षणिकाएं : ०२

Please follow and like us: 6|| वसुंधरा || सरस बरस रे मेघ तू, के रसहीन धरा हुई. न ओज है, न तेज है, असुध वसुंधरा हुई. कहाँ गई, मृदा की गंध, रंग की विचित्रता. पवन में वह सौम्यता, और पुष्प में मृदुलता. अतीत की घटामयी, सुखदायनी विस्मृतियाँ, थीं विश्व में …