फुसरो में संत रैदास की जयंति मनायी गयी

फुसरो पुराना बीडीओ आफिस के राजा बंगला स्थित विवाह मंडप में बुधवार को अखिल भारतीय रविदास महासंघ के तत्वधान में गुरू रैदास की जयंति समारोह मनायी गयी। इस दौरान बेरमो प्रखंड मुख्यालय से गाजे बाजे के साथ विशाल जुलूस निकाला गया। जुलूस में सैकडों महिला-पुरूष व बच्चों ने भाग लिया। समारोह की शुरूआत रैदास के चित्र पर दीप प्रज्जवलित कर किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रखंड अध्यक्ष गोवर्धन रविदास व संचालन सुधीर राम ने किया । यहां मुख्य अतिथि फुसरो नगर परिषद अध्यक्ष नीलकंठ रविदास ने कहा कि संत रैदास सिर्फ जाति-समाज के नहीं बल्कि मानव जगत के कल्याण की बातें समाज को बतायी। उन्होने अपने समय के ब्राहमणों को तर्क में पराजित कर संत की उपाधी प्राप्त की थी। इनके ज्ञान प्राप्त कर मीरा बाई कृश्ण की परम भक्त हो गयी। वक्ता ने कहा कि संत रैदास व बाबा भीमराव अंबेदकर के विचारों से ही समाज व देश का कल्याण है। मौके पर बालदेव रविदास, गोपाल रविदास, फुलचंद रविदास, हिरालाल रविदास, निर्मल रविदास, सुरज पासवान, राजेश राम, आदि मौजूद थे।

संत गुरु रविदास जी

रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म सन् 1388 (इनका जन्म कुछ विद्वान 1398 में हुआ भी बताते हैं) को बनारस में हुआ था। रैदास कबीर के समकालीन हैं। रैदास की ख्याति से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा था। मध्ययुगीन साधकों में रैदास का विशिष्ट स्थान है। कबीर की तरह रैदास भी संत कोटि के प्रमुख कवियों में विशिष्ट स्थान रखते हैं। कबीर ने ‘संतन में रविदास’ कहकर इन्हें मान्यता दी है। मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों में रैदास का बिल्कुल भी विश्वास न था। वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे। रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। रैदास को उपमा और रूपक अलंकार विशेष प्रिय रहे हैं। सीधे-सादे पदों में संत कवि ने हृदय के भाव बड़ी स़फाई से प्रकट किए हैं। इनका आत्मनिवेदन, दैन्य भाव और सहज भक्ति पाठक के हृदय को उद्वेलित करते हैं। रैदास के चालीस पद सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ ‘गुरुग्रंथ साहब’ में भी सम्मिलित हैं। कहते हैं मीरा के गुरु रैदास ही थे।

 

रैदास के पद :
अब कैसे छूटे राम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा॥

रैदास के दोहे :
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।

हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।

रैदास की साखियाँ :
हरि सा हीरा छाड़ि कै, करै आन की आस ।
ते नर जमपुर जाहिँगे, सत भाषै रैदास ।। १ ।।

अंतरगति रार्चैँ नहीं, बाहर कथैं उदास ।
ते नर जम पुर जाहिँगे, सत भाषै रैदास ।। २ ।।

रैदास कहें जाके ह्रदै, रहै रैन दिन राम ।
सो भगता भगवंत सम, क्रोध न ब्यापै काम ।। ३