मन की शान्ति

मन कि शांति
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आज हम सभी को शांति की तलाश है। कुछ लोग मन की शांति भगवद् भजन में ढूढ़ते हैं। कुछ सत्संग का हिस्सा बनकर, तो कुछ लोग घंटों पूजा करते हैं तथा कुछ को गुरु के चरणों में बैठ कर शांति की तलाश करते हैं। पर शांति नहीं मिलती। क्योंकि मन तो आंतरिक रूप से अशांत है, एक बवडंर सा चल रहा है वहां, और जब तक वह शांत नहीं होगा, मानसिक शांति कैसे मिलेगी। लाख जतन कर लें। मन भटकता ही रहेगा। पूजा-पाठ व्यर्थ हो जाएगी।

जीवन एक बहती धारा की तरह होता है यदि उसे उसकी निर्बाध गति से बहने दिया जाय तो उसकी सहजता बनी रहती है परंतु जब भौतिकवाद के बांध उस पर बांधे जाने का प्रयास किया जाता है तो उसकी सरल सहज गति में ठहराव आ जाता है और यह ठहराव ही मानसिक अशांति का कारण बनता है।

कभी प्रकृति की मधुर लयबद्धता को देखिए। उदाहरण के लिए हमारे सामने सूर्योदय और सूर्यास्त की शास्त्रीय लयबद्धता है। वह सदैव अपने नियत समय पर उदय और अस्त होता है। हर मौसम के आने और जाने का समय नियत है, वह उसी समय आएगा और उसी समय जाएगा। इसी तरह समुद्र में उठने वाले ज्वार और भाटे का भी समय नियत होता है। इन्हें कभी किसी ने नियम भंग करके अपनी नई रीति-नीति अपनाते नहीं देखा। प्रकृति ने इनके लिए जो नियम बनाये हैं वे उसका पालन वह पूरी लयबद्धता से करते हैं।

यही नही, जानवरों में भी एक स्वाभाविक लय होती है जैसे चींटियां मध्याह्न में सबसे ज्यादा सक्रिय होती हैं। चिड़ियां दिन के किसी अन्य प्रहर से ज्यादा सूर्योदय के पूर्व ज्यादा चहचहाती हैं। कंगारू दिन के समय प्रायः निष्क्रिय रहते हैं और रात के समय अत्यन्त सक्रिय। सभी अपनी प्राकृतिक लय पर चलते हैं।

सम्पूर्ण ब्रह्मांड में सिर्फ एक इंसान है जो प्रकृतिक नियमों का पालन करने में कतराता है। बजाय उन नियमों पर चलने के वह अपने नियम स्वयं बनाता और तोड़ता है। आज उसके लिए जो सही है संभव कल वह स्वयं ही से गलत साबित कर दे। सही-गलत की उधेड़बुन में मन का अशांत होना सहज स्वाभिक है। सामान्यतः मनुष्य को छोड़ कर प्रायः सभी जीव भूख लगने पर खाना खाते तथा प्यास लगने पर पानी पीते हैं और रात में नियत समय पर सो जाते है। परंतु इंसान इसके लिए भी नियम स्वयं बनाता है कि वह दिन में दो बार खाना खाएंगा, दो बार नाश्ता करेगा और दिन में कम से कम आठ गिलास पानी पियेगा। प्यास लगे या न लगे। वह कहता है यह शरीर की जरूरत है क्यों? क्योंकि उसने जिस दिनचर्या को अपनाया है वह नियमित नहीं है।

अक्सर वह, उस ज़िदगी को जीता है तो वास्तव में उसकी नहीं है। ऐसी ज़िदगी थोड़े समय तक तो सहजता से जी जा सकती है, पर यदि लंबे समय उसे उस बनावटी ज़िदगी को जीना पड़े तो वह अपनी आंतरिक शांति खो बैठता है और चिड़चिड़ा हो जाता है तथा उन जगहों पर शांति की तलाश में भटकने लगने लगता हैं जो उसके जीवन को सुलझाती कम उलझाती ज्यादा है। इसके बाद वह बाबाओं की शरण में जाता हैं जिनके बारे में कुछ न ही कहा जाए तो बेहतर है।

मुझे नहीं लगता कि भौतिकवादी चीज़ो से कभी किसी के मन को शांति मिल सकती है। हां, ये एक तरह का संतोष जरूर देती हैं जिनसे आप शीघ्र ही ऊब भी जाते हैं। अगर वास्तव में आपको आंतरिक शांति चाहिए, तो आपको स्वयं को बाहरी दिखावों से मुक्त करना होगा। तथा वो करना होगा जो आप करना चाहते हैं, वो नहीं जो दुनिया आपसे करवाना चाहती है।इस बनावटी संसार से निकल कर प्रकृति के निकट जाइए। पक्षियों का कलरव और नदियों का कलकल निनाद सुनिए।

ऐसा करने से आहिस्ता-आहिस्ता आपके और उस अदृश्य शक्ति जिसे आप भगवान, प्रकृति, ईश्वर, अल्लाह जो भी कहना चाहे के मध्य एक रिश्ता कायम होने लगेगा। एक आवाज जिसे आत्मा की आवाज भी कहा जाता पुनः आपको दिशा निर्देशित करने लगेगी और संभव है कि आपको वो आतंरिक शांति भी मिल जाए जिसकी आपको तलाश है।

  • Jitendar Kr Tripathi

    bahut hi accha likha sir wellcome

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