हो जायें सावधान, जब बच्चा बोले, बस एक मिनट और!

हो जायें सावधान, जब बच्चा बोले, बस एक मिनट और!

आजकल घरों में प्रायः ही यह देखने को मिल जाता है कि जब आप अपने बच्चों को कोई काम कहें तो आपको उत्तर मिलता है- “बस एक मिनट और!” मतलब स्त्पष्ट है कि आपका बच्चा बहुत ही व्यस्त है, और उसकी यही व्यस्तता इस प्रकार के उत्तर का कारण भी. याद कीजिये अपना बचपन, जब आप पिताजी के बुलाने पर कहते थे “जी, पिताजी अभी आया”.

कुछ लोग कहेंगे, साहब! वह जमाना और था आज के ज़माने में कहाँ ये सब. ऐसे विचार रखने वालों से स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि मात्र संस्कारों का वहन ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसका संवहन भी अति आवश्यक है. अर्थात आपका संस्कारी होना ही काफी नहीं, बल्कि आप अपने संस्कार आने वाली पीढ़ियों तक कैसे पहुंचाते हैं इस पर विचार करना भी बहुत जरुरी है.

आईये, अब उन उत्तरदायी कारणों को पुनः एक बार समझने का प्रयास करते हैं जो इनसे सम्बंधित हो सकते हैं. पुनः एक बार से हमारा आशय स्पष्ट है कि, उन कारणों से हम भलीभांति परिचित होते हुए भी उन्हें नकारने का हर संभव प्रयास करते रहे हैं.

  1. गेम- आज के तकनीकी युग में सबसे अधिक प्रचलन में कंप्यूटर पर खेले जा सकने वाले गेम्स एक प्रमुख कारण है जो बच्चों को उनके मूल कर्म अर्थात अध्ययन से विमुख करता है. उनके सोचने समझने एवं निर्णय क्षमता पर सीधा प्रभाव डालता है. “ब्लू-व्हेल” नामक गेम के दुष्परिणाम से आप भली प्रकार परिचित हैं. माना कि आपका बच्चा वह गेम नहीं खेलता होगा, परन्तु यह कि जहाँ शारीरिक क्षमता विकसित करने के लिए हल्के-फुल्के दौड़-धूप वाले गेम खेलने के बजाय लम्बे समय तक कंप्यूटर पर आँखे गड़ाए रहना कितना हानिकारक हो सकता है, क्या यह आप सबसे से छिपा है?
  2. चैटिंग- सोशल मिडिया पर अधिक समय बिताना भी एक प्रमुख कारण है, जिससे की बच्चों की मानसिक दशा पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है. विशेषकर ऐसे लोगों से चैटिंग के माध्यम से जुड़ना जिन्हें वे जानते तक नहीं कि दूसरी तरफ कौन व किस उम्र का व्यक्ति उनसे चैटिंग कर रहा है. चैटिंग, में कई बार लोग ज्यादा ही खुल कर अपने विचारों को रख जाते हैं जिन्हें सीधे बोलने में शायद हिचक होती हो. ऐसी स्थिति आपके बच्चों की मनोदशा पर विपरीत प्रभाव छोड़ सकती हैं.
  3. मोबाइल- मोबाइल एक सूचना साझा करने का सबसे बेहतर उपकरण मात्र हो सकता है. पर यह कि सदैव उसके साथ ही समय बिताना आपकी कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल जाता है. यह आपको तब पता चलता है जब आपके बच्चे ऐसा करते हैं. सोचें, और ध्यान रखें कि आपके मोबाइल में कोई ऐसी सामग्री न हो, गलती से भी, कि जिसे बच्चे देख ले तो उनकी मनःस्थिति असंतुलित हो जाय.
  4. अन्य कारण- उपरोक्त कारणों के चलते असमय खाना-पीना, देर रात तक जागना, सुबह स्कूल जाने को समय पर तैयार न हो पाना, होमवर्क जैसे तैसे किसी की सहायता से या नक़ल कर पूरा करना आदि ऐसे व्यवहार के पीछे उत्तरदायी हो सकते हैं, पर जरा ध्यान दें कि इनके पीछे भी वही कारण हैं जो इस प्रकार के व्यवहार के कारक हैं.

इनके अतिरिक्त और भी कई कारण हैं जिन्हें हम भलीभांति समझ लेते हैं पर उनके निवारण के लिए कोई उपयुक्त व ठोस कदम नहीं उठा पाते. हमें इसके लिए सुनियोजित तरीके को अपनाना होगा, जहाँ तक संभव हो सके अपने आप को एक उच्चतम स्तर पर आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना होगा जिससे कि उन्हें प्रेरणा मिले और वह अनुकूल वातावरण में स्वयं को ढाल पायें, तथा एक सभ्य नागरिक बनने की दिशा में अग्रसर हो सकें, भले ही यह गति धीमी हो, यदि रास्ता सही होगा तो देर से ही सही, लक्ष्य अवश्य प्राप्त किया जा सकेगा.

  1. समय- सिर्फ पैसे कमाना ही आपका कर्तव्य नहीं, अपनी संतान को बेहतर जीवन देने की दिशा में आपका उसको दिया जाने वाला समय भी परमावश्यक है. सुनियोजित हो कर उन्हें समय, थोड़ा ही सही पर जरुर दें, किसी भी बहाने से, कभी पूछ ही लिया करें, कहाँ गए थे. क्या खाया? क्या पिया? होमवर्क बनाया लिया क्या? ताकि उन्हें भी लगे कि हाँ, पिताजी पूछते हैं. वे भी आपके प्रति उत्तरदायी होंगे. उनके साथ थोड़ा समय व्यतीत करें. आप बहुत काम करते हैं, थक जाना स्वाभाविक है. पर आपको चाहिए अपना मनोरंजन उनके बीच खोजें, उनसे ही अपना मन बहलायें. उनसे अपनी कोई बात साझा करें, प्रेरणास्पद घटनाओं के बारे में बताएं, महापुरुषों की जीवनी के बारे में बताएं, जिससे की उनका मनोबल ऊँचा हो सके.
  2. पैसा- उन्हें उम्र के मुताबिक खर्चने को पैसे भी दें, साथ ही उसका हिसाब भी लें, जिससे की वे अर्थव्यवस्था को समझें, कि पैसे की अहमियत क्या होती है, जब हो और जब किसी के पास न हों इसके बीच का अंतर भी, और पैसा लाने में कितना परिश्रम लगता है आदि.
  3. उपहार- छोटे-छोटे ही सही पर कभी-कभी कुछ उपहार भी दिया करें, पर उन उपहारों के कारणों को सटीकता से ढूंढें, जैसे तुमने अपना फलां काम बेहतर किया इसलिए तुम्हें दिया जा रहा है, अगली बार और बेहतर कर पाओ ऐसी आशा है. पूरी तरह से बेफिक्रे न हों. बच्चों को पता चलना ही चाहिए कि आप कौन हैं, उनसे आपकी क्या अपेक्षा है, और आप उनके लिए क्या कर रहे हैं.
  4. व्यवहार- सबसे महत्वपूर्ण है आपका उनके सामने प्रस्तुत होना कि आप किस रूप और हालत में उनके सामने जाते हैं अथवा उनका सामना कैसे करते हैं. आप तात्पर्य भली प्रकार समझ गए होंगे, परन्तु फिर भी जिक्र करना आवश्यक प्रतीत हो रहा है तो, यह कि यदि आप कोई व्यसन करते हैं तो उनके सामने करने से बचें, भले ही वो जानते हों पर फिर भी भूले से भी उनके सामने ऐसा न करें और हो सके तो स्वयं को व्यसनों से दूर रखें.

जब हम गर्भवती महिलाओं को व्यसनों से दूर रखने अथवा रहने की बात करते हैं तो ध्यान देना चाहिए कि संतान उत्पति के बाद पुरुषों को भी व्यसनों से दूर रहना चाहिए. एक बेहतर संतान की अपेक्षा सभी रखते हैं पर उसके लिए आदर्श वातावरण के निर्माण में अपनी भूमिका भूल जाते हैं.

उपरोक्त बातें चाहे कितनी भी बार आपने अलग-अलग माध्यमो से सुनी, पढ़ी अथवा देखी होंगी, पर इसके अनुपालन में हम ही पिछड़ रहे हैं, अपने बच्चों के प्रति चिन्तित होना, और इस हेतु कुछ कर न पाना, इस विडंबना से हमें बाहर आना ही होगा क्योंकि, आपके हमारे भविष्य की डोर हमारे आपके ही हाथों में है