आहत पंचकुला की अपील

आहत पंचकुला की अपील

मैं पूछूं जो सेवक प्रधान ,

क्या नहीं बचा इसका निदान.

क्यों जुबां पे बंद पड़ा ताला,

कहने को देश का रखवाला.

मन की बात क्यों करते हो,

जब “डेरा” से तुम डरते हो.

“डेरा” तुम पर क्यों भारी है,

बस कहने को तैयारी है.

कुछ नहीं किया तेरा दल-बल,

तेरी अपील का था कायल.

क्यों सोच रहे खोया प्रभाव,

गर बोले कल आता दवाब.

हो सकता तेरी बोली से,

मरते ना कोई गोली से.

संभव था तेरी बात सुने,

जो राह चुनी, वो नहीं चुने.

गर तुम अपील कर देते कल,

हो सकता था सब कुछ तब हल.

क्यों नहीं राष्ट्र-संदेश दिया,

जल जाने क्यों प्रदेश दिया.

तुम पर सबका विश्वास अटल,

परिदृश्य भी जाता आज बदल.

पर ऐसा तुमने नहीं किया ,

जोखिम को शायद नहीं लिया.

चिंता आगे सत्ता की थी,

कट जाए ना पत्ता की थी.

अब किस मुँह से तुम बोलोगे,

क्या पड़ी गांठ तुम खोलोगे.

है मेरे दिल की यह पुकार,

अब भी तो कर लो कुछ सुधार.

वरना बैठी जनता जो मौन,

तुम से पूछेगी – तुम हो कौन?