आहत होती संवेदनाएं और हम

आहत होती सवेदनाएँ और हम

अब तक देखा गया है कि किसी भी फिल्म के प्रदर्शित होने पर प्रतिक्रियाएं आतीं थी और विवाद होने पर उचित/अनुचित विरोध हुआ करता था. वस्तुतः किसी भी फिल्म जो कि विशेष कर ऐतिहासिक मूल्य के विषय वस्तुओं पर आधारित हो तो उनके स्वप्न दृश्यों का फिल्मांकन बहुत ही सावधानी से किया जाना चाहिए. कहने को तो महिषासुर ने भी माता के विषय में अपमानजनक बातें कहीं थीं तो क्या हम इसी को बार बार दुहराते हैं? महिमा मंडित करते हैं? नहीं, हम फिल्मो के माध्यम से अच्छी बातों को प्रचारित-प्रसारित करते हैं.

एक समय था फिल्मे समाज का दर्पण होतीं थी अर्थात जो समाज में घटित होता था उनका ही चित्रण किया जाता था परन्तु आज-कल परिदृश्य कुछ और ही है, आज समाज में वही हो रहा दिखलाई पड़ जाया करता है जो कुछ भी फिल्मो में दिखाया जाता है. सचमुच हमारा समाज पूरी तरह से फ़िल्मी हो चला जान पड़ता है.

इन सबका सामाजिक सरोकार से जितना भी गहरा वास्ता हो पर, इतना तो तय है कि जब तक इनको हवा नहीं मिलती तब तक विवाद गहराता नहीं, इतिहास भरा पड़ा है ऐसे विवादित फिल्मो से पर आज कल तो लगता है कि सब कुछ फिल्मे ही तय करेंगी. क्या राजश्री प्रोडक्शन की फिल्मे बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलतीं? क्या ऐसी फिल्मे दर्शकों को पसंद नहीं आतीं? क्या दर्शक फिल्मो में हिंसा और नग्नता ही देखना पसंद करते हैं? ऐसा बिलकुल नहीं है.

आप पब्लिक डोमेन में किसी भी ऐसे प्रस्तुतिकरण से विचलित हो उठते हैं फिर आप पर्दों पर वही देखना चाहते हैं, फिल्मकारों के अनुसार किये गए सर्वे से यही अनुमानित है कि हिंसक दृश, उत्तेजक दृश्य, दुर्घटनाओं वाले दृश्य आदि दर्शकों में काफी लोकप्रिय है. मैं कहता हूँ क्या खाक लोकप्रिय हैं. क्या कैमरे की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए? क्या जिन दृश्यों को हम आम जीवन में सबके सामने देखना-सुनना नहीं पसंद करते उन्ही दृश्यों को हम परदे पर भला कैसे देख सकते हैं, हमें अपनी ही सोच बदलनी होगी वरना हमें वही परोसा जाता रहेगा और उसका ठीकरा भी हमारे सर फोड़ा जाता रहेगा यदि हम अब भी नहीं चेते.

फिल्म (ध्वनि समानांतर चित्रों का अपलक प्रक्षेपित अवलोकन) जिसमे किसी भी ऐसे दृश्य का समावेशन नहीं किया जाना चाहिए जो किसी भी प्रकार से दर्शकों को विचलित, असामान्य रूप से उत्तेजित अथवा भयभीत करती हो. यह एक सामान्य मापदंड है. जिसका अनुपालन आजकल की फिल्मो में शायद ही होता है.

आपको शायद याद हो आज से वर्षों पहले बन रही फिल्मों के दृश्यांकन में जिस प्रकार बंदूक की गोलियों से बने घाव, घूंसों की आवाज, बलात्कार के सांकेतिक दृश्य, तथा अन्य हिंसक दृश्यों को जिस प्रकार फिल्माया जाता था उनको देखने से दर्शक असहज नहीं हुआ करते थे, परन्तु  तकनीक के विकास के साथ-साथ उनके परिष्कृत होने से वही दृश्य और भी ज्यादा सजीव होते गए और हमारी संवेदनाएं निर्जीव. आज हम सड़क पर हुए हादसों के दृश्य तुरंत शेयर करने लग जाते हैं बजाये इसके कि उस दुर्घटना की सूचना पुलिस को देने और सहायता के लिए उद्दत होने के. इसका कारण एक मात्र यही है कि हमारा मस्तिष्क आदी हो चुका है ऐसे दृश्यों को देखने/झेलने को, तो इसका जिम्मेवार कौन है? जी सही कहा, हम स्वयं अपनी संवेदनाओं के हत्यारे हैं.

अपने विवेक से काम लें, हिंसा नहीं करें.