नक्सलियों के बंद का सामान्य प्रभाव : सरकारी प्रतिष्ठान बंद, निजी रहे खुले.

नक्सलियों के बंद का सामान्य प्रभाव : सरकारी प्रतिष्ठान बंद, निजी रहे खुले.

भाकपा माओवादी के ऑपरेशन “ग्रीन हंट” तथा हमले में सेना के अस्त्र-शस्त्र के उपयोग के विरोध में एक दिवसीय बंद के आह्वान का सामान्य प्रभाव लगभग समस्त कोयलांचल पर देखने को मिला. आज पूरे बेरमो अनुमंडल में बंद का सामान्य देखा गया. सी.सी.एल. के कथारा तथा बी.एंड.के. व ढोरी में कोयले एवं छाई का ट्रांसर्पोटिंग ठप रहा. जबकि कोलियरियों में कोयले का उत्पादन होता रहा. वहीं कोयले के डिस्पैच पर प्रभाव पड़ा.

 

नक्सलियों के बंद का सामान्य प्रभाव : सरकारी प्रतिष्ठान बंद, निजी रहे खुले.
नक्सलियों के बंद का सामान्य प्रभाव : सरकारी प्रतिष्ठान बंद, निजी रहे खुले. (छाया/सूत्र : बेरमो आवाज)

सरकारी बैंक बंद रहे, रेलवे का परिचालन सामान्य रहा, फुसरो बस स्टैंड में बिहार, औरंगाबाद, नवादा, छपरा, दरभंगा, सिवान आदि जाने वाली बसें नहीं चलीं, जिसके कारण यात्रियों को काफी कठिनाई का समाना करना पड़ा. इस दौरान कई निजि स्कूल बंद रहे. जबकि सरकारी कई विद्यालय खुले रहे. फुसरो बाजार, करगली बाजार, जरीडीह बाजार, में कई दुकाने खुली रही. वही फुसरो बाजार में पेट्रोल पंप बंद रहने कारण दोपहिया वाहन मालिको को कठिनाई का समाना करना पड़ा.

मालूम हो कि भाकपा माओवादी द्वारा इस प्रकार एक दिवसीय बंद का आह्वान प्रायः ही होता रहता है. पांच वर्ष पूर्व सन 2012 में जून के महीने में 12 तारीख को फुसरो बाज़ार पर हुए हमले को कोई नहीं भूला है अब तक, जिसका मुख्य कारण उनके बंद के आह्वान को हल्के में लेना रहा था. उस समय से ही जब भी इस प्रकार का आह्वान होता है तो सरकारी तंत्र अपनी सुरक्षा का हवाला देते हुए कामकाज ठप्प कर ही देते हैं, चाहे बैंक हो या अन्य सरकारी दफ्तर सभी जरा सी भी भनक लगती है की माओवादियों ने बंद बुलाया है बस हो गयी छुट्टी.

किसी भी नेता अथवा बड़े आयोजन पर पूरा प्रशासन जमा हो जाता है तो ऐसे बंद के आह्वान के दिन क्यों कमी पड़ जाती है उनकी. क्या प्रशासन को अपने ही सहभागी पुलिस पर भरोसा नहीं, कि उनके सुरक्षा चक्र में भीतर अपने काम काज को सुचारू रख सकें. हमारे समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो इस दिन का इन्तेजार भी करता है की कब बंद का आह्वान हो और छुट्टी मिले इस काम काज से. पर इन सबसे अलग बात करें कि क्यों नक्सलियों के मुख्यधारा में आने की सभी योजनाये कारगर सिद्ध नहीं हो पातीं. कहाँ कमी रह जाती है. क्यों ऑपरेशन ग्रीन हंट जैसी कार्रवाई के लिए सरकार विवश होती है. जिस प्रकार की मानसिकता वाले लोग नक्सलियों के बीच पाए जाते हैं उनसे निपटने के लिए क्यों नहीं कोई अहिंसक निति सरकार अपनाती है. ये कुछ ऐसे अनसुलझे प्रश्न हैं जो मन को विचलित कर जाते हैं….