महिला सशक्तिकरण : वर्तमान परिदृश्य

महिला सशक्तिकरण : वर्तमान परिदृश्य

महिला सशक्तिकरण, अबला नारी, नारी शक्ति पहचानो। कुछ अजीब सा लगता है मुझे ये सब। आज की नारी और पहले की नारी, क्या इसने अपनी शक्ति को आज तक नही पहचाना। यह तो वह नारी है जो हमेशा से अपनी शक्ति का दुरूपयोग करती आ रही है। हम कथा-कहानियों में पढ़ते हैं तो शायद हमें यकीन नही आता, मगर हम प्रत्यक्ष देखते हैं तब भी हमारी आंखों पर पट्टी बंध जाती है। आज हर घर में लड़ाई होती है नारी ही नारी की दुश्मन है।

सास के साथ बहू की या फिर बहू के साथ सास की लड़ाई हम प्रत्यक्ष रूप से हर घर में देखते हैं। और फिर मुकदमा कोर्ट कचहरियों तक जाता है तो बेचारे पुरूषों के कंधों पर और भार आ जाता है। सारे दिन काम करते हैं शाम को घर आओ तो फिर वही क्लेष, सुबह काम पर जाने से पहले क्लेष। आखिर कब तक चलेगा। यह क्लेष। यदि भूले-बिसरे स्त्री को एकाध थप्पड़ मार भी दिया तो वे इस बात का बतंगड़ बना लेती हैं। और पहुंच जाती हैं थाने। बंद करा देती हैं अपने ही मर्द को।

नारी में तो वो शक्ति है जो यदि इसे स्वतंत्र कर दिया जाये तो पूरे संसार को एक अकेली ही नष्ट कर सकती है। नारी की बुद्धि हमेशा उल्टी चलती है। धार्मिक ग्रंथों से लेकर आज इस कलयुग तक नारी हमेशा घर को उजाड़ती ही आई है। आज के नेता हो या किसी भी मिलीटरी के ऑफिसर भले ही हो और देश पर राज करते हों सेना को हुक्म देते हो मगर घर में उनपर उनकी बीबियों का राज है। अपनी पत्नी का हुक्म मानते है। रही सही कसर औरतों की हमारी सरकार ने पूरी कर दी, इनके लिए कानून बनाकर।

ये कानूनों का धड़ल्ले से गलत प्रयोग कर रही हैं। इससे मुसीबत आ गई है बेचारे मर्दों पर। घर से किसी तरह से बीवी से माफी मांगकर बाहर निकलते हैं तो बाहर किसी औरत से उलझ जाते हैं। फिर चाहे गलती औरत की ही क्यों ना हो। चाहे गलती औरत की हो या मर्द की, जेल की चक्की तो बेचारे पुरूष को ही पीसनी पड़ती हैं। इसलिए मेरा विचार तो यही है कि इस बेचारी अबला नारी को हमारी सरकार ने और ज्यादा से ज्यादा शक्ति दे देनी चाहिए। ताकि ये आराम से रह सके।

इनको इस प्रकार की शक्ति देनी चाहिए जैसे कि- हर पुरूष को सुबह से शाम तक काम करना चाहिए और शाम को पत्नी को अच्छी-अच्छी चीजें लाकर दें घर आकर घर का काम जैसे कि खाना बनाना बर्तन साफ करना आदि करे, फिर अपनी औरत के सोते समय पैर दबाए। जो पुरूष ऐसा काम नही करेगा उसकी औरत उसके प्रति न्यायालय के दरवाजे खटखटा सकती है। और न्यायालय के न्यायाधीश को उसकी बात माननी पड़ेगी। यदि वह नही मानेगा तो उसको भी कानून तोड़ने की ऐवज में कोई भी सजा दी जा सकती है।

न्यायालय के न्यायाधीश को उसके पति के प्रति कड़ी से कड़ी सजा या जो उसकी पत्नी चाहती है वह सजा देनी होगी। उस पर वह पत्नी को सताने या मारने वाली धारा लगा सकता है। पत्नी चाहे तो अपने पति पर दहेज का आरोप भी लगा सकती है। वह यह चाह सकती है उसका पति उस पर अत्याचार करता है। वह अपने पति के साथ नही रहना चाहती। पति भी यही चाहे तो अच्छा है कम-से-कम जेल में उसे दाल-रोटी तो सुकून से मिल ही सकती है।

यह लेखक के अपने विचार हैं.