मजबूरीनामा

|| मजबूरीनामा ||

बापू से संबंधित जानकारी आपको इस इंटरनेट की दुनिया में बड़ी आसानी से उपलब्ध हो सकती है, पर आज हम उत्तर गांधी काल की दो अलग-अलग अवधारणाओं पर चर्चा करेंगे, जो आज के वर्तमान समाज की रूपरेखा को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित करती हैं. पहली अवधारणा गाँधी को अहिंसा के परम पुरोधा के रूप में प्रस्तुत करती है, वहीं दूसरी अवधारणा उन्हें भिरू स्वभाव का सिद्ध करती है जिसके कारण ही उन्होंने अन्यान्य अवसरों पर अपने मौन को न तोड़ना उचित समझा, जिस कारण अंततोगत्वा उनकी हत्या कर दी गई थी.

विचारकों के मतानुसार गांधी अपने आप में स्वयं एक अवधारणा के वाहक थे और कईयों के लिए शोध का विषय भी. अहिंसा के पुजारी के लिए अहिंसा से लेश मात्र भी अलग कोई भी व्यवहार हिंसा की श्रेणी में आता था, और उनके इसी सोच ने उनको समकालीन क्रांतिकारियों से अलग कर रखा था, जो किसी भी कीमत पर आजादी चाहते थे. नेहरू और जिन्ना दोनों ही प्रिय थे उनको, जैसे किसी पिता को अपनी संतान प्रिय होती है. परन्तु संतानों ने उनकी कितनी मानी ये पूरा विश्व जानता है. उनके जिद के आगे बापू ने घुटने टेक दिए थे, विभाजन का कलंक हमारे इतिहास के साथ जुड़ चुका था. देश आजाद तो हो चुका था पर यह उनके सपनो का भारत नहीं था.

 लोगों को कहीं न कहीं उनकी बातों में विरोधाभास भी देखने को मिलता है, एक ओर वे कहते थे की ‘अहिंसावादी बनो‘, दूसरी ओर “अन्याय न करो, और न ही सहो‘” तो, न करो तक तो ठीक, पर न सहो के फेर में लोग भ्रमित हो गए थे, उन्हें लगा की अनशन करना- अन्याय सहना है, और फिर कुछ लोगों की सहनशीलता जवाब दे गयी, और वे गाँधी मार्ग से अलग होते चले गए, अंततः देश के विभाजन का दंश उनकी समाधी में परिणत हुई. जहाँ एक ओर उत्तर गाँधी काल में बुद्धिजीवियों ने स्वयं को गाँधी का समर्थक और उनके विचारों का पोषक के रूप में प्रस्तुत किया वहीं दूसरी ओर युवाओं ने स्वयं को असहनशील रखा और गाँधीवाद को गांधीगिरी की संज्ञा दे डाली. अब “मैं गाँधी नहीं.”, मुझे गाँधी मत समझना, कोई एक गाल पर थप्पड़ जड़े तो तुम उसके दोनों गाल पर जड़ दो, आदि संवादों ने समाज में अपनी जगह बनानी शुरू की.

 इन सबसे अलग गाँधीवाद आज भी जिन्दा तो है परन्तु वह मात्र किताबों, विचारों, आदर्शो के गलियारों में भटकता हुआ. हम सभी तस्वीरों पर हार तो चढ़ा आते हैं पर उनके आदर्शों को अपनाने में हार जाते हैं, हम तो कृष्ण को भी चोर कह जाते हैं पर शायद यह नहीं सोचते की उनके द्वारा किये सत्कार्य का एक प्रतिशत भी कभी हम नहीं कर सकते, किंचित, नकारात्मकता अधिक आकर्षक होती है, रामायण के बारे में  बच्चे भी जानते हैं पर उनमें से बिरले ही राम की नक़ल उतारते नजर आते हैं अधिकतर तो रावण की हँसी को ही दुहराते दिख जाते हैं. हम एक पल के लिए गाँधी को उनके ही वाद का सही प्रतिरूप न माने, यह भले ही स्वीकार हो परन्तु यह क्या! हम तो अहिंसा को ही नकारते दिख रहे हैं.

 आज, यदि अहिंसा से कुछ प्राप्त नहीं होता दिख रहा तो भला कौन सा कार्य हिंसा (आतंकवाद/नक्सलवाद/अलगाववाद/उग्रवाद) से होता दिख रहा हो कोई बताये मुझे. अहिंसा कोई गाँधी की थाती नहीं थी, वे तो उसके समर्थक और प्रबल पोषक भर थे दीगर बात यह है की उसमे वो कितने सफल अथवा विफल रहे! अथवा प्रश्न यह होना चाहिए की हम अपने आपको कहाँ पाते हैं? सच पूछिये तो हम मौके के यार भर हैं, बाते तो खूब बड़ी-बड़ी करेंगे पर जब अपने पर आयगी तो निकल लेंगे. गाँधी नोट पर हैं. सच पूछिये अगर वो वहां नहीं होंगे तो कुछ दिन बाद लोग उनका नाम तक भूल जायेंगे, अवधारणाओं की तो बात ही क्या है. अब जहाँ साम-‘दाम’-दंड-भेद में से पहले पर बात नहीं बनती तो दूसरा विकल्प (मजबूरी) और फिर गाँधी जिन्दाबाद! तीसरे और चौथे तक जाने की नौबत ही नहीं आती है. प्रश्न है यह मजबूरी किसने बनायी? हम क्यों मजबूर हो गए और गाँधी को उसका प्रतिरूप बना बैठे.

 आवश्यकता, इस बात के अर्थ को समझने की है की किसी भी चीज का सही अनुप्रयोग कैसे, कब और कहाँ हो सकता है अथवा होना चाहिए इस बात के प्रति हमारी अपनी जागरूकता. हम जितने किसी भी चीज़ के प्रति जागरूक होंगे उतने ही हम उस चीज़ से लाभान्वित भी हो पाएंगे, यह अलग बात है की हम पहले तो जागरूक होना ‘चाहें’. भला ये कोई जबरदस्ती की चीज़ थोड़े ही है. बात गाँधी से से चल कर आगे दूसरी दिशा में न निकल जाये (लगभग निकला ही समझिये) इससे पहले साफ-साफ शब्दों में यही कहना चाहता हूँ की आज गाँधी जी हमारे बीच जिस रूप में भी हैं उन्हें स्वीकार करिए, स्वीकार करिए उनके आदर्शो को और ऐसे ही सलाह देते रहिये दूसरों को कि ‘वो‘ उनके आदर्शों को अपनाएँ, क्योंकि ‘आपने’ तो मजबूरीनामा पर पहले ही हस्ताक्षर कर दिए हैं.

“मजबूरी का नाम- महात्मा गाँधी”
आखिर क्यों जुड़ा बापू के नाम से यह अनचाहा तमगा?

संपादक

नीरज पाठक, संपादक, फुसरो ई-पत्रिका. 9934109077
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    हमें नकारात्मकता की ओर नहीं बल्कि सकारात्मकता की ओर आगे बढना चाहिए ।इसमें ही समाज और राष्ट्र की भलाई है ।

    • जी सही कहा आपने, प्रयास से ही संभव हो सकता है, और उसी दिशा में यह एक छोटा सा प्रयास है.