आओ एक दीप जला जाओ!

आओ एक दीप जला जाओ
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तुम बनो आज अब उद्दीपक

तुम हो तो जल पाए दीपक

तुम हो तो दूर अंधेरा हो

जगमग प्रकाश से डेरा हो

मैं तुझे ही दीपक मान रहा

तू सदा जले यह ठान रहा

तुझमें घी बाती भरता हूँ

अब हो बयार ना डरता हूँ

तुम मंद – मंद ही जला करो

जलते – जलते भी भला करो

पर कभी – कभी मन डोल रहा

अंदर – अंदर ही बोल रहा

क्यों जले दीप ना हो प्रकाश

क्यों ज़िंदा पर ना चले सांस

यह सब वायु का दोष रहा

जो त्याज्य रहा सब पोस रहा

पहले वायु को शुद्ध करो

हो सके तो उससे युद्ध करो

जब शुद्ध पवन हो जाता है

सब अंधकार खो जाता है

दीपक की आयु बढ जाती

गिरती लौ भी तब चढ जाती

हो अंधकार जितना भी घोर

तब काली रात भी लगे भोर

दीपक की यही कहानी है

यह कर्ण -दधिचि -दानी है

खुद जलकर भी ना जलता है

औरों की तरह ना छलता है

अब हो अमीर या हो गरीब

दीपक -प्रकाश सबके करीब

यह सबके साथ करे प्रीति

है इक समान इसकी ज्योति

यह हर घर जगमग करता है

इसके मन ठग ना रहता है

आओ एक दीप जला जाओ

भारत की शान बढा जाओ.

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राजेश कुमार पाठक

प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
सदर प्रखंड, गिरिडीह.