खिचड़ी

खिचड़ी,

जी हाँ, नाम सुनकर कई तो मुंह ही बना डालते हैं, खास कर वो जिन्हें सिर्फ उदर शांति से मतलब नहीं बल्कि जिह्वा पर स्वाद के कमल खिलाने भर से होता है, कुछ के मुंह का स्वाद ही बिगड़ जाता है तो कुछ खास पकाने के शौक़ीन उसमें विभिन्न चीजों का तड़का लगाकर इतना लज्जतदार बना डालते हैं की लोग उँगलियाँ भी चाट जाते है. यूं तो यह एक व्यंजन मात्र है पर इसकी उपमाएं भी कम नहीं, ‘खिचड़ी कर देना’ व ‘खिचड़ी पकाना’ जैसी कहावतें इसके अस्तित्व को चिरायु करती रही हैं. कहा भी गया है – खिचड़ी के चार यार- दही, पापड़, घी व अचार! लेकिन यही खिचड़ी जब मात्र दाल चावल और नमक के साथ सादी होती है तब अत्यधिक सुपाच्य होती है, और जितना व जैसे जैसे इसमें अन्य चीजों का तड़का लगता जाता है यह आकर्षक तो लगती है, पर इसका मूल खो जाता है.

अब बात करते हैं इसके असल मतलब की, जहाँ कहीं भी संदर्भित बातों के इतर ढेर सारी अन्य असंदर्भित बातों का मिश्रण हो वह कार्य अथवा संदर्भित अभिव्यक्ति खिचड़ी का रूप ले लेती है.

ऐसा बिलकुल नहीं की खिचड़ी हमारे समाज में स्वीकार्य नहीं, बल्कि आज आप जिस ओर अपनी नजर दौडाएं, आप पाएंगे की हर क्षेत्र में इसका प्रतिरूप समाहित है, अब चाहे वह अपना देश हो, अपना समाज हो, अपनी राजनीती हो, अपना खेल जगत हो, सिने जगत हो, व्यवसाय हो अथवा साहित्य हो हर जगह इसने अपना संक्रमण फैला रखा है.

यह चिरपरिचित बात है कि अपना देश तो कई संस्कृतियों की खिचड़ी है, वो भी ठंडी खिचड़ी, जैसे जम जाती है ठीक वैसे ही अपना देश कई संस्कृतियों व मान्यताओं को अपने में समाहित किये हुए एकता का आदर्श स्थापित करता आ रहा है और जमा हुआ है, पर कभी-कभी साम्प्रदायिकता का कंकड़ बीच में आ ही जाता है, अब सोचिये जरा यदि यह कंकड़ न आये तो खिचड़ी का स्वाद कभी न बिगड़े. तो हमें भी उन्हें चुनकर बाहर करना ही पड़ेगा जो हमारी खिचड़ी ख़राब कर रहे हैं, इसलिए इनको बख्शा नहीं जाना चाहिए.

आज के युवा समाज ने जो की खिचड़ी संस्कृति को अपनाने में उनकी खुद के संस्कृति से विलग होते जा रहे हैं, उनके आदर्श, विचार, पहनावे, रहन-सहन, बातचीत सभी भिन्न होते हैं, जो, जिन्हें वे आदर्श मानते हैं उनके विचार नहीं, जिनके पहनावे अपनाते हैं उन जैसा रहन सहन नहीं होता, बातचीत की तो बात ही न करें क्योंकि उसको सुनना तो जैसे उनके खिलाफ ही है. जो उम्र उनको सुनने में लगानी चाहिए, बोलने में निकल जाती है और जब बोलने की बारी आती है तो चुप पड़ जाते हैं की वो तो कभी सुना ही नहीं की कहा और कब कैसे बोलते हैं, इसलिए इस वर्ग को अभी बक्श ही दें तो ठीक रहेगा और अपने खिचड़ी वृतांत को आगे बढ़ाते हैं.

राजनीती में खिचड़ी का बड़ा महत्व है, कार्यकर्ताओं का सम्मेलन हो अथवा कोई रैली या रैला खिचड़ी एक सदाबहार व्यंजन है. खिचड़ी पार्टी की सरकारे अक्सर राज्यों व केंद्र में देखने को मिलती रही है. जिनकी खिचड़ी में जैसा तड़का वैसा उसका स्वाद-सुगंध दूर दूर तक फैलता रहता है, जिनकी यारी खिचड़ी के परिजनों सी होती है उनके पञ्च की कुर्सी टिकी रहती है पर जिनकी खिचड़ी में दही ज्यादा हो जाता है तो उनकी खिचड़ी फैलते देर नहीं लगती (क्षमा करें वैसे फैलता तो रायता है पर आपने गौर किया होगा की वो भी तभी फैलता है जब दही ज्यादा हो जाता है), अब अपने सुशाशन बाबु को ले लीजिये समय रहते निकल लिए, देर आये, पर दुरुस्ती का आलम आने अभी देर लगेगी साहब, क्योंकि खिचड़ी में दाल, मूंग, मसूर व अड़हर का तो समझ आता है, भला राजमे की खिचड़ी कैसी होती है? बिहार में लालू तो गए पर समोसे में अभी भी आलू डलता है, बाकी सब तो बिहार की जनता जानवे करती है सो अब उन्हें भी बक्श दिया जाय.

आप कहेंगे की खेल जगत में क्या है, भाई सबसे बड़ा खेल ही तो खिचड़ी है, लोगों को भले ही न पता हो के एक ओवर में कितनी बार एक ही गेंद को फेंकते है पर रन कितने बन रहे है जरुर पता हो जाता है, भला वो अपने को समाज में कम कैसे बता पाएंगे की उनको पता नहीं की क्रिकेट में क नहीं र आधा होता है. अब तक आप समाझ गए होंगे की मैंने क्रिकेट क्यों चुना? जी बिलकुल सही पकड़ा आपने, ये जो आई.पी.एल. है न जिसमें कई देशों के खिलाडी अपना जौहर दिखाते हैं, पर इनकी भी खिचड़ी सही ना हो तो खेल बिगड़ जाता है, मतलब रसोइया सही तरीके इन्हें न बनाये तो टीम खिचड़ी फ्लॉप हुई ही समझिये, अब भला सिर्फ दाल या सिर्फ चावल से तो दाल भात अलग अलग ही बनते हैं न? सही खिचड़ी नहीं बनेगी तो टीम चलेगी कैसे. यह बात सामान्य क्रिकेट टीम पर भी लागू होती है. जब तक सही क्रिकेटरों की खिचड़ी टीम इंडिया में नहीं होगी तब तक उनका स्वाद सुगंध दुनिया तक नहीं फैल पायगा.

हाँ तो संपादक महोदय ने सीमा दे रखी है 1000 शब्दों की, और मैंने 800 पार कर लिए हैं तो अपनी बातो को संक्षेप में आगे बढ़ाते हुए कहना चाहता हूँ की सिने जगत में भी खिचड़ी ने अपना परचम लहरा रखा है, फिल्मे, चाहे उनका फिल्मांकन कितना भी उच्चस्तरीय क्यों न हो पर निर्माताओं को यह भय सदा ही सताता रहता है, की यदि उसमे आइटम नंबर का तड़का नहीं डाला तो उसके फ्लॉप करने का खतरा बना रहता है, जिससे भयभीत हो आजकल जैसे परंपरा सी बन गयी है की फिल्मो में तेल भले ही नौ मन ना हो पर राधा को नचा ही डालते हैं.

आज कल सरकार भी सरकारी तंत्र को सम्हाल नहीं सकती सो इंटरप्रेन्योरशिप को बढ़ावा दे रही है और लोगों को अलग अलग व्यवसायों में एक साथ व्यस्त कर रही है, लोग बहुधन्धी होते जा रहे हैं. मतलब यहाँ भी खिचड़ी का ही व्यापर हो रहा है, जिस कारण लोगो को न तो ठीक से चावल और न ही ठीक से दाल के स्वाद का पता चल पर रहा है, बस सभी अपनी-अपनी खिचड़ी गलाने में लगे हैं, क्योंकि पक तो सभी की जाती है पर गलती किसकी ज्यादा है महत्व इसका है.

संपादक महोदय से क्षमा मांगते हुए आगे अंतिम पैराग्राफ की तरफ बढ़ता हूँ की अपना साहित्य जगत भी इससे अछूता नहीं रह गया है, अब इसी व्यथा की बात लीजिये, शनिवार का दिन था, धर्मपत्नी ने कहा, “आज खिचड़ी ही बनाउंगी” मैंने भी कहा “हाँ-हाँ जरुर क्यों नहीं”, आखिर तुम्हारी भी सप्ताह में एक दिन की छुट्टी बनती है जैसे कई संस्थानों में शनिवार को आधी और रविवार को पूरे दिन छुट्टी रहती है, वैसे तुम भी खिचड़ी पकाकर शोर्टकट में निपटा डालो, ताकि हम सब की क्षुधा शांत हो सके और इसी बीच मैं भी अपने मित्रों की मानसिक क्षुधा शांति के लिए एक लेख लिख लेता हूँ, और उसका विषय तो तुमने पहले ही दे दिया – खिचड़ी.