अंतर्मन (१९६०)

|| अंतर्मन ||

अंतर्मन का सोया विषाद, क्यों चिल्लाता है बार-बार.

भगवान बोल, होता कैसा? जिस बेटे का लुट गया प्यार.

माँ-बाप हेतु बालक रोता, भगवान स्वर्ग में सोता है.

दुःख जलनिधि में लगता गोता, शैशव धरती पर सोता है.

चिंतित जीवन, धूमिल प्रभात, समता पर भीषण वज्रपात.

रहता है मौन वह दिन-रात, रटता है बालक, विगत बात.

माँ किधर गई? कहाँ तात? है तिमिर घोर पथ अज्ञात.

आँखों से झरता है प्रपात, अब होगी फिर क्या मुलाकात.

सुकुमार-सरलता-भोलापन, सब पर कठोरता का बंधन.

गर भरा धूल से यह चंदन, ईर्ष्या के सर्पों का दंशन.

गर उजड़ गया हँसता उपवन, होगा अनाथ यह जीवन धन.

बालक पर स्नेहिल छाया हो, घर-भर की ममता-माया हो.

गदगद शैशव की काया हो, जब सब अंचल की छाया हो.

अब आंसू से कर ले तर्पण, शव पर कर ले माला अर्पण.

कह बार-बार तू हरे-राम! माँ-बाप गए हैं अमर धाम.

कुलदीपक तू एकाकी है, कठिन परीक्षा बाकी है.

जग-ज्योति जलाना तुम बेटे, मत रहना तुम घर में लेटे.

संभव है उर पर लगे घाव, दे चला जमाना नया दाव.

खिल रहा कंटकों में गुलाब, मिल रहा स्नेह-संयत स्वभाव.

एकलौता बेटा धरती पर, भगवान नजर रखना उस पर.

बांका फिर बाल नहीं होगा, दुश्मन या काल कोई होगा.

बरसाता हूँ आशीष पुत्र, जीवन होगा तेरा पवित्र.

हे पुत्र! बड़ी दुनिया विचित्र, इस दुनिया के तुम बनो मित्र.

सद्भाव-सरलता-भोलापन, करवट लेता शत-शत हजार.

अंतर्मन का सोया विषाद, चिल्लाता है रे! बार-बार.