संपादकीय

आजकल के बच्चों को यह क्या होता जा रहा है कि पहले तो वो अपने स्कूल की जहाँ कि वो पढ़े हैं कभी या अभी भी पढ़ रहे हैं उनके पूर्व या वर्तमान में जो शिक्षक हैं उनके व्यंगात्मक फोटो व टिप्पणियों को खुलेआम धरल्ले से पोस्ट कर रहे हैं और उस पोस्ट को शेयर, फॉरवर्ड व लाइक किया जा रहा है. बिना इस बात की चिंता किये की इसके क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं?

चलिए धोड़ी देर के लिए इसे बच्चों द्वारा मन की खीज निकालने का माध्यम भर मान लेते हैं, पर यह कैसा बेबुनियाद आरोप है? और है तो कार्रवाई का यह कौन सा तरीका है? लोगो से बात की तो सबने सोशल मिडिया की ही बात की और कहा उन्हें यहीं से इसकी जानकारी हुई, और महज सोशल मिडिया पर यह बात फैला भर देने से हम भी किसी को कसूरवार मान ले यह तो कोई सभ्य समाज का लक्षण नहीं जान पड़ता. अब यदि तथाकथित रूप से उनपर यह आरोप लगा भी है तो क्यों नहीं यह मामला उचित कार्रवाई के रूप में सामने आया? इस रूप में क्यों भद्दे-भद्दे पोस्ट बनाकर उसे सोशल मिडिया पर पोस्ट किया जा रहा है?

विद्यालय के परीक्षा विभाग के प्रमुख एवं सेकंड इन कमांड पर लगाया गया तथाकथित आरोप न सिर्फ बेबुनियाद है बल्कि एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत बहुत बड़ी साजिश है. और इस साजिश को अंजाम तक पहुचाने का काम यहाँ के ही बच्चे कर रहे हैं और बड़ों को भी बरगला कर उनके सामाजिक पकड़ का फायदा उठाया रहे है और इस बात में साथ दे रहे हैं उस स्कूल के ही बच्चे जिन्होंने जैसे बीड़ा ही उठा रखा है की कौन दोषी है और उसको वो फेसबुक पर ही सजा दे डालेंगे.

स्पष्ट है कि अब तक आपके मन में यह विचार आ चूका होगा की आखिर क्यों? आखिर क्यों कोई भी इस प्रकार के दोषारोपण का दुस्साहस करेगा, वो भी समाज के किसी सम्मानित व्यक्ति के विरुद्ध. आपकी सोच को सलाम करते हुए यह बहुत ही स्पष्टता के साथ बताना चाहता हूँ की शिक्षक, जिनपर यह झूठा आरोप लगाया जा रहा है वे विगत २० से भी अधिक वर्षों से विद्यालय में कार्यरत हैं और अब कुछ गिने चुने वर्ष बचे हैं उनके कार्यकाल पूरे होने को, ऐसे में कोई शिक्षक इस तरह की हरकत करना तो दूर, सोच भी कैसे सकता है, विचारणीय है.

मेरे कार्यकाल में मैंने उन्हें कभी भी अभद्र भाषा तक का प्रयोग करते न तो देखा न सुना. यहाँ मेरे से तात्पर्य केवल मेरे नहीं बल्कि तत्संबधी जिन जिन लोगो से मैंने बात की उन्होंने इसे सोची समझी साजिश का ही नाम दिया और कहा की कई बार विद्यालय के लगभग पुराने शिक्षको में शुमार उनके नाम और समाज में लोगो से पहचान जान के कारण प्रायः लोग नामांकन के लिए उनसे संपर्क करने आ जाया करते थे.

यहाँ एक बात और स्पष्ट कर दूं की ऐसे लोगों में मैं स्वयम भी शामिल रहा, पर शिक्षक के सुझाये रास्ते अर्थात सामान्य प्रक्रिया का अनुसरण कर ही मैं चला और कई विद्यार्थियों के नामांकन करवाए भी जबकि बहुतों का नही भी हो सका. नामांकन के सिलसिले में उनसे तथाकथित व्यक्तियों द्वारा ऑफर्स भी दिए गए जिन्हें शिक्षक ने विनम्रता से अस्वीकार कर दिया था, परन्तु बहुत कहने पर भी जब उन्होंने प्रक्रिया से आने की सलाह दी तो उक्त लोगों द्वारा उन्हें धमकी भी दी गयी, पर शिक्षक ने उन्हें नजरंदाज कर दिया, क्योंकि यह उनके लिए दिनचर्या की बात थी, और अब ऐसे ही लोगों द्वारा अपनी दी गयी धमकी को सार्थक सिद्ध करने के लिए समाज के ही कमजोर/अबोध कड़ियों को कन्धा बनाकर शिक्षक के सम्मान की अर्थी उठाई जा रही है, और अब भी हम चुप बैठे तो वह दिन दूर नहीं जब आये दिन ऐसी शिकायतों को बतौर हथियार की तरह उपयोग में लाना आम बात हो जायगी. और शिक्षक जैसे सम्मानित और मर्यादित लोगों का समाज में जीना दूभर हो जायगा.

आग्रह है की ऐसे बच्चों के अभिभावाक जागें और देखें की उनके बच्चे जिन्हें वे प्रायः घर के अन्दर ही पाकर समझ लेते हैं की उनकी संगती अच्छी है, भ्रम में जी रहे हैं, सनद रहे की सोशल मिडिया के दुष्परिणाम से सम्बंधित अभी तक हजारो ऐसे मामले देखने को मिलते रहे हैं.

 मेरी समाज के सभी बुद्धिजीवियों से अपील है की वे आगे आयें और चाहे वह विद्यालय प्रशासन हो अथवा नागरिक प्रशासन उन पर यह दवाब बनायें की ऐसे अभद्र टिप्पणियों को सार्वजनिक कर किसी के मर्यादा को ठेस पहुचाने का काम कर रहे समाज के उन शरारती तत्वों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करे जिससे की आगे से कोई भी इस तरह की गैरजिम्मेदाराना हरकत करने से पहले सौ बार नहीं हजार बार सोचे.

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