क्यों न माने बुरा होली में

होली मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत त्योहार हुआ करता था। सुबह से तेल चुपड़ कर हम निकल जाते पर असली होली खेलती थी हमारे यहाँ की औरतें। जब वे घर से पुआ तल कर बाहर निकलती तो मुहल्ले में बवाल ही मच जाता था। उनकी टोली हर घर जाती, महिलाओं को खदेड़ निकालती। हम बच्चें अपनी-अपनी माँओं के मदद के लिये तैयार, दौड़ कर चापाकल से उनके लिये बाल्टियां भरते थे।

हँसी-ठिठोली होती थी पर क्या मजाल जो कोई पुरुष इन महिला ब्रिगेड को छेड़ देता। उन्हें भी तो मालूम था, एक बोलेंगे तो पलट कर चार सुनायेंगी ये औरतें। खुल कर होली खेलती इन औरतों को देख कर मुझे आजादी महसूस होती थी इस खूबसूरत त्योहार में।

हम कहते थे “बुरा ना मानो होली है” और उन लोगों से भी जाकर गले मिलते थे जो साल भर हमारे दुश्मन रहे। सारे मुहल्ले वाले मिलकर जबरदस्ती गले मिलवा देते थे बाकी दिन कचड़े फेंकने को लेकर लड़ने वाले पड़ोसियों को। दुनिया में कौन सा त्यौहार यह करवाने की ताकत रखता था??

पर फिर देखी बदलते जमाने की होली। मेरे छोटे से शहर में भी हर घर जाने वाली वह टोली खत्म हो गयी। कुछ मुहल्लों में बची है, पर बदलते जमाने ने उसके अस्तित्व को खतरे में ला दिया है।

बड़े शहरों की होली से तो नफरत सा है। बड़ी होली खेलते हैं दिल्ली के लोग, पर बालकनी से। कल मेरी दोस्त को छत से लड़को ने पानी का गुब्बारा फेंक कर मार और वह दर्द से कराह उठी। उन्होंने कहा बुरा ना मानो होली है पर मैंने बिल्कुल बुरा माना और उनके घर के सामने खड़े होकर पूरी खड़ी-खोटी सुनायी।

रस्ते में दो बच्चे अपनी बालकनी से बाल्टी भर पानी उड़ेलने की कोशिश कर रहे थे। उनसे ज्यादा तो बड़ा बाल्टी ही था मानो। मुझे डर लगा की पानी तो पानी पर बाल्टी ही ना गिरा दे किसी के सिर पर। पूरी दिल्ली ही आते-जाते लोगो पर निशाना साधने में लगी है बिना यह सोचे कि अचानक हुये इस हमले से किसी बाइक का बैलेंस बिगड़ सकता है, किसी को चोट आ सकती है, किसी के आंखों में रंग जा सकता है। पर वे सब यही बोलेंगे बुरा ना मानो होली है।

मथुरा की होली में यही कहते हुये लोगों को विदेशी महिलाओ को जबरदस्ती छुते देखा था। वे परेशान थी, चिल्ला-चिल्ला कर मना कर रही थी।

कितनी दयनीय है आपलोगों की होली। आप होली के दिन अपने पड़ोसियों का दरवाजा खटखटाने, उनके साथ दही बड़ा बांटने की ना हिम्मत रखते हैं ना तमीज। आपको तो मालूम भी नहीं है कि बगल के घर में अकेले रह रहे बुजुर्ग दम्पति के चरणों मे आज अबीर डालने वाला कोई नहीं है। पर आप आती-जाती लड़कियों को छेड़ेंगे, किसी को चोट पहुँचा कर होली मनायेंगे, तबले की थाप पर अपने पड़ोसियों के साथ झूमेंगे नहीं ना ही उन विदेशियों को अपने जश्न में शामिल करेंगे, पर पूरी कोशिश रहेगी होली के बहाने गोरी चमड़ी पर हाथ डालने की।

आखिर कब और क्यों आ गयी हमारे यहाँ ऐसी सैडिस्टिक प्लेजर वाली होली कि, लड़कियों को घर से निकलने में डर लगने लगा उस दिन?? हमारी होली ऐसी तो कतई नहीं थी। ऐसी होली बुरा मानने वाली ही है।

यह दुनिया का सबसे रंग-बिरंगा खूबसूरत त्योहार है, जिसे ‘ कोल्डप्ले अपने एल्बम में दिखाता है, जिसकी फ़ोटो अगले दिन हर विदेशी अखबार में आती है और उस त्योहार का वास्तविक स्वरूप बिगाड़ कर अगर आप सोचेंगे कि हम बुरा नहीं मानेंगे तो आप बेवकूफ हैं। हमारा कुछ बहुत अपना था जो खो रहा है। हमें बुरा लगता है। दुःख होता है।

खेलिये पर थोड़ा खुले दिल से, बिना किसी नीचता के। तभी आपको हक हैं कहने का, “बुरा ना मानो होली है।”

होली की सबको शुभकामनायें। 

नीरज कुमार बरनवाल

नीरज कुमार बरनवाल, स्टूडियो आम्रपाली, मेन रोड फुसरो बाज़ार, बोकारो ८२९१४४ झारखण्ड

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