विकास योजना बनाम विकास प्रशासन : एक विश्लेषण

सरकार द्वारा जिन विकास योजनाओं को मूर्त रूप दिया जाता है उन सारी योजनाओं के निर्माण की रूपरेखा तय किये जाने से लेकर उनको पूर्ण होने तक में वित्तीय अनुशासन (FISCAL DISCIPLINE) का ख़याल रखा जाना परमावश्यक है. जितना यह आवश्यक है कि कोई भी विकास योजना निर्धारित समय सीमा के अन्दर पूर्ण हो, उतना ही इस सन्दर्भ में यह भी आवश्यक है कि वह योजना मूल्य प्रभावी (COST EFFECTIVE) हो. इस हेतु किसी भी योजना के हर स्तर पर कुशल वित्तीय प्रबंधन की जरुरत है. मैंने विकास योजनाओं के निर्माण एवं क्रियान्वयन के उस पक्ष पर बल दिया है जिनपर ध्यान केन्द्रित करने से विकास योजनाओं पर किये जाने वाले व्यय को सिमित कर योजना मद में व्यय की जाने वाली राशी के दोहराव पर भी प्रभावशाली अंकुश लगाया जा सकता है.

अध्ययन एवं सर्वेक्षण से पता चलता है की राज्य सरकार द्वारा विभिन्न विकास मदों में प्रत्येक वर्ष भवनों के निर्माण, ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में पी.सी.सी. पथ के साथ-साथ तालाब-घाटों, जाहेस्थान एवं कब्रिस्तान की घेराबंदी जैसी योजनायें संचालित की जाती हैं जिसमे करोड़ों रुपयों के राशि खर्च होती है. थोडा सा कुशल वित्तीय प्रबंधन कर इन योजनाओं में व्यय की जाने वाली राशि में से जनोपयोगी बचत की जा सकती है.

पहला : एक से अधिक भवन विहीन विभागों के कार्यालय भवनों के निर्माण की  स्थिति में एक ही स्थान पर बनने वाले विभिन्न विभागों के भवनों को पृथक-पृथक आधार तल वाले भवनों के रूप में उनका निर्माण न कर एक ही आधार तल के ऊपर कम से कम एक और भी उपरी तल का निर्माण किया जाना चाहिए एवं आवश्यकतानुसार एक से अधिक विभागों द्वारा उपयोग में लाया जाना चाहिए. इससे भवन निर्माण योजना मद की राशि की बचत होगी. दूसरी ओर आधार तल के छत का निर्माण इस प्रकार की रूप रेखा (DESIGN) वाला हो की उस पर एक से अधिक तल बनाया जा सके. ऐसा करने से आधार तल वाले भू-क्षेत्र की भी बचत होगी.

दूसरा : शहरी एवं ग्रामीण गलियों का वह हिस्सा, जहाँ भरी वाहनों का परिचालन नहीं होता है. जिससे माडल प्राक्कलन के आधार पर 04 इंच पी.सी.सी. पथ ढलाई कराये जाने का वर्तमान प्रावधान है, में आवश्यक बदलाव लाकर भी विकास योजना मद की करोड़ों राशि की बचत की जा सकती है. यह सर्वथा विदित है कि जिन क्षेत्रों /गलियों में भारी या मंझोले वाहनों का परिचालन लगभग शून्य है वहां पी.सी.सी. पता के ढलाई हेतु 03 इंच का प्रावधान किया जाना चाहिए. एकदम ही अन्दर की गलियों में जहाँ लोग पैदल ही चलते है, वहां तो 02 इंच पी.सी.सी. पथ ढलाई से वर्षों तक पथ टिकाऊ बना रहता है. आवश्यकता इस बात की है की प्राथमिकता के आधार पर इन क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिये एवं प्रशासनिक तथा तकनिकी स्वीकृति के दौरान इस संवेदनशील वित्तीय पक्ष (SENSITIVE FINANCIAL ASPECT) का प्रभावी ढंग से अनुकरण भी किया जाना चाहिए.

तीसरे : तालाब-घाटों का निर्माण, जाहेस्थान की घेराबंदी एवं कब्रिस्तान घेराबंदी जैसी योजनाओं के निर्माण में पूर्ण श्रमदान या फिर आंशिक रूप से किसी ख़ास सीमा तक श्रमदान के प्रावधान को अपनाकर भी विकास योजना मद में व्यय की जाने वाली करोड़ों की राशि की बचत की जा सकती है. यह विदित है कि इन योजनाओं के निर्माण का ख़ास धार्मिक एवं सांस्कृतिक पक्ष है. इन योजनाओं के निर्माण के साथ लोगों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक आस्था जुडी रहती है. लोगो की आस्था इस प्रकार की योजनाओं में इतनी जुडी रहती है की कहीं-कहीं सामाजिक संगठन के क्रियाशील सदस्यों द्वारा पूर्ण श्रमदान एवं आपसी लोगों के बीच दान/चंदा द्वारा धन उगाही कर इन योजनाओं का विधिवत निर्माण कर लिया जाता है.

अतः ऐसी योजनाओं के निर्माण में सरकार द्वारा श्रमदान की व्यवस्था की दिशा में समुचित विचार कर योजनाओं के निर्माण में कम से कम योजना लागत के दस से बीस प्रतिशत की राशि तक श्रमदान किये जाने के प्रावधान किया जाना चाहिए. आमजनों के बीच श्रमदान को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सभी श्रम्दाताओं को पचायत या प्रखंड स्तर पर नामित व्यक्तियों द्वारा उस आशय का प्रमाणपत्र दिया जाना चाहिए एवं योजना शिलापट्ट पर भी श्रमदाताओं के नाम अंकित किये जाने चाहिए. ऐसा किये जाने से श्रमदान की प्रवृति में आने वाली क्रांति का उपयोग हम राज्य के अंतर्गत उन क्षेत्रों में भी कर सकेंगे जो आज तक अदृश्य हैं.

चौथे : विकास योजनाओं को निर्धारित समय-सीमा के अन्दर पूर्ण कर लिए जाने से भी हम विकास योजनाओं में होने वाले अतिरिक्त व्यय की बचत कर सकते हैं. कभी-कभी ऐसी स्थिति आती है कि समय पर योजनाओं के निर्माण नहीं होने से योजनाओं के निर्माण-लागत में वृद्धि हो जाती है. इस हेतु सरकारी प्रावधानों के अंतर्गत कार्य-प्राक्कालनों में पुनरीक्षण कर उनका अद्यतीकरण कर बढे संशोधित मूल्य पर कार्य निर्माण कराया जाता है. सरकार को चाहिए कि जब भी कार्य प्राक्कलनों में समय पक्ष (TEMPORAL ASPECT) के चलते हुई मूल्य वृद्धि के आधार पर पुनरीक्षण किया जाना जरुरी हो तो पहले वह इसकी समीक्षा करे कि कार्य में विलम्ब के लिए कौन-कौन से व्यक्ति /पदधारी जिम्मेदार हैं, फिर उसकी समीक्षा कर दायित्व तय करते हुए योजना लागत के अतिरेक की समानुपाती वसूली (PROPORTIONATE RECOVERY OF SURPLUS COST) दोषी व्यक्तियों से करे न कि सरकारी राजस्व से उस अतिरेक मूल्य की पूर्ती की व्यवस्था करे.

उपर्युक्त सुझाये गए उपायों को अपना कर सरकार अपनी विकास योजनाओं में होने वाले व्ययों का कुशल प्रबंधन कर पायेगी एवं योजना व्यय में से होने वाली बचत राशी का उपयोग अन्य आवश्यक क्षेत्रों में कर के विकास प्रशासन (DEVELOPMENT ADMINISTRATION) के लक्ष्य को सहजता से हासिल कर सकती है.

द्वारा
राजेश कुमार पाठक
प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक,
सदर प्रखंड गिरिडीह (झारखण्ड)
पिन कोड : 815301
मोबाइल : 9470177888

राजेश पाठक

राजेश कुमार पाठक, राष्ट्रिय कवि-संगम, (प्रदेश सचिव, झारखण्ड ईकाई), प्रखण्ड साख्यिकी पर्यवेक्षक, सदर प्रखंड, गिरिडीह, सम्प्रति : दुमका प्रखण्ड, झारखंड

You May Also Like