शैलपुत्री – १

-: : शैलपुत्री : :-
-: मां के प्रथम रूप के उपासना का मंत्र :-
|| या देवी सर्वभूतेषु प्रकृति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम: ||

दुर्गाजी के पहले रूप को ‘शैलपुत्री’ के नाम से जाना जाता है.  शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण नवदुर्गा का सर्वप्रथम स्वरूप ‘शैलपुत्री’ कहलाया है.   ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं. नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है. पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के स्वरूप में साक्षात शैलपुत्री की पूजा देवी के मंडपों में प्रथम नवरात्र के दिन होती है.

इनके एक हाथ में त्रिशूल , दूसरे हाथ में कमल का पुष्प है.  यह नंदी नामक वृषभ पर सवार संपूर्ण हिमालय पर विराजमान है.  यह वृषभ वाहन शिवा का ही स्वरूप है.  घोर तपस्चर्या करने वाली शैलपुत्री समस्त वन्य जीव जंतुओं की रक्षक भी हैं.  शैलपुत्री के अधीन वे समस्त भक्तगण आते हैं , जो योग, साधना, तप और अनुष्ठान के लिए पर्वतराज हिमालय की शरण लेते हैं.

जम्मू – कश्मीर से लेकर हिमांचल पूर्वांचल नेपाल और पूर्वोत्तर पर्वतों में शैलपुत्री का वर्चस्व रहता है.  आज भी भारत के उत्तरी प्रांतों में जहां-जहां भी हल्की और दुर्गम स्थलों में आबादी है , वहां पर शैलपुत्री के मंदिरों की पहले स्थापना की जाती है , उसके बाद वह स्थान हमेशा के लिए सुरक्षित मान लिया जाता है. कुछ अंतराल के बाद बीहड़ से बीहड़ स्थान भी शैलपुत्री की स्थापना के बाद एक सम्पन्न स्थल बल जाता है.

विशेष : इस वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में अर्थात शारदीय नवरात्र का शुभ मुहूर्त दिनांक 21 सितम्बर 2017 दिन बृहस्पतिवार को प्रातः 6 बजकर 3 मिनट से 8 बजकर 22 मिनट तक रहेगा तथा अभिजीत मुर्हूत 11.36 से 12.24 बजे तक रहेगा.

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