गम न करें – ६

गम न करें, सोचें और शुक्र अदा करें.

किसी के शुक्रिये का इन्तेजार न करें, अल्लाह (भगवान) ने बन्दों को अपनी इबादत (पूजा) के लिए पैदा किया. इन्हें रोजी दी. इसका शुक्र अदा करें. लेकिन अक्सर लोगों ने इबादत (पूजा) की तो दूसरों कि की. शुक्र किया तो दूसरों का, मतलब ये है कि इंकार, ज्यादती, बेवफाई, इंसानी फितरत पर ग़ालिब है. लिहाजा आपको बिलकुल हैरानी न हो. लोग आपके अहसान को फरामोश कर दे, भलाई का इंकार कर दे, अच्छे बर्ताव को भूल जाय, बल्कि आपसे दुश्मनी शुरू कर दे. और अहसान के बदले अदावत और हसद रखे. दुनिया का खुला दफ्तर सामने है. इसे पढ़िए.

वह तमाम का तमाम इस बात का किस्सा है जिसने बेटे को पाला पोसा, खिलाया पिलाया, तालीम और तरबियत दी, इसे सुलाने के लिए खुद जागा, इसे खिलाने के लिए खुद भूखा रहा. इसके आराम के लिए खुद थका, मगर जब यह बेटा जवान हो गया तो बाप के लिए कटखना कुत्ता साबित हुआ. बेईजती, नफरत, नाफ़रमानी, किसी चीज़ में भी तो कसर नहीं छोड़ी. एक अजाब बन कर रह गया. लिहाजा वह लोग जिनके अहसान कमजर्फों ने भुला दिए हों. वह परेशान न हो. वो ऐसी हस्ती के इनाम के मुस्तहक (हक़दार) बनेंगे जिसके खजाने कभी खाली नहीं होते.

हमारा मतलब यह नहीं है कि अहसान करना छोड़ दें बल्कि यह है कि नेकी कर दरिया में डाल के आदी हो जाएँ. भलाई का काम करें सिर्फ अल्लाह (भगवान) के वास्ते. ऐसा करेंगे तो हर हाल में कामयाब होंगे. आप अहसान करने वाले होंगे. आपक हाथ ऊँचा होगा. जो निचले हाथ से बेहतर होता है. आप परेशान न हों अगर किसी कमजर्फ को कलम दे दें जो इससे आप ही की बुराई लिखने लगे या अगर किसी जाहिल को डंडा थमा दें तो वह आप ही का सर फोड़ देगा. आदमी का फितरत यही है. जब यही सलूक इसका भगवान के साथ है तो हम और आप क्या हैं. इसलिए गम न करें खुश रहें.

मिश्र के मशहूर आलिम (ज्ञानी) और लेखक सैफ अली तन्ताबी एक जगह बड़ी कीमती बात कहते हैं,
फरमाते हैं:

“जो लोग हमें नहीं जानते उनकी नजर में हम आम हैं,
जो हमसे हसद रखते हैं उनकी नजर में हम मगरूर हैं,
जो हमें समझते हैं उनकी नजर में हम अच्छे हैं,
जो हमसे मुहब्बत करते हैं उनकी नजर में हम ख़ास हैं,
जो हमसे दुश्मनी रखते हैं उनकी नजर में हम बुरे हैं,
हर शख्स का अपना एक अलग नजरिया और देखने का तरीका है.
लिहाजा दूसरों के नजर में अच्छा बनने के पीछे अपने आपको मत थकायिए.
अल्लाह (भगवान) आपसे राजी हो जाय यही आपके लिए काफी है.
लोगों को राजी करना ऐसा मकसद है जो कभी पूरा नहीं हो सकता.
अल्लाह (भगवान) को राजी करना ऐसा मकसद है जिसको छोड़ा नहीं जा सकता.
तो जो चीज़ मिल नहीं सकती उसे छोड़ कर वह चीज़ पकडिये जिसे छोड़ा नहीं जा सकता.”

जारी….