डायरी

ब देखो कुछ-न-कुछ लिखते ही रहते हो। कभी अपनी बेटी के बारे में भी सोचा करो। बड़ी हो रही है। घर से बाहर भी निकला करो, सरकारी कामकाज तो होने ही है। इसी काम-काज के बीच समय निकालकर रिश्ते तो ढूंढ़ो। समय पर सब कुछ हो जाय भला यह कौन नहीं चाहता ? पत्नी की रोज-रोज की यह नसीहत सुनकर रामेश्वर उब चुका था। मन ही मन सोचता, कहाँ जाऊं? किससे अपनी बेटी के लिए हाथ मांगूं ? हाथ भरे हों तो सबका साथ मिल जाये, ना हो तो अपने भी पराये नजर आते हैं। और तो और शादी के लिए पैसे कैसे जुटाऊं? लड़के वाले बिना कुछ लिए हां भी कह दे तो उनकी प्रतिष्ठा को ढंकने के लिए दो-चार लाख तो खर्च करने ही होंगे। मंहगाई भी तो सर चढ़ कर बोल रही है।

क्या सोचते हो ? मंहगाई है तो बेटी की शादी नहीं करोगे ! जिंदगी भर अपने ही घर रखोगे? अरे! बिना कुछ किये घर बैठे ही सब कुछ मान लेने से नहीं होता। कल रामदीन का फोन आया था। कह रहा था-दिल्ली में एक लड़का प्राइवेट कंपनी में तीस हजार माहवारी पर नौकरी में है। देखने-सुनने में भी अच्छा है। ममता पर खूब फबेगा। दोनों की जोड़ी अच्छी जमेगी। चाचा से कहो वे इस लड़के पर जरूर जायें। समय साथ दिया तो जोड़ी जरूर लगेगी।

सोचता हूँ कि पहले थोड़ा बहुत ही सही पर इतना तो इंतजाम कर ही लूं कि अगर लड़के वालों ने हां कर दिया तो थोड़ा वक्त लेकर रिश्ता कर जाऊँ। ”चिंता क्या करते हो ? आजकल तो लड़के वाले खुलकर दहेज की बात भी नहीं किया करते। उन्हें भी तो कानून से डर होता है। उस पर भी अजनबी अनजान लोगों से रिश्तों की बात करते”, पत्नी ने कहा।

सच कहती हो, डर तो उन्हें भी रहता है। पर बिन मांगे भी इतना कुछ मांग जाते है जिसे तुम सोच भी नहीं सकती।
वह कैसे ? पत्नी ने बड़े ही आश्चर्य से पूछा ।

बहुत नादान हो। पर वे नादान नहीं होते। बदल रही परिस्थितियों से वे बहुत ही सावधान रहते हैं। तुम क्या सोचती हो, मैं रिश्ते नहीं ढूंढ़ रहा। ढूंढ़ रहा हूँ। रामदीन जिसकी बात करता है उनसे मेरी बात भी हो चुकी है। बहुत ही प्रभावशाली लोग है। समाज में भी काफी पूछ है। उन्हें तिलक-दहेज में कुछ नहीं चाहिए। वे दहेज के विरोधी हैं। दहेज विरोधी संघ और संगठन भी चलाते हैं। खाता-पीता परिवार है। बेटी उस घर जाएगी तो समझो राज ही करेगी।

अरे! तब तो इससे अच्छा और कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता। कितना अच्छा है रामदीन। कितनी खबर रखता है। अभी मैं उसे फोन पर बताती हूँ।

इतनी भी जल्दी क्या है ? पूरी बात तो हो जाने दो।

अब कौन सी बात पूरी हो जाने दूं? अब क्या रामदीन को शादी हो जाने के बाद शादी की खबर दोगे? वह भी भला क्या सोचेगा? पत्नी ने बड़े कौतूहल से अपनी बात कह डाली।

रामेश्वर अपनी पत्नी के भोलेपन पर मन-ही-मन तरस खा रहा था। मन-ही-मन सोच रहा था, कितनी भोली है रे तू! इतनी भोली मानो एक हिन्दुस्तानी औसत पढ़ी लिखी लड़की शादी के बाद अपनी बचीखुची समझ भी अपने पति के दामन में भर जाती है और कर जाती है अपने को अपने देवता समान पति पर निढाल।

रामेश्वर अपनी पत्नी को सच्चाई बताते हुए आखिरकार कह ही जाता है कि लड़के वाले ने बिन मांगे बहुत कुछ मांगा है। लड़के वाले ने तो साफ-साफ सहज भाव से कह डाला है कि आजकल तो सौ ग्राम सोने के जेवर तो लड़की वाले बिना कुछ कहे बनवा ही देते है। अपनी बेटी से बाप कितना प्यार करता है यह तो अपनी बेटी को दिये जाने वाले कार के मॉडल से तो तय हो ही जाता है और सामाजिक प्रतिष्ठा किसे प्यारी नहीं होती। उसकी रक्षा और उसका मान तो हम भारतीय भली-भांति करना जानते ही है। मतलब यह कि बारातियों के रहने-खाने, आने-जाने की मुक्म्मल व्यवस्था से तो लड़की वालों की ही मर्यादा बढ़ती है। बारात में आए लोग उनकी अच्छी व्यवस्था को सदा ही याद रखते है, तारीफ करते है और तारीफ के लिए इतना कुछ किया जाना न बुरी बात है और ना ही बड़ी बात।

बस करो, मैं समझ सकती हूँ। कालचक्र कितना पीछे या फिर कितना आगे जा चुका है मैं कह नहीं सकती पर इतना सच है कि अब तुम्हारे अंदर उपज रही पीड़ा को मैं सह नहीं सकती। मैं भले तुम्हारी लिखी गंभीर बातों को पढ़कर भी नहीं समझ सकती पर बिना पढ़े ही समझ सकती हूँ, तेरे चेहरे पर समाये उस भाव को जो बरबस तुझे घाव दे जाता हो।

पर अंदर से रामेश्वर को वह रिश्ता पंसद था। रह गई बात रूपये-पैसों के इंतजाम की, तो वह आज नही तो कल तो करना ही था। भले कम या ज्यादा। वह सोचता- पता नहीं फिर आगे कोई बेहतर रिश्ता मिल पाये या ना मिल पाए। वह इस रिश्ते को अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहता था। रामदीन की मदद से शादी की तारीख भी तय हो गई। दो महीने बाद रामेश्वर के घर बारात आने वाली थी। वह तन-मन से उन सारी व्यवस्थाओं को पूरा करने में जुट गया जिसे पूरा किया जाना निहायत जरूरी था। अपनी तमाम व्यस्तता के बावजूद वह डायरी लिखना नहीं छोड़ता था। शादी की रात भी जब वह डायरी में कुछ लिख रहा था तभी उसकी पत्नी उसकी डायरी झटके में छीनती हुई आदेश के लहजे में बोल बैठी-आज ऐसा भी क्या जरूरी है कि डायरी लिखो।

आज मेरी बेटी की शादी है। क्या यह भी ना लिखूं? रामेश्वर ने बड़े ही कातर लहजे में अपनी पत्नी से कहा।

यह तो एक क्या अनेक जगहों पर लिखी हुई है, फिर डायरी में हर बात लिखी ही जाये यह क्या जरूरी है? यह कह कर रामेश्वर की पत्नी ने एक कमरे में उसकी डायरी छिपा दी।

रामेश्वर भी आगे बिना जिद किये लोगों की आवभगत में जुट गया। सब कुछ अच्छे से गुजर गया। शादी संपन्न हुई बारात भी बिदा हो गयी। बेटी की बिदाई का दर्द लिए रामेश्वर अपनी पत्नी की भावुक आँखों में खुद को भी निहारता रहा। अचानक उसे अपनी भावनाओं को डायरी में कैद करने की सूझी तो डायरी खोजने से भी नहीं मिल रही थी। शादी वाले घरों में कुछ दिनों तक सामानों के अस्तव्यस्त होने की स्थिति सामान्य तौर पर अधिकांश घरों में पायी जाती है। वैसी ही स्थिति रामेश्वर के घर की भी थी। डायरी नहीं मिल रही थी और रामेश्वर की बेचैनी उतनी ही बढ़ती जा रही थी।

आखिर क्या रखा है उस डायरी में? नहीं मिल पा रही है तो नयी खरीद लो। वैसे भी साल तो लगने वाला ही है। नयी तो खरीदनी ही है, पत्नी ने सहज भाव से कहा। कुछ महीने पहले भी तो तेरी डायरी गुम हो गई थी तो इतने बेचैन तो नहीं हुए थे। क्या कुछ खास है उस डायरी में? मुझे तो अब शक हो रहा है तेरी नेक नीयती पर। कहीं तुम वह सब तो नहीं लिख रहे जो बच्चे पढ़ जाएं तो तुझे तेरी ही नजरों में झुकना पड़ जाए? आखिर क्यों यह सब लिखते हो? अच्छी बातें लिखा करो। क्या अब प्यार-मोहब्बत की बातें लिखना शोभा देती है, तुम्हें? पर तुम हो कि मानते ही नहीं। अब मुझे बातें समझ में आ रही है कि जब भी मैं तेरे डायरी लिखते वक्त सामने आती थी तो तुम क्यों मुझे बहला-फुसलाकर मेरी दिशा ही मोड़ देते थे। पत्नी एक ही सांस में कह गयी।

रामेश्वर मन ही मन सोच रहा था कि अब भी कितनी नादान है मेरी पत्नी। मन ही मन कहता, वह तो सिर्फ और सिर्फ उसे ही प्यार करता रहा है। परिवार की परवरिश का बोझ तो उसकी यही नादानी और निश्छलता से हल्का करते आया हूँ पर वह भी बेचारी क्या करे।

उधर ब्याही गयी बेटी के ससुर दीनानाथ को वह डायरी हाथ लग जाती है। संयोगवश वह डायरी बेटी के सामान के साथ समधी के घर तक पहुंच गयी थी।

रामेश्वर की डायरी पढ़ते ही दीनानाथ अवाक हो गया। उसे लगा कि धरती पर रामेश्वर जैसे ही बाप होने चाहिए जिसने अपनी बेटी के लिए सर्वस्व लुटाते हुए भी स्वयं को उसका कर्जदार मान रहा है। दीनानाथ को अपने रसूखदार होने का भ्रम जाता रहा। असली रसूखदार होने का हकदार तो रामेश्वर है जिसने अपनी ममता के लिए बची-खुची सारी ममता ही मेरे घर भेज दी।

डायरी में जो बातें लिखीं थी वह यूं थी-”एक बाप ने अपनी बेटी को जन्म दिया, उसकी परवरिश की, पढ़ाया-लिखाया पर अब सामाजिक रिश्ता और बंधन की डोर में उसे बाँधा तो खुद ही कर्ज की डोर से बँध गया।

पर कर्ज की डोर में बँधकर भी बाप होने का फर्ज निभाने का सुखद अहसास उस कर्ज की डोर को झकझोर कर तोड़ देने की हमें ताकत देगी।

तुझे यह जानकर खुश होना चाहिए कि तेरा बाप अन्य सरकारी मुलाजिमों की तरह अनैतिक साधनों से धन-दौलत अर्जित न कर अपनी ईमानदारी एवं कर्तव्य-निष्ठा के साथ जीवन बिताया है। तुझे अभी उतना भी क्या मालूम कि यह सब चीजें कितनी ताकतवर होती हैं? आज उसी ईमानदारी और कर्तव्य-निष्ठा के चलते कुछ लोगों ने इस शादी में रूपये-पैसों से मदद की जिसे मैं उनका अपने ऊपर कर्ज मानता हूँ, भले ही वे इसे अपना फर्ज कह भूल जाना चाहते हों। मेरी इस डायरी के अंतिम पन्ने में कुछ लोगों के नाम-पता-संपर्क नंबर एवं उनके द्वारा प्रदत्त की गई राशियाँ अंकित की गई है जिसे मैं वक्त रहते वापस कर देने का पूरा प्रयास करूंगा अन्यथा सेवानिवृति के समय तो यह प्रयास हर हाल में पूर्ण हो जाएगा।

परंतु जिंदगी और मौत का क्या भरोसा? अपनी मौत से पहले अगर ऋणमुक्त हो सका तो समझूंगा कि मैं पुत्री ऋण से मुक्त हो सका अन्यथा मेरी मौत के बाद के धन का क्या जिसपर मेरा अधिकार ना हो और भले दुनिया उसे मेरी ही माने।

रोना नहीं। आंसुओं को बचाकर रखो। कहीं तेरे आंसुओं से उनके नाम न धुल जायें जिनके नामों को डायरी के अंतिम पन्ने में जाकर पढ़ना अभी शेष है।”

डायरी पढ़ने के बाद दीनानाथ ने रामेश्वर को अपने शुभचिंतकों से प्राप्त शादी के लिए रकम को लौटाने का मन बना लिया था। जितनी राशियाँ उस डायरी में लिखी थीं उतनी राशियाँ लेकर वह बिना विलंब किए उसके घर की ओर प्रस्थान कर चुका था। इधर रामेश्वर हर रोज की तरह समय पर अपने कार्यस्थल पर था। अचानक घर में दस्तक पर रामेश्वर की पत्नी ने जब दरवाजा खोला तो वह अपने घर पर नये समधी को पायी। दीनानाथ ने रामेश्वर के बारे में पूछा-कहाँ है रामेश्वर? रामेश्वर की पत्नी कुछ समझ नहीं पा रही थी कि आखिर नये संबंधी अचानक, बिना कोई सूचना दिए उसके यहाँ क्यों पधारें? ज्योंही दीनानाथ ने डायरी का उच्चारण किया, उसके पांव तले जमीन खिसक गई। उसे लगा कि प्यार-वार का राज खुल गया। अब वह किसे मुंह दिखयेगी। रूंधे स्वर में दीनानाथ से बैठने का आग्रह करती हुई अपने पति को फोन से उनके घर आने की सूचना दी। रामेश्वर आधी छुट्टी लेकर दौड़ा-दौड़ा घर आया। दीनानाथ रामेश्वर को गले लगा लिया। दीनानाथ के हाथ में डायरी देख, रामेश्वर को सभी स्थितियों का स्वतः अहसास हो गया था। रामेश्वर की पत्नी को यह सब कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह सब क्या हो रहा था। दीनानाथ रूपयों से भरे उस बैग को रामेश्वर के हाथों में जबरन थमाते हुए कहा कि वह कर्ज से अभी और इसी वक्त अपने को मुक्त समझे।

राजेश कुमार पाठक
पॉवर हाउस के नजदीक
गिरिडीह-815301
झारखंड

राजेश पाठक

राजेश कुमार पाठक,
राष्ट्रिय कवि-संगम,
(प्रदेश सचिव, झारखण्ड ईकाई),
प्रखण्ड साख्यिकी पर्यवेक्षक,
सदर प्रखंड, गिरिडीह,
सम्प्रति : दुमका प्रखण्ड, झारखंड

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