पुकार

पुकार – एक हिन्दी काव्य पुस्तक। ऑनलाइन पढ़ें!
विषय – नक्सलवाद पर आधारित।
रचयिता – श्री राजेश कुमार पाठक, प्रखण्ड साख्यिकी पदाधिकारी, गिरिडीह।

पुकार पुस्तक के बारे में कुछ बताने से पहले मैं थोड़ी बातें कवि के बारे में बताना चाहूंगा। श्री राजेश पाठक उस पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं जिसमे शिक्षकों की भरमार रही है। समाज में अपने मध्यमवर्गीय पहचान को प्रतिष्ठापित करने के लिए जो संघर्ष का दौर रहा पीढ़ियों से उसको नजदीक से देखा और महसूस भी किया है। यहाँ तक की श्री पाठक स्वयं भी वर्तमान सरकारी सेवा में आने से पहले शिक्षण-प्रशिक्षण के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं , चाहे वह शिशु मंदिर जैसे आदर्शवादी स्कूल हो या फिर महिला महाविद्यालय जहाँ उन्होंने अपनी सेवाएं दी हैं।

विगत वर्षों में श्री पाठक ने एक सरकारी अधिकारी के रूप में जिन-जिन क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दीं है जैसे देवरी, गिरिडीह आदि तो ऐसे मे उन्होंने शासन को नजदीक से जाना और माना की वे जब सरकारी सेवा में नहीं थे, तो उनकी जो सोच थी, सरकारी लोगों के बारे में, उसमे न सिर्फ बदलाव आया, बल्कि उन्होंने समझा, कि कैसे काँटों भरा ताज जब सर पर हो तो उसे सम्हालने में अच्छी मशक्कत भी करनी पड़ती है। आज उन्हें काम करते हुए लगभग डेढ़ दशक होने को आये। ऐसे में उन्होंने जिन समस्याओं का सामना किया उसमे नक्सल प्रभावित कहें अथवा जनित कहे कुछ ज्यादा ही रही शायद यह भी एक कारण रहा हो उनके इस पुस्तक के पीछे। पुस्तक की पंक्तियों को पढ़ कर उनके ह्रदय की पीड़ा साफ़-साफ़ महसूस की जा सकती है।

कोई कहता तू बन बैठा,
पूरे समाज का मालिक।
भूलो मत तेरे माथे,
अब भी कलक की कालिख॥
…..
इस कलक की कालिख को,
आज मिटाने आया हू।
लौटा दो अपनी बन्दूके,
मा, बेटी, बहने लाया हू॥

आज तक जितने ही प्रयास हुए, पर उन प्रयासों के पीछे छिपे स्वार्थ की जो राजनीति कह ले या अवसरवादिता कह ले, रहीं, उनसे यह मामला और भी बिगड़ता चला गया और नक्सलवाद का स्वरुप दिन-ब-दिन बदलता चला गया। इस बदले हुए परिप्रेक्ष्य को एक बार फिर या यों कहें की अंतिम बार एक बदलाव की आवश्यकता आ पड़ी है जिसे आज न पूरा किया तो आने वाले ‘अच्छे दिन’ की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

शासन को शत्रु मत समज्हो,
यह मित्र हुआ सभी का।
बदलाव की आन्धी आयी,
यह पवित्र हुआ कभी का॥
….
जाओ सरहद पर वहा जहा,
राष्ट्रप्रेम लहराता है।
……
कोई दुश्मन जब ललकारे,
सर कलम करो बढ कर आगे।

श्री पाठक नक्सल शक्ति को एक दिशा देने की बात करते हैं उनको मुख्यधारा से जोड़ने की बात करते हैं, वो खुला अवसर देने की बात करते हैं कि नक्सली अपने सामर्थ्य का परिचय सीमा पर देवें अपने घर में अपनों का ही रक्त बहा कर नहीं, क्योंकि अब समय बदल चुका है आप भी बदलो, आप जिनके लिए ऐसा करने को तत्पर हुए थे कभी अब उसकी आवश्यकता नहीं। अगर आप समर्पण को तैयार हैं तो शासन भी आपके इस कदम का स्वागत करने को तैयार है और जहाँ कमियां हैं वहां-वहां वार्ता का द्वार खुला है।

रोते-रोते आज तेरी
मा का हाल बुरा है,
तेरे ही बारूद से,
तेरा भाई उडा है।
……
तुझे पता क्या तेरा भाई
बना पुलिस का अफसर था,
तेरे आत्मसमर्पण को
लेकर हरदम तत्पर था॥

वस्तुतः कवि ने इस पुस्तक के माध्यम से उनकी सम्वेदनाओ को प्रभावित करने का प्रयास किया है। यह पुस्तक एक आमंत्रण है उनके लिए जो स्वयं को समाज से अलग समझते या समझे जाते हैं, वो ऐसा न समझे और समाज की मुख्यधारा से जुड़े उनके घर, समाज और शासन सभी उनको अपनाएंगे।