छठ : स्त्री-पुरुष समानता का अनुपम प्रतीक

छठ : स्त्री-पुरुष समानता का अनुपम प्रतीक

हमारे देश में लोक आस्था का महान पर्व छठ वर्ष में दो बार मनाये जाते हैं. चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाये जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है. निरोगी काया, पारिवारिक सुख समृद्धि व मनोवांछित फल प्राप्ति हेतु मनाया जाने वाला यह पर्व स्त्री एवं पुरुष वर्गों द्वारा सामान रूप से मनाया जाता है. यूँ तो अधिकांश पर्वों में स्त्रियों द्वारा ही उपवास एवं व्रत धारण करने की परंपरा रही है, परन्तु छठ पर्व ही एक ऐसा महत्वपूर्ण पर्व है जिसमे समान रूप से स्त्री एवं पुरुष द्वारा व्रत धारण करने की परम्परा रही है, जो किसी न किसी रूप में स्त्री पुरुष की समानता एवं परस्पर निर्भरता का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है.

इस पर्व में सर्वोच्च आस्था के प्रतीक सूर्य देव की आराधना आतंरिक शक्ति एवं तेज की प्राप्ति हेतु की जाती रही है. सादगी, सफाई एवं निर्विघ्नता इस पर्व के तीन मजबूत कारक हैं जिसे दृष्टिगत रख उपासना की जाती है. गहराई से देखें तो पता चलता है कि इस पर्व का न सिर्फ धार्मिक महत्व है वरन यह लोगों के दिन प्रतिदिन के कार्यव्यवहार में अपनाई जाने वाली सादगी एवं स्वच्छता की अनिवार्यता को भी स्वीकार करता है. यह पर्व सदा सन्देश देते आ रहा है कि हमें स्वच्छता, सादगी व सफाई जैसे मूलभूत मानवीय गुणों को धारण करने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए. ऐसा कहा भी जाता है कि “स्वच्छता का हो रहा निवास जब, बसता है भगवान और वहीँ पे रब”.

यद्यपि, छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक एवं लोककथाएं प्रचलित हैं जिसमे सूर्य पुत्र कर्ण की लोककथा ज्यादा प्रचलित है. एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में कर्ण द्वारा सूर्य की उपासना के साथ हुई. सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने. शक्ति के अनंतिम स्रोत सूर्य को आज भी शक्ति व ऊर्जा का अनंतिम स्रोत माना जाता है एवं उनकी कृपा दृष्टि पाने के लिए समस्त विश्व विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक कार्य व्यवहारों में संग्लग्न रहते आया है.

अब हमें इस सत्य को मानने से इंकार नहीं करना चाहिए कि लोक आस्था से जुड़ा यह महापर्व दिन प्रतिदिन के आचरण में अपनायी जाने वाली महत्वपूर्ण गतिविधियों का केंद्र बनते जा रहा है.