अछूत, राजेश पाठक की कहानी
कहानी
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अछूत – ०३

इसके पहले की कहानी पढ़ें: नजर में असर होता है. नजर टेढ़ी हो, तो उसके अलग और सीधी हो, तो अलग मायने निकल आते हैं. आपकी टेढ़ी नजरें मुझे भले अछूत मानती हों, पर नजरें सीधी कर दें, तो वहीं मेरा सौम्य चेहरा बरबस आपको अपना ही पुत्र मान लेने …

अछूत, राजेश पाठक की कहानी
कहानी
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अछूत – ०२

इससे पहले की कहानी पढ़ें यह कितना आश्चर्य भरा है कि गंदगी तो सभी पैदा करनेवाले होते हैं, पर कुछ ही होते हैं, जो उस पैदा की गयी गंदगी को स्वयं साफ करते हैं और बहुसंख्यक ऐसे होते हैं, जो उन मजबूर लोगों की तलाश में जुट जाते हैं, जो …

अछूत, राजेश पाठक की कहानी
कहानी
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अछूत – ०१

गाँव के कुछ लोग रमेश के पिता के बारे में जानने के इच्छुक रहते थे, उन्हें पता था कि जब से वे गाँव के स्कूल से स्थानांतरित हो, दूर शहर के स्कूल में चले गए हैं, तब से ही गाँव के स्कूलों में शिक्षा की स्थिति उतनी अच्छी नहीं रह …

कहानी
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पुनर्जन्म

श्रीधर सरकारी सेवा में रहते हुए भी भ्रष्ट सरकारी सेवकों के कुप्रभावों से अपने को दूर रखकर बड़ी ही ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा के साथ सरकारी कामकाज एवं दायित्वों को समय पर पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ता था. वह अपने बचे समय का उपयोग घर के लोगों को सदआचरण …

diary
कहानी

डायरी

  जब देखो कुछ-न-कुछ लिखते ही रहते हो। कभी अपनी बेटी के बारे में भी सोचा करो। बड़ी हो रही है। घर से बाहर भी निकला करो, सरकारी कामकाज तो होने ही है। इसी काम-काज के बीच समय निकालकर रिश्ते तो ढूंढ़ो। समय पर सब कुछ हो जाय भला यह …

बंटवारा, the division
कहानी
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बंटवारा

विजय मैंट्रिक की परीक्षा पास कर अपने गांव के बगल वाले शहर से सटे कॉलेज में दाखिला लेना उचित समझा। कारण यह था कि ऐसा कर वह अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी दादी की देखभाल भी समुचित तरीके से कर सकता था। उसकी दादी मां भी ऐसी थी कि उसके …

कहानी
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बूटपालिश

एक गरीब लड़का था। चौदह साल की उम्र होते-होते उसके ऊपर मां-बाप का स्नेहिल साया उठ चुका था। अब वह और उसकी छोटी बहन किसी तरह अपनी जिंदगी आस-पड़ोस के लोगों की कृपा पर गुजारने को मजबूर हो गये थे। गांव का माहौल था। कोई शहरी संस्कृति थी नहीं। जीवनयापन …