गम न करें – १७

बे-मौके सब शरीफ

मतलब यह नहीं कि यह सीधे तौर पर आपके बारे में हैं. मतलब यह है कि यह उन सभी के बारे में है जो मौके पर शरीफ बनने का ढोंग रचते हैं और समय आने पर दूसरों को आगे कर खुद उनका समर्थन अथवा उनके साथ अथवा उनके पीछे चलने को तुरंत तैयार हो जाते हैं. इसलिए बे-मौके सब शरीफ से हमारा तात्पर्य यह है कि मौका आने पर अपनी शराफत दिखाने से कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता, पर यह कि सिर्फ ख़बरों में आने के लिए या कि सिर्फ दिखावे के लिए.

आप कथनी और करनी में जितना कम अंतर रख पाते हैं उतने ही आप चरित्रवान होते हैं, यह नहीं कि आप चरित्रवान तो हों पर अवसर आने पर आप खिसक लें. यहाँ मेरा यह सब लिखना आप में से बहुतों को खल रहा होगा पर क्या करें तारीफ बनती भी होगी तो आप इसे मेरा दंभ न समझ ले इसलिए यह साफ करना जरुरी है कि मै इस लेख के माध्यम से आप सब को कुंठित नहीं करना चाहता हूँ. मेरा उद्देश्य बस इतना है कि हम अपने चरित्र के स्तर को उस ऊँचाई तक ले जा सकें जहाँ हम सचमुच ही अपने कथनी और करनी अंतर नहीं कर सकें अर्थात जैसा भी हम सोचें अथवा कहें उसपर चल भी सकें.

थोड़ी देर के लिए यह लेख आपको गप्पबाजी लग सकती है पर आप जरा ध्यान देकर इन बातों को सोचेंगे तो यही पाएंगे कि हम में से कितने ही अवसर आने पर किसी जन-कल्याणकारी कार्यों के लिए समय निकल पाते हैं? अधिकतर का उत्तर यही होगा कि अपने काम से फुर्सत मिले तभी ना. सही भी है, पर यह तभी संभव हो पाता है जब आप समय निकालना चाहें. क्या आप अपने परिवार के लिए समय नहीं निकाल पाते, क्या आप अपने किसी निजी कार्य के लिए समय नहीं निकाल पाते यदि आपका उत्तर हाँ है तो समस्या यह है कि समय आपको निकालना होता है इससे पहले कि समय आपको निकाल दे.

महत्वपूर्ण यह नहीं कि आप किन बातों अथवा कार्यों के लिए समय निकाल पाते हैं अपितु यह कि आप किन बातों अथवा कार्यों के लिए स्वयं को अनुकूल पाते हैं. यदि नहीं तो फिर आप चाहें कि उक्त कार्यों के लिए भी आप समय निकालें. क्योंकि यह आपके ही हाथों में होता है पूर्णरुपेण. आप टालमटोल के शिकार महसूस होते हैं यदि आप चाह कर भी समय प्रबंधन नहीं कर पाते और इसका ठीकरा दूसरों के सर फोड़ने को उद्दत रहते हैं.

आईये इस उधेड़बुन से निकालें जीवन बहुत खुबसूरत है, इसका आनंद लीजिये, नहीं समझ आ रहा हो तो किसी मनोवैज्ञानिक से जरुर मिलें, आप पागल नहीं हैं पर इस स्थिति में अधिक देर रहना आपको जल्द ही उस श्रेणी में ला खड़ा कर सकता है, इसलिए कि कही और अधिक देर न हो जाये, अपने आपको, अपने लिए कुछ ऐसा करें जिससे आपके मन, आत्मा और चित्त को प्रसन्नता होती हो, साथ ही दूसरों की प्रसन्नता का कारण हो ऐसे कृत्यों में स्वयं को उलझाएँ.

इसलिए गम न करें खुश रहें.

महिला सशक्तिकरण : वर्तमान परिदृश्य

महिला सशक्तिकरण, अबला नारी, नारी शक्ति पहचानो। कुछ अजीब सा लगता है मुझे ये सब। आज की नारी और पहले की नारी, क्या इसने अपनी शक्ति को आज तक नही पहचाना। यह तो वह नारी है जो हमेशा से अपनी शक्ति का दुरूपयोग करती आ रही है। हम कथा-कहानियों में पढ़ते हैं तो शायद हमें यकीन नही आता, मगर हम प्रत्यक्ष देखते हैं तब भी हमारी आंखों पर पट्टी बंध जाती है। आज हर घर में लड़ाई होती है नारी ही नारी की दुश्मन है।

सास के साथ बहू की या फिर बहू के साथ सास की लड़ाई हम प्रत्यक्ष रूप से हर घर में देखते हैं। और फिर मुकदमा कोर्ट कचहरियों तक जाता है तो बेचारे पुरूषों के कंधों पर और भार आ जाता है। सारे दिन काम करते हैं शाम को घर आओ तो फिर वही क्लेष, सुबह काम पर जाने से पहले क्लेष। आखिर कब तक चलेगा। यह क्लेष। यदि भूले-बिसरे स्त्री को एकाध थप्पड़ मार भी दिया तो वे इस बात का बतंगड़ बना लेती हैं। और पहुंच जाती हैं थाने। बंद करा देती हैं अपने ही मर्द को।

नारी में तो वो शक्ति है जो यदि इसे स्वतंत्र कर दिया जाये तो पूरे संसार को एक अकेली ही नष्ट कर सकती है। नारी की बुद्धि हमेशा उल्टी चलती है। धार्मिक ग्रंथों से लेकर आज इस कलयुग तक नारी हमेशा घर को उजाड़ती ही आई है। आज के नेता हो या किसी भी मिलीटरी के ऑफिसर भले ही हो और देश पर राज करते हों सेना को हुक्म देते हो मगर घर में उनपर उनकी बीबियों का राज है। अपनी पत्नी का हुक्म मानते है। रही सही कसर औरतों की हमारी सरकार ने पूरी कर दी, इनके लिए कानून बनाकर।

ये कानूनों का धड़ल्ले से गलत प्रयोग कर रही हैं। इससे मुसीबत आ गई है बेचारे मर्दों पर। घर से किसी तरह से बीवी से माफी मांगकर बाहर निकलते हैं तो बाहर किसी औरत से उलझ जाते हैं। फिर चाहे गलती औरत की ही क्यों ना हो। चाहे गलती औरत की हो या मर्द की, जेल की चक्की तो बेचारे पुरूष को ही पीसनी पड़ती हैं। इसलिए मेरा विचार तो यही है कि इस बेचारी अबला नारी को हमारी सरकार ने और ज्यादा से ज्यादा शक्ति दे देनी चाहिए। ताकि ये आराम से रह सके।

इनको इस प्रकार की शक्ति देनी चाहिए जैसे कि- हर पुरूष को सुबह से शाम तक काम करना चाहिए और शाम को पत्नी को अच्छी-अच्छी चीजें लाकर दें घर आकर घर का काम जैसे कि खाना बनाना बर्तन साफ करना आदि करे, फिर अपनी औरत के सोते समय पैर दबाए। जो पुरूष ऐसा काम नही करेगा उसकी औरत उसके प्रति न्यायालय के दरवाजे खटखटा सकती है। और न्यायालय के न्यायाधीश को उसकी बात माननी पड़ेगी। यदि वह नही मानेगा तो उसको भी कानून तोड़ने की ऐवज में कोई भी सजा दी जा सकती है।

न्यायालय के न्यायाधीश को उसके पति के प्रति कड़ी से कड़ी सजा या जो उसकी पत्नी चाहती है वह सजा देनी होगी। उस पर वह पत्नी को सताने या मारने वाली धारा लगा सकता है। पत्नी चाहे तो अपने पति पर दहेज का आरोप भी लगा सकती है। वह यह चाह सकती है उसका पति उस पर अत्याचार करता है। वह अपने पति के साथ नही रहना चाहती। पति भी यही चाहे तो अच्छा है कम-से-कम जेल में उसे दाल-रोटी तो सुकून से मिल ही सकती है।

यह लेखक के अपने विचार हैं.

नदियों को नदियों से जुड़ने दो!

नदियां बहती जा रही थी। लोगों के पाप को धोते जा रही थीं। कोई कूड़ा-करकट फेंकता तब भी वह निश्चता के भाव से उसे स्वीकार करते जा रही थी पर मन में एक बात उसे सालती जा रही थी कि वर्षों से मानव जाति में दो बहनों के बीच आना-जाना, एक-दूसरे से मिलना कितना स्वाभाविक है। काश् में भी अपनी नदी बहनों से मिल पाती। पूछती, क्या वह मजे में तो है या फिर उसे उसकी ही तरह मानव जाति का दंश झेलना पड़ रहा है। आखिर वह अपने मन का बोझ जो हल्का करना चाहती थी।

क्यों ना चाहे ? हर मानव एक-दूसरे से मिलने के लिए स्वच्छंद है। घूमने-फिरने की आजादी जो मिली है। जब कभी भी उसका मन किया वह अपने दुख-दर्द अपने सगे भाई-बहनों से मिलकर बांट आता है। पर मैं तो चाहकर भी पास या दूर बसी अपनी बहनों से मिल नहीं पाती हूँ। मुझे चिकनी-चुपड़ी बनाने के लिए कानून भी आगे आ जाता है पर एक-दूसरे से मिलने की बात हो तो अपनी ही जगह कैद रहो। आखिर कब तक । कोई सोचे । देश आजाद हुआ। पक्षी आजाद हैं। मैं भी आजाद हूँ पर जब कभी-भी अपनी बहनों से मिलने की सोचती हूँ आगे बड़ा-बड़ा पहाड़, उंची भू-आकृति इसके आड़े आ जाती है। मैं चाहकर भी अपनी बहनों से और ना मेरी बहने चाहकर भी मुझसे मिल पाती है। तुम्हीं बताओ, यह कैसा न्याय है ?

अपने निकट के लोगों को सुविधा भी प्रदान करती हूँ, खेतों को सींचती भी हूँ, खाने-पीने के लिए जल भी मुहैया कराती हूँ, बदले में कुछ मांगती भी नहीं हूँ, पर वर्षों से जब मैं अपनी नदी-बहनों से मिलने की मांग कर रही हूँ तो कोई मेरी सुनता ही नहीं है। खैर मत भूलो, वक्त मेरा भी आएगा। आखिर मेरी भी तो कुछ तमन्नाएँ है। अरमान हैं। पर मैं मानव जाति की तरह नहीं कि जब उनके अभिभावक मना करे तो बात काट कर अपनों से मिलने चली जाउं। उन्हें अपनी बहनों से मिलने से रोक दो तो वे तूफान खड़ा कर देती है। हाँ, मुझमें से भी कुछ ऐसी हैं पर कुछ ही ऐसी हैं। आखिर करे भी तो क्या करे। सब्र की भी सीमा होती है।

भले मैं अपनी दूरदराज बहनों से न मिल पाउं मगर गुस्से में तूफान खड़ा कर अगल-बगल में रह रही बहनों से तो जब चाहूँ मिल ही लेती हूँ। बस अफसोस यही होता है कि मेरे तूफान खड़ा करने से अगल-बगल के सारे लोगों को कष्ट पहुँचता है। उनका दोष न भी हो तो गुस्से में मैं अच्छे-बुरे लोगों में तब भेद नहीं कर पाती हूँ। करूँ भी क्यों, अच्छे-बुरे सभी तो मेरी पनाह लेते है। तब भी तो मैं उनमें भेद नहीं करती हूँ। भेद-विभेद तो सर्वदा मेरे साथ होते आया है। राजनेता भी संसद के सत्र वर्ष भर में दो बार बुला ही लेते है, एक-दूसरे से मिलने के लिए फिर मैं क्यों एकांकी जीवन बिताउं। मानव जाति को तो देखो । एक दूसरे से मिलने के लिए सारे पर्वों का सहारा ले लिया करते है-ईद मिलन, होली मिलन, रक्षा बंधन में भाई-बहन का मिलन वगैरह-वगैरह। बरसात के समय में अगर दूरदराज में वर्षों से अकेली पड़ी नदी-बहन से मिलना भी चाहूँ तो यह मानव जाति मेरे रास्ते को मेरी बहनों की तरफ मोड़ते नहीं बल्कि सामने इतना बड़ा तटबंध बना देते है कि मैं बेबस हो जाती हूँ। बेबस होकर धीरे-धीरे लाचार हो वापस लौट आती हूँ। फिर वही दिनचर्या, अब बहुत हो गया। अब तो मैं ‘नदियों का संघ’ बना कर ही रहूँगी। संघ बनाना भी तो मैंने मानव जाति से ही सीखा है। अपनी अपेक्षाऍ पूरी करनी हो तो वे सदा ही संघ का सहारा लेते हैं। संघ में शक्ति है। सरकारी सेवकों को वेतन बढ़ाना हो, सुविधाएँ बढ़वानी हो, हड़ताल पर चले जाते हैं। सारा कामकाज ठप्प कर देते है, सरकारी मशीनरी इस तरह बैठ जाती है मानों डीजल तो है पर मशीन चलाने वाली पट्टी ही पटरी से उतर गई हो। अब तो वे कदम-कदम पर हड़ताल की धमकी और सही मायने में हड़ताल पर चले भी जाने लगे हैं। मैं उनकी रेस में हूँ पर उनसे आगे नहीं निकल पायी हूँ। वे तो हड़ताल पर जाकर अपनी बात लगभग मनवा भी लेते है परंतु मैं हड़ताल पर जाती भी हूँ, कहने का मतलब सूख भी जाती हूँ तो वे नदी-नाले खुदवाने के नाम पर योजनाओं के आश्वासनों की बाढ़ कर देते है। जीव-जन्तुों की नाजुक हालत को देख मुझे ही दया आने लगती है पुनः अच्छे सरकारी मुलाजिमों की तरह काम पर वापस आ जाती हूँ। चारों तरफ मैं ही मैं लोगों को नजर आने लगती हूँ।

इतना होने पर भी लोग मुझे अपनी ही दूरदराज में रहने वाली बहनों से मिलने में रोके, भला इसे मैं कब तक बर्दाशत करते रहूँगी। अब तो मैंने मन बना लिया है। लोग जो भी सोचें। मैं तो अपनी बहनों से मिलकर ही रहूँगी। बहुत हो गया। वर्षों से नेताओं द्वारा भी झूठी दिलासा मिलती आ रही है। अगले साल तक नदियों से नदियों को जोड़ यिा जाएगा। यह अगला साल कब आएगा आज तक न समझ सकी। अब तो मैं भी मानव जाति के पाप धोते-धोते उनकी ही तरह ‘स्लोगन’ के साथ विरोध करने पर विचार कर रही हूँ।

‘स्लोगन’ तैयार भी किया है-
‘जोड़ सके न वे अबतक
से नदियों को नदियों से
क्यों सुनती रहूँ निरा भाषण
नेताओं का सदियों से’

वैसे मैं कुछ करने से पहले मानव जाति को अंतिम अवसर देना चाहती हूँ। अभी भी वक्त है। एक बार वे जोड़ कर तो देखें। एक बार तो मेरी बहनों से मिलाकर तो देखें। फिर मैं दुबारा मिलने की ना तो जिद्द करूंगी। फिर तो मैं जहाँ पहुंचूंगी वहीं रहूँगी। उन्हें यकीन हो या ना हो पर मुझे तो पूरा यकीन है। एक बार मैं बहनों से मिल लूँ तो मुझे वापस जाने नहीं कहेगी। सब एकसाथ मिलजुलकर रहने लगूँगी। फिर न तो मेरी हड़ताल देश में सूखा लाएगी, न ही कोई सूखा के कारण भूखा ही रहेगा। धरती सूखी नहीं, सुखी होगी, वर्ना मुझे भी जलजला पैदा करना आता है। मेरे थोड़े से गुस्से से कैसे सब कुछ उलट-पुलट हो जाता है। इतना होने पर भी दाद देनी होगी इस मानवजाति को, कितनी ढ़ीठ है।

राजेश कुमार पाठक
प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
गिरिडीह.

 

तेजपत्ता

तेजपत्ता,

जी साहब! यह वो चीज़ है जो आपके भोजन के लिए बनाये गए व्यंजनों में जब शामिल होता है तो उसका स्वाद बढ़ा देता है, पर सबसे पहले थाली में से इसे ही बाहर कर दिया जाता है. यह इसका दुर्भाग्य है या यह सीधा प्राकृतिक व्यवस्था की भेंट चढ़ जाता है, विचार का विषय हो सकता है कि कोई तेजपत्ता अथवा उस जैसी प्राकृतिक व्यवस्था का शिकार क्यों हो.

किसी भी निर्माण में चाहे वह समाज (यहाँ समाज से तात्पर्य स्वच्छ, स्वस्थ्य एवं निष्पक्ष समाज से है) के निर्माण की बात हो, अपने देश के या फिर भोजन के ही, सभी घटकों, कारकों व वस्तुओं की अपनी एक निश्चित भूमिका होती है अथवा आवश्यकता होती ही है, चाहे वह छोटी ही सी चीज़ ही क्यों न हो?

पीढ़ियों से हम जिस अलगाव को झेलते रहे हैं उसका निवारण जितनी भी कट्टरपंथी विचारधारा के समर्थक हैं जो पुराणपंथी विचारधाराओं से चिपके रहने को बेहतर भविष्य कि सीढ़ी मानते हैं, तो सनद रहे कि यह सीढ़ी उन्हें आकाश को नहीं ले जाती है, यह उन्हें कुएं से होती रसातल में ले जाती है.

आवश्यकता अनुरूप सामाजिक योगदान देना उपादेयता का सर्वप्रथम लक्षण होता है, जो कि किसी के लिए भी उसके सामाजिक वर्चस्व को प्रतिष्ठापित करने के साथ सुदृढ़ता का मुख्य कारक होता है. आपकी जितनी क्षमता है उतना योगदान करें, आप पेट नहीं भर सकते किसी का तो उसका मन भरें. आप हजार कमाते हैं तो दहाई में तो मदद करें, यदि लाख, तो सैकड़े में और यदि करोड़ों के स्वामी है तो हजारों में तो मदद कर ही सकते हैं.

तेजपत्ता के गुणों से हमारा समाज पूरी तरह नावाकिफ है ऐसा बिलकुल नहीं और उन्हें भी स्वयं को तेजपत्ता कहने कि आवश्यकता नहीं होनी चाहिए क्योकि उपमाएं और भी दी जा सकती हैं. पर हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि जब हम घर में भोजन करते हैं और बाहर में भोजन करते हैं तो कुछ हद तक स्वयं को उपलब्धता के आधार पर संतुलित कर ही लेते हैं. उसी प्रकार हम उनके बीच भी सामंजस्य स्थापित कर ही सकते हैं.

पीढियां नयी हैं, आज हमे उनके मस्तिष्क में अपनी रूढ़िवादी मान्यताओं को नहीं भरना चाहिए, समय कि मांग के मुताबिक चलना चाहिए. आज क्यों उन्हें तेजपत्ता समझ कर सिर्फ भोजन में ही प्रयुक्त किया जा रहा है, इस बात को सिरे से समझना और समझाना आवश्यक है. उन्होंने ने स्वयं ही अपनी यह पहचान बना रखी है यदि वो स्वयं को तेजपत्ता समझ कर कुंठित हो रहे हैं तो उनकी ही भूल है, वो महज भोजन में प्रयुक्त होने भर के लिए नहीं बल्कि समाज के हर क्षेत्र में प्रयुक्त होने के लिए हैं, और यह बात उन्हें अपनी मेहनत और लगन से साबित करनी होगी और वे कर भी रहे हैं.

कोई नवजात जब जन्म लेता है तो वह पहले क्या होता है? यदि वह किसी धर्म विशेष का होता है अथवा माना जाता है तो वह ऐसे परिवार में जन्मा है जहाँ धार्मिक कट्टरता चरम पर है और बच्चा निसंदेह चरमपंथी ही बनेगा, उसे किसी धर्म विशेष का नहीं मान कर इन्सान का बच्चा माना जाना चाहिए. हम बाते तो बड़ी आसानी से कह जाते हैं पर अनुसरण में सबसे पीछे हो जाते हैं. जब सभी धर्म समभाव की बात करते हैं तो दुनिया में इतने अलग अलग धर्म क्यों है?

हमें तेजपत्ता को भोजन भर के लिए प्रयुक्त नहीं करना चाहिए, हमें उसके गुणों को पहचान कर उसके काबिल स्थान पर उसका उपयोग भी करना चाहिए ताकि उस वर्ग विशेष को यह आभास हो कि वह महज भोजन में अथवा चाय में मिलाकर बाहर करने के लिए नहीं बल्कि अन्य  स्थानों पर भी उनका महत्व है, जिससे सामंजस्यपूर्ण परिवेश का आरम्भ होगा और एक नए समाज कि अवधारणा का जन्म भी.

खिचड़ी

खिचड़ी,

जी हाँ, नाम सुनकर कई तो मुंह ही बना डालते हैं, खास कर वो जिन्हें सिर्फ उदर शांति से मतलब नहीं बल्कि जिह्वा पर स्वाद के कमल खिलाने भर से होता है, कुछ के मुंह का स्वाद ही बिगड़ जाता है तो कुछ खास पकाने के शौक़ीन उसमें विभिन्न चीजों का तड़का लगाकर इतना लज्जतदार बना डालते हैं की लोग उँगलियाँ भी चाट जाते है. यूं तो यह एक व्यंजन मात्र है पर इसकी उपमाएं भी कम नहीं, ‘खिचड़ी कर देना’ व ‘खिचड़ी पकाना’ जैसी कहावतें इसके अस्तित्व को चिरायु करती रही हैं. कहा भी गया है – खिचड़ी के चार यार- दही, पापड़, घी व अचार! लेकिन यही खिचड़ी जब मात्र दाल चावल और नमक के साथ सादी होती है तब अत्यधिक सुपाच्य होती है, और जितना व जैसे जैसे इसमें अन्य चीजों का तड़का लगता जाता है यह आकर्षक तो लगती है, पर इसका मूल खो जाता है.

अब बात करते हैं इसके असल मतलब की, जहाँ कहीं भी संदर्भित बातों के इतर ढेर सारी अन्य असंदर्भित बातों का मिश्रण हो वह कार्य अथवा संदर्भित अभिव्यक्ति खिचड़ी का रूप ले लेती है.

ऐसा बिलकुल नहीं की खिचड़ी हमारे समाज में स्वीकार्य नहीं, बल्कि आज आप जिस ओर अपनी नजर दौडाएं, आप पाएंगे की हर क्षेत्र में इसका प्रतिरूप समाहित है, अब चाहे वह अपना देश हो, अपना समाज हो, अपनी राजनीती हो, अपना खेल जगत हो, सिने जगत हो, व्यवसाय हो अथवा साहित्य हो हर जगह इसने अपना संक्रमण फैला रखा है.

यह चिरपरिचित बात है कि अपना देश तो कई संस्कृतियों की खिचड़ी है, वो भी ठंडी खिचड़ी, जैसे जम जाती है ठीक वैसे ही अपना देश कई संस्कृतियों व मान्यताओं को अपने में समाहित किये हुए एकता का आदर्श स्थापित करता आ रहा है और जमा हुआ है, पर कभी-कभी साम्प्रदायिकता का कंकड़ बीच में आ ही जाता है, अब सोचिये जरा यदि यह कंकड़ न आये तो खिचड़ी का स्वाद कभी न बिगड़े. तो हमें भी उन्हें चुनकर बाहर करना ही पड़ेगा जो हमारी खिचड़ी ख़राब कर रहे हैं, इसलिए इनको बख्शा नहीं जाना चाहिए.

आज के युवा समाज ने जो की खिचड़ी संस्कृति को अपनाने में उनकी खुद के संस्कृति से विलग होते जा रहे हैं, उनके आदर्श, विचार, पहनावे, रहन-सहन, बातचीत सभी भिन्न होते हैं, जो, जिन्हें वे आदर्श मानते हैं उनके विचार नहीं, जिनके पहनावे अपनाते हैं उन जैसा रहन सहन नहीं होता, बातचीत की तो बात ही न करें क्योंकि उसको सुनना तो जैसे उनके खिलाफ ही है. जो उम्र उनको सुनने में लगानी चाहिए, बोलने में निकल जाती है और जब बोलने की बारी आती है तो चुप पड़ जाते हैं की वो तो कभी सुना ही नहीं की कहा और कब कैसे बोलते हैं, इसलिए इस वर्ग को अभी बक्श ही दें तो ठीक रहेगा और अपने खिचड़ी वृतांत को आगे बढ़ाते हैं.

राजनीती में खिचड़ी का बड़ा महत्व है, कार्यकर्ताओं का सम्मेलन हो अथवा कोई रैली या रैला खिचड़ी एक सदाबहार व्यंजन है. खिचड़ी पार्टी की सरकारे अक्सर राज्यों व केंद्र में देखने को मिलती रही है. जिनकी खिचड़ी में जैसा तड़का वैसा उसका स्वाद-सुगंध दूर दूर तक फैलता रहता है, जिनकी यारी खिचड़ी के परिजनों सी होती है उनके पञ्च की कुर्सी टिकी रहती है पर जिनकी खिचड़ी में दही ज्यादा हो जाता है तो उनकी खिचड़ी फैलते देर नहीं लगती (क्षमा करें वैसे फैलता तो रायता है पर आपने गौर किया होगा की वो भी तभी फैलता है जब दही ज्यादा हो जाता है), अब अपने सुशाशन बाबु को ले लीजिये समय रहते निकल लिए, देर आये, पर दुरुस्ती का आलम आने अभी देर लगेगी साहब, क्योंकि खिचड़ी में दाल, मूंग, मसूर व अड़हर का तो समझ आता है, भला राजमे की खिचड़ी कैसी होती है? बिहार में लालू तो गए पर समोसे में अभी भी आलू डलता है, बाकी सब तो बिहार की जनता जानवे करती है सो अब उन्हें भी बक्श दिया जाय.

आप कहेंगे की खेल जगत में क्या है, भाई सबसे बड़ा खेल ही तो खिचड़ी है, लोगों को भले ही न पता हो के एक ओवर में कितनी बार एक ही गेंद को फेंकते है पर रन कितने बन रहे है जरुर पता हो जाता है, भला वो अपने को समाज में कम कैसे बता पाएंगे की उनको पता नहीं की क्रिकेट में क नहीं र आधा होता है. अब तक आप समाझ गए होंगे की मैंने क्रिकेट क्यों चुना? जी बिलकुल सही पकड़ा आपने, ये जो आई.पी.एल. है न जिसमें कई देशों के खिलाडी अपना जौहर दिखाते हैं, पर इनकी भी खिचड़ी सही ना हो तो खेल बिगड़ जाता है, मतलब रसोइया सही तरीके इन्हें न बनाये तो टीम खिचड़ी फ्लॉप हुई ही समझिये, अब भला सिर्फ दाल या सिर्फ चावल से तो दाल भात अलग अलग ही बनते हैं न? सही खिचड़ी नहीं बनेगी तो टीम चलेगी कैसे. यह बात सामान्य क्रिकेट टीम पर भी लागू होती है. जब तक सही क्रिकेटरों की खिचड़ी टीम इंडिया में नहीं होगी तब तक उनका स्वाद सुगंध दुनिया तक नहीं फैल पायगा.

हाँ तो संपादक महोदय ने सीमा दे रखी है 1000 शब्दों की, और मैंने 800 पार कर लिए हैं तो अपनी बातो को संक्षेप में आगे बढ़ाते हुए कहना चाहता हूँ की सिने जगत में भी खिचड़ी ने अपना परचम लहरा रखा है, फिल्मे, चाहे उनका फिल्मांकन कितना भी उच्चस्तरीय क्यों न हो पर निर्माताओं को यह भय सदा ही सताता रहता है, की यदि उसमे आइटम नंबर का तड़का नहीं डाला तो उसके फ्लॉप करने का खतरा बना रहता है, जिससे भयभीत हो आजकल जैसे परंपरा सी बन गयी है की फिल्मो में तेल भले ही नौ मन ना हो पर राधा को नचा ही डालते हैं.

आज कल सरकार भी सरकारी तंत्र को सम्हाल नहीं सकती सो इंटरप्रेन्योरशिप को बढ़ावा दे रही है और लोगों को अलग अलग व्यवसायों में एक साथ व्यस्त कर रही है, लोग बहुधन्धी होते जा रहे हैं. मतलब यहाँ भी खिचड़ी का ही व्यापर हो रहा है, जिस कारण लोगो को न तो ठीक से चावल और न ही ठीक से दाल के स्वाद का पता चल पर रहा है, बस सभी अपनी-अपनी खिचड़ी गलाने में लगे हैं, क्योंकि पक तो सभी की जाती है पर गलती किसकी ज्यादा है महत्व इसका है.

संपादक महोदय से क्षमा मांगते हुए आगे अंतिम पैराग्राफ की तरफ बढ़ता हूँ की अपना साहित्य जगत भी इससे अछूता नहीं रह गया है, अब इसी व्यथा की बात लीजिये, शनिवार का दिन था, धर्मपत्नी ने कहा, “आज खिचड़ी ही बनाउंगी” मैंने भी कहा “हाँ-हाँ जरुर क्यों नहीं”, आखिर तुम्हारी भी सप्ताह में एक दिन की छुट्टी बनती है जैसे कई संस्थानों में शनिवार को आधी और रविवार को पूरे दिन छुट्टी रहती है, वैसे तुम भी खिचड़ी पकाकर शोर्टकट में निपटा डालो, ताकि हम सब की क्षुधा शांत हो सके और इसी बीच मैं भी अपने मित्रों की मानसिक क्षुधा शांति के लिए एक लेख लिख लेता हूँ, और उसका विषय तो तुमने पहले ही दे दिया – खिचड़ी.