कविता

यह समर आज अंतिम होगा

यह समर आज अंतिम होगा ………………………………. यह समर आज अंतिम होगा मत सोच कि यह मद्धिम होगा मिट जाएगा अब सब अंतर हर भय होगा अब छू-मंतर हर दिशा आज संवाद करे हर क्षण हर पल अनुनाद भरे बिछड़े का होगा आज मिलन बिन ब्याही बने नहीं दुल्हन अब नहीं …

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आओ एक दीप जला जाओ!

आओ एक दीप जला जाओ ………………………………. तुम बनो आज अब उद्दीपक तुम हो तो जल पाए दीपक तुम हो तो दूर अंधेरा हो जगमग प्रकाश से डेरा हो मैं तुझे ही दीपक मान रहा तू सदा जले यह ठान रहा तुझमें घी बाती भरता हूँ अब हो बयार ना डरता …

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हिन्दुस्तान (झेलम तट, राजबाग – 07 जून 1969)

|| हिंदुस्तान || (झेलम तट स्थित राजबाग से 07 जून 1969 को) कितना महान प्यारा हिन्दुस्तान है | नागराज कि ऊँचाई देशाभिमान है || कश्मीर भारत वर्ष का शाश्वत ईमान है | इस पर न्योछावर तन-मन अनमोल प्राण है || पावन पवित्र नदियाँ उपवन हरे भरे हैं | भारत के …

वाह रे कैसी है सरकार
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वाह रे कैसी है सरकार

| | वाह रे कैसी है सरकार | | रोज उखड़ती पटरी है पर बुलेट ट्रेन तैयार, वाह रे कैसी है सरकार, डीजल-पेट्रोल लेने जाओ, बढे दाम हर बार वाह रे कैसी है सरकार, घर से निकलो बाहर देखो पता चलेगा यार, वाह रे कैसी है सरकार, मोदी को सोम …

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क्षणिकाएं : ०४

|| भगवान || भगवन इस संसार के कण-कण में तुम व्याप्त हो. सर्वव्यापी, अंतर्गामी, फिर भी पहुँच के पार हो. मैं वियोगी, प्रेमाभाव में माया-बद्ध जीवात्मा. किस विधि मिलूं मैं काट के बंधन, दया करो परमात्मा. योग न जानू, क्षेम न जानू, कर्म विधि न राग है. न त्याग, ना …

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क्षणिकाएं : ०३

|| कर्मयोगी || दु:सह्य वेदना, असाध्यप्राय कार्य, श्याह लक्ष्य, निष्फल चेष्टा. शून्य प्रतिफल, व्यथा तेरे अंतर्मन की. हे! प्राण प्रतिष्ठित, किंचित न हो व्यथित, शांत कर उदवेदना, लक्ष्य का आह्वान कर, तू कर्मयोगी, माना भुक्तभोगी, भाग्य का सत्कार कर. क्या हुआ यदि गिर पड़ा, चोटिल हो निष्प्राण नहीं. चल उठ, …

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क्षणिकाएं : ०२

|| वसुंधरा || सरस बरस रे मेघ तू, के रसहीन धरा हुई. न ओज है, न तेज है, असुध वसुंधरा हुई. कहाँ गई, मृदा की गंध, रंग की विचित्रता. पवन में वह सौम्यता, और पुष्प में मृदुलता. अतीत की घटामयी, सुखदायनी विस्मृतियाँ, थीं विश्व में जो श्रेष्ठ, वो संस्कृतियाँ कहाँ …

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क्षणिकाएं : ०१

|| यौवन || आरूढ़ रश्मि रथ पे, नवजीवन की किरण. प्रफुल्लित मन मृदुल, तृप्त अनावृत यौवन. उच्छृल नदी प्रतिविम्बित, समृद्ध रवि रक्त कण. समीर मंद वेग में, उन्मत्त च्यूत जिर्ण पर्ण. विस्तृत क्षिति निजभाववश, चहुँ दिक वृत्त नील वर्ण. खग-वृंद श्रृंगकलवरत, मदसिक्त भू आसक्त मन. संयुक्त मुक्त भुक्त है, हो …

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अंतर्मन (१९६०)

|| अंतर्मन || अंतर्मन का सोया विषाद, क्यों चिल्लाता है बार-बार. भगवान बोल, होता कैसा? जिस बेटे का लुट गया प्यार. माँ-बाप हेतु बालक रोता, भगवान स्वर्ग में सोता है. दुःख जलनिधि में लगता गोता, शैशव धरती पर सोता है. चिंतित जीवन, धूमिल प्रभात, समता पर भीषण वज्रपात. रहता है …

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मित्रों का अलबम

|| मित्रों का अलबम || जीवन के बने अनेक चित्र, कुछ नए-पुराने कुछ विचित्र. मेरे अनेक मुंहलगे मित्र, दिल की खूँटी पर टंगे मित्र. कुछ भूल गए थे वे विचित्र, कुछ लगते है अबतक सचित्र. मिलता लेकर अरमान मित्र, झिलमिल होती पहचान मित्र. जीवन यौवन जंजाल मित्र, ‘भूदेव’ हुआ कंगाल …