भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए किस अवसर की तलाश है आपको?

छाया : बेरमो आवाज

मकोली स्थित उत्क्रमित विद्यालय के पास बी.आर.सी. भवन से रविवार की सुबह एंटी करप्शन ब्यूरो की धनबाद टीम ने बेरमो प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी महेन्द्र सिंह (फाइल फोटो) को 40 हजार रुपए रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार कर अपने साथ धनबाद ले गई। एसीबी की टीम ने यह कार्रवाई मनबहादुर थापा नामक एक ठेकेदार के शिकायत पर की है। अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार बिल पास करने के एवज में बीईईओ सिंह ने ठेकेदार थापा से डेढ़ लाख रुपए की मांग की थी। पर थापा ने 40 हजार फ़िलहाल देने की बात कही और जिसकी शिकायत थापा ने एसीबी धनबाद की टीम से किया। जिसके बाद एसीबी की टीम रविवार की सुबह मकोली पहुंची, इधर पूर्व निर्धारित समय पर रकम लेकर ठेकेदार थापा भी पहुंचे और जैसे ही  मकोली स्थित बीआरसी भवन में उक्त राशि  बीईईओ महेन्द्र सिंह को दिया, वहीं सादे लिबास में पहले से बैठे एसीबी की टीम ने धर दबोचा। गिरफ्तार महेन्द्र सिंह बेरमो (वन) के प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी हैं तथा इसके पहले नावाडीह में पदस्थापित थे.

कहा जाता है कि दान जितना गुप्त होता है दानी को उतना ही पुण्य प्राप्त होता है और दान जो दिखावे के साथ होता है वह आडम्बर होता है. अब तर्क यह है कि गुप्त दान करने वाले यदि फल की इच्छा और पुण्य मात्र की प्राप्ति से उत्साहित हो कर दान करते हैं तो वह भी लालसा की श्रेणी में आ जाता है और निष्फल हो जाता है. सार यह है कि दान भी एक कर्म है जिस प्रकार आप अन्य कर्मो का साधन करते हैं. यह एक प्रक्रिया है जो आपके सामाजिक उत्तरदायित्व को एक स्थान प्रदान करती है समाज में.

कर्म को प्रधानता उसके नैतिक व आदर्श मूल्य के स्तर पर दिया  जाना चाहिए और इच्छा से व्युत्पन्न अवसाद से स्वयं को दूर रखना चाहिए. इच्छा का होना महत्वपूर्ण न होकर कैसी इच्छा है यह अधिक विचारनीय होना चाहिए. इच्छा कर्म को प्रेरित करती है, सत्कर्म आपके व्यक्तित्व का निर्माण करती है. अवसर आपकी निष्ठा की परीक्षा लेती है, यह नहीं कि अवसर मिला तो आप ईमानदारी का बिगुल बजा रहे और अवसर मिला तो अपना उल्लू भी सीधा करने से नहीं चूके.

यूँ तो अवसर की तलाश सबों को होती है, परन्तु यह कि अवसर प्राप्त होने पर उसको उपयुक्तता के साथ प्रयुक्त भी कर सकें, क्षमता किन्ही विशिष्ट आत्माओं में ही होती है. अवसर का होना किसी विशेष कर्म के निष्पादन के लिए उपयुक्त है अथवा नहीं यह पूर्ण रूप से उसके एकाधिक लाभुकों के संख्या बल से निर्धारित होना चाहिए न कि अपनी क्षमता का अनुचित लाभ लेकर स्वहित साधन कर अनैतिक रूप से प्रयुक्त किया जाये.

आप अफसर थे, आपके स्वयं को सौंपे गए कार्य के प्रति उत्तदायी बना कर पदस्थापित किया गया. उसके बदले में सरकार वह हर लाभ दे रही है जिसके आप पदानुकुल अधिकारी थे. आपने गलत को सही करने के लिए पैसे लेने शुरू किये तो सही लोगों को लगा आप गलत कर रहे हैं. जब आपने सही लोगों को भी पैसे देने के लिए विवश किया तो एक बार फिर उनको लगा कि आप गलत कर रहे हैं. जब कभी शायद आपको विवश किया गया हो गलत करने के लिए तो आप नहीं रुके और न ही रोका अपितु आप अवसर का लाभ प्राप्त करते चले गए. अब ऐसे में यह दिन देखने के लिए तैयार होंगे आप शायद, परन्तु इस घटना से एक बात तो स्पष्ट है कि लोग अब विरोध तो करेंगे.

इन सब बातों से एक और बात निकलती है कि क्या कभी आपने उनकी बातों का मान न रखा हो, और उन्होंने कसम उठा ली हो कि आपको सही जगह पहुंचा देंगे. या फिर वास्तव में वे आपसे और आपके रवैये से त्रस्त हो गए होंगे और आप अपने ही कर्म के जाल में फंस गए. जो भी हो इतना तो पक्का है कि उच्चाधिकारियों ने आपको पकड़ा है, वैसे लोगों ने जिन्होंने शपथ ली है ऐसे ही कर्मो को रोकने की तो आप अपनी शपथ क्यों भूल गए थे, जो आपके संस्थान ने आपको दिलाई हुई थी.

गम न करें – १७

बे-मौके सब शरीफ

मतलब यह नहीं कि यह सीधे तौर पर आपके बारे में हैं. मतलब यह है कि यह उन सभी के बारे में है जो मौके पर शरीफ बनने का ढोंग रचते हैं और समय आने पर दूसरों को आगे कर खुद उनका समर्थन अथवा उनके साथ अथवा उनके पीछे चलने को तुरंत तैयार हो जाते हैं. इसलिए बे-मौके सब शरीफ से हमारा तात्पर्य यह है कि मौका आने पर अपनी शराफत दिखाने से कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता, पर यह कि सिर्फ ख़बरों में आने के लिए या कि सिर्फ दिखावे के लिए.

आप कथनी और करनी में जितना कम अंतर रख पाते हैं उतने ही आप चरित्रवान होते हैं, यह नहीं कि आप चरित्रवान तो हों पर अवसर आने पर आप खिसक लें. यहाँ मेरा यह सब लिखना आप में से बहुतों को खल रहा होगा पर क्या करें तारीफ बनती भी होगी तो आप इसे मेरा दंभ न समझ ले इसलिए यह साफ करना जरुरी है कि मै इस लेख के माध्यम से आप सब को कुंठित नहीं करना चाहता हूँ. मेरा उद्देश्य बस इतना है कि हम अपने चरित्र के स्तर को उस ऊँचाई तक ले जा सकें जहाँ हम सचमुच ही अपने कथनी और करनी अंतर नहीं कर सकें अर्थात जैसा भी हम सोचें अथवा कहें उसपर चल भी सकें.

थोड़ी देर के लिए यह लेख आपको गप्पबाजी लग सकती है पर आप जरा ध्यान देकर इन बातों को सोचेंगे तो यही पाएंगे कि हम में से कितने ही अवसर आने पर किसी जन-कल्याणकारी कार्यों के लिए समय निकल पाते हैं? अधिकतर का उत्तर यही होगा कि अपने काम से फुर्सत मिले तभी ना. सही भी है, पर यह तभी संभव हो पाता है जब आप समय निकालना चाहें. क्या आप अपने परिवार के लिए समय नहीं निकाल पाते, क्या आप अपने किसी निजी कार्य के लिए समय नहीं निकाल पाते यदि आपका उत्तर हाँ है तो समस्या यह है कि समय आपको निकालना होता है इससे पहले कि समय आपको निकाल दे.

महत्वपूर्ण यह नहीं कि आप किन बातों अथवा कार्यों के लिए समय निकाल पाते हैं अपितु यह कि आप किन बातों अथवा कार्यों के लिए स्वयं को अनुकूल पाते हैं. यदि नहीं तो फिर आप चाहें कि उक्त कार्यों के लिए भी आप समय निकालें. क्योंकि यह आपके ही हाथों में होता है पूर्णरुपेण. आप टालमटोल के शिकार महसूस होते हैं यदि आप चाह कर भी समय प्रबंधन नहीं कर पाते और इसका ठीकरा दूसरों के सर फोड़ने को उद्दत रहते हैं.

आईये इस उधेड़बुन से निकालें जीवन बहुत खुबसूरत है, इसका आनंद लीजिये, नहीं समझ आ रहा हो तो किसी मनोवैज्ञानिक से जरुर मिलें, आप पागल नहीं हैं पर इस स्थिति में अधिक देर रहना आपको जल्द ही उस श्रेणी में ला खड़ा कर सकता है, इसलिए कि कही और अधिक देर न हो जाये, अपने आपको, अपने लिए कुछ ऐसा करें जिससे आपके मन, आत्मा और चित्त को प्रसन्नता होती हो, साथ ही दूसरों की प्रसन्नता का कारण हो ऐसे कृत्यों में स्वयं को उलझाएँ.

इसलिए गम न करें खुश रहें.

बाबा आम्टे नगरवासियों का ऐसे मना गणतंत्र दिवस

फुसरो नगर परिषद उपाध्यक्ष कृष्ण कुमार ने अपने चिर-परिचित अंदाज में मनाया गणतंत्र दिवस. 26 जनवरी 2018 को झंडोत्तोलन के पश्चात वे अपने सहयोगियों साथ निकल पड़े उस बस्ती की ओर जहाँ सभी विभिन्न मौकों पर गरीबों को दान देने जाया करते हैं. जी हाँ, आपने सही समझा, बाबा आमटे नगर जिसे पूर्व में कुष्ठ बस्ती के नाम से भी जाना जाता था. वहां के निवासियों के बीच अन्न का वितरण करते हुए उन्होंने अपने गणतंत्र दिवस की शुरुआत की और निकल पड़े सुभाष नगर की ओर जहाँ और भी गरीबों को अन्न का दान किया गया.

हमारे सभ्य समाज में अभी भी एक ऐसा तबका है जो इन अवसरों पर प्रायः ही याद कर लिया जाया करता है. कचरे चुन कर और कभी-कभी भिक्षाटन कर जीवन यापन करने वाले ऐसे ही कुछ गरीबों की बस्ती है, जिसे नाम तो दे दिया गया बाबा आमटे नगर, पर उनके दैनिक जीवन के सर्वजनिक उपयोग की सरकारी महकमो से मिलने वाली सुविधाओं का सदा से अभाव ही रहा है. सी.सी.एल. के लगे बोर्ड पर वहां की जनसांख्यिकी को दर्शाने भर से उनका अपने सामाजिक दायित्व को पूरा समझना आखिर कहाँ की दूरदर्शिता है.

कृष्ण कुमार वहां के लोगों से मिले और उनकी समस्याओं से अवगत हुए और भरोसा दिलाया कि जल्द ही उनके सभी समस्याओं के निवारण के उपाय होंगे. लोगों ने मिलकर सामूहिक रूप से पानी की समस्या से अवगत कराया और कहा कि एक जो पम्पसेट लगा भी है तो उससे पानी पूरा नहीं हो पाता है. वहां पहले से ही गड़े चापाकल पर मोटर लग जाने से पानी की सप्लाई को दुरुस्त किया जा सकता है, इसपर विचार कर जल्द ही इसे मूर्त रूप दिया जायगा जिसके लिए वे हर संभव प्रयास करेंगे.

बताते चलें की अभी हाल ही में फुसरो नगर परिषद द्वारा ओ.डी.एफ. (Open Defection Free) अर्थात खुले में शौच से मुक्ति की दिशा में पहल हुई है, पर बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस बस्ती में अभी तक शौचालय नहीं बन पाया है और लोग अभी भी खुले में शौच के लिए विवश हैं. जो शौचालय है भी उसकी दशा बहुत ही दयनीय है. ऐसे में हमारा तंत्र कैसे गणतंत्र मना पाता है, यह एक विचारनीय तथ्य है.

यह बस्ती हमारे सभ्य समाज के मखमल पर टाट का पैबंद नहीं बल्कि हमारे सामाजिक तंत्र पर एक ऐसा जंग लगा पुर्जा है जो कि सदा ही से ऐसा ही रहने के लिए बसाया गया है ताकि हम अपनी संवेदनाओं को ऐसे अवसरों पर सहलाते रहें और खुद को सामाजिक प्राणी कहलाने का दंभ पालते रहें. कहीं न कहीं कसूर उनका भी है जो यहाँ के निवासी हैं जिन्हें ऐसे ही जीवन यापन करने की विवशता अब सामान्य लगने लगी है.

कोई सुन रहा है इन बेजुबानों की… और आप?

बिजली के नंगे तारो पर अक्सर पंछियों की बैठक होती है, और इन खतरों से अनजान पंछी कभी कभी बिजली के झटके से घायल भी हो जाया करते हैं। जिन्दगी किसी की भी हो, अनमोल होती है, चाहे वो इंसान हो या फिर जानवर। ये कहना है पेशे से व्यवसायी फुसरो बाज़ार मेन रोड निवासी श्री अंक्ति मित्तल का.

घायल पक्षी के साथ अंकित मित्तल, मेन रोड फुसरो

अक्सर अंकित जब पंछियों को इस प्रकार से घायल होते देखते हैं तो इन नादान परिन्दो से कभी यह सोचकर मुंह नहीं फेरा कि ये बस परिन्दे है, न कोई नाम है इनका, न ही कोई पहचान है इनकी और न कोई पता ही। न कोई पूछताछ होगी इनके मृत् शरीर की। पर अपने कोमल हृदय की आवाज सुनकर आज तक 9 पंछियों को बचाया इन्होंने.

फुसरो सिटी को दिए गए एक्स्क्लूसिव इंटरव्यू में अंकित ने आगे बताया कि यहाँ कोई ऐसी संस्था नहीं जो इस प्रकार के जानवरों अथवा पक्षियों के लिए कोई काम करती हो। साथ ही उन्होंने आशा व्यक्त की कि उनकी कोशिश है लोगों को इसके बारे में जागरूक बनाने की और कुछ समय बाद ही सही लोगों में जागरूकता आयेगी और यूं ही कोई जानवर और पक्षी नहीं मर जाया करेंगे. करते हे कि यह नेक कोशिश आप भी करे क्योंकि यह भी हमारे जीवन का एक अनमोल हिस्सा है.

सच है, इसे कहते हैं मानवता. जरुरी नहीं कि कल से आप भी सिर्फ पक्षियों को बचाने में ही लग जाएँ, पर जरुर आपको ऐसे ही किसी कार्य में स्वयं को सम्मिलित कर ही लेना चाहिए जिसका सामाजिक सरोकार और मानवता, देश-धर्म से सीधा सम्बन्ध हो. आप स्वयं को किसी भी पेशे अथवा परिवेश में पाते हों, अपनी प्राथमिकताओं को सुनिश्चित करें और समाज और देश हित में जो भी बन पड़े जरुर करें.

हो जायें सावधान, जब बच्चा बोले, बस एक मिनट और!

आजकल घरों में प्रायः ही यह देखने को मिल जाता है कि जब आप अपने बच्चों को कोई काम कहें तो आपको उत्तर मिलता है- “बस एक मिनट और!” मतलब स्त्पष्ट है कि आपका बच्चा बहुत ही व्यस्त है, और उसकी यही व्यस्तता इस प्रकार के उत्तर का कारण भी. याद कीजिये अपना बचपन, जब आप पिताजी के बुलाने पर कहते थे “जी, पिताजी अभी आया”.

कुछ लोग कहेंगे, साहब! वह जमाना और था आज के ज़माने में कहाँ ये सब. ऐसे विचार रखने वालों से स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि मात्र संस्कारों का वहन ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसका संवहन भी अति आवश्यक है. अर्थात आपका संस्कारी होना ही काफी नहीं, बल्कि आप अपने संस्कार आने वाली पीढ़ियों तक कैसे पहुंचाते हैं इस पर विचार करना भी बहुत जरुरी है.

आईये, अब उन उत्तरदायी कारणों को पुनः एक बार समझने का प्रयास करते हैं जो इनसे सम्बंधित हो सकते हैं. पुनः एक बार से हमारा आशय स्पष्ट है कि, उन कारणों से हम भलीभांति परिचित होते हुए भी उन्हें नकारने का हर संभव प्रयास करते रहे हैं.

  1. गेम- आज के तकनीकी युग में सबसे अधिक प्रचलन में कंप्यूटर पर खेले जा सकने वाले गेम्स एक प्रमुख कारण है जो बच्चों को उनके मूल कर्म अर्थात अध्ययन से विमुख करता है. उनके सोचने समझने एवं निर्णय क्षमता पर सीधा प्रभाव डालता है. “ब्लू-व्हेल” नामक गेम के दुष्परिणाम से आप भली प्रकार परिचित हैं. माना कि आपका बच्चा वह गेम नहीं खेलता होगा, परन्तु यह कि जहाँ शारीरिक क्षमता विकसित करने के लिए हल्के-फुल्के दौड़-धूप वाले गेम खेलने के बजाय लम्बे समय तक कंप्यूटर पर आँखे गड़ाए रहना कितना हानिकारक हो सकता है, क्या यह आप सबसे से छिपा है?
  2. चैटिंग- सोशल मिडिया पर अधिक समय बिताना भी एक प्रमुख कारण है, जिससे की बच्चों की मानसिक दशा पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है. विशेषकर ऐसे लोगों से चैटिंग के माध्यम से जुड़ना जिन्हें वे जानते तक नहीं कि दूसरी तरफ कौन व किस उम्र का व्यक्ति उनसे चैटिंग कर रहा है. चैटिंग, में कई बार लोग ज्यादा ही खुल कर अपने विचारों को रख जाते हैं जिन्हें सीधे बोलने में शायद हिचक होती हो. ऐसी स्थिति आपके बच्चों की मनोदशा पर विपरीत प्रभाव छोड़ सकती हैं.
  3. मोबाइल- मोबाइल एक सूचना साझा करने का सबसे बेहतर उपकरण मात्र हो सकता है. पर यह कि सदैव उसके साथ ही समय बिताना आपकी कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल जाता है. यह आपको तब पता चलता है जब आपके बच्चे ऐसा करते हैं. सोचें, और ध्यान रखें कि आपके मोबाइल में कोई ऐसी सामग्री न हो, गलती से भी, कि जिसे बच्चे देख ले तो उनकी मनःस्थिति असंतुलित हो जाय.
  4. अन्य कारण- उपरोक्त कारणों के चलते असमय खाना-पीना, देर रात तक जागना, सुबह स्कूल जाने को समय पर तैयार न हो पाना, होमवर्क जैसे तैसे किसी की सहायता से या नक़ल कर पूरा करना आदि ऐसे व्यवहार के पीछे उत्तरदायी हो सकते हैं, पर जरा ध्यान दें कि इनके पीछे भी वही कारण हैं जो इस प्रकार के व्यवहार के कारक हैं.

इनके अतिरिक्त और भी कई कारण हैं जिन्हें हम भलीभांति समझ लेते हैं पर उनके निवारण के लिए कोई उपयुक्त व ठोस कदम नहीं उठा पाते. हमें इसके लिए सुनियोजित तरीके को अपनाना होगा, जहाँ तक संभव हो सके अपने आप को एक उच्चतम स्तर पर आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना होगा जिससे कि उन्हें प्रेरणा मिले और वह अनुकूल वातावरण में स्वयं को ढाल पायें, तथा एक सभ्य नागरिक बनने की दिशा में अग्रसर हो सकें, भले ही यह गति धीमी हो, यदि रास्ता सही होगा तो देर से ही सही, लक्ष्य अवश्य प्राप्त किया जा सकेगा.

  1. समय- सिर्फ पैसे कमाना ही आपका कर्तव्य नहीं, अपनी संतान को बेहतर जीवन देने की दिशा में आपका उसको दिया जाने वाला समय भी परमावश्यक है. सुनियोजित हो कर उन्हें समय, थोड़ा ही सही पर जरुर दें, किसी भी बहाने से, कभी पूछ ही लिया करें, कहाँ गए थे. क्या खाया? क्या पिया? होमवर्क बनाया लिया क्या? ताकि उन्हें भी लगे कि हाँ, पिताजी पूछते हैं. वे भी आपके प्रति उत्तरदायी होंगे. उनके साथ थोड़ा समय व्यतीत करें. आप बहुत काम करते हैं, थक जाना स्वाभाविक है. पर आपको चाहिए अपना मनोरंजन उनके बीच खोजें, उनसे ही अपना मन बहलायें. उनसे अपनी कोई बात साझा करें, प्रेरणास्पद घटनाओं के बारे में बताएं, महापुरुषों की जीवनी के बारे में बताएं, जिससे की उनका मनोबल ऊँचा हो सके.
  2. पैसा- उन्हें उम्र के मुताबिक खर्चने को पैसे भी दें, साथ ही उसका हिसाब भी लें, जिससे की वे अर्थव्यवस्था को समझें, कि पैसे की अहमियत क्या होती है, जब हो और जब किसी के पास न हों इसके बीच का अंतर भी, और पैसा लाने में कितना परिश्रम लगता है आदि.
  3. उपहार- छोटे-छोटे ही सही पर कभी-कभी कुछ उपहार भी दिया करें, पर उन उपहारों के कारणों को सटीकता से ढूंढें, जैसे तुमने अपना फलां काम बेहतर किया इसलिए तुम्हें दिया जा रहा है, अगली बार और बेहतर कर पाओ ऐसी आशा है. पूरी तरह से बेफिक्रे न हों. बच्चों को पता चलना ही चाहिए कि आप कौन हैं, उनसे आपकी क्या अपेक्षा है, और आप उनके लिए क्या कर रहे हैं.
  4. व्यवहार- सबसे महत्वपूर्ण है आपका उनके सामने प्रस्तुत होना कि आप किस रूप और हालत में उनके सामने जाते हैं अथवा उनका सामना कैसे करते हैं. आप तात्पर्य भली प्रकार समझ गए होंगे, परन्तु फिर भी जिक्र करना आवश्यक प्रतीत हो रहा है तो, यह कि यदि आप कोई व्यसन करते हैं तो उनके सामने करने से बचें, भले ही वो जानते हों पर फिर भी भूले से भी उनके सामने ऐसा न करें और हो सके तो स्वयं को व्यसनों से दूर रखें.

जब हम गर्भवती महिलाओं को व्यसनों से दूर रखने अथवा रहने की बात करते हैं तो ध्यान देना चाहिए कि संतान उत्पति के बाद पुरुषों को भी व्यसनों से दूर रहना चाहिए. एक बेहतर संतान की अपेक्षा सभी रखते हैं पर उसके लिए आदर्श वातावरण के निर्माण में अपनी भूमिका भूल जाते हैं.

उपरोक्त बातें चाहे कितनी भी बार आपने अलग-अलग माध्यमो से सुनी, पढ़ी अथवा देखी होंगी, पर इसके अनुपालन में हम ही पिछड़ रहे हैं, अपने बच्चों के प्रति चिन्तित होना, और इस हेतु कुछ कर न पाना, इस विडंबना से हमें बाहर आना ही होगा क्योंकि, आपके हमारे भविष्य की डोर हमारे आपके ही हाथों में है

गम न करें – १०

गम करना बेमानी है. करना है तो जतन करें, जिससे ग़मज़दा लोगों की जिंदगी से गम के बादल दूर हों, और वह भी आपकी जमात में शामिल हो खुश रहना सीख ले.

किसी शायर ने खूब कहा है कि “दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है, औरों का गम देखा तो, मैं अपना गम भूल गया.”

मतलब साफ़ है, गम तो है पर उससे कहीं ज्यादा खुश रहने के बहाने मौजूद है, जरुरत उसको पहचानने भर की है. जब सभी को पता है कि गम से कुछ हासिल नहीं हो सका है किसी को अब तक तारीख़ में तो भला हमें कैसे हासिल हो सकता है.

हम अक्सर ही दूसरों की ख़ुशी का कारण पता करने लग जाते हैं, बजाय इसके कि आप उसकी ख़ुशी में दिल से शामिल हो सकें. आप दूसरों के दुःख में शामिल होते हैं, पर उसमे आप ख़ुशी का अनुभव नहीं कर पाते हैं.

कहा भी गया है चिंता से चतुराई घटे, दुःख से घटे शरीर…

आप तय कर लें, गम करना है कि गम के कारणों को ढूंढ कर उसको ख़ुशी तब्दील करने का जरिया तलाशना है. सबसे बड़ी बात होती है कोशिश, जिसने की नहीं वो गम कर सकता है, वरना कोशिश करने वालों का तो कुदरत भी साथ देती है. हालात जैसे भी हों उसपर तंज कसना और उसका रोना-रोना बहुत आम बात है, ख़ुशी तो इस बात में है कि आप गमगीन भी हैं इस बात का पता औरों को लगता तक नहीं, और आप उसके सामने से गुजर जाते है.

हर हाल में खुश रहना आपको आपके बुरे हाल से निकलने में मददगार होता है बजाय इसके कि आप झख मारते फिरें. अपना रोना कभी न रोयें, इससे लोग आपके गम को कम तो कर नहीं पाएंगे उलटे आपसे और कन्नी काटने लगेंगे. जितना हो सके सरलता से पेश आयें. ऐसा भी नहीं कि डींगे ही मारने लगें.

हमें संतुलित व्यवहार को तरजीह देनी चाहिए. एक मुकम्मल इंसान बनने के रास्ते में मुश्किलें तो आयेंगी, पर उन मुश्किलों को पार करने के लिए ख़ुशी की राह अपनाएं, गम का नहीं. गम नहीं करने से सीधा मतलब है बेकार की चिंता, ऐसा बिलकुल न समझें की चिंतन जरुरी नहीं या सोच जरुरी नहीं, पर गम? उसका इससे कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए, तभी आप चिंतन-मनन-सोच-विचार आदि कर भी पाएंगे.

इसलिए गम न करें, सोचें और शुक्र अदा करें, कि देने वाले ने जो भी आपको दिया है, क्या उतना भी किसी के पास है भी क्या?

जारी….

सफ़ेद आसमान पर हरा चाँद : फुसरो ने मनाई पैगम्बर साहब की जयन्ती

जी हाँ, ईद-ए-मिलादुन्नबी अर्थात पैगम्बर साहब के जन्मदिन के उपलक्ष्य मनाया जाने वाला समारोह. फुसरो शहर में निकले जुलुस में जिस सफ़ेद झंडे का उपयोग किया गया जिसपर हरे चाँद और सितारे लगे थे, ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अमन के आसमान पर खिले हरे चाँद और सितारे मोहमद साहब का पैगाम दे रहे हों कि जब तक चाँद और सितारे रहेंगे इस्लाम यूँ ही अमन और शांति का पैगाम दुनिया को देता रहेगा.

जानें :
मिलादुन्नबी यानी इस्लाम के संस्थापक पैगम्बर मोहम्मद साहब का जन्मदिन रबीउल अव्वल महीने की 12 तारीख को मनाया जाता है। हजरत मोहम्मद साहब का जन्म मक्का (सऊदी अरब) में हुआ था। उनके वालिद साहब का नाम अबदुल्ला बिन अब्दुल मुतलिब था और वालेदा का नाम आमेना था। उनके पिता का स्वर्गवास उनके जन्म के दो माह बाद हो गया था। उनका लालन-पालन उनके चाचा अबू तालिब ने किया।

हजरत मोहम्मद साहब को अल्लाह ने एक अवतार के रूप में पृथ्वी पर भेजा था, क्योंकि उस समय अरब के लोगों के हालात बहुत खराब हो गए थे। लोगों में शराबखोरी, जुआखोरी, लूटमार, वेश्यावृत्ति और पिछड़ापन भयंकर रूप से फैला हुआ था। कई लोग नास्तिक थे। ऐसे माहौल में मोहम्मद साहब ने जन्म लेकर लोगों को ईश्वर का संदेश दिया।

वे बचपन से ही अल्लाह की इबादत में लीन रहते थे। वे कई-कई दिनों तक मक्का की एक पहाड़ी पर, जिसे अबलुन नूर कहते हैं, इबादत किया करते थे। चालीस वर्ष की अवस्था में उन्हें अल्लाह की ओर से संदेश प्राप्त हुआ। अल्लाह ने फरमाया- ‘ये सब संसार सूर्य, चाँद, सितारे मैंने पैदा किए हैं। मुझे हमेशा याद करो। मैं केवल एक हूँ। मेरा कोई मानी-सानी नहीं है। लोगों को समझाओ।’

हजरत मोहम्मद साहब ने ऐसा करने का अल्लाह को वचन दिया। तभी से उन्हें नुबुवत प्राप्त हुई। हजरत मोहम्मद साहब ने खुदा के हुक्म से जिस धर्म को चलाया, वह इस्लाम कहलाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है- ‘खुदा के हुक्म पर झुकना।’
स्रोत : वेबदुनिया हिंदी

आज जिस तरह दुनिया में इस्लाम की बदनामी हो रही है या कुछ चरमपंथी तत्वों द्वारा ऐसा किया जा रहा है, ऐसे में यह बहुत जरुरी हो जाता है कि ऐसे मौकों पर और ऐसे जलसों द्वारा यह बताया जाये कि जो सही मायने हैं इस्लाम के वो क्या हैं. दुनिया का हर वो मुसलमान जो वास्तव में मुसलमान है अर्थात् जिसका इमान मुस्सल्लम है कभी इस्लाम से इतर सोच नहीं सकता, और जो इस्लाम के गलत मायने निकालते/समझाते फिरते हैं वो तो मुसलमान रह ही नहीं जाते.

इसलिए ये कहना कि दुनिया में आतंकवादी मुसलमान होते हैं न कहकर यह कहा जाना चाहिए कि जो मुसलमान आतंकवाद का रास्ता चुनते हैं वो फिर मुसलमान रह ही नहीं जाते जैसे किसी इन्सान ने अगर गलत रास्ता अख्तियार कर लिया तो हमारा समाज उन्हें इन्सान कह सकता है क्या? हम बेजा ही किसी धर्म को ही गलत बता बैठते हैं बगैर सोचे कि उसके बारे में हम जानते भी कितना हैं.

बात अच्छी चीजों के अमल में लाने से जुड़ी होनी चाहिए न कि वो अच्छी बातें हमें कहा से सिखने को मिल रही हैं यह सोचने के.

मैंने आत्महत्या नहीं की : पुष्पा भालोटिया

मैं पुष्पा भालोटिया बोल रही हूं, वहीं पुष्पा भालोटिया जिसे रानीगंज में उसका पति दिनदहाड़े षडयंत्र रचकर हत्या करवा देता है, वहीं पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या पर रानीगंज का सभ्य मारवाड़ी समाज चुप्पी साध लेता है, वहीं पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या को उसके समुदाय वाले आत्महत्या घोषित करने के लिए अपने राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव का दुरुपयोग कर रहें हैं।

जी हां, मै पुष्पा भालोटिया बोल रही हूं, वहीं पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या पर उसके समुदाय का एक भी समाजिक, राजनीतिक अथवा धर्मिक नेतृत्व करने वाले व्यक्ति द्वारा विरोध नहीं होता है, वहीं पुष्पा भालोटिया जिसकी क्रूर हत्या पर रानीगंज का पूरा मारवाड़ी समुदाय शांति बनाए हुआ है, वहीं पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या पर उसके समुदाय में कोई रोष नहीं है। वहीं पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या पर मारवाड़ी समुदाय के युवकों में कोई आक्रोश नहीं है।

जी हां, मै पुष्पा भालोटिया बोल रही हूं, वही पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या पर न्याय के सौदागरों के कारण उसके पिता की वृद्ध आंखो के आंसू सूखने लगे है, वहीं पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या पर षढ़यंत्रकारी बाजीगरों के कारण उसकी वृद्ध मां को रानीगंज मारवाड़ी समुदाय द्वारा शोक सन्देश के बजाये हास्यात्मक वातावरण बनाकर आनंदमय हो रहा है।

जी हां, मै पुष्पा भालोटिया बोल रही हूं, वही पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या पर अपने वर्चस्व को बचाने के लिए हत्यारों को सहयोग दिया जा रहा है, वहीं पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या की कीमत उसी के समुदाय वालो ने लगाई है, जी हां वही पुष्पा भालोटिया जिसकी मृत शरीर पर वर्चस्व का खेल हो रहा है। जी हां वही पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या को पचाने का प्रयास रानीगंज के उसी सभ्य समाज द्वारा किया जा रहा है। जी हां वही पुष्पा भालोटिया जिसकी लाशों का कीमत लगाया जा चुका है।

जी हां, मै पुष्पा भालोटिया बोल रही हूं , वही पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या हुई है, आत्महत्या नहीं, मै उसी समुदाय को बोल रही हूं जिसके बीच मै रहती थी, उसी समुदाय को बोल रही हूं जिसपर मै गौरानवित होती थी, उसी समुदाय को बोल रही जिसके शहर ब्याह कर लाई गई थी , उसी को बोल रही हूं जिसने मेरा पहचान मुझसे छीना है,उसी को बोल रही हूं जिसने मेरा अस्तित्व मुझसे छीन लिया है। उसी को बोल रही हूं जिसने मुझसे मेरा प्राण छीन लिया है। उसी को बोल रही हूं जिसने मुझसे मेरे भाई बहन, मां , बाप, बेटे बेटी, खुशीया सब कुछ छीन लिया है। उसी को बोल रही हूं जिसने मेरा अस्तित्व मुझसे छीन लिया है। उसी को बोल रही हूं जिसने मुझसे मेरा दुनिया छीन लिया है।उसी को बोल रही हूं जिसने मेरी हत्या को आत्महत्या बोल कर रानीगंज मारवाड़ी समुदाय को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जिसने पूरे समाज को कलंकित किया है, समाज पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया है।

जी हां, मै पुष्पा भालोटिया बोल रही हूं, वही पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या हुई है, आत्महत्या नहीं, में उनसे बोल रही हूं जो रानीगंज मारवाड़ी समाज में किसी की मां है, किसी की बेटी है, किसी की बहन है, किसी की पत्नी है, आपके बीच में, आपके सामने, आपके पास एक मां को, एक बेटी को , एक बहन को और एक पत्नी को गोली मार दिया जाता है, गोली मार कर जला दिया जाता है, इस क्रूर हत्या को आत्म हत्या घोषित करने का प्रयास किया जाता है। लेकिन आप एक मां, एक बेटी, एक बहन एक पत्नी की इस हत्या को देख कर, सुन कर, समझ कर सिर्फ इसलिए ख़ामोश रहती हो के आपके समुदाय पर कोई सवाल नही उठे, कोई कलंक ना लगे, कोई आलोचना नहीं हो, कोई कारवाई नहीं हो। रानीगंज के मारवाड़ी समाज की मां, बहन, बेटी, पत्नी से पूछना चाहती हूं के क्या मेरे हत्या के साथ आपके अंतरात्मा का भी हत्या हो चुका है? मेरे हत्या के साथ रानीगंज के मारवाड़ी समाज की नारीवादी सोच का भी हत्या हो चुका है? मेरे हत्या के साथ रानीगंज मारवाड़ी नारी की विचारों का भी हत्या हो चुका है? मेरे हत्या के साथ मारवाड़ी समुदाय की औरतों की आजादी की भी हत्या हो चुकी है? अगर नहीं तो आपकी ख़ामोशी का कारण क्या है?

जी हां, मै पुष्पा भालोटिया बोल रही हूं , वही पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या हुई है, आत्महत्या नहीं, मै रानीगंज के मारवाड़ी समाज के सभी मां , बेटी, बहन, पत्नी को बता देना चाहती हूं के मेरी हत्या पर आप ख़ामोश है, आपका समाज ख़ामोश है, आपका समाजिक और राजनीतिक नेतृत्व ख़ामोश है लेकिन मेरे हत्या पर देश से आवाज़ उठने लगी है, सड़कों पर आवाज़ उठने वाली है, संसद तक आवाज़ उठाने की मुहिम चल रही है। आपकी ख़ामोशी ने मानवता को ललकारा है, मेरी आत्मा ने अत्याचार के विरुद्ध लड़ने वाले योद्धाओं को पुकारा है , न्याय के पुजारियों को आवाज़ दी है जो आपके मोहल्ले और शहर के सड़कों से संसद तक न्याय का ध्वज लेकर मुखर होकर वीरतापूर्वक संघर्ष करने की दिशा में अग्रसर है। और यह सब सिर्फ इसलिए के मेरी हत्या के बाद मेरे समुदाय की किसी मां, बेटी, बहन या पत्नी की हत्या करने से पहले हत्यारों पर ऐसा भय हो जो उसे सपने में भी भयभीत करती रहे, यह सन्देश मै सपना द्वारा अपने समुदाय वालों को दे रही हूं। अब आप चिंता ना करें, मेरी हत्या पर आपकी उदासीनता ने क्रांतिकारी आंदोलनकारियों तक मेरा संदेश पहुंचा चुकी हुई और वह ऐसे योद्धा है जो मेरे घर वालों को न्याय दिलाने तक संघर्ष करते रहेंगे।

जी हां, मै पुष्पा भालोटिया बोल रही हूं, वही पुष्पा भालोटिया जिसकी हत्या हुई है, आत्महत्या नहीं। मै अपने समुदाय की मां, बेटी, बहन और पत्नी को बोल रही हूं की मैं अपने हत्या के बाद भी अपने समुदाय की मां, बेटी, बहन, पत्नी के लिए आवाज़ उठाने के लिए समाज के ऐसे लोगों को आवाज़ दी है जो धर्म, जाती और समुदाय से ऊपर उठकर आवाज़ लगाते हुए संघर्ष करने जा रहे हैं और आप?

 : अग्रेसित- रोहित मित्तल, फुसरो

आहत होती संवेदनाएं और हम

अब तक देखा गया है कि किसी भी फिल्म के प्रदर्शित होने पर प्रतिक्रियाएं आतीं थी और विवाद होने पर उचित/अनुचित विरोध हुआ करता था. वस्तुतः किसी भी फिल्म जो कि विशेष कर ऐतिहासिक मूल्य के विषय वस्तुओं पर आधारित हो तो उनके स्वप्न दृश्यों का फिल्मांकन बहुत ही सावधानी से किया जाना चाहिए. कहने को तो महिषासुर ने भी माता के विषय में अपमानजनक बातें कहीं थीं तो क्या हम इसी को बार बार दुहराते हैं? महिमा मंडित करते हैं? नहीं, हम फिल्मो के माध्यम से अच्छी बातों को प्रचारित-प्रसारित करते हैं.

एक समय था फिल्मे समाज का दर्पण होतीं थी अर्थात जो समाज में घटित होता था उनका ही चित्रण किया जाता था परन्तु आज-कल परिदृश्य कुछ और ही है, आज समाज में वही हो रहा दिखलाई पड़ जाया करता है जो कुछ भी फिल्मो में दिखाया जाता है. सचमुच हमारा समाज पूरी तरह से फ़िल्मी हो चला जान पड़ता है.

इन सबका सामाजिक सरोकार से जितना भी गहरा वास्ता हो पर, इतना तो तय है कि जब तक इनको हवा नहीं मिलती तब तक विवाद गहराता नहीं, इतिहास भरा पड़ा है ऐसे विवादित फिल्मो से पर आज कल तो लगता है कि सब कुछ फिल्मे ही तय करेंगी. क्या राजश्री प्रोडक्शन की फिल्मे बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलतीं? क्या ऐसी फिल्मे दर्शकों को पसंद नहीं आतीं? क्या दर्शक फिल्मो में हिंसा और नग्नता ही देखना पसंद करते हैं? ऐसा बिलकुल नहीं है.

आप पब्लिक डोमेन में किसी भी ऐसे प्रस्तुतिकरण से विचलित हो उठते हैं फिर आप पर्दों पर वही देखना चाहते हैं, फिल्मकारों के अनुसार किये गए सर्वे से यही अनुमानित है कि हिंसक दृश, उत्तेजक दृश्य, दुर्घटनाओं वाले दृश्य आदि दर्शकों में काफी लोकप्रिय है. मैं कहता हूँ क्या खाक लोकप्रिय हैं. क्या कैमरे की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए? क्या जिन दृश्यों को हम आम जीवन में सबके सामने देखना-सुनना नहीं पसंद करते उन्ही दृश्यों को हम परदे पर भला कैसे देख सकते हैं, हमें अपनी ही सोच बदलनी होगी वरना हमें वही परोसा जाता रहेगा और उसका ठीकरा भी हमारे सर फोड़ा जाता रहेगा यदि हम अब भी नहीं चेते.

फिल्म (ध्वनि समानांतर चित्रों का अपलक प्रक्षेपित अवलोकन) जिसमे किसी भी ऐसे दृश्य का समावेशन नहीं किया जाना चाहिए जो किसी भी प्रकार से दर्शकों को विचलित, असामान्य रूप से उत्तेजित अथवा भयभीत करती हो. यह एक सामान्य मापदंड है. जिसका अनुपालन आजकल की फिल्मो में शायद ही होता है.

आपको शायद याद हो आज से वर्षों पहले बन रही फिल्मों के दृश्यांकन में जिस प्रकार बंदूक की गोलियों से बने घाव, घूंसों की आवाज, बलात्कार के सांकेतिक दृश्य, तथा अन्य हिंसक दृश्यों को जिस प्रकार फिल्माया जाता था उनको देखने से दर्शक असहज नहीं हुआ करते थे, परन्तु  तकनीक के विकास के साथ-साथ उनके परिष्कृत होने से वही दृश्य और भी ज्यादा सजीव होते गए और हमारी संवेदनाएं निर्जीव. आज हम सड़क पर हुए हादसों के दृश्य तुरंत शेयर करने लग जाते हैं बजाये इसके कि उस दुर्घटना की सूचना पुलिस को देने और सहायता के लिए उद्दत होने के. इसका कारण एक मात्र यही है कि हमारा मस्तिष्क आदी हो चुका है ऐसे दृश्यों को देखने/झेलने को, तो इसका जिम्मेवार कौन है? जी सही कहा, हम स्वयं अपनी संवेदनाओं के हत्यारे हैं.

अपने विवेक से काम लें, हिंसा नहीं करें.

जिम्मेवार कौन?

माइनिंग छात्र दामोदर नदी में डुबा, 8 घंटे बाद भी पता नहीं चला. (छाया: राजेश गुप्ता)
दिनांक 19-11-2017 को बेरमो थाना क्षेत्र के अंतर्गत खास ढोरी सी.सी.एल. ऑफिस के समीप पानी टंकी के पास दामोदर नदी में दिन रविवार को नहाने के क्रम में 22 वर्षीय महेश रजक डूब गया. जिसे  खेतको के गोताखोर टीम द्वारा दामोदर नदी में खोजबीन किया जा रहा है.
सांत्वना देते लोग
सांत्वना देते लोग, छाया: राजेश गुप्ता
सूचना प्राप्त होने तक करीब 8 घंटे बीत जाने के बाद भी अब तक उसे खोजा नहीं जा सका है. बताया जाता है कि शारदा कॉलोनी निवासी सीसीएल कर्मी प्रभु रजक का पुत्र महेश रजक अपने क्वार्टर से खास ढोरी पानी टंकी के समीप दामोदर नदी में अपने दो दोस्तों के साथ सुबह 9 बजे नहाने गया था उसी क्रम में नदी के गहराई में जाने के कारण डूब गया.
आखिर क्यों होती हैं ऐसी दुर्घटनाएं? क्या उत्तरदायित्व होता है हमारा?
आखिर क्यों होती हैं ऐसी दुर्घटनाएं? क्या उत्तरदायित्व होता है हमारा? छाया: राजेश गुप्ता 
मौके पर पहुंचे झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के डुमरी विधानसभा क्षेत्र के विधायक श्री जगरनाथ महतो एवं भाकपा नेता श्री जवाहर लाल यादव ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की और उन्हें सांत्वना देते हुए अपनी संवेदना व्यक्त की.
जिम्मेवार कौन?
यह घटना एक प्रश्न चिन्ह है हमारे समाज पर, आखिर क्यों होती हैं ऐसी दुर्घटनाएं? क्या उत्तरदायित्व होता है हमारा? इन सबसे थोडा अलग बात करें तो हम पाएंगे कि इस उम्र वर्ग के युवाओं पर अपनी मनमानी करने की धुन सवार होती है. अभिभावकों के लाख समझाने पर भी वे उनकी एक नहीं सुनते, और अगर गलती से कुछ कह दिया गया तो उलटे उन्ही को सुनने को मिलती है.
हमें आये दिन इस प्रकार कि घटनाओं से दो-चार होना ही पड़ता है. ये लोग इतनी तेज बाइक चलाएंगे वो भी बिना हेलमेट के कि उनको समय को पीछे छोड़ देना हो जैसे. इसी तरह आज का दिन उन पर भरी पड़ गया और नदी में जा डूबे. हमें ऐसे घटनाओं से सबक लेना चाहिए कि हम अपने बच्चों पर नजर रखें उनसे बात करें उनकी सोच और अपनी सोच को एक धरातल पर लायें जेनेरसन गैप को कम करें ताकि हम उनकी सही और उचित आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रख सकें.
सुझाव : नदी में जाल कि व्यवस्था और घेराव से इस प्रकार की दुर्घटनाओं से कुछ हद तक तो बचा जा ही सकता है, पर सब से बड़ी बात है अपने-अपने बच्चों को संस्कारों  के घेरेबंदी में रखना जिससे कि इस प्रकार कि दुर्घटनाओं की नौबत ही न आ सके.