झारखण्ड राज्य में ग्राम सभा सशक्तिकरण : एक सुझाव

झारखण्ड राज्य स्थापना के 17 साल बीतने एवं वर्ष 2010 से त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू हो जाने के बाद भी ग्राम सभा के सशक्तिकरण का कार्य राज सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है. शोध एवं अध्ययन बताते हैं कि आम तौर पर ग्राम सभाओं में गणपूर्त्ति (ग्राम सभा के कुल सदस्यों का 1/10 भाग जिसमें 33% महिला सदस्य का होना जरुरी) नहीं हो पाती है. ग्राम सभा में भागीदारी के प्रमाण स्वरुप घर-घर जा कर ग्राम सभा सदस्यों से ग्राम सभा पंजी में हस्ताक्षर लिए जाने की अदभुत परंपरा विकसित होते जा रही है. जो पंचायती राज व्यवस्था के सारतत्व को ही कुप्रभावित कर जाती है.

 यह सर्वविदित है कि ग्राम सभा में ही विकास की सम्पूर्ण योजनायें परिकल्पित एवं रेखांकित होती हैं, एवं तदनुसार पारित प्रस्तावों के आधार पर कार्यरूप में आती हैं. अतः ग्राम सभा में ग्राम सभा सदस्यों की समुचित भागीदारी एवं उसकी कार्यवाही में पूर्ण पारदर्शिता का होना नितांत आवश्यक है और ऐसा सुनिश्चित कर ही हम ग्राम सभा को सशक्त एवं पंचायती राज व्यवस्था के मूल तत्व को अक्षुण्ण रख सकते हैं.

 इस सन्दर्भ में निम्नांकित सुझावों पर अमल करके हम ग्राम सभा को सशक्त कर सकते हैं-

 सर्वप्रथम, ग्राम सभा आयोजन की तिथि समय एवं स्थान की सूचना देने से सम्बंधित तंत्र को मजबूत करना होगा. सूचना दिए जाने हेतु उपयोग में लायी जाने वाली सामग्रियों यथा- ध्वनि विस्तारक यंत्र, ढोल, हैण्ड-बिल, पोस्टर आदि का प्रयोग समुचित तरीके से किया जाना आवश्यक है. इतना ही नहीं आज अधिकांश ग्राम पंचायतें इन्टरनेट सेवा से जुड़ी हैं. फलतः ग्राम सेवा के प्रचार प्रसार हेतु सोशल साइट्स का उपयोग भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा. इस हेतु प्रत्येक ग्राम पंचायत का फेसबुक पर अपना एक पेज होना जरुरी है, जिससे ग्राम पंचायत के बहुसंख्यक लोग उससे जुड़ कर पंचायतों की क्रियाविधि से अपने को संगत रख सकेंगे.

 दूसरे, ग्राम सभा की सूचना देते समय ग्राम सभा में चर्चा किये जाने वाले मुख्य एजेंडों को प्रचारित किया जाना चाहिए. ऐसा किये जाने से विषयों से सम्बंधित हितग्राही व्यक्ति अपने अन्य कार्यों के ऊपर ग्राम सभा में भाग लेने के कार्य को प्राथमिकता दे सकेंगे एवं परिणास्वरूप ग्राम सभा में सदस्यों की भागीदारी बढ़ेगी.

 तीसरे, ग्राम सभा स्थल भी ग्राम सभा के सदस्यों की भागीदारी को प्रभावित करता है. फलतः सभा स्थल के चयन में पूर्ण सतर्कता एवं गंभीरता बरतनी चाहिए. सभा स्थल का सुरक्षित होना एवं सदस्यों के द्वारा जरुरत पर उपयोग हेतु पेयजल के साथ-साथ महिला-पुरुषों द्वारा उपयोग किये जाने वाले पृथक शौचालयों से युक्त स्थान/भवन श्रेयस्कर माना जाता है.

 चौथे, ग्राम सभा की बैठक आरंभ करने से ठीक पहले, यदि उस ग्राम में पिछली बैठक और वर्तमान बैठक के अन्तराल में कोई असह्य दुर्घटना घटी हो तो उस सन्दर्भ में उस घटना के प्रति शोक संवेदना व्यक्त किया जाना व्यावहारिक प्रतीत होता है. ऐसा किये जाने से लोगों का आपस में संवेदनात्मक जुड़ाव के साथ-साथ सरकारी तंत्र के संवेदनशील एवं मित्रवत होने का जीवंत साक्ष्य मिल सकेगा और वे ग्राम सभा में अपनी-अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने में ज्यादा सहज महसूस कर सकेंगे.

 पांचवें, प्रत्येक ग्राम सभा की शुरुआत एक प्रेरक गीत से की जानी चाहिए जिसमें सामुदायिक गीत की प्रधानता के साथ-साथ अभिवंचित परिवारों के लाभ के प्रति जन सामान्य का सहयोगी रवैया प्रतिध्वनित हो.

 छठे, ग्राम सभा में प्रस्तावों पर चर्चोपरांत लिए गए विधिसम्मत निर्णय का दस्तावेजीकरण ग्राम सभा के दौरान ही होने चाहिए. औपचारिक दस्तावेजीकरण का कार्य ग्राम सभा स्थल से हटकर या अन्य दिनों में नहीं किया जाना चाहिए. ग्राम सभा के प्रति लोगों में विश्वास पैदा करने हेतु यह एक आवश्यक तत्व है.

 ग्राम सभा के सशक्तिकरण हेतु सुझाये गए उपर्युक्त उपायों को व्यवहार में लाकर हम ग्राम सभा को वास्तविक स्वरुप प्रदान करने में सफल हो सकेंगे साथ ही ग्राम सभा को एक नया कलेवर दिया जा सकेगा जो किसी न किसी रूप में आम जनों की उत्तरोत्तर सहभागिता के मार्ग को प्रशस्त करता दिखाई देगा.

 राजेश पाठक
सांख्यिकी पर्यवेक्षक
(झारखण्ड सरकार)
9113150917

GST के बारे में कुछ ज़रूरी बातें : 01

भारत की अप्रत्यक्ष कर संरचना ( Indirect Tax Structure) में सुधार करने हेतु  GST का लाना एक  बहुत बड़ा कदम माना जा रहा है।

जीएसटी एक उपभोग आधारित कर है अर्थात यह कर उस राज्य के द्वारा वसूल किया जाएगा जहा वस्तुओंं एवं सेवाओं का उपभोग किया जाएगा ना कि उस राज्य के द्वारा जहा यह वस्तुए एवं सेवाए निर्मित होंगी। जीएसटी के अंतर्गत अलग-अलग वस्तुओंं एवं सेवाओं पर अलग-अलग दर लागू होंगी। जीएसटी की दरें निर्धारित कर दी गयी हैं।

मूल तौर पर सभी वस्तुओं एवं सेवाओं पर-

  • 0%
  • 5%
  • 12%
  • 18% एवं
  • 28%

विशेष रूप से वैभव की वस्तुओं (luxury items) पर 28% की दर apply होगी।

कुछ वस्तुएं ऐसी भी हैं जो जीएसटी के कर्यक्षेत्र से बाहर रखी गयी हैं। ऐसी वस्तुओं में मुख्य तौर पर –

  • शराब
  • पांच पेट्रोलियम सामग्री जैसे- कच्चा तेल (crude oil), पेट्रोल, डीज़ल, विमानन टरबाइन ईंधन (aviation turbine fuel) एवं प्राकृतिक गैस आदि सम्मिलित है.

ये कर हो जायेंगे गायब 

जीएसटी (GST) के लागू हो जाने पर सभी वस्तुओं एवं सेवाओं पर जीएसटी ही लगेगी अर्थात ज्यादातर अन्य सभी अप्रत्यक्ष करो को कर संरचना से हटा दिया जाएगा। जीएसटी के आने से समाप्त होने वाली राज्य स्तरीय (State level) एवं केंद्र स्तरीय (Central level) टैक्सेज की सूचि कुछ इस प्रकार है:

राज्य स्तरीय कर:

  • वैट (VAT)
  • सेंट्रल सेल्स टैक्स (Central Sales Tax)
  • एंट्री टैक्स एवं ओक्ट्रोई (Entry tax & Octroi)
  • इंटरटेनमेंट टैक्स (Entertainment Tax)
  • टैक्सेज आँन लाटरी, बेटिंग, गम्ब्लिंग (Taxes on lottery, betting, gambling)
  • स्टेट सेस एवं सरचार्ज (State Cess and Surcharge)

केंद्र स्तरीय कर:

  • सर्विस टैक्स (Service Tax)
  • सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी (Central Excise Duty)
  • एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (Additional Excise Duty)
  • एडिशनल ड्यूटी ऑफ़ कस्टम (Additional Duty of Custom)
  • सेंट्रल सेस एवं सरचार्ज (Central Cess and Surcharge)

चूँकि भारत में कर वसूल करने का अधिकार राज्य सरकार एवं केंद्रीय सरकार दोनों को है, जीएसटी को तीन भागो में विभाजित किया गया है:

१) स्टेट जीएसटी (State GST)

२)सेंट्रल जीएसटी (Central GST) एवं

३) इंटीग्रेटेड जीएसटी (Integrated GST)

  • राज्यान्तर्गत (Intra-State )  एक ही राज्य के अन्दर खरीद-बिक्री पर स्टेट जीएसटी एवं सेंट्रल जीएसटी दोनों लागू होंगे जिसे राज्य सरकार एवं केंद्रीय सरकार दोनों एक निर्धारित अनुपात में वसूल करेंगे।
  • अंतर-राज्यीय (Inter-State)  दो या दो से अधिक राज्यों के बीचखरीद एवं बिक्री पर इंटीग्रेटेड जीएसटी लगेगा जो केंद्र सरकार द्वारा वसूल किया जाएगा।

जीएसटी के लाभ – Benefits of GST in India:

भारत की वर्तमान कर-संरचना (Tax Structure) अत्यंत जटिल है। राज्य सरकर एवं केंद्रीय सरकार दोनों के द्वारा कर वसूले जाने की वजह से भारत में अलग-अलग प्रकार के कई कर मौजूद हैं। अलग-अलग करो की मौजूदगी के कारण व्यवसायियों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Service Tax) के आ जाने से इन समस्याओं का काफी हद तक समाधान हो जाएगा।

वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Service Tax) के लागू होने से सरकार एवं साधारण जनता दोनों का फ़ायदा होगा। जीएसटी को लागू करने के पीछे का उद्देश्य इन समस्त लाभों को अर्जित करना है:

  1. व्यापार करने में आसानी

जीएसटी के आ जाने से ज्यादातर सभी अप्रत्यक्ष कर समाप्त हो जाएँगे जिसकी वजह से व्यवसायियों को अब न तो अलग-अलग प्रकार के कर देने पड़ेंगे और ना ही विभिन्न प्रकार के कर विवरणी (Tax Returns) का सामना करना पड़ेगा। अब सभी व्यवसायी केवल एक अप्रत्यक्ष कर, Gst Registration लेकर जीएसटी, का भुगतान करेंगे एवं केवल एक प्रकार का कर विवरणी, जीएसटीआर (GSTR), जमा करेंगे।

  1. टैक्स पर टैक्स व्यवस्था की समाप्ति

वर्तमान समय में उत्पाद कर (Excise Duty) एवं सेवा कर (Service Tax) केंद्रीय सरकार के द्वारा संग्रह किया जाता है और वैट (VAT) एवं सेल्स टैक्स (Sales Tax) राज्य सरकार के द्वारा। जिस वजह से केंद्रीय सरकार को दिये जाने वाले करो का क्रेडिट (Input Tax Credit), राज्य सरकार को दिए जाने वाले करो पर एवं राज्य सरकार को दिए जाने वाले करो का क्रेडिट (Input Tax Credit), केंद्रीय सरकार को दिए जाने वाले करो पर नहीं मिल पाता है। जिस वजह से करो पर कर लग जाते है। परंतु जीएसटी के आ जाने के बाद विभिन्न प्रकार के अप्रत्यक्ष करो के समाप्त हो जाने के कारण करो पर कर लगाने की व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।

  1. कर के बोझ में कमी

वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Service Tax) के लागू हो जाने से ज्यादातर सभी प्रकार के अप्रत्यक्ष कर समाप्त हो जाएँगे और सभी को केवल एक कर, जीएसटी, देना पड़ेगा। इन बदलावों की वजह से कर के बोझ में कमी आएगी।

  1. वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य में कमी

अप्रत्यक्ष कर-संरचना (Tax Structure) में वदलाव एवं विभिन्न प्रकार के अप्रत्यक्ष करो के समाप्त हो जाने की वजह से वस्तुओं एवं सेवाओं पर कर पहले की तुलना में कम लगेगा जिससे वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य में कमी आएगी।

  1. टैक्स की चोरी में कमी

जीएसटी के अंतर्गत कोई भी विक्रेता इनपुट टैक्स क्रेडिट (ख़रीदे हुए सामान पर दिए गये कर का लाभ) तभी उठा सकता है जब वह व्यक्ति जिससे उसने सामान ख़रीदा है, सरकार को अपने हिस्से का कर अदा कर दे एवं उस खरीददार को जिसे वह सामान बेच रहा है इनवॉइस (Invoice) अदा कर दे। अतः यह प्रक्रिया एक श्रृंखला प्रणाली (Chain System) में काम करती है जिससे वर्तमान समय में होने वाली कर की चोरी के समाप्त हो जाने की काफी हद तक संभावना है।

  1. सरकार के करआय में वृद्धि

कर में होने वाली चोरी में कमी आने से केंद्र एवं राज्य सरकार दोनों को काफी फ़ायदा होगा। इसके अलावा अप्रत्यक्ष कर-संरचना (Tax Structure) में सुधार होने से कर-संरचना सरल बन जाएगी जिससे अधिक से अधिक लोग कर देंगे एवं इसकी वजह से सरकार के कर-आय में वृद्धि होगी, जिसका प्रयोग देश की प्रगति के लिए किया जा सकता है।

कोई भी बदलाव चाहे वो हमारे भले के लिए ही क्यों न हो कष्टकारी लगता है। शुरू में GST की वजह से भी समस्याएं आएँगी लेकिन long term में हमे इसके कई फायदे मिल सकते हैं। कुल मिलाकर ये उम्मीद की जा सकती है कि जीएसटी के लागू हो जाने से भारत की अर्थव्यवस्था पर एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है।

(Continue…)

विशेष आलेख :

CA NIRAJ  KUMAR  AGARWAL

(Practicing Chartered Accountant)

KARGALI BAZAR, PHUSRO BERMO.

Mob : 9576117227 / 7004113723

क्यूँ

स्कूल में 1 नवंबर से सर्दी की यूनिफार्म पहन कर जाना होता था. मैं आज के दिन सुबह करीब 11 बजे अपनी यूनिफार्म लेने “युसूफ सराय मार्केट” गया था. जो AIIMS के गेट के सामने ही है. तभी दनदनाती कुछ एम्बुलेंस और कारें AIIMS में दाखिल हुयीं. सब लोग देखने लगे की ऐसा कुआ हुआ है.
मैं भी अपनी यूनिफार्म खरीद अपनी दूकान पर आ गया. वहां पिताजी ने धीमी आवाज में मुझसे कहा की सुना है इंदिरा गांधी को किसी ने गोली मार दी है. सुनकर मैं भी हैरान रहा गया..तब अंदाज लगाया की जरूर उस वक्त AIIMS में इंदिरा जी को लेकर ही आये होंगे.
उस दिन कराची में भारत और पकिस्तान के बीच मैच चल रहा था. वह भी थोड़ी देर में बंद हो गया. दोपहर होते होते अफवाह हकीकत में बदलने लगी. तभी करीब 4 बजे समाचारों में घोषणा हुयी की इंदिरा जी की मृत्यु हो गयी है. लोगों का हुजूम AIIMS के बाहर इकठ्ठा होने लगा. लोगों में आक्रोश था. उनके सब्र का बाँध टूटने लगा था. तभी स्थानीय कॉंग्रेसी नेताओं ने आग में घी का काम किया और लोगों की भावनाओ को हवा दी.
इस आग में दिल्ली एक सप्ताह जलती रही. कई दर्दनाक मंजर मैंने अपनी आँखों से देखे हैं. कारों को जलाना दुकाने लूटना तो आम था. कई सिख भाईओं को जलाकर बहुत बेहरहमी से मार दिया गया. परिवार उजड़ गए उनके. हर तरफ चीत्कार ही चीत्कार थी. टायर जलाकर गले में लटका कर मार देना. घर के अन्दर परिवार को जला देना, महिलाओं से बलात्कार…उफ्फ. करीब 25000 निर्दोष सिखों की हत्या की गयी….
आज 31 अक्टूबर को मैं सभी “शहीद” हुए सिखों को नमन करता हूँ. साथ ही उनके लिए पूर्ण न्याय की मांग करता हूँ. आज 33 साल बाद भी वह लोग न्याय के लिए मारे मारे फिरते हैं. और इस दुष्कर्म के अपराधी आज भी नेता बने मजे से जिंदगी काट रहे हैं. और हम यहाँ 31 अक्टूबर को सिर्फ इंदिरा जी को श्रधांजलि देते हैं ? क्यूँ……….. ?
:साभार
ललित शर्मा जी की फेसबुक पोस्ट
#Indira_Gandhi 

महिला विकास एवं सशक्तिकरण

|| महिला विकास एवं सशक्तिकरण ||

भारत में वैदिक काल से ही यह सर्वस्वीकृत रहा है कि स्त्री पृथ्वी पर नैतिकता, मानवता और सभ्यता के विकास का अपरिमित रही है और तभी से उसे माता, पत्नी और बहन के रूप में आदरणीय माना गया है.

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता |
यत्र एतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वातत्राफला क्रिया ||”

वैदिक वांग्मय में उपलब्ध महिलाओं का गौरवपूर्ण व्यक्तित्व तत्कालीन समाज में उनके पूर्ण विकास का द्योतक है. उस समय उन्हें देवी तुल्य माना जाता था. उनमे ईश्वरीय गुणों कि कल्पना की गई तथा उन्हें वेद-वेदांगो, शास्त्रों, कलाओं का ज्ञान प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार था. गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा एवं घोषा ने ज्ञान के बल पर सम्माननीय स्थान प्राप्त किया. इन्द्रसेन, विश्लय, नमुचि, विपुला आदी जैसीं महिलाएं पारिवारिक व सामाजिक मर्यादाओं का पालन करते हुए शस्त्र विद्या में निपुण हुईं और राष्ट्र रक्षा में सहभागी बनी. वे विदुषी, वीरांगना, तेजस्विनी, वीर पुत्रों की माता होने के साथ-साथ कर्तव्यनिष्ठ अर्धांगिनी, सदगृहिणी और अपनी संतान को संस्कारयुक्त शिक्षा देने वाली प्रथम शिक्षिका भी बनी.

माता के रूप में महिला ही बालक को सुसंस्कृत करती है और उसकी शिक्षा के लिए परिवार में ऐसे वातावरण का निर्माण करती है कि वह भविष्य में भारत का सुयोग्य सुसंस्कृत नागरिक बनता है. महिला गृहिणी, परिवार कि धुरी है, संस्कृति का संरक्षण-संवर्द्धन करने वाली, सृष्टिक्रम को आगे बढाने वाली, समाज को नयी दिशा देने में समर्थ, नर को नारायणी बनाने वाली महिला ही है. आज हम जैसे नागरिक समाज तथा राष्ट्र बनाना चाहते हैं तदनुरूप महिला के समग्र विकास कि चिंता करनी आज की आवश्यकता है.

आज भारत में चतुर्दिक पाश्चात्य प्रभाव दृष्टिगत होता है, प्रत्येक क्षेत्र में चाहे शिक्षा का हो या रहन सहन का हो या संसकारों एवं पहनावे के प्रश्न हों सब ओर पाश्चात्यीकरण हावी है. पश्चिम का अनुकरण करने की होड़ में परिवारों का विघटन हो रहा है. संयुक्त परिवार टूट रहा है, वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है. जीवन मूल्य और आदर्श गायब हो रहे हैं, संस्कृति का क्षरण हो रहा है.

महिला विकास के सन्दर्भ में प्रचलित तीन शब्द- समानता, अधिकार एवं स्वतंत्रता मुख्य रूप से सुनने को मिलता है. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में महिलाओं की स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने भारतीय संविधान में उन्हें पुरुषों के समान अधिकार प्रदान किये और उनकी स्वतंत्र सत्ता कि स्वीकृति दी. तदनुसार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ रही है तथा अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं. ऐसी महिलाओं की संख्या मुट्ठी भर ही है.

संवैधानिक रूप से समाज में महिलाओं कि स्थिति जितनी गौरवपूर्ण सम्मानित और प्रतिष्ठित है वस्तुस्थिति उसके बिलकुल विपरीत है. व्यावहारिक रूप से देखें तो समानता, स्वतंत्रता, महिला विकास का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, दावे किये जा रहे हैं पर देश में घर और बाहर दोनों ही मोर्चों पर नारी पिस रही है. शोषण का शिकार, असुरक्षित तथा हीनता कि भावना से ग्रस्त है. समानता, अधिकार व स्वतंत्रता के नारे देश कि महिलाओं को दिग्भ्रमित करके भटकाव की ओर ले जा रहे हैं और इसका दुष्परिणाम समाज में दिख भी रहा है.

समानता, अधिकार और स्वतंत्रता का भरपूर लाभ लेने के चक्कर में यह भूल जातीं हैं कि ईश्वर ने स्त्री-पुरुष की संरचना भिन्न रखी है. उनके गुण, कर्म, स्वभाव भिन्न हैं, जिस कारण दायित्वों में भिन्नता होना स्वाभाविक है.

मुंशी प्रेमचंद ने अपने एक उपन्यास में लिखा है “पुरुष में नारी के गुण आ जाते हैं तो वह देवता बन जाता है. तथा नारी, यदि पुरुष के गुण अपनाती है तो वह उद्दंड और उच्छ्रंखला हो जाती है.”

सम्पूर्ण वैदिक वांग्मय और हमारी संस्कृति परंपरा के अनुसार नारी सृष्टि की नियामक शिशु सृजनहार माँ है, परिवार की धुरी है तथा एक सहधर्मिणी है. प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा ने संस्कृति के स्वर कहा है, “जब हम भारतीय संस्कृति कि अक्षुण्ण परंपरा को देखते हैं तो स्पष्ट परिलक्षित होता है कि हमारी संस्कृति ने नारी को आत्मरूप की ही नहीं उसके दिव्यात्म रूप को भी ऐसी प्रतिष्ठा प्रदान की जो देश काल के परिवर्तन क्रम से परिवर्तित होते हुए भी अपने मूलरूप में भारतीय जीवन पद्धति में महत्वपूर्ण स्थान रखती है. यह संतति के सिर्फ जन्म देने के कारण उसका महत्व होता तो प्राणी शास्त्र में विज्ञान के विकास में उसकी दिव्यात्मकता खो जाती, अपितु आज भी दिव्यात्म रूप भारतीय संस्कृति में अनेक रूपों में अपनी स्थिति बनाये हुए है, यथा ‘भारत-माता’, ‘धरती-माँ’ राष्ट्रीयता, प्राकृत, सांख्य, वेदांत आदि दर्शनों में तंत्र समाधानों के शक्ति के रूप में ‘राधा’, ‘सीता’ के रूप में, बहन, प्रेयसी के रूप में आदि. संतो का कहना है “ईश्वर को देखना है तो मातृरूप में देखो- ‘मातृदेवो भव’. भारतीय नारी में देश का ही नहीं बल्कि विश्व का भी नेतृत्व करने की क्षमता है.

स्त्री में निहित सप्तशक्तियाँ- ‘कीर्ति श्री वाक् च नारीणाम, स्मृति, मेधा, धृति क्षमा’ |

मानवीय जीवन में जितने सद्गुण हैं, स्त्रीवाचक, स्त्रीलिंग हैं. जैसे भक्ति, शक्ति, निति, मुक्ति, आदि. स्त्रियों का सतीत्व, तेज व पवित्रता ही राष्ट्र की धरोहर है. संसार में ईश्वरीय शक्ति सबसे अधिक स्त्री को ही मिली है. स्त्री को अपना जीवन स्वयं साध्य्मय बनाना होगा. इस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाना होगा कि स्त्री अपना रक्षण करने में स्वयं समर्थ हो. स्त्री अपनी इन सात शक्तियों का चिंतन करते हुए दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती के गुणों को उजागर कर भारत माता के चरणों में समर्पित हों एवं पुरुषों का भी मार्ग दर्शन करे.

ममता श्रीवास्तव,
प्रधानाचार्या
कस्तूरबा श्री विद्या निकेतन
ढोरी, (बोकारो)

चुनने का हक! चुने जाने का नहीं : क्यों?

मेरा मानना है कि जब किसी व्यक्ति में नेतृत्वकर्ता को चुनने की क्षमता विकसित है, ऐसा मान लिया जाता है, तो उसमें नेतृत्व करने की क्षमता से इंकार नहीं किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में जब कोई व्यक्ति को ‘मत देने का संवैधनिक अधिकार’ प्राप्त हो जाता है ठीक उसी समय उसे निर्वाचित होने का भी अधिकार प्राप्त हो जाना चाहिए।

एक तरफ सरकार यह मानती है कि जब कोई भी सामान्य नागरिक 18 वर्ष का हो जाता है तो उसे व्यस्क मताधिकार प्राप्त हो जाता है। इस क्षमता से वह अपने नेतृत्वकर्ता को चुन सकता है, जब कोई व्यक्ति में सही-गलत में अंतर करने की क्षमता इस उम्र में प्राप्त हो गई मान ली जाती है तो उन्हें स्वयं नेतृत्वकर्ता की भूमिका निभाने के लिए अगले न्यूनतम 7 वर्षों तक और किस अनुभव के लिए इंतजार कराया जाता है?

तर्क यह है कि किसी को किसी उद्देश्य के लिए चुनना एक तार्किक एवं अनुभवजन्य विधा है जिसमें स्वयं ही अनुभव एवं आंतरिक/बाह्यज्ञान तथा सकारात्मक परिकल्पना की आवश्यकता होती है और जब हमारा संविधान यह स्वीकार करता है कि किसी खास उम्र (18) वर्ष में लोगों में परिपक्वता एवं अनुभव क्षमता विकसित है तो उन्हें स्वयं के भी उसी उम्र में चुने जाने का अधिकार क्यों नहीं ?

इसलिए यह विषय महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब हम अच्छे-बुरे, देशहित, समाजहित एवं स्वहित आदि में अंतर करने की क्षमता लेकर चयन करने की शक्ति है तो स्वयं के ही उसी उम्र में चुने जाने के अधिकार से क्यों वंचित रहें ? इतना ही नहीं, अगर हम आपराधिक कृत्य की बात करें तो पता चलता है कि अब तो न्यायिक प्रक्रिया एवं व्यवस्था भी बाल अपराध की श्रेणी में मान्य उम्र को और भी घटा देने पर समुचित विचार कर रही है, उसे तो और भी लगने लगा है कि लोगों में परिपक्वता 18 वर्षों से बहुत पहले ही आ जाती है।

दूसरे शब्दों में क्या गलत या फिर क्या सही है इसका निर्णय अब 18 वर्ष से कम उम्र के लोग आसानी से कर लेते है, फलतः बाल अपराधी तभी वे कहलाएंगे जब वे 16 वर्ष तक की उम्र के हैं अर्थात यह मान लेने में हमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि 18 वर्ष की उम्र प्राप्त होते ही हमें व्यस्क मताधिकार प्राप्त हो जाता है एवं हम देश/राज्य के भाग्यविधाता को चुनने में संवैधानिक तौर पर अधिकृत हो जाते हैं।

जो लोग यह तर्क देते हैं कि चुने जाने के लिए राजनीतिक, सामाजिक एवं अन्य परिपक्वता होना बहुत जरूरी है जो कि सामान्यता 25 वर्ष की उम्र होते-होते लोगों को प्राप्त हो जाती है तो उसे चुने जाने हेतु एक अनुभवजन्य योग्यता से संबंधित आधार को उम्मीदवार होने की योग्यता में ही क्यों नहीं शामिल कर लिया जाता है कि व्यस्क मताधिकार की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष प्राप्त करने के बाद कम से कम सात वर्षों तक उन्हें और भी ज्ञानार्जन करना चाहिए ताकि देश/राज्य को परिपक्व एवं अनुभवी नेतृत्वकर्ता मिल सके।

दूसरा तर्क यह है कि जब कोई व्यक्ति 18 वर्ष की उम्र में चुने जाने की वास्तविक क्षमता या फिर योग्यता नहीं प्राप्त करता है अर्थात चुने जाने हेतु वह अपरिपक्व नागरिक है तो फिर उसे देश/राज्य के सही नेतृत्वकर्ता को चुनने में परिपक्व नागरिक कैसे माना जा सकता है। मुझे यह मानने में कोई आपत्ति नहीं कि देश/राज्य के राजनीतिक या अन्य प्रशासन चलाने हेतु योग्यता के साथ-साथ अनुभव भी आवश्यक कारक है तो फिर क्या बिना कोई सक्रिय गतिविधि के ही सिर्फ 25 वर्ष की उम्र प्राप्त हो जाने से उस नागरिक को राजनीति या अन्य मामलों में अनुभवी मान लिया जाना चाहिए जो कि सामान्यतया उसे चुने जाने के अधिकार को संपुष्ट कर देता हो क्योंकि विधानसभा या लोकसभा की सदस्यता प्राप्त करने हेतु तो किसी ढ़ंग के राजनीति या अन्य अनुभवों को तो अनिवार्य नहीं बनाया गया है।

यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि समाज या उसके अंतर्गत गठित किसी संस्था-समूह के अंतर्गत नेतृत्व कर चुके व्यक्ति को ही वृहत्तर नेतृत्व करने का विशेष अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। इससे देश/राज्य को एक अनुभवी नेतृत्वकर्ता प्राप्त हो सकेगा एवं उनके अनुभवों एवं गुणों का लाभ पूरे राज्य/देश को प्राप्त हो सकेगा। यह अपने एवं अन्य देशों की राजनीतिक प्रशासनिक व्यवस्थापकों के लिए हास्यास्पद ही प्रतीत होता है कि बिना किसी सांगठनिक नेतृत्व क्षमता एवं कोरा अनुभव के मात्र सहानुभूति या इससे जुड़े अन्य मापदण्ड अपने देश में नेतृत्वकर्ता के चयन में प्रभावी भूमिका निभाती है जो कि देश एवं राज्य के अपरिपक्व प्रजातंत्र होने के संपूर्ण कारण को परिलक्षित करता है।

उपर्युक्त तथ्यों का अगर हम गहराई से अघ्ययन करें तो पता चलता है कि 18 से 25 वर्षों के बीच जो सात वर्षों का गैप या अंतर, जो चुनने या चुने जाने के बीच है, वह बेमानी है। यह गैप या अंतर यह प्रमाणित करने में सर्वदा विफल है कि उस अंतर से इतनी क्षमता एवं इतनी परिपक्वता आ जाती है जो कि देश/राज्य के नेतृत्व करने के लिए आवश्यक है और उसके विपरीत 18 वर्ष की उम्र में वही क्षमता एकदम नहीं विकसित होती है।

उपर्युक्त संदर्भ में सरकार के पास दो विकल्प रह जाते है जिसमें से आज की बदली हुई परिस्थितियों में एक का चयन किया जाना नितांत आवश्यक हो जाता है। प्रथम तो यह है कि जिस उम्र में कोई नागरिक वयस्कता को प्राप्त करता है एवं लोकसभा/विधानसभाओं के सदस्यों को चुनने का अधिकार प्राप्त करता है तो ठीक उसी वक्त से उसे चुने जाने का भी अधिकार प्राप्त हो जाना चाहिए। दूसरे, यदि चुने जाने में कोई विशेष योग्यता, अनुभव, तर्क या विलक्षणता की आवश्यकता देश एवं राज्य के प्रशासनिक हित में दृष्टिगोचर होता है तो उक्त प्राप्त अनुभव का साक्ष्य संग्रहण हो एवं वस्तुतः चुनाव लड़ने की आवश्यक अर्हताओं में इसे आवश्यक रूप से शामिल किया जाय। इस ढ़ंग के अनुभव एवं क्रियाशीलता के उदाहरण हो सकते है-छात्रा संगठन या अन्य दबाव समूह के सक्रिय कार्यकर्ता या पदाधिकारी, किसी एनजीओ या पदधारी जो समाज या राज्यहित साधने में अपनी उर्जा लगाते है या कोई अन्य राजनीतिक, सामाजिक सांगठनिक अनुभव जो नेतृत्व के गुणों को धारण करता हो। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि यद्यपि दबाव समूह के सदस्यों का राजनीतिक दलों के समान राजनीतिक हित साधने का मुख्य उद्देश्य  नहीं होता है तथापि जब वे किस राजनीतिक दल के आधार पर चुनाव लड़ना चाहें तो उन्हें दबावसमूह के सदस्यों के रूप में सक्रियता समाप्त कर देनी चाहिए ताकि दबाव समूह के सार तत्व को अक्षुण्ण रखा जा सके।

उपर्युक्त दो विकल्पों में किसी भी एक विकल्प का अनुसरण नहीं किया जाना सरकार की अन्य/इतर मनसा को दर्शाता है जिसे आज का आधुनिक समाज सहजता से स्वीकार करने में असहज महसूस कर रहा है।

जनप्रतिनिधियों को चुनने एवं स्वयं जनप्रतिनिधि चुने जाने के बीच के काल को हम अर्धनागरिकता (Half Citizenship) या ‘नागरिकता गैप’ (Citizenship Gap) की संज्ञा दे सकते है क्योंकि उन्हे जनप्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार तो संवैधानिक तौर पर प्राप्त होता है परंतु वे स्वयं जनप्रतिनिधि बनने के प्रत्याशी नहीं हो सकते। जनप्रतिनिधियों की औपचारिक योग्यता को लेकर देश में हमेशा बहस छिड़ती रही है एवं सामान्य तथा विशिष्ट तौर पर इस तर्क को सर्वदा झुठलाते रहा गया है कि उन्हें औपचारिक योग्यता वाला होना चाहिए परंतु यदि उन्हें औपचारिक शिक्षा प्राप्त न भी हो तो इतना तो आवश्यक है ही कि उन्हें समाज में नेतृत्व क्षमता जैसे गुणों का अनुभव होना ही चाहिए जिसकी आवश्यकता स्वीकारी जाती रही है क्योंकि उनकी औपचारिक शैक्षणिक योग्यताओं की कमी को उनके सलाहकार दूर कर देंगे परंतु वे सचिव जिन्हें राजनीतिक अनुभव नहीं होता, जिसका कि किसी भी नेतृत्वकर्ता जनप्रतिनिधि के लिए होना नितांत आवश्यक है, उनके नीति-निर्धारण की प्रक्रिया (Policy Making Process) में समुचित भूमिका अदा नहीं कर सकते।

उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में अगर आवश्यकता हो तो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धाराओं में आवश्यक संशोधनोपरांत लोकसभा/विधानसभा के सदस्य हेतु चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों की आवश्यक अर्हताओं में भले ही औपचारिक शैक्षणिक योग्यता, किसी खास सीमा तक, को समावेशित नहीं किया जाय तथापि राजनीतिक, सामाजिक नेतृत्वकर्ता के रूप में प्राप्त औपचारिक अनुभवों को उनकी अर्हता में आवश्यक रूप से समावेशित किया जाना चाहिए। ऐसा समावेश भले ही हमें प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक जे.एस.मिल द्वारा जनप्रतिनिधि के लिए निर्धारित औपचारिक योग्यता के हूबहू अनुसरण नहीं करता हो तथापि अनुभवजन्य योग्यता का निर्धारण किये जाने से बहुत हद तक उनकी आत्मा के करीब हम अपने को पाते है जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया था कि जनप्रतिनिधियों को चुने जाने के लिए निर्धारित अर्हताओं में उतना तो होना ही चाहिए कि उन्हें सामान्य ज्ञान एवं अंकगणित जैसे व्यावहारिक विषयों का ज्ञान हो ।

उपर्युक्त सुझाए गए उपायों को अगर हम नकार भी देते हैं तो इस संवैधानिक सच से कैसे इंकार किया जा सकता है कि भारतीय संविधान में 61वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जब वयस्क मताधिकार की उम्र सीमा 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गयी थी तब उस वक्त भी निर्वाचित होने के लिए उम्र सीमा 25 वर्ष ही रखी गयी थी जबकि हम तटस्थ भाव से अघ्ययन करें तो उसी वक्त निर्वाचित होने के लिए कम से कम समानुपातिक ढ़ंग से न्यूनतम उम्र सीमा 25 वर्ष से घटाकर 22 वर्ष तो कर ही दी जानी चाहिए थी, जो कि आज तक नहीं हुआ। वास्तव में देखा जाए तो यह विषय अत्यंत ही संवैधानिक महत्व एवं जनहित का है। अब इसे प्रजातांत्रिक दुविधा (Democratic Dilemma) का शिकार होने से बचाने के लिए स्पष्ट जनमत निर्माण की आवश्यकता है।

राजेश कुमार पाठक
प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक, सदर प्रखंड, गिरिडीह, झारखंड
एवं
निदेशक कार्मिक, साहित्य दर्पण तंत्र, गिरिडीह

विकास योजना बनाम विकास प्रशासन : एक विश्लेषण

सरकार द्वारा जिन विकास योजनाओं को मूर्त रूप दिया जाता है उन सारी योजनाओं के निर्माण की रूपरेखा तय किये जाने से लेकर उनको पूर्ण होने तक में वित्तीय अनुशासन (FISCAL DISCIPLINE) का ख़याल रखा जाना परमावश्यक है. जितना यह आवश्यक है कि कोई भी विकास योजना निर्धारित समय सीमा के अन्दर पूर्ण हो, उतना ही इस सन्दर्भ में यह भी आवश्यक है कि वह योजना मूल्य प्रभावी (COST EFFECTIVE) हो. इस हेतु किसी भी योजना के हर स्तर पर कुशल वित्तीय प्रबंधन की जरुरत है. मैंने विकास योजनाओं के निर्माण एवं क्रियान्वयन के उस पक्ष पर बल दिया है जिनपर ध्यान केन्द्रित करने से विकास योजनाओं पर किये जाने वाले व्यय को सिमित कर योजना मद में व्यय की जाने वाली राशी के दोहराव पर भी प्रभावशाली अंकुश लगाया जा सकता है.

अध्ययन एवं सर्वेक्षण से पता चलता है की राज्य सरकार द्वारा विभिन्न विकास मदों में प्रत्येक वर्ष भवनों के निर्माण, ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में पी.सी.सी. पथ के साथ-साथ तालाब-घाटों, जाहेस्थान एवं कब्रिस्तान की घेराबंदी जैसी योजनायें संचालित की जाती हैं जिसमे करोड़ों रुपयों के राशि खर्च होती है. थोडा सा कुशल वित्तीय प्रबंधन कर इन योजनाओं में व्यय की जाने वाली राशि में से जनोपयोगी बचत की जा सकती है.

पहला : एक से अधिक भवन विहीन विभागों के कार्यालय भवनों के निर्माण की  स्थिति में एक ही स्थान पर बनने वाले विभिन्न विभागों के भवनों को पृथक-पृथक आधार तल वाले भवनों के रूप में उनका निर्माण न कर एक ही आधार तल के ऊपर कम से कम एक और भी उपरी तल का निर्माण किया जाना चाहिए एवं आवश्यकतानुसार एक से अधिक विभागों द्वारा उपयोग में लाया जाना चाहिए. इससे भवन निर्माण योजना मद की राशि की बचत होगी. दूसरी ओर आधार तल के छत का निर्माण इस प्रकार की रूप रेखा (DESIGN) वाला हो की उस पर एक से अधिक तल बनाया जा सके. ऐसा करने से आधार तल वाले भू-क्षेत्र की भी बचत होगी.

दूसरा : शहरी एवं ग्रामीण गलियों का वह हिस्सा, जहाँ भरी वाहनों का परिचालन नहीं होता है. जिससे माडल प्राक्कलन के आधार पर 04 इंच पी.सी.सी. पथ ढलाई कराये जाने का वर्तमान प्रावधान है, में आवश्यक बदलाव लाकर भी विकास योजना मद की करोड़ों राशि की बचत की जा सकती है. यह सर्वथा विदित है कि जिन क्षेत्रों /गलियों में भारी या मंझोले वाहनों का परिचालन लगभग शून्य है वहां पी.सी.सी. पता के ढलाई हेतु 03 इंच का प्रावधान किया जाना चाहिए. एकदम ही अन्दर की गलियों में जहाँ लोग पैदल ही चलते है, वहां तो 02 इंच पी.सी.सी. पथ ढलाई से वर्षों तक पथ टिकाऊ बना रहता है. आवश्यकता इस बात की है की प्राथमिकता के आधार पर इन क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिये एवं प्रशासनिक तथा तकनिकी स्वीकृति के दौरान इस संवेदनशील वित्तीय पक्ष (SENSITIVE FINANCIAL ASPECT) का प्रभावी ढंग से अनुकरण भी किया जाना चाहिए.

तीसरे : तालाब-घाटों का निर्माण, जाहेस्थान की घेराबंदी एवं कब्रिस्तान घेराबंदी जैसी योजनाओं के निर्माण में पूर्ण श्रमदान या फिर आंशिक रूप से किसी ख़ास सीमा तक श्रमदान के प्रावधान को अपनाकर भी विकास योजना मद में व्यय की जाने वाली करोड़ों की राशि की बचत की जा सकती है. यह विदित है कि इन योजनाओं के निर्माण का ख़ास धार्मिक एवं सांस्कृतिक पक्ष है. इन योजनाओं के निर्माण के साथ लोगों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक आस्था जुडी रहती है. लोगो की आस्था इस प्रकार की योजनाओं में इतनी जुडी रहती है की कहीं-कहीं सामाजिक संगठन के क्रियाशील सदस्यों द्वारा पूर्ण श्रमदान एवं आपसी लोगों के बीच दान/चंदा द्वारा धन उगाही कर इन योजनाओं का विधिवत निर्माण कर लिया जाता है.

अतः ऐसी योजनाओं के निर्माण में सरकार द्वारा श्रमदान की व्यवस्था की दिशा में समुचित विचार कर योजनाओं के निर्माण में कम से कम योजना लागत के दस से बीस प्रतिशत की राशि तक श्रमदान किये जाने के प्रावधान किया जाना चाहिए. आमजनों के बीच श्रमदान को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सभी श्रम्दाताओं को पचायत या प्रखंड स्तर पर नामित व्यक्तियों द्वारा उस आशय का प्रमाणपत्र दिया जाना चाहिए एवं योजना शिलापट्ट पर भी श्रमदाताओं के नाम अंकित किये जाने चाहिए. ऐसा किये जाने से श्रमदान की प्रवृति में आने वाली क्रांति का उपयोग हम राज्य के अंतर्गत उन क्षेत्रों में भी कर सकेंगे जो आज तक अदृश्य हैं.

चौथे : विकास योजनाओं को निर्धारित समय-सीमा के अन्दर पूर्ण कर लिए जाने से भी हम विकास योजनाओं में होने वाले अतिरिक्त व्यय की बचत कर सकते हैं. कभी-कभी ऐसी स्थिति आती है कि समय पर योजनाओं के निर्माण नहीं होने से योजनाओं के निर्माण-लागत में वृद्धि हो जाती है. इस हेतु सरकारी प्रावधानों के अंतर्गत कार्य-प्राक्कालनों में पुनरीक्षण कर उनका अद्यतीकरण कर बढे संशोधित मूल्य पर कार्य निर्माण कराया जाता है. सरकार को चाहिए कि जब भी कार्य प्राक्कलनों में समय पक्ष (TEMPORAL ASPECT) के चलते हुई मूल्य वृद्धि के आधार पर पुनरीक्षण किया जाना जरुरी हो तो पहले वह इसकी समीक्षा करे कि कार्य में विलम्ब के लिए कौन-कौन से व्यक्ति /पदधारी जिम्मेदार हैं, फिर उसकी समीक्षा कर दायित्व तय करते हुए योजना लागत के अतिरेक की समानुपाती वसूली (PROPORTIONATE RECOVERY OF SURPLUS COST) दोषी व्यक्तियों से करे न कि सरकारी राजस्व से उस अतिरेक मूल्य की पूर्ती की व्यवस्था करे.

उपर्युक्त सुझाये गए उपायों को अपना कर सरकार अपनी विकास योजनाओं में होने वाले व्ययों का कुशल प्रबंधन कर पायेगी एवं योजना व्यय में से होने वाली बचत राशी का उपयोग अन्य आवश्यक क्षेत्रों में कर के विकास प्रशासन (DEVELOPMENT ADMINISTRATION) के लक्ष्य को सहजता से हासिल कर सकती है.

द्वारा
राजेश कुमार पाठक
प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक,
सदर प्रखंड गिरिडीह (झारखण्ड)
पिन कोड : 815301
मोबाइल : 9470177888

नौकरियों में आरक्षण का फादर इन डिसेंडेंट आऊट मॉडल : एक विकल्प

नौकरियों में आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से कमजोर तबकों के साथ-साथ अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के समूहों को समुन्नत एवं सुदृढ़ करना रहा है. परन्तु भारत में वर्तमान आरक्षण प्रणाली से आरक्षण प्राप्त परिवार अधिक समुन्नत एवं सुदृढ़ हो जाते हैं तो वहीँ दूसरी ओर कई ऐसा परिवार है जिन्हें आरक्षण का लाभ प्राप्त भी है तो वे आरक्षण प्राप्त वर्गों से ही प्रतियोगिता में पिछड़ जाते हैं. कारण स्पष्ट है. आरक्षित श्रेणी में आने वाले ढेर सारे परिवार ऐसे हैं जहाँ आरक्षण के आधार पर एक ही परिवार में अर्थात पिता एवं उनके एक से अधिक संतानों को विभिन्न श्रेणियों की नौकरियां प्राप्त हुई है. दूसरी ओर आरक्षित श्रेणियों के ऐसे परिवार बहुतायत संख्या में हैं जहाँ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 एवं 16 के तहत प्राप्त आरक्षण की सुविधाओं का उपयोग करते हुए एक भी श्रेणी की नौकरियां प्राप्त नहीं हो सकी.

परिणाम स्वरूप आरक्षण व्यवस्था के मूलभूत उद्देश्यों कि प्रतिपूर्ति नहीं हो सकी है. साथ ही सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से कमजोर वर्ग एवं अनुसूचित जाति/जनजाति का एक बड़ा तबका अब तक समुन्नत एवं सुदृढ़ नहीं हो पाया है.

दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था से आरक्षित वर्ग का स्वयं ही विभाजन हो गया जिसमे एक वर्ग सुदृढ़ एस.सी./एस.टी./बी.सी. वर्ग एवं दूसरा कमजोर एस.सी./एस.टी./बी.सी. वर्ग का उदय हो गया.

कौन है सुदृढ़ समुन्नत एस.सी./एस.टी./बी.सी. वर्ग?
नौकरियों में आरक्षण का अनवरत लाभ प्राप्त कर एक ही परिवार के विभिन्न सदस्यों में से जब एक सदस्य को नौकरी प्राप्त हुई तो उनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति थोड़ी सुदृढ़ हुई. उस सुदृढ़ता का लाभ उठाते हुए उनके बच्चे भी बहुत आसानी से पिता के समकक्ष या कमतर स्तर की नौकरियां प्राप्त कर लेने में सहज महसूस किये और उनका लाभ उठाते हुए प्रगतिशील एवं समुन्नत होते चले गए. परन्तु ध्यान देने योग्य बाते हैं कि आरक्षण व्यवस्था का मूलभूत उद्देश्य सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से कमजोर माने जाने वाले वर्ग एवं एस.सी./एस.टी. वर्ग का लगभग समरूप उन्नति एवं  विकास रहा है. परन्तु वर्तमान आरक्षण प्रणाली इस उद्देश्य को प्राप्त करने में चूकती रही है.

अगर किसी ख़ास या सामान्य कारणवश एस.सी./एस.टी./बी.सी. वर्ग का एक बड़ा तबका अरक्षण से होने वाले लाभों को अपने में समायोजित कर किसी भी श्रेणी में नौकरियां प्राप्त नहीं कर सका तो इस दिशा में भारतीय संविधान में अनुच्छेद 338, 338 क एवं 340 के अंतर्गत गढ़ित क्रमशः राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग एवं पिछड़ा वर्ग आयोग स्तर पर शोध कर उन वास्तविकताओं की खोज निष्पक्षता के साथ की जानी थी जिसमे आरक्षण से होने वाले वास्तविक लाभों को सभी परिवारों तक पहुचाया जा सकता था.

उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में आरक्षण की मौजूदा प्रणाली में आवश्यक संशोधन कर के मेरे द्वारा सुझाए गए मॉडल ‘फादर इन डिसेंडेंट आऊट’ को अपनाये जाने से संविधान द्वारा, प्रदत्त नौकरियों में आरक्षण की असंगत व्यवस्थाओं से आसानी से निपटा जा सकता है. चाहिए तो सिर्फ दृढ राजनैतिक इच्छाशक्ति और कुछ नहीं.

क्या है ‘फादर इन डिसेंडेंट आऊट’ मॉडल?
सर्वप्रथम यह मॉडल सरकार द्वारा प्रदत्त की जाने वाली सभी प्रकार की नौकरियों को श्रेणियों में विभाजन करता है. यथा श्रेणी ए.बी.सी.डी. आदि. नौकरियों का विभिन्न श्रेणियों में विभाजन सर्वप्रथम प्रत्येक राज्य अपने अपने अधिकारिता वाले नौकरियों में करता है. पुनः प्रत्येक राज्य अपने द्वारा निर्धारित श्रेणियों का फिटमेंट, केन्द्रीय सरकार द्वारा आवंटित की जाने वाली नौकरियों के साथ करता है और तब जाकर राज्य एवं केन्द्रीय स्तर पर प्रदत्त की जाने वाली नौकरियों के श्रेणियों में श्रेणीगत एकरूपता तय की जाती है.

नौकरियों की श्रेणीगत एकरूपता तय कर लिए जाने के बाद आरक्षण प्रदान करने के लिए परम मापक इकाई (Absolute Measurement Unit) तय किया जाता है. इसकी नौकरियों में आरक्षण प्राप्त करने वाले व्यक्ति का पिता होता है. इस मॉडल के अनुसरण करने से जब किसी उम्मीदवार के पिता को आरक्षण का लाभ प्राप्त करते हुए अगर श्रेणी डी. की नौकरी प्राप्त हुई हो तो उनकी संतान (पुत्र/पुत्री) श्रेणी डी. की  नौकरियों में प्राप्त होने वाले आरक्षण के लाभ से बाहर कर दिए जाते हैं. परन्तु इसके विपरीत श्रेणी सी.बी.ए. कि नौकरियों में आरक्षण प्राप्त करने का अवसर विद्यमान रहता है.

इसी प्रकार अगर आवेदक के पिता आरक्षण के आधार पर श्रेणी-सी. की नौकरी प्राप्त कर चुके हों तो उनकी संतान श्रेणी-सी. से, अगर उनके पिता श्रेणी-बी. की नौकरी आरक्षण के आधार पर प्राप्त कर चुके हों तो उनकी संतान श्रेणी-बी. के आरक्षण की श्रेणी से बाहर हो जाते हैं परन्तु उनकी संतानों को क्रमशः बी. एवं ए. श्रेणी की नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलता रहता है.

यहाँ ध्यान देने योग्य बाते हैं कि अगर आवेदक के पिता श्रेणी-ए. की उच्चतम स्तर की नौकरी आरक्षण के आधार पर प्राप्त करते हैं तो उनकी संतान को किसी भी श्रेणी की नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है.

क्या है मॉडल से लाभ?
इस मॉडल को अपनाने से आरक्षण व्यवस्था के लाभों का लगभग समरूप फैलाव एवं विस्तार आरक्षण प्राप्त कर रहे लोगों के बीच होगा एवं उसका लाभ उन परिवारों से हटकर अलग परिवारों में जा सकेगा जो आरक्षण का लाभ उठाते हुए अबतक किसी भी श्रेणी की नौकरी प्राप्त करने में सफल नहीं रहे हो. एक अनुमान के अनुसार यदि यह मॉडल प्रयोग में लाया जाता है तो आने वाले दस वर्षों में सभी आरक्षित संवर्ग परिवारों को किसी न किसी श्रेणी की नौकरियां प्राप्त हो सकेगी एवं सामाजिक शैक्षणिक एवं आर्थिक स्थिति में यथोचित सुधार एवं दृढ़ता आएगी जबकि मौजूदा आरक्षण प्रणाली से आरक्षित संवर्ग के ही सभी योग्य परिवारों में नौकरियां प्रवेश नहीं कर पा रही है.

दूसरे, जब अधिकांश परिवार सामाजिक शैक्षणिक एवं आर्थिक दृष्टि से समुन्नत होगा तो समाज में छुआछूत की बिमारियों एवं गरीबी/ बेरोजगारी के चलते होने वाले अपराधों पर भी स्वयमेव अंकुश लगता दिखेगा.

तीसरे, इस मॉडल को अपनाने जाने से एक ऐसी आदर्श स्थिति भी आयगी, जबकि धीरे-धीरे ही सही परन्तु अधिकांश श्रेणी की नौकरियां आरक्षण की व्यवस्था से मुक्त हो जा सकेगी एवं उन्हें प्राप्त करने के लिए बिना आरक्षण के लाभ लिए सभी संवर्ग के व्यक्ति प्रतियोगिता कर सकेंगे.

चौथे, आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था से समाज में आरक्षित एवं गैर आरक्षित संवर्ग में जो विद्वेष्कारी विभाजन दिखता है, उसका भी सहज अंत हो सकेगा.

राजेश कुमार पाठक
प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
सदर प्रखंड, गिरिडीह.

खरी-खोटी : भाग-१

वास्तविकता यही है कि राजनीति नैतिकता विहीन हो गयी है. मानता हूँ कि राजनीति में कठोर दलीय अनुशासन राजनीतिक तानेबाने को एकसूत्र में बांधे रखने के लिए जरूरी है पर उस राजनीति में भी कम-से-कम आंतरिक लोकतंत्र हो जो उसी राजनीति के शीर्षस्थ निर्णायकों के अहंवाद पर अंकुश रख सके और लोकहित में सर्वमान्य निर्णय की गुंजाइश बची रहे.

पर अफसोस है कि क्या योगी या फिर क्या मोदी?
लोक कल्याणकारी राज्य में आम जनता जब असहाय होती है तो अंतिम विकल्प के रूप में शासन /प्रशासन से आस लगाती है और जब यह आस टूटती नजर आती है तब लोकतंत्र का प्रहरी बना चतुर्थ स्तंभ झंकृत होता है और मदमस्त सत्ता की आंखों के सामने तथ्य को परोसते हुए दायित्व का बोध कराता है तो सत्ता का अहं चोटिल होता है और फिर यहाँ से शुरू हो जाती है -सरकार का प्रेस के साथ खुली जंग!
आजादी के 70साल बीतने के बाद भी तंत्र में स्पष्ट दायित्व की क्यों नहीं सुस्पष्ट श्रृंखला दिखती है.
गोरखपुर की हाल की घटना महज एक मौत नहीं बल्कि संभावनाओं का अंत है.बारंबार
रेल हादसों पर घिसी पिटी प्रतिक्रियाएं मानवीय संवेदनाओं से एक क्रूर मजाक नहीं तो और क्या है?

अवाम सब देखता है.सोचता है .
पर सही निर्णय लेने में देर कर बैठता है.
पर अब जनता जाग चुकी है.
वह अब और हादसों का गवाह बनना नहीं चाहती.
सत्ता से संग्राम तो संग्राम ही सही पर उचित फैसले में अब देर नहीं.