भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए किस अवसर की तलाश है आपको?

छाया : बेरमो आवाज

मकोली स्थित उत्क्रमित विद्यालय के पास बी.आर.सी. भवन से रविवार की सुबह एंटी करप्शन ब्यूरो की धनबाद टीम ने बेरमो प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी महेन्द्र सिंह (फाइल फोटो) को 40 हजार रुपए रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार कर अपने साथ धनबाद ले गई। एसीबी की टीम ने यह कार्रवाई मनबहादुर थापा नामक एक ठेकेदार के शिकायत पर की है। अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार बिल पास करने के एवज में बीईईओ सिंह ने ठेकेदार थापा से डेढ़ लाख रुपए की मांग की थी। पर थापा ने 40 हजार फ़िलहाल देने की बात कही और जिसकी शिकायत थापा ने एसीबी धनबाद की टीम से किया। जिसके बाद एसीबी की टीम रविवार की सुबह मकोली पहुंची, इधर पूर्व निर्धारित समय पर रकम लेकर ठेकेदार थापा भी पहुंचे और जैसे ही  मकोली स्थित बीआरसी भवन में उक्त राशि  बीईईओ महेन्द्र सिंह को दिया, वहीं सादे लिबास में पहले से बैठे एसीबी की टीम ने धर दबोचा। गिरफ्तार महेन्द्र सिंह बेरमो (वन) के प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी हैं तथा इसके पहले नावाडीह में पदस्थापित थे.

कहा जाता है कि दान जितना गुप्त होता है दानी को उतना ही पुण्य प्राप्त होता है और दान जो दिखावे के साथ होता है वह आडम्बर होता है. अब तर्क यह है कि गुप्त दान करने वाले यदि फल की इच्छा और पुण्य मात्र की प्राप्ति से उत्साहित हो कर दान करते हैं तो वह भी लालसा की श्रेणी में आ जाता है और निष्फल हो जाता है. सार यह है कि दान भी एक कर्म है जिस प्रकार आप अन्य कर्मो का साधन करते हैं. यह एक प्रक्रिया है जो आपके सामाजिक उत्तरदायित्व को एक स्थान प्रदान करती है समाज में.

कर्म को प्रधानता उसके नैतिक व आदर्श मूल्य के स्तर पर दिया  जाना चाहिए और इच्छा से व्युत्पन्न अवसाद से स्वयं को दूर रखना चाहिए. इच्छा का होना महत्वपूर्ण न होकर कैसी इच्छा है यह अधिक विचारनीय होना चाहिए. इच्छा कर्म को प्रेरित करती है, सत्कर्म आपके व्यक्तित्व का निर्माण करती है. अवसर आपकी निष्ठा की परीक्षा लेती है, यह नहीं कि अवसर मिला तो आप ईमानदारी का बिगुल बजा रहे और अवसर मिला तो अपना उल्लू भी सीधा करने से नहीं चूके.

यूँ तो अवसर की तलाश सबों को होती है, परन्तु यह कि अवसर प्राप्त होने पर उसको उपयुक्तता के साथ प्रयुक्त भी कर सकें, क्षमता किन्ही विशिष्ट आत्माओं में ही होती है. अवसर का होना किसी विशेष कर्म के निष्पादन के लिए उपयुक्त है अथवा नहीं यह पूर्ण रूप से उसके एकाधिक लाभुकों के संख्या बल से निर्धारित होना चाहिए न कि अपनी क्षमता का अनुचित लाभ लेकर स्वहित साधन कर अनैतिक रूप से प्रयुक्त किया जाये.

आप अफसर थे, आपके स्वयं को सौंपे गए कार्य के प्रति उत्तदायी बना कर पदस्थापित किया गया. उसके बदले में सरकार वह हर लाभ दे रही है जिसके आप पदानुकुल अधिकारी थे. आपने गलत को सही करने के लिए पैसे लेने शुरू किये तो सही लोगों को लगा आप गलत कर रहे हैं. जब आपने सही लोगों को भी पैसे देने के लिए विवश किया तो एक बार फिर उनको लगा कि आप गलत कर रहे हैं. जब कभी शायद आपको विवश किया गया हो गलत करने के लिए तो आप नहीं रुके और न ही रोका अपितु आप अवसर का लाभ प्राप्त करते चले गए. अब ऐसे में यह दिन देखने के लिए तैयार होंगे आप शायद, परन्तु इस घटना से एक बात तो स्पष्ट है कि लोग अब विरोध तो करेंगे.

इन सब बातों से एक और बात निकलती है कि क्या कभी आपने उनकी बातों का मान न रखा हो, और उन्होंने कसम उठा ली हो कि आपको सही जगह पहुंचा देंगे. या फिर वास्तव में वे आपसे और आपके रवैये से त्रस्त हो गए होंगे और आप अपने ही कर्म के जाल में फंस गए. जो भी हो इतना तो पक्का है कि उच्चाधिकारियों ने आपको पकड़ा है, वैसे लोगों ने जिन्होंने शपथ ली है ऐसे ही कर्मो को रोकने की तो आप अपनी शपथ क्यों भूल गए थे, जो आपके संस्थान ने आपको दिलाई हुई थी.

अथ यू.पी.-बिहार उपचुनाव कथा भाषा टीका

मैं घोषित राष्ट्रवादी हूँ। और भाजपा मेरी आशाओं के केंद्र में है जिसका फिलहाल मेरे पास कोई विकल्प उपलब्ध नही है। समान नागरिक संहिता, धारा 370 का निर्मूलन, राम मंदिर निर्माण, हिंदुत्व के पक्ष में खड़े होने का दमखम, छद्म पंथनिरपेक्षता के नाटक से दूरी, लम्बी अवधि की राष्ट्रहित की योजनाओं पर चिंतन और उनका कार्यान्वयन, सुरक्षित सीमाएं, देश के दुश्मनों को मुँहतोड़ जवाब एवं जबरन देश में घुस आये घुसपैठियों की वापसी का प्रयास आदि आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें देर-सबेर भाजपा द्वारा ही अंजाम तक पहुंचाना मुमकिन है। शेष से तो उम्मीद करना ही व्यर्थ है।

अतः गोरखपुर में भाजपा की हार से आहत तो हूँ परन्तु विक्षिप्त नही हूँ कि संगठन को अनाप-शनाप बकूँ। यहाँ जातिवादिता ने हिंदुओं को दो फांड़ में बांट दिया है। अन्यथा शेष सब यथावत है। नेतृत्व अवश्य मंथन कर रहा होगा। मुझे उन पर विश्वास है। अपनी आप जानें। मेरा उत्साह और धैर्य यथावत है।उस पर रत्ती भर भी फ़र्क़ नही पड़ा है। 2019 के बड़े युद्ध सेे पहले सम्भवतः यह झटका भी जरूरी ही था। हम फिर लड़ेंगे और जीतेंगे।

एक बात और पढिये, बोलिये और गुनिये भी, एक मशहूर किस्सा है। एक बार किसी राज्य के राजा ने एक भिखारिन से शादी कर ली। राजा भिखारिन से अत्यंत प्रेम करता था। उसने उसके लिए दासियों की फौज खड़ी कर दी। खाने के लिए रोज 56 पकवान परोसे जाने लगे। सोने के लिए शाही बिछौना लगाया गया। गद्देदार पलँग। हर सुख सुविधा।

लेकिन कुछ दिनों में रानी साहिबा बीमार पड़ने लगी। शरीर से दुबली होने लगी। धीरे धीरे रानी साहिबा ऐसी बीमार पड़ी की बिस्तर पकड़ लिया। राजा ने चिंतित होकर एक से बढ़कर एक वैद्य बुलाए, लेकिन रानी की तबियत ठीक न हो सकी। थक हारकर राजा ने एलान कर दिया जो रानी को ठीक करेगा, उसे मुँह मांगा पुरुस्कार दिया जाएगा। एलान सुनते ही एक बूढ़ा राजा के पास इलाज हेतु पहुंचा। पूरी बात सुनने के बाद बूढ़े ने कहा- महाराज रानी साहिबा का शाही बिछौना हटाकर जमीन पर चटाई लगाई जाए। दासियों को तुरन्त हटा दिया जाए। रानी साहिबा को बासी और बचा खुचा खाना दिया जाए। 7 दिनों बाद में फिर आऊँगा। राजा को बूढ़े की बात सुन बड़ा अचरज़ हुआ। किंतु वैसा ही किआ गया।  7 दिनों के अंदर ही रानी साहिबा टनटनाट होकर , पूर्ण स्वस्थ्य हो गई।

मित्रो फूलपुर, गोरखपुर में भी यही हुआ। योगी ने ताबड़तोड़ काम शुरु किए। भृष्टाचार कम कर दिया। बोर्ड परीक्षा की नकल रोक दी। 80 % सड़को के गड्ढे भर दिए। 14 सालो बाद मोहर्रम बिना हिंसा के बना। होली बिना डर के साये में धूमधाम से मनी। दिवाली पर पहली बार अयोध्या जगमगाया। जंगलराज से मुक्ति मिली। अपराधी बिलो में छुप गए। कैराना में हिन्दू वापसी हुई। योगी जी ने सिर्फ 1 साल में बहुत कुछ दे दिया।बस यही योगी जी आपने गलती कर दी। जिस जनता को 14 साल से भृष्टाचार की आदत पड़ी हो। बच्चों को नकल से पास कराकर भविष्य बनाने की आदत हो। सड़क के गड्डो पर उछलने की आदत लगी हो। जिन्हें मोहर्रम पर हिंसा में अपने घर जलवाने, दुकान तुड़वाने में चैन मिलता हो। डर के साए में दुर्गा विसर्जन, होली की आदत हो। दिवाली पर 14 सालो से सूनी अयोध्या देखने की आदत पड़ी हो। और सबसे बढ़कर योगी जी जिन लोगो को जातियों में बंटकर खुद का, धर्म का, देश का बंटाधार करने की चुल पड़ गई हो। वे लोग तो आपके कामो के बाद बीमार पड़ेंगे ही। नतीजा वोट डालने घरों से ही न निकले। और जो निकले वो अपनी ही बर्बादी की बटन दबा आए। अतः योगी जी राजनीति का लंबा अनुभव होने के नाते, आपसे हाथ जोड़कर निवेदन है, ये राजनीति है। धीरे धीरे बदलाव लाइये। यहां हिन्दुओ को एकदम से ‘घी’ हजम नही होता। उड़ेल दिया फूलपुर, गोरखपुर में। बाकी हम राष्ट्रवादी हमेशा की तरह आपके साथ है।

हाई टेक होली

पर्व त्योहारों को सामूहिक रूप से उल्लास पूर्वक मनाने की हमारी परंपरा रही है। इन दिनों हम अपने सगे-संबंधियों, पड़ोसियों से मिलने उपहार-मिठाई लेकर उनके घर जाया करते थे। छोटे-बड़े के बीच चरण-स्पर्श आशीर्वाद होता, बाकी लोग गले मिलकर बधाईयाँ देते। इस प्रकार सब आनंदित होते! जिनसे वो मिल न पाते, तो मन में दुख होता था। बाद में, मिलने पर शिकायतें हुआ करती थी। सबसे एक साथ जुड़े रहने का कोई साधन भी तो नहीं होता था! 😔 लोग पत्र और greeting cards का सहारा लेते थे।

फिर आया टेलीफोन!
दूर रहने वाले अपनों से सीधा या उनके पड़ोसी के सहयोग से बातें कर पाना संभव हुआ। अपनों से बात कर मन को शांति मिलती; भले इसके लिए पैसे लगते हों और कुछ समय भी लगता था। पर मिलने वाली खुशी अनमोल होती थी।

फिर मोबाइल का आगमन हुआ!
हर घर और फिर हर हाथ में “मोबाइल” आने पर मानों जैसे भौगोलिक दूरियाँ ही समाप्त होने को आईं! बातें करना महँगा होने के कारण सीमित बातें ही होती, पर होतीं जरूर थीं। हमारी खुशियाँ और बढ़ गईं। हम ये ध्यान देते कि किसी अपने से बात करना रह तो नहीं गया!

फिर सोशल मीडिया के समय आया। फेसबुक और ट्विटर पर अपनी बात एकसाथ सब लोगों तक पहुँचाने लगें। one-to-one बातचीत में कमी आई। WhatsApp messenger और इन जैसे कुछ और साधन के आने पर लोग एक-दूसरे से अब तथा कथित “online connected” रहने लगे! इसका लाभ मोबाइल कंपनियों को अधिक होने लगा।

Jio के आने पर हमें और सुविधा उपलब्ध हुई। डाटा सस्ता हुआ और बात करने के अलग से पैसे लगने बंद हो गए। इसके लाभ कुछ सीमित लोगों को ही हुआ। अधिकांश लोग आपस में हमेशा बतियाते रहते या आॅनलाईन वीडियो देखा करते। इसी में पूरा समय निकल जाता है।

अब किसी के पास समय नहीं है किसी अपने से मिलने की!!! 😟 साधन है पर इच्छा नहीं, किसी अपने से बात करने की!!! आम दिनों की तो छोड़ ही दीजिए, सुख-दुख, पर्व त्योहारों में भी एक एकाकीपन अपने पैर पसार रहा है। हमारे अपनों का दायरा, अब हमारे दिल में छोटा होता जा रहा है। अब हम उत्सव सबके साथ नहीं, अकेले ही मनाते हैं।

प्रार्थना है कि ये आपके जीवन का सत्य न हो।

होली की आनंदमयी अनेकानेक शुभकामनाएँ!

क्यों न माने बुरा होली में

होली मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत त्योहार हुआ करता था। सुबह से तेल चुपड़ कर हम निकल जाते पर असली होली खेलती थी हमारे यहाँ की औरतें। जब वे घर से पुआ तल कर बाहर निकलती तो मुहल्ले में बवाल ही मच जाता था। उनकी टोली हर घर जाती, महिलाओं को खदेड़ निकालती। हम बच्चें अपनी-अपनी माँओं के मदद के लिये तैयार, दौड़ कर चापाकल से उनके लिये बाल्टियां भरते थे।

हँसी-ठिठोली होती थी पर क्या मजाल जो कोई पुरुष इन महिला ब्रिगेड को छेड़ देता। उन्हें भी तो मालूम था, एक बोलेंगे तो पलट कर चार सुनायेंगी ये औरतें। खुल कर होली खेलती इन औरतों को देख कर मुझे आजादी महसूस होती थी इस खूबसूरत त्योहार में।

हम कहते थे “बुरा ना मानो होली है” और उन लोगों से भी जाकर गले मिलते थे जो साल भर हमारे दुश्मन रहे। सारे मुहल्ले वाले मिलकर जबरदस्ती गले मिलवा देते थे बाकी दिन कचड़े फेंकने को लेकर लड़ने वाले पड़ोसियों को। दुनिया में कौन सा त्यौहार यह करवाने की ताकत रखता था??

पर फिर देखी बदलते जमाने की होली। मेरे छोटे से शहर में भी हर घर जाने वाली वह टोली खत्म हो गयी। कुछ मुहल्लों में बची है, पर बदलते जमाने ने उसके अस्तित्व को खतरे में ला दिया है।

बड़े शहरों की होली से तो नफरत सा है। बड़ी होली खेलते हैं दिल्ली के लोग, पर बालकनी से। कल मेरी दोस्त को छत से लड़को ने पानी का गुब्बारा फेंक कर मार और वह दर्द से कराह उठी। उन्होंने कहा बुरा ना मानो होली है पर मैंने बिल्कुल बुरा माना और उनके घर के सामने खड़े होकर पूरी खड़ी-खोटी सुनायी।

रस्ते में दो बच्चे अपनी बालकनी से बाल्टी भर पानी उड़ेलने की कोशिश कर रहे थे। उनसे ज्यादा तो बड़ा बाल्टी ही था मानो। मुझे डर लगा की पानी तो पानी पर बाल्टी ही ना गिरा दे किसी के सिर पर। पूरी दिल्ली ही आते-जाते लोगो पर निशाना साधने में लगी है बिना यह सोचे कि अचानक हुये इस हमले से किसी बाइक का बैलेंस बिगड़ सकता है, किसी को चोट आ सकती है, किसी के आंखों में रंग जा सकता है। पर वे सब यही बोलेंगे बुरा ना मानो होली है।

मथुरा की होली में यही कहते हुये लोगों को विदेशी महिलाओ को जबरदस्ती छुते देखा था। वे परेशान थी, चिल्ला-चिल्ला कर मना कर रही थी।

कितनी दयनीय है आपलोगों की होली। आप होली के दिन अपने पड़ोसियों का दरवाजा खटखटाने, उनके साथ दही बड़ा बांटने की ना हिम्मत रखते हैं ना तमीज। आपको तो मालूम भी नहीं है कि बगल के घर में अकेले रह रहे बुजुर्ग दम्पति के चरणों मे आज अबीर डालने वाला कोई नहीं है। पर आप आती-जाती लड़कियों को छेड़ेंगे, किसी को चोट पहुँचा कर होली मनायेंगे, तबले की थाप पर अपने पड़ोसियों के साथ झूमेंगे नहीं ना ही उन विदेशियों को अपने जश्न में शामिल करेंगे, पर पूरी कोशिश रहेगी होली के बहाने गोरी चमड़ी पर हाथ डालने की।

आखिर कब और क्यों आ गयी हमारे यहाँ ऐसी सैडिस्टिक प्लेजर वाली होली कि, लड़कियों को घर से निकलने में डर लगने लगा उस दिन?? हमारी होली ऐसी तो कतई नहीं थी। ऐसी होली बुरा मानने वाली ही है।

यह दुनिया का सबसे रंग-बिरंगा खूबसूरत त्योहार है, जिसे ‘ कोल्डप्ले अपने एल्बम में दिखाता है, जिसकी फ़ोटो अगले दिन हर विदेशी अखबार में आती है और उस त्योहार का वास्तविक स्वरूप बिगाड़ कर अगर आप सोचेंगे कि हम बुरा नहीं मानेंगे तो आप बेवकूफ हैं। हमारा कुछ बहुत अपना था जो खो रहा है। हमें बुरा लगता है। दुःख होता है।

खेलिये पर थोड़ा खुले दिल से, बिना किसी नीचता के। तभी आपको हक हैं कहने का, “बुरा ना मानो होली है।”

होली की सबको शुभकामनायें। 

राष्ट्र भक्ति और हम

शीर्षक के माध्यम से अपनी बात कहने की आजादी चाहता हूँ। राष्ट्र और राष्ट्र भक्ति को हम में से हर एक के जीवन में प्रथम स्थान प्राप्त है, इसमें कोई संदेह नहीं है। पर इसे प्रर्दशित करने के अपने-अपने तरीके हैं। जिस तरह एक सैनिक सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए अपनी राष्ट्र भक्ति प्रर्दशित करता है ठीक उसी तरह एक कवि अपनी कविताओं के माध्यम से, लेखक अपने लेखों के माध्यम से, कलाकार, साहित्यकार व इन जैसे ही सभी अपनी-अपनी विधाओं के माध्यम से राष्ट्र के प्रति अपनी सच्ची कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

इनमें से किसी के बारे यह आकलन किया जाना कि कौन अपने देश के लिए ज्यादा वफादार अथवा समर्पित है, कौन नहीं, सर्वथा अनुचित है। कौन राष्ट्र भक्ति की दौड़ का स्वर्ण पदक विजेता है, इसके निर्णय की कौन से सर्वमान्य सिद्धांत है, पता नहीं। हमारे देश की भी अजीब विडंबना है। बहुत कम ही ऐसे मौके आते हैं जब एक सही विषय के पक्ष में अथवा सही विषय के लिए लोग आंदोलन करते हैं। समय समय पर कुछ स्व्यंभू कबिलाई किस्म के नेता उभरते हैं और हमारी सोच और विचार की सांझी विरासत के साथ जम कर खिलवाड़ करने की कोशिश करते हैं। इनके आयोजित तमाशे में कुछ भीड़ भी होती है जो इनके अनुसार समर्थक होते हैं। इन्हीं तथाकथित समर्थकों की भीड़ इनके आयोजन की सफलता अथवा असफलता की कहानी बयां करती है।

यह बात जब मैंने अपने एक मुसलमान दोस्त से पूछी तो उसने बेबाकी से अपनी बात कही। उसने कहा कि बंटवारे के समय जब हम में से हर एक के पास यह विकल्प मौजूद था कि हम कहां जाएं, हमने इसी माटी में दफ़न होने का विकल्प चुना। वह भी इसलिए कि हमें अपने भाईयों पर जो हिन्दू थे, खुद से ज्यादा भरोसा था। मुझे उसके कथन में सच्चाई की झलक दिखाई दी। लोग चाहे जितना जोर लगा दें, चंद फिरकापरस्त लोगों की नापाक कोशिश हमारे विश्वास की डोर टूटने नहीं देगी।

बाबा आम्टे नगरवासियों का ऐसे मना गणतंत्र दिवस

फुसरो नगर परिषद उपाध्यक्ष कृष्ण कुमार ने अपने चिर-परिचित अंदाज में मनाया गणतंत्र दिवस. 26 जनवरी 2018 को झंडोत्तोलन के पश्चात वे अपने सहयोगियों साथ निकल पड़े उस बस्ती की ओर जहाँ सभी विभिन्न मौकों पर गरीबों को दान देने जाया करते हैं. जी हाँ, आपने सही समझा, बाबा आमटे नगर जिसे पूर्व में कुष्ठ बस्ती के नाम से भी जाना जाता था. वहां के निवासियों के बीच अन्न का वितरण करते हुए उन्होंने अपने गणतंत्र दिवस की शुरुआत की और निकल पड़े सुभाष नगर की ओर जहाँ और भी गरीबों को अन्न का दान किया गया.

हमारे सभ्य समाज में अभी भी एक ऐसा तबका है जो इन अवसरों पर प्रायः ही याद कर लिया जाया करता है. कचरे चुन कर और कभी-कभी भिक्षाटन कर जीवन यापन करने वाले ऐसे ही कुछ गरीबों की बस्ती है, जिसे नाम तो दे दिया गया बाबा आमटे नगर, पर उनके दैनिक जीवन के सर्वजनिक उपयोग की सरकारी महकमो से मिलने वाली सुविधाओं का सदा से अभाव ही रहा है. सी.सी.एल. के लगे बोर्ड पर वहां की जनसांख्यिकी को दर्शाने भर से उनका अपने सामाजिक दायित्व को पूरा समझना आखिर कहाँ की दूरदर्शिता है.

कृष्ण कुमार वहां के लोगों से मिले और उनकी समस्याओं से अवगत हुए और भरोसा दिलाया कि जल्द ही उनके सभी समस्याओं के निवारण के उपाय होंगे. लोगों ने मिलकर सामूहिक रूप से पानी की समस्या से अवगत कराया और कहा कि एक जो पम्पसेट लगा भी है तो उससे पानी पूरा नहीं हो पाता है. वहां पहले से ही गड़े चापाकल पर मोटर लग जाने से पानी की सप्लाई को दुरुस्त किया जा सकता है, इसपर विचार कर जल्द ही इसे मूर्त रूप दिया जायगा जिसके लिए वे हर संभव प्रयास करेंगे.

बताते चलें की अभी हाल ही में फुसरो नगर परिषद द्वारा ओ.डी.एफ. (Open Defection Free) अर्थात खुले में शौच से मुक्ति की दिशा में पहल हुई है, पर बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस बस्ती में अभी तक शौचालय नहीं बन पाया है और लोग अभी भी खुले में शौच के लिए विवश हैं. जो शौचालय है भी उसकी दशा बहुत ही दयनीय है. ऐसे में हमारा तंत्र कैसे गणतंत्र मना पाता है, यह एक विचारनीय तथ्य है.

यह बस्ती हमारे सभ्य समाज के मखमल पर टाट का पैबंद नहीं बल्कि हमारे सामाजिक तंत्र पर एक ऐसा जंग लगा पुर्जा है जो कि सदा ही से ऐसा ही रहने के लिए बसाया गया है ताकि हम अपनी संवेदनाओं को ऐसे अवसरों पर सहलाते रहें और खुद को सामाजिक प्राणी कहलाने का दंभ पालते रहें. कहीं न कहीं कसूर उनका भी है जो यहाँ के निवासी हैं जिन्हें ऐसे ही जीवन यापन करने की विवशता अब सामान्य लगने लगी है.

बच्चों में मोबाइल का बढ़ता उपयोग एवं इसके दुष्परिणाम – डॉ. प्रभाकर कुमार

आज का समय भौतिकवादी, आपसी प्रतिस्पर्धा का, सामाजिक चकाचौंध की एवं सूचना प्रौद्योगिकी का बढ़ना व सहज रूप से मिलना, इंटरनेट सर्वसुलभ होना और कम पैसों में 4G की सुविधा मिल पाना है। बच्चों में अनुकरण करने की प्रवृति अत्यधिक होती है, बच्चे अपने घरों एवं माता पिता के व्यवहारों का अनुकरण कर रहे हैं। आज के माता पिता की शिक्षा व संस्कार ही मर्यादित नहीं रह गए हैं तो हम बच्चों को कितना संस्कारवान बना सकते हैं। बच्चों में मोबाइल की लत घर के संस्कारों से आ रहे हैं। साथ ही घर के वातावरण से जब बच्चे स्कूल या महाविद्यालय जा रहे हैं तो अपने संगी साथियों का प्रभाव एवं उनसे यह उपकरण के प्रयोगों को सीख रहे हैं। कुछ बच्चे घर में माता पिता की नजर से बचकर उनकी मोबाइल पर हाथ साफ कर रहे हैं। बच्चों का बाल मन ऐसा होता है कि वह जल्द ही गुमराह होते या गलत चीजों की आदत जल्द सीखते हैं। मोबाइल की माता पिता की लत बच्चों में स्थानांतरित होना, घर में बच्चों को खेल खेल में मोबाइल हाथ मे दिया जाना, कहीं न कहीं प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी ही कर जाता है।

मोबाइल प्रयुक्त करने की आदत आज के समय अपने उच्चतम स्तर पर है। आजकल बच्चों की शारीरीक अवस्था में बदलाव के चलते तथा बच्चों में यौन जानकारी के प्रति उत्सुकता के कारण भी बच्चे मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग कर रहे हैं। पोर्न साइट पर आसानी से जा रहे हैं, नशे सेवन के लिये एडवांस तरीकों को बच्चे मोबाइल इंटरनेट के सहारे आसानी से सीख पा रहे हैं । बच्चों में आज महंगे एंड्रॉयड मोबाइल सेट अपने पास रखने का क्रेज बढ़ा है। माता पिता से जिद करके वह महंगे मोबाइल की खरीद कर रहे हैं। हालांकि बच्चों का बिना मोबाइल फ़ोन के भी काम हो सकता है। पर आज के समय में बच्चों की जिज्ञासा मोबाइल फोन की ओर उन्मुख है।

दुष्परिणाम- समय से पहले परिपक्व हो रहे हैं, आसानी से इंटरनेट का उपयोग, सारी वर्जनाओं को पार कर पोर्न साइट व यौन सामग्री की खोज में समय व्यतीत करना, पढ़ाई में मन न लगा पाना, एकाग्रता की कमी, आंखों की समस्या, शारीरिक गतिविधि का अभाव, बच्चों का बौद्धिक विकास गलत रास्ते की ओर उन्मुख, समाजीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध, बच्चे एकांत की तलाश करते है ताकि मोबाइल पर अनावश्यक चीजों की सर्फिंग कर पाएं, माता पिता से झूठ बोलने की आदत मे वृद्धि, गलत संगति, समय का दुरुपयोग करना आदि। बच्चों में मोबाइल की आदत- जब बच्चे को मोबाइल की आदत लग जाती है और मोबाइल की सुविधा मिल नही पाती तो चोरी, दूसरे की मोबाइल लेना, इसी में हत्या कर देना। बच्चों में id (“इड” एक मनोवैज्ञानिक शब्दावली, जिसका अर्थ है “दिमाग का वह हिस्सा जिसमें सहज ही आवेग और प्राथमिक प्रक्रियाएं प्रकट होती हैं”. “id”: is a PSYCHOANALYSIS term which means “the part of the mind in which innate instinctive impulses and primary processes are manifest.”) अर्थात बच्चे सिर्फ व सिर्फ अपनी आवश्यकता की पूर्ति चाहते हैं उन्हें वास्तविकता से कोई लेना देना नही होता है। इस लिये बाल मन कोई घृणित कार्य करके भी आवश्यकता की पूर्ति कर जाता है।

कोई सुन रहा है इन बेजुबानों की… और आप?

बिजली के नंगे तारो पर अक्सर पंछियों की बैठक होती है, और इन खतरों से अनजान पंछी कभी कभी बिजली के झटके से घायल भी हो जाया करते हैं। जिन्दगी किसी की भी हो, अनमोल होती है, चाहे वो इंसान हो या फिर जानवर। ये कहना है पेशे से व्यवसायी फुसरो बाज़ार मेन रोड निवासी श्री अंक्ति मित्तल का.

घायल पक्षी के साथ अंकित मित्तल, मेन रोड फुसरो

अक्सर अंकित जब पंछियों को इस प्रकार से घायल होते देखते हैं तो इन नादान परिन्दो से कभी यह सोचकर मुंह नहीं फेरा कि ये बस परिन्दे है, न कोई नाम है इनका, न ही कोई पहचान है इनकी और न कोई पता ही। न कोई पूछताछ होगी इनके मृत् शरीर की। पर अपने कोमल हृदय की आवाज सुनकर आज तक 9 पंछियों को बचाया इन्होंने.

फुसरो सिटी को दिए गए एक्स्क्लूसिव इंटरव्यू में अंकित ने आगे बताया कि यहाँ कोई ऐसी संस्था नहीं जो इस प्रकार के जानवरों अथवा पक्षियों के लिए कोई काम करती हो। साथ ही उन्होंने आशा व्यक्त की कि उनकी कोशिश है लोगों को इसके बारे में जागरूक बनाने की और कुछ समय बाद ही सही लोगों में जागरूकता आयेगी और यूं ही कोई जानवर और पक्षी नहीं मर जाया करेंगे. करते हे कि यह नेक कोशिश आप भी करे क्योंकि यह भी हमारे जीवन का एक अनमोल हिस्सा है.

सच है, इसे कहते हैं मानवता. जरुरी नहीं कि कल से आप भी सिर्फ पक्षियों को बचाने में ही लग जाएँ, पर जरुर आपको ऐसे ही किसी कार्य में स्वयं को सम्मिलित कर ही लेना चाहिए जिसका सामाजिक सरोकार और मानवता, देश-धर्म से सीधा सम्बन्ध हो. आप स्वयं को किसी भी पेशे अथवा परिवेश में पाते हों, अपनी प्राथमिकताओं को सुनिश्चित करें और समाज और देश हित में जो भी बन पड़े जरुर करें.

रिजेक्टेड कोल सेल बनाम सलेक्टेड कोल सेल, हादसा : नरगिस खातून की मौत का जिम्मेवार कौन?

नरगिस खातून की मौत का जिम्मेवार कौन? घटना के बाद प्रबंधन ने रिजेक्ट सेल बंद किया. अवैध वसूली प्रतिमाह करोड़ों में. क्या एक युवती की मौत की कीमत 50 हजार रुपये है?

सी.सी.एल. बी.एंड के. प्रक्षेत्र के करगली वाशरी परियोजना के बालू बैंकर स्थित रिजेक्ट सेल प्वांट में चाल धसने से हुई मौत- नरगिस खातून की मौत का आखिर जिम्मेवार कौन है? बार-बार हो रही घटना के बाद भी आखिर प्रशासन व प्रबंधन चुप क्यों है। बालू बैंकर स्थित रिजेक्ट सेल में अब तक लगभग तीन लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि आधा दर्जन से अधिक लोग घायल हो चुके है। कोयला उठाव को लेकर प्रबंधन के सेफ्टी विभाग आखिर क्या कर रहा था? सुरक्षा मापदंड की धज्जियां उड़ाई जा रही है, घटना के बाद आखिर मामले को क्यो दबाने का प्रयास किया जाता है। पता नहीं चलता है कि रिजेक्ट सेल सी.सी.एल. प्रबंधन चला रही है, या लोकल कमेटी के द्वारा संचालित किया जा रहा है। सच्चाई तो यही है कि स्थानीय ग्रामीण महिला कोयला स्वयं नही चुनती है, बल्कि सेल कमेटी के द्वारा बाहर से लेबर बुलाकर अच्छे क्वालिटी के कोयला को चुनवाया जाता है, जिसको बाद में ट्रक में लोड कर दूसरे स्थान पर भेजा जाता है।

जहाँ शुक्रवार को हुई घटना में नरगिस खातून की मौत हो गयी वहीं एतवारी देवी, व फतिमा खातून गंभीर रूप से घायल हो गयी। इधर यहीं पूर्व में घटी घटना में रिजेक्ट सेल के मापदंड के उल्लंघन के आरोप में पूर्व पी.ओ. ए.एल. सिंह को प्रबंधन के द्वारा चार्जसीट किया है। वहीं पूर्व जी.एम. अनुराग कुमार व पी.ओ. डी. सिंह सेल ऑफिसर एस.के. सिन्हा को स्थानांतरित किया गया था। वहीं वाशरी के दो क्लर्क श्यामलाल सिंह व शरण सिंह राणा को तीन वर्ष पूर्व नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया है। क्या वर्तमान पी.ओ. के ऊपर भी गाज गिर सकती है?

अवैध वसूली का अड्डा बना रिजेक्ट सेल-
रिजेक्ट कोयले के उठाव में नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ायी जाती है। उक्त डिपो से केवल हाईवा के माध्यम से कोयले का उठाव किया जाना है, साथ ही लोडींग पेलोडर से होनी है, लेकिन यहां अनाधिकृत ट्रक मालिकों के द्वारा स्थानिय लोगों से औने-पौने दाम पर चुना हुआ कोयला (Rejected Coal converted to Selected Coal) खरीदा जाता है जो बाहर की मंडियों में महंगे दामो में बेची जाती है। सेल में ट्रक लगाने से लेकर कोयला लेकर निकलने तक कि प्रक्रिया में स्थानीय माफिया तत्व की भूमिका अहम होती है। ट्रक चालकों से बकायदा मोटी रकम की अवैध वसूली की जाती रही है।

रिजेक्ट सेल में प्रतिमाह 72 लाख तक का घालमेल-
सूत्रों की माने तो रिजेक्ट कोल के अवैध वसूली में प्रबंधन, पुलिस, सहित प्रेस प्रतिनिधियो को भी कमेटी के द्वारा मैनेज किया जाता है। यदि प्राप्त आकड़ों की माने तो प्रति दिन करीब 120 ट्रक लोडिंग होती है। प्राप्त सूचना के अनुसार प्रति ट्रक 2 हजार तक की वसूली की जाती रही है, तो उस हिसाब से प्रति दिन 2 लाख 40 हजार की अवैध वसूली की जा रही है. प्रतिमाह लगभग 72 लाख का घालमेल रिजेक्ट सेल में किया जाता है। प्रति दिन 120 ट्रकों की जो लोडिंग होती है उस अवैध वसूली में  दो लोकल कमेटी का हिस्सा होता है।

सी.सी.एल. बी.एंड के. प्रक्षे़त्र के जी.एम. रामविनय सिंह ने कहा कि रिजेक्ट कोल का उठाव पेलोडर से ही करना है। टेंडर लेने वाले संवेदको को इसका अनुपालन हर -हाल में करना होगा।

: लेखक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में संवाददाता हैं , एवं यह उनके निजी विचार हैं.

गम न करें – १०

गम करना बेमानी है. करना है तो जतन करें, जिससे ग़मज़दा लोगों की जिंदगी से गम के बादल दूर हों, और वह भी आपकी जमात में शामिल हो खुश रहना सीख ले.

किसी शायर ने खूब कहा है कि “दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है, औरों का गम देखा तो, मैं अपना गम भूल गया.”

मतलब साफ़ है, गम तो है पर उससे कहीं ज्यादा खुश रहने के बहाने मौजूद है, जरुरत उसको पहचानने भर की है. जब सभी को पता है कि गम से कुछ हासिल नहीं हो सका है किसी को अब तक तारीख़ में तो भला हमें कैसे हासिल हो सकता है.

हम अक्सर ही दूसरों की ख़ुशी का कारण पता करने लग जाते हैं, बजाय इसके कि आप उसकी ख़ुशी में दिल से शामिल हो सकें. आप दूसरों के दुःख में शामिल होते हैं, पर उसमे आप ख़ुशी का अनुभव नहीं कर पाते हैं.

कहा भी गया है चिंता से चतुराई घटे, दुःख से घटे शरीर…

आप तय कर लें, गम करना है कि गम के कारणों को ढूंढ कर उसको ख़ुशी तब्दील करने का जरिया तलाशना है. सबसे बड़ी बात होती है कोशिश, जिसने की नहीं वो गम कर सकता है, वरना कोशिश करने वालों का तो कुदरत भी साथ देती है. हालात जैसे भी हों उसपर तंज कसना और उसका रोना-रोना बहुत आम बात है, ख़ुशी तो इस बात में है कि आप गमगीन भी हैं इस बात का पता औरों को लगता तक नहीं, और आप उसके सामने से गुजर जाते है.

हर हाल में खुश रहना आपको आपके बुरे हाल से निकलने में मददगार होता है बजाय इसके कि आप झख मारते फिरें. अपना रोना कभी न रोयें, इससे लोग आपके गम को कम तो कर नहीं पाएंगे उलटे आपसे और कन्नी काटने लगेंगे. जितना हो सके सरलता से पेश आयें. ऐसा भी नहीं कि डींगे ही मारने लगें.

हमें संतुलित व्यवहार को तरजीह देनी चाहिए. एक मुकम्मल इंसान बनने के रास्ते में मुश्किलें तो आयेंगी, पर उन मुश्किलों को पार करने के लिए ख़ुशी की राह अपनाएं, गम का नहीं. गम नहीं करने से सीधा मतलब है बेकार की चिंता, ऐसा बिलकुल न समझें की चिंतन जरुरी नहीं या सोच जरुरी नहीं, पर गम? उसका इससे कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए, तभी आप चिंतन-मनन-सोच-विचार आदि कर भी पाएंगे.

इसलिए गम न करें, सोचें और शुक्र अदा करें, कि देने वाले ने जो भी आपको दिया है, क्या उतना भी किसी के पास है भी क्या?

जारी….