लवली श्रृंगार स्टोर एण्ड बुटिक भव्य उद्घाटन

लवली श्रृंगार स्टोर एण्ड बुटिक

लवली श्रृंगार स्टोर एण्ड बुटिक
लवली श्रृंगार स्टोर एण्ड बुटिक का उद्घाटन करते हुए सैनिक पब्लिक स्कूल के प्रिंसीपल श्री महेश्वर यादव.

दिनांक 08-12-2017 दिन शुक्रवार को रहीमगंज, मेन रोड फुसरो के सामने नये प्रतिष्ठान “लवली श्रृंगार स्टोर एण्ड बुटीक” का शुभ उद्घाटन सैनिक पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल श्री महेश्वर यादव व भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष समिजुद्दीन जी ने रिबन काट कर किया।

इस अवसर पर प्रतिष्ठान की संचालिका पिंकी मित्तल, महेश अग्रवाल, निखिल अग्रवाल, विकाश अग्रवाल, प्रदीप अग्रवाल, रेखा देवी, मनीषा अग्रवाल, भगवती देवी, पूनम देवी, मो.मुद्सर, प्रिय अग्रवाल आदि उपस्थित थे, तथा सबने मिलकर संचालिका पिंकी अग्रवाल का उत्साहवर्धन किया और बधाईयाँ दीं.

मूल रूप से यह दुकान एक महिला द्वारा चलाया जाने के कारण किसी भी वर्ग अथवा समुदाय की महिलाएं यहाँ निःसंकोच खरीदारी कर सकती हैं. क्योंकि महिलाओं के प्रसाधन से सम्बंधित सामग्रियों को एक महिला बेहतर तौर पर समझ व बता सकती है, यह एक सुलभ बात हो जाती है.

फुसरो ई-पत्रिका पिंकी अग्रवाल के इस प्रयास के साथ है. वास्तव में यह प्रयास आज के युग के मुताबिक इन्टरप्रेन्योरशिप को बढ़ावा देने की राह में एक कदम है. हम उम्मीद कर सकते हैं कि हमारे समाज में इसी प्रकार और भी महिलएं स्वाबलंबी होने की दिशा में आगे आयेंगी. यह कदम उठा कर पिंकी अग्रवाल ने न सिर्फ एक ओर महिलाओं की समाज में सुधरती स्थिति का परिचय दिया है बल्कि साथ ही महिला सशक्तिकरण का एक बेहतर उदाहरण भी प्रस्तुत किया है.

लवली श्रृंगार स्टोर एण्ड बुटिक
महिलाओं के सौन्दर्य प्रसाधन से सम्बंधित साजो-सामान से परिपूर्ण लवली श्रृंगार स्टोर एण्ड बुटिक

यहां बच्चों के लिए खिलोने, महिलाओं के लिए कॉस्मेटिक, लड़कियों के लिए लेगिंस एवं कुर्ती, सभी वर्ग के लिए गिफ्ट आइटम्स उचित मूल्य पर उपलब्ध है।

सफ़ेद आसमान पर हरा चाँद : फुसरो ने मनाई पैगम्बर साहब की जयन्ती

जी हाँ, ईद-ए-मिलादुन्नबी अर्थात पैगम्बर साहब के जन्मदिन के उपलक्ष्य मनाया जाने वाला समारोह. फुसरो शहर में निकले जुलुस में जिस सफ़ेद झंडे का उपयोग किया गया जिसपर हरे चाँद और सितारे लगे थे, ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अमन के आसमान पर खिले हरे चाँद और सितारे मोहमद साहब का पैगाम दे रहे हों कि जब तक चाँद और सितारे रहेंगे इस्लाम यूँ ही अमन और शांति का पैगाम दुनिया को देता रहेगा.

जानें :
मिलादुन्नबी यानी इस्लाम के संस्थापक पैगम्बर मोहम्मद साहब का जन्मदिन रबीउल अव्वल महीने की 12 तारीख को मनाया जाता है। हजरत मोहम्मद साहब का जन्म मक्का (सऊदी अरब) में हुआ था। उनके वालिद साहब का नाम अबदुल्ला बिन अब्दुल मुतलिब था और वालेदा का नाम आमेना था। उनके पिता का स्वर्गवास उनके जन्म के दो माह बाद हो गया था। उनका लालन-पालन उनके चाचा अबू तालिब ने किया।

हजरत मोहम्मद साहब को अल्लाह ने एक अवतार के रूप में पृथ्वी पर भेजा था, क्योंकि उस समय अरब के लोगों के हालात बहुत खराब हो गए थे। लोगों में शराबखोरी, जुआखोरी, लूटमार, वेश्यावृत्ति और पिछड़ापन भयंकर रूप से फैला हुआ था। कई लोग नास्तिक थे। ऐसे माहौल में मोहम्मद साहब ने जन्म लेकर लोगों को ईश्वर का संदेश दिया।

वे बचपन से ही अल्लाह की इबादत में लीन रहते थे। वे कई-कई दिनों तक मक्का की एक पहाड़ी पर, जिसे अबलुन नूर कहते हैं, इबादत किया करते थे। चालीस वर्ष की अवस्था में उन्हें अल्लाह की ओर से संदेश प्राप्त हुआ। अल्लाह ने फरमाया- ‘ये सब संसार सूर्य, चाँद, सितारे मैंने पैदा किए हैं। मुझे हमेशा याद करो। मैं केवल एक हूँ। मेरा कोई मानी-सानी नहीं है। लोगों को समझाओ।’

हजरत मोहम्मद साहब ने ऐसा करने का अल्लाह को वचन दिया। तभी से उन्हें नुबुवत प्राप्त हुई। हजरत मोहम्मद साहब ने खुदा के हुक्म से जिस धर्म को चलाया, वह इस्लाम कहलाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है- ‘खुदा के हुक्म पर झुकना।’
स्रोत : वेबदुनिया हिंदी

आज जिस तरह दुनिया में इस्लाम की बदनामी हो रही है या कुछ चरमपंथी तत्वों द्वारा ऐसा किया जा रहा है, ऐसे में यह बहुत जरुरी हो जाता है कि ऐसे मौकों पर और ऐसे जलसों द्वारा यह बताया जाये कि जो सही मायने हैं इस्लाम के वो क्या हैं. दुनिया का हर वो मुसलमान जो वास्तव में मुसलमान है अर्थात् जिसका इमान मुस्सल्लम है कभी इस्लाम से इतर सोच नहीं सकता, और जो इस्लाम के गलत मायने निकालते/समझाते फिरते हैं वो तो मुसलमान रह ही नहीं जाते.

इसलिए ये कहना कि दुनिया में आतंकवादी मुसलमान होते हैं न कहकर यह कहा जाना चाहिए कि जो मुसलमान आतंकवाद का रास्ता चुनते हैं वो फिर मुसलमान रह ही नहीं जाते जैसे किसी इन्सान ने अगर गलत रास्ता अख्तियार कर लिया तो हमारा समाज उन्हें इन्सान कह सकता है क्या? हम बेजा ही किसी धर्म को ही गलत बता बैठते हैं बगैर सोचे कि उसके बारे में हम जानते भी कितना हैं.

बात अच्छी चीजों के अमल में लाने से जुड़ी होनी चाहिए न कि वो अच्छी बातें हमें कहा से सिखने को मिल रही हैं यह सोचने के.

अक्षय नवमी

अक्षय अर्थात जिसका क्षरण (नाश) न होता हो, तात्पर्य यह है कि अक्षय नवमी के दिन आप जो भी कर्म/आचरण करते हैं उसके प्रतिफल का नाश कभी नहीं होता. ऐसा कहा गया है कि आज के दिन किसी को भी अपशब्द भी नहीं कहना चाहिए और न ही गलती से किसी को कष्ट पहुंचाना चाहिए. इस दिन किये गए दान को जितना हो सके गुप्त रखना चाहिए और इसकी चर्चा कही नहीं करनी चाहिए. इस दिन गुप्त-दान किये जाने की परंपरा है.

इस वर्ष 29 अक्टूबर को अक्षय नवमी मनाई जाएगी. कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को आंवला नवमी या अक्षय नवमी कहते हैं. इस दिन आंवला वृक्ष की पूजा की जाती है, जिससे अखंड सौभाग्य, आरोग्य, संतान और सुख की प्राप्ति होती है. अक्षय नवमी का शास्त्रों में वही महत्व बताया गया है जो वैशाख मास की तृतीया यानी अक्षय तृतीया का है. शास्त्रों के अनुसार अक्षय नवमी के दिन किया गया पुण्य कभी समाप्त नहीं होता. इस दिन जो भी शुभ कार्य जैसे दान, पूजा, भक्ति, सेवा की जाती है उसका पुण्य कई-कई जन्म तक प्राप्त होता है।

आंवला वृक्ष की पूजा और इस वृक्ष के नीचे भोजन करने की प्रथा की शुरुआत करने वाली माता लक्ष्मी मानी जाती हैं. इस संदर्भ में कथा है कि एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण करने आयीं. रास्ते में भगवान विष्णु एवं शिव की पूजा एक साथ करने की इच्छा हुई. लक्ष्मी मां ने विचार किया कि एक साथ विष्णु एवं शिव की पूजा कैसे हो सकती है. तभी उन्हें ख्याल आया कि तुलसी एवं बेल का गुण एक साथ आंवले में पाया जाता है. तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है और बेल शिव को.

आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक चिह्न मानकर मां लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष की पूजा की. पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुए. लक्ष्मी माता ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को भोजन करवाया. इसके बाद स्वयं भोजन किया. जिस दिन यह घटना हुई थी उस दिन कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि थी. इसी समय से यह परंपरा चली आ रही है.

इस दिन अगर आंवले की पूजा करना और आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन बनाना और खाना संभव न हो तो इस दिन आंवला जरूर खाना चाहिए. आंवले का वृक्ष घर में लगाना वास्तु की दृष्टि से भी शुभ माना जाता है. वास्तु शास्त्र के अनुसार पूर्व की दिशा में बड़े वृक्षों को नहीं लगाना चाहिए लेकिन आंवले को इस दिशा में लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है. इस वृक्ष को घर की उत्तर दिशा में भी लगाया जा सकता है.

पूजन विधि
प्रात:काल स्नान कर आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है. पूजा करने के लिए आंवले के वृक्ष की पूर्व दिशा की ओर उन्मुख होकर षोडशोपचार पूजन करें. दाहिने हाथ में जल, चावल, पुष्प आदि लेकर व्रत का संकल्प करें. संकल्प के बाद आंवले के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा की ओर मुख करके ऊँ धात्र्यै नम: मंत्र से आह्वानादि षोडशोपचार पूजन करके आंवले के वृक्ष की जड़ में दूध की धारा गिराते हुए पितरों का तर्पण करें. इसके बाद आंवले के वृक्ष के तने में कच्चे सूत्र लपेटें. फिर कर्पूर या घृतपूर्ण दीप से आंवले के वृक्ष की आरती करें. कुछ ही दिनों में आप पर मां लक्ष्मी की कृपा होने लगेगी।

अक्षय नवमी पूजा मुहूर्त – सुबह 06:43 से दोपहर 12:22 तक
नवमी के दिन महिलाएं सुबह से ही स्नान ध्यान कर आँवला के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में मुंह करके बैठती हैं। इसके बाद वृक्ष की जड़ों को दूध से सींच कर उसके तने पर कच्चे सूत का धागा लपेटा जाता है। तत्पश्चात रोली, चावल, धूप दीप से वृक्ष की पूजा की जाती है।
महिलाएं आँवले के वृक्ष की १०८ परिक्रमाएं करके ही भोजन करती हैं।

कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की नवमी बहुत ख़ास और शुभ मानी जाती है। इस दिन उत्तर भारत और मध्य भारत में अक्षय नवमी या आंवला नवमी का पर्व मनाया जाता है। जबकि दक्षिण और पूर्व भारत में इसी दिन जगद्धात्री पूजा का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन अच्छे कार्य करने से अगले कई जन्मों तक हमें इसका पुण्य फल मिलता रहेगा। धर्म ग्रंथो के अनुसार आंवला नवमी के दिन आंवले के पेड़ पर भगवान विष्णु एवं शिव जी वास करते हैं। इसलिए इस दिन सुबह उठकर इस वृक्ष की सफाई करनी चाहिए। साथ ही इस पर दूध एवं फल चढ़ाना चाहिए। पुष्प अर्पित करने चाहिए और धूप-दीप दिखाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार आंवला नवमी या अक्षय नवमी उतनी ही शुभ और फलदायी है जीतनी की वैशाख मास की अक्षय तृतीया.

छठ : स्त्री-पुरुष समानता का अनुपम प्रतीक

हमारे देश में लोक आस्था का महान पर्व छठ वर्ष में दो बार मनाये जाते हैं. चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाये जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है. निरोगी काया, पारिवारिक सुख समृद्धि व मनोवांछित फल प्राप्ति हेतु मनाया जाने वाला यह पर्व स्त्री एवं पुरुष वर्गों द्वारा सामान रूप से मनाया जाता है. यूँ तो अधिकांश पर्वों में स्त्रियों द्वारा ही उपवास एवं व्रत धारण करने की परंपरा रही है, परन्तु छठ पर्व ही एक ऐसा महत्वपूर्ण पर्व है जिसमे समान रूप से स्त्री एवं पुरुष द्वारा व्रत धारण करने की परम्परा रही है, जो किसी न किसी रूप में स्त्री पुरुष की समानता एवं परस्पर निर्भरता का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है.

इस पर्व में सर्वोच्च आस्था के प्रतीक सूर्य देव की आराधना आतंरिक शक्ति एवं तेज की प्राप्ति हेतु की जाती रही है. सादगी, सफाई एवं निर्विघ्नता इस पर्व के तीन मजबूत कारक हैं जिसे दृष्टिगत रख उपासना की जाती है. गहराई से देखें तो पता चलता है कि इस पर्व का न सिर्फ धार्मिक महत्व है वरन यह लोगों के दिन प्रतिदिन के कार्यव्यवहार में अपनाई जाने वाली सादगी एवं स्वच्छता की अनिवार्यता को भी स्वीकार करता है. यह पर्व सदा सन्देश देते आ रहा है कि हमें स्वच्छता, सादगी व सफाई जैसे मूलभूत मानवीय गुणों को धारण करने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए. ऐसा कहा भी जाता है कि “स्वच्छता का हो रहा निवास जब, बसता है भगवान और वहीँ पे रब”.

यद्यपि, छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक एवं लोककथाएं प्रचलित हैं जिसमे सूर्य पुत्र कर्ण की लोककथा ज्यादा प्रचलित है. एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में कर्ण द्वारा सूर्य की उपासना के साथ हुई. सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने. शक्ति के अनंतिम स्रोत सूर्य को आज भी शक्ति व ऊर्जा का अनंतिम स्रोत माना जाता है एवं उनकी कृपा दृष्टि पाने के लिए समस्त विश्व विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक कार्य व्यवहारों में संग्लग्न रहते आया है.

अब हमें इस सत्य को मानने से इंकार नहीं करना चाहिए कि लोक आस्था से जुड़ा यह महापर्व दिन प्रतिदिन के आचरण में अपनायी जाने वाली महत्वपूर्ण गतिविधियों का केंद्र बनते जा रहा है.

दीपावली की शुभकानाएं

-: दीपावली के शुभ अवसर पर माननीय सांसद गिरिडीह लोकसभा क्षेत्र श्री रविन्द्र कुमार पाण्डेय जी ने दी शुभकामनायें :-

आप सभी को फुसरो ई-पत्रिका के माध्यम से श्रीराम चन्द्र के रावण वधोपरांत अयोध्या लौटने की ख़ुशी में तथा असत्य पर सत्य की जीत के प्रतीक दीपावली के शुभ, मंगल एवं पावन पर्व पर ढ़ेरो हार्दिक शुभकामनाएँ

खुशियाँ आपके कदम चूमे, सुख, शांति एवं समृद्धि प्राप्त हो। इसी कामना के साथ आप सभी को ढेरों हार्दिक बधाई

आप सभी बंधुओ एवं बच्चों से आग्रह होगा की आप त्यौहार आपसी सौहार्द्र पूर्ण वातावरण में शांति पूर्वक मनाएं।

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: निवेदक :
रवीन्द्र कुमार पाण्डेय
सांसद गिरिडीह लोकसभा क्षेत्र
(झारखंड)

-: दीपावली के शुभ अवसर पर आप सबों की शुभकामनायें भी हमें प्राप्त हुईं :-

मुहर्रम

इमाम हुसैन की शहादत की याद में मुहर्रम मनाया जाता है. यह कोई त्योहार नहीं बल्कि मातम का दिन है. इमाम हुसैन अल्लाह के रसूल पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के नाती थे. यह हिजरी संवत का प्रथम महीना है. मुहर्रम एक महीना है, जिसमें शिया मुस्लिम दस दिन तक इमाम हुसैन की याद में शोक मनाते हैं. इस्लाम की तारीख में पूरी दुनिया के मुसलमानों का प्रमुख नेता यानी खलीफा चुनने का रिवाज रहा है. ऐसे में पैगंबर मोहम्मद के बाद चार खलीफा चुने गए. लोग आपस में तय करके किसी योग्य व्यक्ति को प्रशासन, सुरक्षा इत्यादि के लिए खलीफा चुनते थे. जिन लोगों ने हजरत अली को अपना इमाम और खलीफा चुना, वे शियाने अली यानी शिया कहलाते हैं.

मोहम्मद साहब के मरने के लगभग 50 वर्ष बाद मक्का से दूर कर्बला के गवर्नर यजीद ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया. कर्बला जिसे अब सीरिया के नाम से जाना जाता है. वहां यजीद इस्लाम का शहंशाह बनाना चाहता था. इसके लिए उसने आवाम में खौफ फैलाना शुरू कर दिया. लोगों को गुलाम बनाने के लिए वह उन पर अत्याचार करने लगा. यजीद पूरे अरब पर कब्जा करना चाहता था. लेकिन उसके सामने हजरत मुहम्मद के वारिस और उनके कुछ साथियों ने यजीद के सामने अपने घुटने नहीं टेके और जमकर मुकाबला किया. अपने बीवी बच्चों की सलामती के लिए इमाम हुसैन मदीना से इराक की तरफ जा रहे थे तभी रास्ते में यजीद ने उन पर हमला कर दिया. इमाम हुसैन और उनके साथियों ने मिलकर यजीद की फौज से डटकर सामना किया. हुसैन लगभग 72 लोग थे और यजीद के पास 8000 से अधिक सैनिक थे लेकिन फिर भी उन लोगों ने यजीद की फौज के दांत खट्टे कर दिये थे. हालांकि वे इस युद्ध में जीत नहीं सके और सभी शहीद हो गए. किसी तरह हुसैन इस लड़ाई में बच गए. यह लड़ाई मुहर्रम 2 से 6 तक चली. आखिरी दिन हुसैन ने अपने साथियों को कब्र में दफन किया. मुहर्रम के दसवें दिन जब हुसैन नमाज अदा कर रहे थे, तब यजीद ने धोखे से उन्हें भी मरवा दिया. उस दिन से मुहर्रम को इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत के त्योहार के रूप में मनाया जाता है.

मुहर्रम के दस दिनों में बांस, लकड़ी का इस्तेमाल कर तरह-तरह से लोग ताजिया सजाते हैं और ग्यारहवें दिन इसे जुलुस साथ बाहर निकाला जाता है. ये शिया मुस्लिमों का अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का एक तरीका है. लोग इन्हें सड़कों पर लेकर पूरे नगर में घुमाया करते हैं सभी इस्लामिक लोग इसमें जमा होते हैं. इसके बाद इन्हें इमाम हुसैन की कब्र बनाकर दफनाया जाता है. इसके जरिये 60 हिजरी में शहीद हुए लोगों को एक तरह से यह श्रद्धांजलि दी जाती है.

मुख्तलिफ हदीसों, यानी हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के कौल  व अमल से मुहर्रम की पवित्रता व इसकी अहमियत का पता चलता है. ऐसे ही हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने एक बार मुहर्रम का जिक्र करते हुए इसे अल्लाह का महीना कहा. इसे जिन चार पवित्र महीनों में रखा गया है, उनमें से दो महीने मुहर्रम से पहले आते हैं. यह दो मास हैं जीकादा व जिलहिज्ज. एक हदीस के अनुसार अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कहा कि रमजान के अलावा सबसे उत्तम रोजे वे हैं, जो अल्लाह के महीने यानी मुहर्रम में रखे जाते हैं. यह कहते समय नबी-ए-करीम हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने एक बात और जोड़ी कि जिस तरह अनिवार्य नमाजों के बाद सबसे अहम नमाज तहज्जुद की है, उसी तरह रमजान के रोजों के बाद सबसे उत्तम रोजे मुहर्रम के हैं.

सौजन्य: समाचार जगत डॉट कॉम एवं विकिपीडिया

दशहरा – १०

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी,
तृतीयं चन्द्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्,
पंचमं स्क्न्दमातेति 
षष्ठं कात्यायनीति च,
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्,
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः

|| आप सभी को विजयादशमी  की शुभकामनायें ||

आप सभी को टीम phusro.in की तरफ से दशहरा की हार्दिक शुभकामनायें, माँ आप सबकी मनोकामनाओं को पूरा करें. आज के दिन मेले का सपरिवार आनंद उठाएं, हाँ सावधानी का ख़याल रखें, प्रशासन का सहयोग करें ताकि शांतिपूर्ण तरीके से मेला संपन्न हो सके, बच्चों की जेब में नाम व पते की पर्ची रखना न भूले. कम उम्र के बच्चों को ऊँचे झूले इत्यादि से दूर रखें. किसी भी प्रकार की असुविधा होने पर तुरंत मेले में स्थित जन-सूचना केंद्र से संपर्क करें. अफवाहों से बचें. बिना सोचे समझे किसी भी बात पर यकीन करने से पहले तथ्य की पुष्टि करें.

शुभ – दशहरा

प्रस्तुत है ऐसे विशेष लोगों के लिए जो फुसरो से दूर रह रहे हैं और उन्हें अपने घर की याद आ रही है, तो इस दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर वो भी माता के दर्शन करें, और पुण्य के भागी बने.

फुसरो दुर्गा-मण्डप में माता की झांकी

श्री श्री दुर्गा पूजा समिति फुसरो में हर वर्ष की तरह आयोजित दुर्गा पूजा में, माता की झांकी दिखाई गयी. जिसे हजारीबाग के कलाकारों ने मिलकर पूरा किया. यहाँ पहले भी अलग-अलग थीम पर माता की झांकी दिखाई जाती रही है, विगत कुछ वर्षो पहले इसे बंद कर दिया गया था यह बताते हुए की स्थापित मूर्ती की हिलाना नहीं चाहिए. पर विद्वानों ने यह कह इसका खंडन किया की शोभा के रूप में प्रदर्शित मूर्ती और प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ती में बहुत अंतर होता है. झांकी शोभा से सम्बन्ध रखती है तो उस मूर्ती के हिलने-डुलने से कोई परेशानी नहीं. क्योकि पाठ-पूजा तो प्रतिपदा से ही शुरू हो जाती है, जब की मूर्ती तब तक निर्माणाधीन ही होती है. इसलिए झांकी की परम्परा पुनर्स्थापित हो गयी.


सिद्धिदात्री – ९

: : सिद्धिदात्री : :
-: माता के सप्तम रूप के उपासना का मन्त्र :-
सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि,
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी.

माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं.  ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं.  नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है.  इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है.  नवदुर्गाओं में सबसे श्रेष्ठ और सिद्धि और मोक्ष देने वाली दुर्गा को सिद्धिदात्री कहा जाता है.  यह देवी भगवान विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी के समान कमल के आसन पर विराजमान है और हाथों में कमल शंख गदा सुदर्शन चक्र धारण किए हुए है.  देव यक्ष किन्नर दानव ऋषि-मुनि साधक विप्र और संसारी जन सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्र के नवें दिन करके अपनी जीवन में यश बल और धन की प्राप्ति करते हैं.

सिद्धिदात्री देवी उन सभी महाविद्याओं की अष्ट सिद्धियां भी प्रदान करती हैं , जो सच्चे हृदय से उनके लिए आराधना करता है.  नवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा उपासना करने के लिए नवाहन का प्रसाद और नवरस युक्त भोजन तथा नौ प्रकार के फल-फूल आदि का अर्पण करके जो भक्त नवरात्र का समापन करते हैं , उनको इस संसार में धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है.  सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप है , जो सफेद वस्त्रालंकार से युक्त महा ज्ञान और मधुर स्वर से अपने भक्तों को सम्मोहित करती है.  नवें दिन सभी नवदुर्गाओं के सांसारिक स्वरूप को विसर्जन की परम्परा भी गंगा , नर्मदा , कावेरी या समुद्र जल में विसर्जित करने की परम्परा भी है.  नवदुर्गा के स्वरूप में साक्षात पार्वती और भगवती विघ्नविनाशक गणपति को भी सम्मानित किया जाता है.

महागौरी – ८

: : महागौरी : :
-: माता के अष्टम रूप के उपासना का मन्त्र :-
श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बर धरा शुचि:,
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा.

माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है.  दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है.  इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है.  इनकी उपासना से भक्तों को सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं.  नवरात्र के आठवें दिन आठवीं दुर्गा महागौरी की पूजा-अर्चना और स्थापना की जाती है.  अपनी तपस्या के द्वारा इन्होंने गौर वर्ण प्राप्त किया था.  अतः इन्हें उज्जवल स्वरूप की महागौरी धन , ऐश्वर्य , पदायिनी , चैतन्यमयी , त्रैलोक्य पूज्य मंगला शारिरिक , मानसिक और सांसारिक ताप का हरण करने वाली माता महागौरी का नाम दिया गया है.

उत्पत्ति के समय यह आठ वर्ष की आयु की होने के कारण नवरात्र के आठवें दिन पूजने से सदा सुख और शान्ति देती है.  अपने भक्तों के लिए यह अन्नपूर्णा स्वरूप है.  इसीलिए इसके भक्त अष्टमी के दिन कन्याओं का पूजन और सम्मान करते हुए महागौरी की कृपा प्राप्त करते हैं.  यह धन-वैभव और सुख-शान्ति की अधिष्ठात्री देवी है.  सांसारिक रूप में इसका स्वरूप बहुत ही उज्जवल , कोमल , सफेदवर्ण तथा सफेद वस्त्रधारी चतुर्भुज युक्त एक हाथ में त्रिशूल , दूसरे हाथ में डमरू लिए हुए गायन संगीत की प्रिय देवी है , जो सफेद वृषभ यानि बैल पर सवार है.

कालरात्रि – ७

: : कालरात्रि : :
-: माता के सप्तम रूप के उपासना का मन्त्र :-
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता,
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी.
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा,
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी.

माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं.  दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है.  इस दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में स्थित रहता है.  इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है.  अपने महाविनाशक गुणों से शत्रु एवं दुष्ट लोगों का संहार करने वाली सातवीं दुर्गा का नाम कालरात्रि है.  विनाशिका होने के कारण इनका नाम कालरात्रि पड़ गया.  आकृति और सांसारिक स्वरूप में यह कालिका का अवतार यानी काले रंग रूप की अपनी विशाल केश राशि को फैलाकर चार भुजाओं वाली दुर्गा है , जो वर्ण और वेश में अर्द्धनारीश्वर शिव की तांडव मुद्रा में नजर आती है.

इनकी आंखों से अग्नि की वर्षा होती है.  एक हाथ से शत्रुओं की गर्दन पकड़कर दूसरे हाथ में खड़क तलवार से युद्ध स्थल में उनका नाश करने वाली कालरात्रि सचमुच ही अपने विकट रूप में नजर आती है.  इसकी सवारी गंधर्व यानी गधा है , जो समस्त जीवजंतुओं में सबसे अधिक परिश्रमी और निर्भय होकर अपनी अधिष्ठात्री देवी कालरात्रि को लेकर इस संसार में विचरण कर रहा है.  कालरात्रि की पूजा नवरात्र के सातवें दिन की जाती है.  इसे कराली भयंकरी कृष्णा और काली माता का स्वरूप भी प्रदान है , लेकिन भक्तों पर उनकी असीम कृपा रहती है और उन्हें वह हर तरफ से रक्षा ही प्रदान करती है.