सिद्धिदात्री – ९

: : सिद्धिदात्री : :
-: माता के सप्तम रूप के उपासना का मन्त्र :-
सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि,
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी.

माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं.  ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं.  नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है.  इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है.  नवदुर्गाओं में सबसे श्रेष्ठ और सिद्धि और मोक्ष देने वाली दुर्गा को सिद्धिदात्री कहा जाता है.  यह देवी भगवान विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी के समान कमल के आसन पर विराजमान है और हाथों में कमल शंख गदा सुदर्शन चक्र धारण किए हुए है.  देव यक्ष किन्नर दानव ऋषि-मुनि साधक विप्र और संसारी जन सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्र के नवें दिन करके अपनी जीवन में यश बल और धन की प्राप्ति करते हैं.

सिद्धिदात्री देवी उन सभी महाविद्याओं की अष्ट सिद्धियां भी प्रदान करती हैं , जो सच्चे हृदय से उनके लिए आराधना करता है.  नवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा उपासना करने के लिए नवाहन का प्रसाद और नवरस युक्त भोजन तथा नौ प्रकार के फल-फूल आदि का अर्पण करके जो भक्त नवरात्र का समापन करते हैं , उनको इस संसार में धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है.  सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप है , जो सफेद वस्त्रालंकार से युक्त महा ज्ञान और मधुर स्वर से अपने भक्तों को सम्मोहित करती है.  नवें दिन सभी नवदुर्गाओं के सांसारिक स्वरूप को विसर्जन की परम्परा भी गंगा , नर्मदा , कावेरी या समुद्र जल में विसर्जित करने की परम्परा भी है.  नवदुर्गा के स्वरूप में साक्षात पार्वती और भगवती विघ्नविनाशक गणपति को भी सम्मानित किया जाता है.

महागौरी – ८

: : महागौरी : :
-: माता के अष्टम रूप के उपासना का मन्त्र :-
श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बर धरा शुचि:,
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा.

माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है.  दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है.  इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है.  इनकी उपासना से भक्तों को सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं.  नवरात्र के आठवें दिन आठवीं दुर्गा महागौरी की पूजा-अर्चना और स्थापना की जाती है.  अपनी तपस्या के द्वारा इन्होंने गौर वर्ण प्राप्त किया था.  अतः इन्हें उज्जवल स्वरूप की महागौरी धन , ऐश्वर्य , पदायिनी , चैतन्यमयी , त्रैलोक्य पूज्य मंगला शारिरिक , मानसिक और सांसारिक ताप का हरण करने वाली माता महागौरी का नाम दिया गया है.

उत्पत्ति के समय यह आठ वर्ष की आयु की होने के कारण नवरात्र के आठवें दिन पूजने से सदा सुख और शान्ति देती है.  अपने भक्तों के लिए यह अन्नपूर्णा स्वरूप है.  इसीलिए इसके भक्त अष्टमी के दिन कन्याओं का पूजन और सम्मान करते हुए महागौरी की कृपा प्राप्त करते हैं.  यह धन-वैभव और सुख-शान्ति की अधिष्ठात्री देवी है.  सांसारिक रूप में इसका स्वरूप बहुत ही उज्जवल , कोमल , सफेदवर्ण तथा सफेद वस्त्रधारी चतुर्भुज युक्त एक हाथ में त्रिशूल , दूसरे हाथ में डमरू लिए हुए गायन संगीत की प्रिय देवी है , जो सफेद वृषभ यानि बैल पर सवार है.

कालरात्रि – ७

: : कालरात्रि : :
-: माता के सप्तम रूप के उपासना का मन्त्र :-
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता,
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी.
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा,
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी.

माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं.  दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है.  इस दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में स्थित रहता है.  इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है.  अपने महाविनाशक गुणों से शत्रु एवं दुष्ट लोगों का संहार करने वाली सातवीं दुर्गा का नाम कालरात्रि है.  विनाशिका होने के कारण इनका नाम कालरात्रि पड़ गया.  आकृति और सांसारिक स्वरूप में यह कालिका का अवतार यानी काले रंग रूप की अपनी विशाल केश राशि को फैलाकर चार भुजाओं वाली दुर्गा है , जो वर्ण और वेश में अर्द्धनारीश्वर शिव की तांडव मुद्रा में नजर आती है.

इनकी आंखों से अग्नि की वर्षा होती है.  एक हाथ से शत्रुओं की गर्दन पकड़कर दूसरे हाथ में खड़क तलवार से युद्ध स्थल में उनका नाश करने वाली कालरात्रि सचमुच ही अपने विकट रूप में नजर आती है.  इसकी सवारी गंधर्व यानी गधा है , जो समस्त जीवजंतुओं में सबसे अधिक परिश्रमी और निर्भय होकर अपनी अधिष्ठात्री देवी कालरात्रि को लेकर इस संसार में विचरण कर रहा है.  कालरात्रि की पूजा नवरात्र के सातवें दिन की जाती है.  इसे कराली भयंकरी कृष्णा और काली माता का स्वरूप भी प्रदान है , लेकिन भक्तों पर उनकी असीम कृपा रहती है और उन्हें वह हर तरफ से रक्षा ही प्रदान करती है.

कात्यायनी – ६

: : कात्यायनी : :
-: माता के षष्ठम रूप के उपासना का मन्त्र :-
चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दूलवर वाहना,

कात्यायनी शुभंदद्या देवी दानव घातिनि.

माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है.  उस दिन साधक का मन ‘आज्ञा’ चक्र में स्थित होता है.  योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है.  यह दुर्गा देवताओं के और ऋषियों के कार्यों को सिद्ध करने लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुई महर्षि ने उन्हें अपनी कन्या के स्वरूप पालन पोषण किया साक्षात दुर्गा स्वरूप इस छठी देवी का नाम कात्यायनी पड़ गया.

यह दानवों और असुरों तथा पापी जीवधारियों का नाश करने वाली देवी भी कहलाती है.  वैदिक युग में यह ऋषिमुनियों को कष्ट देने वाले प्राणघातक दानवों को अपने तेज से ही नष्ट कर देती थी.  सांसारिक स्वरूप में यह शेर यानी सिंह पर सवार चार भुजाओं वाली सुसज्जित आभा मंडल युक्त देवी कहलाती है.  इसके बाएं हाथ में कमल और तलवार दाहिने हाथ में स्वस्तिक और आशीर्वाद की मुद्रा अंकित है.

स्कन्दमाता – ५

: : स्कन्दमाता : :
-: माता के पंचम रूप के
उपासना का मन्त्र :-
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया,
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी.

नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है.  मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं.  माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं.  श्रुति और समृद्धि से युक्त छान्दोग्य उपनिषद के प्रवर्तक सनत्कुमार की माता भगवती का नाम स्कन्द है.  अतः उनकी माता होने से कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री देवी को पांचवीं दुर्गा स्कन्दमाता के रूप में पूजा जाता है.

नवरात्रि में इसकी पूजा-अर्चना का विशेष विधान है.  अपने सांसारिक स्वरूप में यह देवी सिंह की सवारी पर विराजमान है तथा चतुर्भज इस दुर्गा का स्वरूप दोनों हाथों में कमलदल लिए हुए और एक हाथ से अपनी गोद में ब्रह्मस्वरूप सनत्कुमार को थामे हुए है.  यह दुर्गा समस्त ज्ञान-विज्ञान , धर्म-कर्म और कृषि उद्योग सहित पंच आवरणों से समाहित विद्यावाहिनी दुर्गा भी कहलाती है.

कूष्मांडा – ४

: : कूष्मांडा : :
-: मां के चतुर्थ रूप के उपासना का मंत्र :-
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च,
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे.

नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है.  इस दिन साधक का मन ‘अदाहत’ चक्र में अवस्थित होता है. त्रिविध तापयुत संसार में कुत्सित ऊष्मा को हरने वाली देवी के उदर में पिंड और ब्रह्मांड के समस्त जठर और अग्नि का स्वरूप समाहित है.  कूष्माण्डा देवी ही ब्रह्मांड से पिण्ड को उत्पन्न करने वाली दुर्गा कहलाती है.  दुर्गा माता का यह चौथा स्वरूप है.  इसलिए नवरात्रि में चतुर्थी तिथि को इनकी पूजा होती है.

लौकिक स्वरूप में यह बाघ की सवारी करती हुई अष्टभुजाधारी मस्तक पर रत्नजड़ित स्वर्ण मुकुट वाली एक हाथ में कमंडल और दूसरे हाथ में कलश लिए हुए उज्जवल स्वरूप की दुर्गा है.  इसके अन्य हाथों में कमल , सुदर्शन , चक्र , गदा , धनुष-बाण और अक्षमाला विराजमान है.  इन सब उपकरणों को धारण करने वाली कूष्मांडा अपने भक्तों को रोग शोक और विनाश से मुक्त करके आयु यश बल और बुद्धि प्रदान करती है.

चन्द्रघंटा – ३

: : चन्द्रघंटा : :
-: मां के तृतीय रूप के उपासना का मंत्र :-
पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता,
प्रसादं तनुते मह्यां चन्द्रघण्टेति विश्रुता.

शक्ति के तीसरे रूप में विराजमान चन्द्रघंटा मस्तक पर चंद्रमा को धारण किए हुए है. माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है. नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है. इस दिन साधक का मन ‘मणिपूर’ चक्र में प्रविष्ट होता है. नवरात्र के तीसरे दिन इनकी पूजा-अर्चना भक्तों को जन्म जन्मांतर के कष्टों से मुक्त कर इहलोक और परलोक में कल्याण प्रदान करती है.

देवी स्वरूप चंद्रघंटा बाघ की सवारी करती है. इसके दस हाथों में कमल , धनुष-बाण , कमंडल , तलवार , त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र हैं. इसके कंठ में सफेद पुष्प की माला और रत्नजड़ित मुकुट शीर्ष पर विराजमान है. अपने दोनों हाथों से यह साधकों को चिरायु आरोग्य और सुख सम्पदा का वरदान देती है.

ब्रह्मचारिणी – २

-: : ब्रह्मचारिणी : :-
-: मां के द्वितीय रूप के उपासना का मंत्र :-
या देवी सर्वभूतेषु सृष्टि रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै
नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम:

दुर्गा जी के दूसरे रूप का नाम ब्रह्मचारिणी है.  नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है.  साधक इस दिन अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं.

ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली.  इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली.  सच्चिदानंदमय ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति करने वाली विद्याओं की ज्ञाता ब्रह्मचारिणी इस लोक के समस्त चर और अचर जगत की विद्याओं की ज्ञाता है.

इनका स्वरूप सफेद वस्त्र में लिपटी हुई कन्या के रूप में है, इनके एक हाथ में अष्टदल कमल की माला और दूसरे हाथ में कमंडल विराजमान है. यह अक्षयमाला और कमंडल धारिणी ब्रह्मचारिणी नामक दुर्गा शास्त्रों के ज्ञान और निगमागम तंत्र-मंत्र आदि से संयुक्त है.  अपने भक्तों को यह अपनी सर्वज्ञ संपन्नन विद्या देकर विजयी बनाती है.

शैलपुत्री – १

-: : शैलपुत्री : :-
-: मां के प्रथम रूप के उपासना का मंत्र :-
|| या देवी सर्वभूतेषु प्रकृति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम: ||

दुर्गाजी के पहले रूप को ‘शैलपुत्री’ के नाम से जाना जाता है.  शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण नवदुर्गा का सर्वप्रथम स्वरूप ‘शैलपुत्री’ कहलाया है.   ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं. नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है. पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के स्वरूप में साक्षात शैलपुत्री की पूजा देवी के मंडपों में प्रथम नवरात्र के दिन होती है.

इनके एक हाथ में त्रिशूल , दूसरे हाथ में कमल का पुष्प है.  यह नंदी नामक वृषभ पर सवार संपूर्ण हिमालय पर विराजमान है.  यह वृषभ वाहन शिवा का ही स्वरूप है.  घोर तपस्चर्या करने वाली शैलपुत्री समस्त वन्य जीव जंतुओं की रक्षक भी हैं.  शैलपुत्री के अधीन वे समस्त भक्तगण आते हैं , जो योग, साधना, तप और अनुष्ठान के लिए पर्वतराज हिमालय की शरण लेते हैं.

जम्मू – कश्मीर से लेकर हिमांचल पूर्वांचल नेपाल और पूर्वोत्तर पर्वतों में शैलपुत्री का वर्चस्व रहता है.  आज भी भारत के उत्तरी प्रांतों में जहां-जहां भी हल्की और दुर्गम स्थलों में आबादी है , वहां पर शैलपुत्री के मंदिरों की पहले स्थापना की जाती है , उसके बाद वह स्थान हमेशा के लिए सुरक्षित मान लिया जाता है. कुछ अंतराल के बाद बीहड़ से बीहड़ स्थान भी शैलपुत्री की स्थापना के बाद एक सम्पन्न स्थल बल जाता है.

विशेष : इस वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में अर्थात शारदीय नवरात्र का शुभ मुहूर्त दिनांक 21 सितम्बर 2017 दिन बृहस्पतिवार को प्रातः 6 बजकर 3 मिनट से 8 बजकर 22 मिनट तक रहेगा तथा अभिजीत मुर्हूत 11.36 से 12.24 बजे तक रहेगा.