सोच की आजादी

हमारा सम्पूर्ण जीवन हमारे विचारों के द्वारा नियंत्रित होता है | हमारे जैसे विचार होते हैं , हमारी जैसी सोच होती है ; हमारी जैसी चिंतन धारा होती है ; वैसी ही हमारी प्रवृति होती है | जैसी प्रवृति होगी व्यवहार ठीक उसी के अनुकूल होगा ;व्यवहार के अनुरूप ही हमारे जीवन का निर्माण होता है | निष्कर्षतः मनुष्य का समग्र जीवन उसकी सोच व विचारधाराओं के गीर्द ही घूमती है | अब देखने की जरूरत यह है कि व्यक्ति की विचारधारा कैसी है ? यदि व्यक्ति सकारात्मक विचारों का स्वामी है तो उसके जीवन में पवित्रता स्थाई रूप से रहेगी | विचारधार दूषित है तो जीवन भी दूषित हो जाता है | नदी किनारे एक कुंभकार मिट्टी को आकार दे रहा था | वह मिट्टी से चिलम बना रहा था | अचानक उसके विचार बदले और उसने चिलम की जगह घड़ा बनाना शुरू कर दिया | पास बैठी कुम्हारिन ने पूछा मिट्टी का आकार क्यों बदल गया ? कुम्हार ने कहा कि बस यूँ ही मेरा विचार बदल गया | माटी ने तत्तक्षण कहा तुम्हारे विचार क्या बदले मेरा तो संसार ही बदल गया |

वस्तुतः किसी व्यक्ति के जीवन की ऊँचाई उसके नजरिये की ऊँचाई पर निर्भर करती है | यदि सोच स्वस्थ है तो व्यक्ति का जीवन मानवता का आदर्श बन जाता है और सोच यदि नकारात्मक है तो पूरी मानव जाति के लिए कलंक बन जाता है हम चाहें तो अच्छे नजरिये के बल पर अपने भीतर सकारात्मकता को प्रकट कर अपने जीवन में अहोभाव का अलग आनंद उत्पन्न कर अभिनव उल्लास की अभिव्यक्ति कर सकते हैं |

सोच तीन प्रकार की मानी गई है – भौतिक सोच व्यवहारिक सोच व  आध्यात्मिक सोच |

भौतिक सोच वाले व्यक्ति भोगवादी मनोवृति से ग्रसित होने के कारण इनके जीवन में दुखों का अम्बार लग जाता है | भौतिक सोच मनुष्य की चिंतनधारा को संकीर्ण बना देती है | ऐसे लोग स्वार्थी मनोवृति के धारक बन जाते हैं,

व्यावहारिक सोच में जीने वाले लोग इस बात के प्रति सजग रहते हैं कि उनके किसी बर्ताव से सामने वाला आहत न हो बल्कि विशेष रूप से प्रभावित हो |

सर्वश्रेष्ठ सोच अध्यात्मिक सोच को माना गया है | अध्यात्मिक सोच से प्रभावित व्यक्ति बुराई में भी अच्छाई ढूँढ लेता है | वह दूसरों पर दोषारोपण की जगह स्वयं को उस हालात में स्थापित कर सूक्ष्मता से विचार करता है | राम और रावण के अंतर का कारण क्या था राम अध्यात्मिक सोच से भरे थे , उनका त्यागमय और मार्यादित जीवन ही उन्हें ईश्वरत्व की महिमा से मंडित कर दिया | जबकि रावण की भौतिक सोच ही उसे संसार में घृणा का पात्र बना दिया | यह अतीत में राम और रावण की घटना ही नहीं आज भी एसा ही होता है |

सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति अपनी चिंतनधारा व प्रर्वृति के बल पर अपने जीवन का उत्कर्ष कर लेता है और जीवन को मंदिर बना लेता है |

प्रभावशाली व ऐतिहासिक व्यक्ति वही माना गया है जिसकी सोच स्वतंत्र रही है | जो किसी की थोपी गई विचारधारा को अपने जीवन का मार्ग नहीं बनाता बल्कि अपने जीवन की इमारत की भव्यता स्वयं गढ़ता है और अखंड विश्वास के साथ लक्ष्य को प्राप्त कर इतिहास रचता है | कहा भी गया है सुने सबकी, करें वही, जिसकी अनुमति आपकी आत्मा देती हो | आत्मा की आवाज सुन कर अपने जीवन को गति देनें वाला प्राणी कभी भी असफलता का न तो मुख देखता है न ही हताशा, निराशा व अवसाद का शिकार होता है , प्रारब्ध को ही अपने जीवन का श्रेष्ठ परिणाम समझ प्रफुल्लित मन से स्वीकार कर लेता है | हाँ , जीवन पथ संघर्ष व चुनौतियों भरे अवश्य होंगे किन्तु आजाद चिंतन वाले व्यक्ति कभी विचलित नहीं होते | स्वतंत्र चिंतन, मनन मंथन ही श्रेष्ठ व सत्य मार्ग दिखलाने का कार्य करता है | स्वतंत्र व सम्यक चिंतन से जुड़ने की कोशिश हमारे जीवन में सार्थक उपलब्धियाँ अर्जित कराता है हमारे सफल संतुष्ट जीवन का मूलाधार हमारी सोच की धुरी पर केन्द्रित है |

कुछ नया करने का साहस और जुनून आजाद ख्याल की टोलियों में पाए जाने वाले कुछ चुनिंदे लोगों में ही होते हैं , ऐसे लोग न आग से खेलने में घबराते हैं न ही झुलस जाने के परिणाम की चिंता करते हैं | निश्कर्षतः ऐसे व्यक्ति जमाने की परवाह किए बिना एक ऐसी लकीर खींच डालते हैं जिसे भावी पीढ़ी मिटा तो नहीं पाती बल्कि उस पथ की अनुगामिनी अवश्य हो जाती है | ऐसे ही विरले लोग खुले आसमान में ऊँची उड़ान तय करते हैं , सपनों में मनचाहा रंग भरते हैं और धरती को एक चमत्कार भेंट स्वरूप सौंप देते हैं | हमारी धरती के जितने भी आविष्कर्ता हुए जिनकी खोजों की बदौलत मानव सम्यता ने सुई से लेकर चाँद तक के सफर की यात्रा तय की है , निःसंदेह उनके मन की उड़ान , आसमान को छूने के लिए फड़फडाते पंखों ने कभी विश्राम नहीं लिया होगा , ऐसे ही आजाद लोग दुनिया की तस्वीर बदलने का ज़ज्बा रखते हैं |

अंततः विलक्षण व्यक्ति सत चिंतन व स्वतंत्र सोंच की बुनियाद पर ही अपने जीवन के साथ संसार में भी व्यापक परिवर्तन का निमित माना गया है | कहते हैं कि सोच तेरी बदली तो नजारा बदल गया, किश्ती ने बदला रूप तो किनारा बदल गया |

ओम प्रकाश यादव

 

 

 

 

 

लेखक डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल
झुमरीतिलैया, कोडरमा, के प्राचार्य हैं.

गम न करें – १७

बे-मौके सब शरीफ

मतलब यह नहीं कि यह सीधे तौर पर आपके बारे में हैं. मतलब यह है कि यह उन सभी के बारे में है जो मौके पर शरीफ बनने का ढोंग रचते हैं और समय आने पर दूसरों को आगे कर खुद उनका समर्थन अथवा उनके साथ अथवा उनके पीछे चलने को तुरंत तैयार हो जाते हैं. इसलिए बे-मौके सब शरीफ से हमारा तात्पर्य यह है कि मौका आने पर अपनी शराफत दिखाने से कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता, पर यह कि सिर्फ ख़बरों में आने के लिए या कि सिर्फ दिखावे के लिए.

आप कथनी और करनी में जितना कम अंतर रख पाते हैं उतने ही आप चरित्रवान होते हैं, यह नहीं कि आप चरित्रवान तो हों पर अवसर आने पर आप खिसक लें. यहाँ मेरा यह सब लिखना आप में से बहुतों को खल रहा होगा पर क्या करें तारीफ बनती भी होगी तो आप इसे मेरा दंभ न समझ ले इसलिए यह साफ करना जरुरी है कि मै इस लेख के माध्यम से आप सब को कुंठित नहीं करना चाहता हूँ. मेरा उद्देश्य बस इतना है कि हम अपने चरित्र के स्तर को उस ऊँचाई तक ले जा सकें जहाँ हम सचमुच ही अपने कथनी और करनी अंतर नहीं कर सकें अर्थात जैसा भी हम सोचें अथवा कहें उसपर चल भी सकें.

थोड़ी देर के लिए यह लेख आपको गप्पबाजी लग सकती है पर आप जरा ध्यान देकर इन बातों को सोचेंगे तो यही पाएंगे कि हम में से कितने ही अवसर आने पर किसी जन-कल्याणकारी कार्यों के लिए समय निकल पाते हैं? अधिकतर का उत्तर यही होगा कि अपने काम से फुर्सत मिले तभी ना. सही भी है, पर यह तभी संभव हो पाता है जब आप समय निकालना चाहें. क्या आप अपने परिवार के लिए समय नहीं निकाल पाते, क्या आप अपने किसी निजी कार्य के लिए समय नहीं निकाल पाते यदि आपका उत्तर हाँ है तो समस्या यह है कि समय आपको निकालना होता है इससे पहले कि समय आपको निकाल दे.

महत्वपूर्ण यह नहीं कि आप किन बातों अथवा कार्यों के लिए समय निकाल पाते हैं अपितु यह कि आप किन बातों अथवा कार्यों के लिए स्वयं को अनुकूल पाते हैं. यदि नहीं तो फिर आप चाहें कि उक्त कार्यों के लिए भी आप समय निकालें. क्योंकि यह आपके ही हाथों में होता है पूर्णरुपेण. आप टालमटोल के शिकार महसूस होते हैं यदि आप चाह कर भी समय प्रबंधन नहीं कर पाते और इसका ठीकरा दूसरों के सर फोड़ने को उद्दत रहते हैं.

आईये इस उधेड़बुन से निकालें जीवन बहुत खुबसूरत है, इसका आनंद लीजिये, नहीं समझ आ रहा हो तो किसी मनोवैज्ञानिक से जरुर मिलें, आप पागल नहीं हैं पर इस स्थिति में अधिक देर रहना आपको जल्द ही उस श्रेणी में ला खड़ा कर सकता है, इसलिए कि कही और अधिक देर न हो जाये, अपने आपको, अपने लिए कुछ ऐसा करें जिससे आपके मन, आत्मा और चित्त को प्रसन्नता होती हो, साथ ही दूसरों की प्रसन्नता का कारण हो ऐसे कृत्यों में स्वयं को उलझाएँ.

इसलिए गम न करें खुश रहें.

गम न करें – १६

दुनिया में आगर आप मोहताज या गमगीन हों या मर्ज लाहक हो जाए या आपका कोई हक मार ले या कोई जुल्म आप पर हो, तो आप हमेशा रहने वाली जगह जन्नत को याद कर लें. जब आप ऐसा करने लगेंगे और जन्नत को पाने के लिए नेक काम करने लगेंगे तो आपका नुकसान फायदे में बदल जायगा. मुसीबतें अतियात साबित होंगी.

सबसे अकलमन्द वही है जो आखरत के लिए काम करे, क्योंकि आखरत ही बेहतर और बाक़ी रहने वाली है. मख्लुकात (प्राणियों) में सबसे अहमक वो है जो दुनिया को अपना घर और आरामगाह और उम्मीदों का मरकज समझते हैं. इसीलिए जब मुसीबत पड़ती है तो बहुत घबरा जाते हैं. क्योंकि वो दुनिया की जिंदगी को ही सब कुछ समझ बैठे हैं. दुनिया की जिंदगी मुख्त्सर है. मरने के बाद की जिंदगी हमेशा और कायम रहने वाली है.

चिन्तन – ०३

सुप्रभात, आज का दिन मंगलमय हो एवं उमंग, सार्थक चिंतन, हर्षोल्लास में व्यतीत हो।

देश की आजादी सही मायने में तभी चरितार्थ हो सकती है जब देश मे लिंग भेद के नाम पर वर्गीकरण न हो, महिलाओं, बच्चों के अधिकारों की रक्षा हो व सम्मान मिले, शिक्षा व आजादी मिले। जीवन की दिशा तय करने का अधिकार मिले, अपने रुचि के मुताबिक अपने कैरियर को संवारने का मौका मिले, आजाद भारत में किसी भी महिला/बच्चों को अपना कैरियर चुनने का अधिकार भारतीय संविधान के मूल में वर्णित है जिस पर सारगर्भित अमल की जा सके। जीवन में महिलाएं / बच्चे इतना सक्षम बनें की अपनी जिंदगी की जरूरतों को खुद पूरा कर सकें, परजीवी प्रवृति त्यागकर आत्मनिर्भर, स्वाबलंबन की ओर उन्मुख हों।

महिलाएं/बच्चे इसके लिये माता-पिता, परिवार पर आश्रित न रहें, बल्कि अपना खुद का अस्तित्व बनायें। किसी के ऊपर आश्रित रहने से जरूरतें पूरी होती हैं, सपने नहीं। जीवन का आत्मस्वाभिमान सपनों को पंख दिये जाने में निहित है। खुद के सपनों को साकार बनाने के लिये पतंग की डोर अपने हाथों में रखनी जरूरी है। 21 वी सदी में महिलाओं, बच्चों को पितृसत्तात्मक व्यवस्था से निकलकर खुद आत्मनिर्भरता की ओर उन्मुख होने पर बल दिये जाने की जरूरत है, ताकि भारत उन्नति के बहुआयामी आयाम को छू पायें।

जिस देश की महिलाएं, बहनें, पत्नियाँ, माँ, बच्चे ताकतवर होंगे, वह देश समृद्धता की ओर उन्मुख होगा, अतुल्यता की ओर बढ़ेगा। देश के संविधान में लिंग भेद के नाम पर असमानता को दूर किये जाने पर बल, भातृत्व भावना को प्रबल किये जाने पर जोर, विश्व बंधुत्व की भावना पर बल आदि को तवज्जो दिये जाने की जरूरत है। किसी देश की संविधान से वहाँ के नागरिकजनों को मार्गदर्शन प्राप्त होता है।  जय हिंद, जय भारत।

गम न करें – १५

कुछ लोग होते हैं, जिनके जेहन में, बिस्तर पर लेटे हुए आलमी जंग (world war) होती रहती है. इन्हें सुगर व ब्लड प्रेशर जैसी बीमारी हो जाती है. वाकयात से वो झुलसते रहते हैं. कीमतों में बढ़ोत्तरी हुई इन्हें गुस्सा आया, बारिश क्या हुई वो दहाड़ने लगे, करेंसी की कीमत कम हुई वो परेशान हो गए. इस तरह वो हमेशा मलाल व कलक की हालत में रहते हैं. हर आवाज को अपने ही खिलाफ समझते हैं. मेरा मशवरा है कि सारे जहाँ का दर्द लेकर मत फिरिए, हादसात जमीन में हो, आपके आंतो में न हो, बाज लोगों का दिल स्पंज होता है. जो हर तरह की गपबाजियों, अफवाहों को पीता रहता है. छोटी-छोटी बातों पर परेशान, मामूली ख़ुशी पर दिल बहार निकल जाता है. ऐसा दिल जिसका होता है उसकी शख्सियत ख़तम हो जाती है.

अहले हक की यह कैफियत होती है, इबरतें व नसीहतें इनके इमान में बढ़ोत्तरी करती हैं. हादसात और ट्रेजडियों के सामने तो एक बहादुर दिल ही ठहर सकता है. जो गैरतमंद व खुद्दार है वो अल्लाह के मदद व करम के मुश्तहक हैं. आप नेक काम करते रहिये, आपको कभी परेशान होने की जरुरत नहीं, क्योंकि अल्लाह आपके साथ है.

गम न करें – १४

दायें बाएं देखिये हर तरफ मुसीबत जदा दिखाई देंगे. हर घर में हंगामा बरपा है. हर रुखसार पर आंसू है. हर वादी में मातम है. आप देखेंगे मुसीबत जदा आप तनहा नहीं. दूसरों के मुसीबत के मुकाबले में आपकी मुसीबत कम है. कितने ही मरीज हैं जो सालो साल से बिस्तर पर करवटें बदल रहे हैं. दर्द से कराहते रहते हैं. कितने जेलों में बंद हैं. सालों से इन्होने सूरज की रौशनी नहीं देखीं. कितनी औरतें हैं जिनके जिगर के टुकड़े नौजवानी में ही छीन लिए गए. कितने हैं जो परेशान हैं, कर्जदार हैं, मुसीबत में हैं. आप इनके जरिये तसल्ली हासिल करें. और अपने आप को मुसीबत का सामना करने का ऐसा आदी बनायें जैसे ऊंट सेहरा में चलने का आदी हो जाता है. जिंदगी के सफ़र में तवाज्जन (संतुलन) बरक़रार रखिये. अपने इर्द-गिर्द और पहले के लोगों के नमूने सामने रखिये, और इनके बीच अपना मुआज्जना (अंदाज) लगाईये तो पता चलेगा, आप इनसे बहुत ज्यादा बेहतर हैं.

आपको हल्का सा झटका लगा है. इस पर अल्लाह (भगवान) का शुक्र अदा करें. जो उसने ले लिया उसपर शबाब की उम्मीद रखिये. और अपने माहौल के लोगों को देख कर तसल्ली हासिल कीजिये. इस सिलसिले में आखिरी नबी हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अच्छी मिसाल हैं, के आपके सर पर ऊंट का ओझरी रखा गया, कदम जख्मी हुए, चेहरे पर चोटें आयीं, घाटी में बंद किया गया, दरख्तों के पत्ते खाने पड़े, अपना प्यारा शहर मक्का छोड़ना पड़ा, आपका बेटा और अक्सर बेटियां आपके जिंदगी में ही इंतकाल कर गयीं. हजरत मूसा अल्लैहिस्सल्लाम को तकलीफ दी गयी, हजरत ईसा अल्लैहिस्सल्लाम को सूली पर लटकाया गया. श्रीराम जी को बनवास जाना पड़ा, सीता जी को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी. इसीलिए ऋषियों ने इस संसार को दुखालय कहा है. दूसरों के मुकाबले हमारा गम कितना कम हैं, फिर भी हम गमगीन हैं?

जारी….

चिन्तन – ०१

शुभ प्रभात, आज का दिन मंगलमय हो एवं उमंग, सार्थक चिंतन, आत्मोत्थान की ओर अग्रसर एवं हर्षोल्लास मे व्यतीत हो।

आज का विषय : शिक्षा

अनुशासन, ईमानदारी, विवेक, विनम्रता, त्याग, शिष्टाचार, सत्यता, सदाचार, सच्चरित्र, परानुभूति, मिर्दुभाषी, कोमल ह्रदय, धैर्यवान, कर्तव्यनिष्ठ, कुशल नेतृत्व संचालन आदि शीलगुणों ( Traits ) सरीखे संस्कार, मूल्याधारित शिक्षा में अनिवार्य रूप से लागू की जानी चाहिए। मूल्याधारित नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रमों में अनिवार्य रूप से क्रियान्वित किया जाना चाहिए, जो व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिये अनिवार्य घटक सिद्ध होगा।

ऐसे संस्कार निर्मित किये जाने से व्यक्ति के आत्मशक्ति को उन्नत किया जा सकता है। शैशवावस्था में बच्चों का मन कोरा कागज की तरह होता है, परिवार बच्चों की प्रथम पाठशाला है, यह समाजीकरण का प्रथम स्तर है, जहाँ अभिभावक व अन्य पारिवारिक सदस्यों का आचरण आदर्श-उदत्त भावना से परिपूर्ण होने चाहिए। मूल्यपरक शिक्षा के प्रति सकारात्मक नजरिया राष्ट्रीय प्रगति के लिये आवश्यक सोपान है। समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ाने के हरसंभव प्रयास किये जाने चाहिये।

आजकल नैतिक मूल्यों में (अवमूल्यन) कमी, एकल परिवारों (Nuclear Family) का चलन, समाजीकरण (Socialization) की शुद्ध प्रक्रिया का अभाव, भौतिकवादी उपयोग में बढ़ावा, परिवार में विघटन की स्थिति, कर्तव्यनिष्ठ न होना, घर का दोषपूर्ण वातावरण, आनुवंशिक दोष आदि के चलते नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन दिख रहा है। एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिये नैतिक शिक्षा को संपूर्ण राष्ट्र के सभी Education Institutions (शैक्षणिक संस्थानों) में अनिवार्य रूप से लागू किये जाने पर बल दिया जाना चाहिये, ताकि आध्यात्मिक प्रखरता का अद्यतन विकास हो पाये। संतुलित व्यक्तित्व के लिये व्यक्ति मे IQ (Intelligence Quotient) (बुद्धि-लब्धि), EQ (Emotional Quotient) (भावनात्मक-लब्धि) एवं SQ (Spiritual Quotient) (आध्यात्मिक-लब्धि) तीनों गुणों का संतुलित समन्वय होना जरूरी है।

गम न करें – १३

नरमी जिस चीज में होगी, उसे जीनत देगी. जिस चीज से निकाल ली जायगी, उसमे ऐब पैदा होगा. बातचीत में नरमी, चेहरे पर मुस्कूराहट, गुफ्तगू के वक्त अच्छी बात, यह, वह बेहतरीन अवसाफ (गुण) हैं, जो खुशनसीबों के हिस्से में आते हैं. ये बेहतरीन इंसानों की शिफात है. इनकी मिसाल ऐसी है, जैसे शहद की मक्खी, पवित्र चीज खाकर पवित्र चीज बनाती है. वो फूल पर बैठती है, लेकिन इसे तोड़ती नहीं.

नरमी से अल्लाह (भगवान) वह चीज दे देता है, जो सख्ती से नहीं मिलती. नरम मिजाज वालों का लोग स्वागत करते हैं. निगाहें इन्हें देखती हैं, दिल मायल होता है. रूहें सलाम करती हैं. वजह ये है कि इनका मिजाज, बातचीत, लेनदेन, मेलजोल और खरीदना बेचना हर जगह इन्हें महबूब बना देता है. दोस्त बनाना एक फन है.

बुराई का जवाब भलाई से दो. इस सूरत में आपके और जिसके बीच अदावत है, वो ऐसा हो जायगा जैसे दिली दोस्त. सही इन्सान तो वो है, जिसके जुबान और हाथ से दूसरा इन्सान महफूज हो. अल्लाह ने मुझे हुक्म दिया है जो मुझसे कटे मैं उससे जुडु, जो मुझ पर जुल्म करे मैं उसे माफ़ कर दूं. अगर हम ये राह अपनाएंगे तो हमेशा खुश रहेंगे.

जारी…

गम न करें – १२

ऐ! इन्सान, भूख के बाद शिकमशेरी (पेट भर खाना) है, प्यास के बाद शैराबी है, जागने के बाद नींद है, बीमारी के बाद सेहत है. गुमकर्दा मंजिल पायगा, मुशक्कत उठाने वाला आसानी हासिल करेगा, अँधेरे छंट जायेंगे, रात को बशारत दो सुबह की, जो इसको पहाड़ों की तरफ धकेल देंगे.

गमजादा को बसारत दो, रौशनी की तरह तेजी से आने वाले आसानी की. रस्सी लम्बी पे लम्बी होती जाती है, तो याद रखिये जल्द ही टूट जाएगी. आंसू के साथ मुस्कराहट है, खौफ के बाद अमन, घबराहट के बाद शुकून, मायुशकुन सूरतेहाल के गिरफ्तार, सिर्फ तंगी, इबरत और बदबख्ती का अहसास करते हैं.

इनकी नजर कमरे की दीवारों और दरवाजों तक होती है. इसकी आगे इनकी रसाई नहीं. काश! वो पर्दे के पीछे भी देखते. आप तंगदिल न हों. हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहती. जमाना उलटता पलटता रहता है. गर्दिशे दौरां जारी रहती है. मुसीबत के बाद ख़ुशी है, तंगी के बाद आसानी है. लिहाजा गम न करें खुश रहें.

गम न करें – ११

तुम्हें दुनिया में जो तकलीफ पहुँचती है, वो तुम्हारे पैदाईश से पहले ही एक रिकॉर्ड में दर्ज कर ली गयी है. कलम सोख चुका है, खाता बंद कर लिया गया, मामला तय पा गया, तक़दीर लिखी जा चुकी, वही हमें पहुँचता है जो हमारे लिए लिखा जा चुका. जो हमारे साथ हुआ वो टलने वाला न था, जिससे हम बच गए, वो हमें लाहक होने वाला न था. जब ये अकीदा (विश्वास) आपके दिल में अच्छी तरह बैठ जाये, तो तकलीफ अतिया और मुसीबत इनाम बन जाये, जो गुजरे उसे आप अच्छा समझें अल्लाह (भगवान) जिसके साथ भलाई चाहता है, उसे उसमें हिस्सा मिलता है.

अब जो भी आपको तकलीफ पहुंचे, बीमारी लाहक हो, कोई अपना मर जाय, माली नुकसान हो जाये, घर जल जाये तो समझ ले यही भगवान ने मुक्कदर में लिखा था. इसमें सारा अख्तियार खुदा के पास है, हाँ हम सब्र करेंगे तो उसका फल मिलेगा. लिहाजा जो मुसीबत के शिकार हैं, वो खुश हो जाएँ कि, सब कुछ खुदा के हुक्म से हो रहा है, जो देता भी है, लेता भी है, अता भी करता है, छीनता भी है, उससे उसके कामों का हिसाब नहीं लिया जा सकता.

अच्छी बुरी तक़दीर पर जब तक इमान न होगा, तब तक आपके मन और आत्मा को शुकून और शांति नहीं मिलेगी, उलझने ख़तम न होंगी, दिल के वशवशे दूर न होंगे. जो होना है वो होकर रहेगा, लिहाजा हसरत नदामत से क्या फायदा. ये मत सोचिये कि गिरती दिवार को आप बचा लेंगे, पानी के बहने को रोक देंगे, हवा के चलने को मना कर देंगे, शीशा को टूटने से बचा लेंगे, ये नहीं हो सकता. आपको, हमें, अच्छा लगे या बुरा जो लिखा है वो होकर रहेगा. जो चाहे मान लें, जो चाहे न माने. इसलिए भगवान (खुदा) के बनाये हुए तक़दीर पर सर तसलीम कर दें. गम न करें, खुश रहें.

जारी…