अछूत – ०३

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नजर में असर होता है. नजर टेढ़ी हो, तो उसके अलग और सीधी हो, तो अलग मायने निकल आते हैं.

आपकी टेढ़ी नजरें मुझे भले अछूत मानती हों, पर नजरें सीधी कर दें, तो वहीं मेरा सौम्य चेहरा बरबस आपको अपना ही पुत्र मान लेने का विस्मयकारी एहसास करा जायेगा. जिन सवालों के जवाब खोजे भी नहीं मिलते, अगर उनके जवाब कूड़े-करकटों पर बिखरे पन्नों में मिल जायें, तो उसे लोग छोड़ा नहीं करते. उन्हें यूं सहेज कर रख लेने में कोई परहेज नहीं करते. जो कूड़ों-करकट की परवाह करते हैं, वे अपनी जिंदगी खुद ही तबाह करते हैं. बच्चे को स्कूल आने से मत रोकिये, वह बहुत कोमल है. उस पर अपने विचार मत थोपिए. रूंधे स्वर में प्रधानाध्यापक सुरेश ने कहा.

आपका क्या? प्रधानाध्यापक एक लय में कहे जा रहे थे, आप तो इतने रसूखदार हैं कि सरकार के सहारे मेरा स्थानांतरण इस स्कूल से किसी दूसरे स्कूल जब चाहें करा दें. पर, क्या बच्चों में मेरे प्रति स्वाभाविक रूप से उपजी गुरु भक्ति, अपने शिष्यों के प्रति पैदा हुई मेरी उस आसक्ति को किसी के सहारे मिटा पायेंगे?

शायद नहीं, क्योंकि गुरु भक्ति हो या गुरुओं की शिष्यों के प्रति आसक्ति, इसे कानूनों के मोहताज नहीं बनाये जा सकते. क्या सोचते हैं, प्रधानाध्यापक सुरेश कहे जा रहे थे कि एक अछूत, जो पाठ अपने शिष्यों को पढ़ाते आया है, आपके ही दरवाजे पर आ कर आपको ही पढ़ा गया. नहीं, कदापि नहीं. यह तो वह पाठ है, जिसे आप, हम, हर कोई अपने-अपने बालपन में पढ़ा होता है. कालचक्र के वक्र होते बहुसंख्यक इसे भूल जाते हैं. मैं उसी कालचक्र की वक्रता को सीधा करना चाहता हूं.

बाबूजी! मैं सोचता हूं कि कोई अपने में ही समायी अज्ञानता, अशिक्षा एवं दंभ को अछूत क्यों नहीं मानता? काश! कोई इसे ही अछूत मानता और इस अछूत को भी अपना ही पुत्र जानता. प्रीतम सिंह अछूत प्रधानाध्यापक सुरेश की बातें इस तरह अवाक् हो सुनता जा रहा था, मानो उसके मुंह से निकली अमृतवाणी उसे आत्मग्लानि का बरबस एहसास करा रही हो.

वह प्रधानाध्यापक के आत्मविश्वास एवं निर्भीकता को देख हतप्रभ था. जब प्रधानाध्यापक ने अचानक बोलना बंद कर दिया, तो प्रीतम सिंह हठात बोल पड़ा- बोलते जाओ. पता नहीं आज मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि मेरा अंतर्मन जाग रहा है. इस जग रहे अंतर्मन को पूरी तरह जगा देना चाहता हूं. कोई इसे भले ठगना कहता हो, तब भी मैं ठगा जाना चाहता हूं. आज मुझे एहसास हो रहा है कि संस्कार किसी जाति का मोहताज नहीं. संस्कार मोहताज भी है, तो प्रधानाध्यापक जैसे दृढ़ निश्चयी, वीर्यवान और शौर्यवान लोगों को, जो निडर हो बेबाक सच्चाई बयां कर जाता हो और लोगों की कोई चाहत न भी हो, तो अच्छाई उनके घर कर जाता हो.

प्रीतम सिंह अपनी कुरसी से उठ खड़ा हुआ. उसे लग रहा था मानो वर्षों बाद उसे जीवन के दर्शन हुए. वह अछूत प्रधानाध्यापक को अपना जीवन समझ उसे अपने में आत्मसात कर लेना चाह रहा था. मानो उसके ऐसा नहीं करने से वह जीवन से ही जाता रहेगा. उसने प्रण किया कि आज और अभी से सागर पर उससे कहीं ज्यादा प्रधानाध्यापक का अधिकार है. सागर के जीवन की चिंता करना उसके लिए बेकार है, क्योंकि अब पुत्र तो पुत्र, उसे भी प्रधानाध्यापक के विचारों की अधीनता स्वीकार है.

इन सबों के बीच प्रीतम सिंह की आंखों से बहती प्रायश्चित रूपी अश्रु की धारा अछूत प्रधानाध्यापक सुरेश की आंखों से बहते स्वाभिमान और विवेक की अश्रुधारा में इस तरह विलीन हो रही थी, मानो नदियां समुद्र में मिल अपनी चिरस्थायी शांति को प्राप्त कर रही हों.

समाप्त.

अछूत – ०२

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यह कितना आश्चर्य भरा है कि गंदगी तो सभी पैदा करनेवाले होते हैं, पर कुछ ही होते हैं, जो उस पैदा की गयी गंदगी को स्वयं साफ करते हैं और बहुसंख्यक ऐसे होते हैं, जो उन मजबूर लोगों की तलाश में जुट जाते हैं, जो अपने जीवन अस्तित्व को रखने के लिए उनके द्वारा पैदा की गयी गंदगी को साफ कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहता हो.

यह सच है कि प्रधानाध्यापक सोचे जा रहे थे, कि मजबूरियां इनसान को कर्म करने की ओर प्रेरित करती हैं. मेरा तो मानना है कि मजबूरियों से उपजी कर्म की दिशा और दशा चिरकाल तक स्थायी नहीं हो सकती, क्योंकि मजबूरियां मिटते ही कर्म की दिशा बदल जाती है.

मजबूरियां समाज में उच्च जाति एवं वर्ण माने जानेवाले लोगों को भी जूते साफ कर भी धन अर्जन को मजबूर कर देती हैं, तब उस व्यक्ति या परिवार को हम मोची का स्थायी नाम क्यों नहीं दे पाते? क्यों नहीं उनकी जातिगत श्रेष्ठता कर्मगत श्रेष्ठता या निकृष्टता में विलीन हो पाती है? आज मुझे क्यों लोग अछूत कह कर अछूत मान लेना चाहते हैं, जबकि मैं ज्ञान अनुभवों से लोगों के बीच सुसंस्कार बांटता हूं? सच कहूं, तो जाति तो कर्म की दासी है.

कर्म स्थायी हो, तो जाति स्थायी हो सकती है. परंतु, सच यह है कि कर्म स्थायी या समरूप स्वरूपवाला हो ही नहीं सकता. परिस्थितियों का दास बना व्यक्ति एक कर्म से दूसरे कर्म को सदा स्थानांतरित होता रहता है. मुझे नियत कर्म से उपजी वर्ण व्यवस्था को मान लेने में कोई अचरज नहीं, पर तब उनलोगों की जाति, जो अपनी मूल जातिगत कर्मों से विलग हो कर अन्य जातिगत कर्मों में स्वयं को आत्मसात कर अपने जीवन का आधार बना लेते हैं, को धर्म परिवर्तन की तरह जाति परिवर्तन के अधिकारों को क्यों नहीं मान्यता मिली?

सच तो यह है कि कर्म के स्वरूप का वर्गीकरण काल, समय एवं परिस्थितियों के अनुरूप सदा अस्थायी एवं परिवर्तनशील होता है.

प्रधानाध्यापक के मन में खुद तरह-तरह के सवाल पैदा होते जाते, उनका मस्तिष्क स्वयं उनका हल ढूंढ़ता जा रहा था. बस आवश्यकता इस बात की रह गयी थी कि उसके मस्तिष्क द्वारा ढूंढ़े जा रहे हल को समाज सहजता से मान्यता प्रदान करने में असहज महसूस नहीं करता, परंतु समाज को इस पारंपरिक मान्यताओं की वर्जनाओं से मुक्ति प्रदान करना उतना भी सहज नहीं था और यह भी सच था कि प्रधानाध्यापक भी हार माननेवालों में से नहीं थे. वह उस व्यक्ति के दंभ, अहंकार, कुंठाधारित अस्त्रों से उसे ही घायल कर उस पर अपने विवेक एवं चातुर्य का मरहम लगा कर सदा के लिए उसे इस रोग से मुक्त कर देना चाहते थे.

वह बच्चों में घर करते जा रहे सुसंस्कारों के हथियार से उसके ही अभिभावकों में जातिगत दंभ और अहंकार के शत्रु का विनाश कर देना चाहते थे, जो किसी न किसी रूप में बच्चों के व्यक्तित्व के समुचित विकास को बंधक बना रखा हो.

धीरे-धीरे सभी बच्चों ने प्रधानाध्यापक से प्राप्त शिक्षा को व्यावहारिक जीवन में उतारना शुरू कर दिया था. अपने ही माता-पिता व वरिष्ठ लोगों द्वारा समाज-परिवार में बरती जानेवाली विसंगतियों के प्रति विरोध जताना शुरू कर दिया था. उच्च जाति के बच्चे निडर हो अपने से निम्न जाति के बच्चों के साथ खुल कर मिलना, उनके घर आना-जाना बेरोकटोक शुरू कर दिया था. निम्न जाति के टोलों में बसे बच्चों के साथ हृदयंगम होने लगे थे. ऊंच-नीच के भेदभाव की दीवार बच्चों के बीच बालू की भीत की तरह ढहते जा रहे थे.

यह सब उच्च जाति के अधिकतर लोगों को नागवार लग रहा था. उन लोगों ने अपने बच्चों को गांव के इस स्कूल में नहीं पढ़ाने की योजना बनानी शुरू कर दी थी. इसी योजना के तहत सर्वप्रथम उनलोगों ने यह तय किया कि इस गांव के प्रीतम सिंह, जिसे जाति एवं धन दोनों ही दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना जाता था, अपने बच्चे सागर को स्कूल भेजना बंद करें. प्रीतम सिंह ने लोगों की बात मान कर सागर को स्कूल जाने से मना कर दिया. सागर के स्कूल नहीं गये कुछ दिन गुजर चुके थे. तब अछूत प्रधानाध्यापक सुरेश ने फैसला किया कि क्यों नहीं सागर के इस तरह अचानक स्कूल न आने की सुधि लें.

उस पर सागर जैसा लड़का, जो धीर-गंभीर स्वभाव का होने के साथ-साथ कम उम्र में ही जीवन-दर्शन को आत्मसात कर लेनेवाला था. प्रधानाध्यापक को रहा नहीं गया. वह प्रत्येक शनिवार की शाम स्कूल बंद होने पर अपने घर जाया करते थे, पर इस शनिवार को उन्होंने अपने घर न जा कर सागर के घर उसकी खोज-खबर लेने का मन बना लिया. एक राहगीर की मदद से प्रधानाध्यापक सागर का घर आसानी से ढूंढ़ कर पहुंच गये. उसके घर से सटा एक दालान था, जिसमें से कुछ लोगों की बातचीत की आवाज आ रही थी. प्रधानाध्यापक ने दालान पर पहुंच कर दोनों हाथ जोड़े अपना परिचय देते हुए सागर से मिलने की बात कही.

‘क्या तुम सागर से ही मिलना चाहते हो? मुझसे नहीं मिलोगे? मैं सागर का बाप हूं, प्रीतम सिंह ने बड़े ही रौब में आ कर कहा- अहो भाग्य! आपके दर्शन हुए, प्रधानाध्यापक सुरेश ने कहा- क्या मुझे बैठने को नहीं कहेंगे? प्रधानाध्यापक ने आत्मविश्वास के साथ पूछा. कोई कुरसी अगर खाली पड़ी हो, तो बैठ जाओ, वरना तुम्हारी दो-चार फिजुल बातों को भी सुनने का वक्त फिलहाल मेरे पास नहीं है, प्रीतम सिंह ने घमंड के साथ कहा. प्रीतम सिंह तो ऐसे अवसर की तलाश में था ही, जबकि वह अछूत शिक्षक का मान-मर्दन करे.

उसे लगा मानो वह अवसर उसे आज मिल ही गया. वह इस आये अवसर को गंवाना नहीं चाहता था. कुरसियां खाली न होने से प्रधानाध्यापक ने खड़े-खड़े ही बिना देर किये सागर के कुछ दिनों से स्कूल नहीं आने की वजह जाननी चाही. सागर मेरा बेटा है. उसे स्कूल भेजूं या ना भेजूं, तुझे तकलीफ क्यों? प्रीतम सिंह ने बड़ी हेकड़ी के साथ कहा. सागर सिर्फ और सिर्फ आपका बेटा है, यह आपने कैसे मान लिया? प्रधानाध्यापक सुरेश ने प्रत्युत्तर में कहा.

और नहीं तो क्या, वह तुझ जैसे अछूत का बेटा है? प्रीतम सिंह ने अकड़ कर अपनी बात कह डाली. बस बाबूजी बस! बहुत हो गया. आप भ्रम में थे कि मैं सागर से मिलने आया था.

मुझे तो सागर पहले ही आपके बारे में, आपकी सोच के बारे में बता चुका था. सच तो यह है कि मैं आपसे ही मिलना चाह रहा था. मैं जानता हूं, मुझे सागर ने स्कूल नहीं आने की वजह पहले ही बता दी थी. उसकी गुरु भक्ति आपको इसलिए रास नहीं आयी कि मैं अछूत हूं. सच कहा आपने. भला एक अछूत जाति का आदमी उच्च संस्कारों की बात सोच भी कैसे सकता है? जो चीथड़ों और गुदड़ियों में पलता हो, भला मखमलों का एहसास उसे कैसे हो? पर, यह मत भूलिए कि कोई व्यक्ति महान तब होता है, जब दूसरों का अपमान न कर, उसके स्वाभिमान की रक्षा करता है और यह सब आपमें दिखायी देता है. मैं आपमें वह सब देख पा रहा हूं, जिसे आप चाह कर भी नहीं देख पा रहे. आखिर ऐसा क्यों?

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अछूत – ०१

गाँव के कुछ लोग रमेश के पिता के बारे में जानने के इच्छुक रहते थे, उन्हें पता था कि जब से वे गाँव के स्कूल से स्थानांतरित हो, दूर शहर के स्कूल में चले गए हैं, तब से ही गाँव के स्कूलों में शिक्षा की स्थिति उतनी अच्छी नहीं रह गयी थी. उनलोगों की अब भी चाहत थी कि वे शहर से स्थानांतरित हो, अपने गाँव के स्कूल में आ जाते. लेकिन, सच्चाई यह थी कि सरकारी नियमो के अनुसार वे अपने गाँव के में शिक्षक बन कार्य नहीं कर सकते थे.

गाँव के लोग सोचते थे कि उनके जाने के बाद एक निम्न जाति का शिक्षक इस गाँव के इकलौते स्कूल का जब से प्रधानाध्यापक बन कर आया है, तब से मानो स्कूल की शिक्षा व्यवस्था ही चौपट हो गई हो, परन्तु सच्चाई ऐसी नहीं थी. उस नए प्रधानाध्यापक सुरेश के आने से बच्चे स्कूल में और भी अनुशासित हो विद्या अध्ययन करते और सुसंस्कृत हो रहे थे. सभी बच्चे ज्योंही विद्यालय के मुख्य द्वार पर पहुंचते, उस मुख्य द्वार को विद्या का मंदिर समझ अपना मस्तक टेक कर प्रवेश करते और फिर अपनी-अपनी कक्षाओं में स्थान ग्रहण कर लेते.

प्रत्येक दिन प्रधानाध्यापक इस एक शिक्षकीय विद्यालय में विषय से संबंधित पाठ्य सामग्रियों की पढ़ाई के दौरान थोड़ा वक्त निकाल कर व्यवहार कुशलता एवं नैतिकता का पाठ बच्चों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. बच्चे भी सर्वस्व न्योछावर कर गुरु भक्ति में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते. उन्हें मां-बाप का प्यार भी मानो शिक्षकों से सहजता से मिल जाता था. सभी बच्चे ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा, जाति-धर्म जैसे भेदभावों से बहुत ही ऊपर उठ कर मानव धर्म के गुणों का वरण कर रहे थे. उन्हें विद्यालय में रह कर स्वर्गिक और दैविक अनुभूति प्राप्त हो रही थी.

गांव के कुछ संकीर्ण व जमींदार मानसिकतावाले घराने के लोगों को विद्यालय के अछूत प्रधानाध्यापक की लोकप्रियता एवं स्कूली बच्चों का उसके प्रति समर्पण भाव रास नहीं आ रहा था. उन्हें निम्न जाति के प्रधानाध्यापक के प्रति बच्चों में विकसित होते जा रही गुरु भक्ति सर्वदा सालती रहती. वे स्कूल के प्रधानाध्यापक के विरुद्ध गांव के अन्य लोगों को भड़काने एवं जलील करने की मोहलत की तलाश में रहते. परंतु, प्रधानाध्यापक पूरी तन्मयता से बच्चों के बीच शिक्षा का अलख जगाते, अंदर ही अंदर आत्मिक सुखों के सागर में बिना डगमगाये, अपनी नैया को खेते जा रहे थे.

विद्यालय के सभी बच्चे प्रधानाध्यापक द्वारा दी गयी शिक्षा के अनुसार सुबह उठते अपने मां-बाप के चरण स्पर्श कर पूरे आत्मविश्वास के साथ दिनचर्या शुरू करते. बच्चों में आये इस परिवर्तन को कुछ अभिभावक अपना सौभाग्य, तो कुछ संकीर्ण विचारधारा के उच्च जाति के लोग नये शिक्षक अछूत प्रधानाध्यापक की सोची-समझी दूरगामी रणनीति का हिस्सा समझते. उन्हें अपने बच्चों में आ रहे सुसंस्कृत परिवर्तन के बजाय प्रधानाध्यापक के प्रति बच्चों की अतिशय गुरु भक्ति एवं गुरु वचनों के सम्मान की चिंता सताती. उस गांव के कुछ प्रबुद्ध लोग, सुरेश के अछूत जाति का होने पर भी उसके अंदर की विलक्षण प्रतिभा के प्रति यह सोच, मन ही मन प्रसन्न होते कि उनके बच्चे सुसंस्कृत हो, जीवन के असली मूल्यों के करीब होते जा रहे थे.

परंतु, ऐसे अभिभावकों की संख्या नगण्य थी. वे भी गांव के बाहुबली व उच्च जाति के घरानों के बीच अछूत प्रधानाध्यापक के गुणों का बखान खुलेआम करने में जी चुराते थे. उन्हें अंदर ही अंदर डर रहता था कि कहीं वे अपने रसूख के बल पर उन्हें समाज से बहिष्कृत न कर दें. गांव के रसूखदार माने जानेवाले उच्च जाति के कुछ लोगों ने मिल कर एक योजना बनायी कि क्यों नहीं प्रधानाध्यापक को इतना जलील किया जाये कि वह स्वयं इस गांव के विद्यालय से अपना स्थानांतरण कहीं अन्यत्र करा ले.

इन दिनों सरकार द्वारा भी स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा था. सरकारी कार्यालयों, सार्वजनिक स्थानों, गली-मुहल्लों आदि में पसरे कूड़े-करकट, गंदगी आदि की साफ-सफाई करना मानो एक प्रचलन-सा बन गया था. प्रधानाध्यापक ने भी सभी स्कूली बच्चों को अगले रविवार की छुट्टी के दिन टीम बना कर अपने नेतृत्व में स्कूल और गांव की बजबजाती, गंदी नालियों को साफ करने का ठान रखा था. इसके लिए उसने सभी आवश्यक तैयारियां कर रखी थी. योजनानुसार, रविवार को स्वच्छता अभियान में सारे बच्चे जुट गये.

इस अभियान में कुछ वरिष्ठ बच्चों को टीम का लीडर बनाया गया था, परंतु उस संपूर्ण अभियान की पूरी देख-रेख स्वयं प्रधानाध्यापक कर रहे थे. सुबह से लेकर शाम तक पूरे गांव-मुहल्लों की गलियां गंदगी से मुक्त हो गयी थीं. प्रधानाध्यापक अपने विद्यार्थियों के साथ जब गांव के एक रसूखदार के घर की ओर जाती गलियों की गंदगी को साफ कर रहे थे, उसी समय एक व्यक्ति की घमंड से युक्त वाणी को सुन कर ठिठक गये. ‘‘बच्चों थोड़ा रुक जाओ.

अपने कोमल हाथों से इस तरह गंदगी उठाना शोभा नहीं देता. और तो और, तुम्हें तो गंदगी साफ करने की न तो आदत है, न ही अनुभव. तुम्हें नहीं मालूम कि तेरा गुरु उस जाति से ताल्लुक रखता है, जो समाज में हमारे-तुम्हारे द्वारा त्याज्य गंदगियां चिरकाल से साफ करते आया है. इनके रहते तुम जैसे अनुभवहीन बच्चों से इस तरह गंदगी बिल्कुल ही साफ नहीं हो सकती.’’ यह कहते हुए उस व्यक्ति ने अपने घर की कुदाल प्रधानाध्यापक को थमा दी. प्रधानाध्यापक स्थिर चित्त एवं गंभीर स्वभाव के थे.

उन्होंने उस व्यक्ति के जातिगत अहंकार एवं कुंठा को सहजता से भांप लिया. बच्चों को उस व्यक्ति के वचनों का भावार्थ समझाना उन्होंने उचित नहीं समझा. उधर, सफाई अभियान सफलतापूर्वक पूरा करने का भी दायित्व प्रधानाध्यापक पर ही था. परंतु, प्रधानाध्यापक के मन का समुद्र सदा उस व्यक्ति के वचनों से हिचकोले मारता रहा कि ज्ञान-विज्ञान इतना ऊंचा है, विश्व के सभी प्राणी वैज्ञानिक चमत्कार से एक-दूसरे के इतने करीब एवं परस्पर निर्भर हैं, फिर भी लोग संकीर्ण जातिगत हितों एवं उसकी श्रेष्ठता का राग अलापना क्यों नहीं छोड़ते? जीवन क्षणभंगुर है, यह तो सब जानते हैं पर अपने हितों की बात पूरी करनी हो, तो उन्हें अपना जीवन अनंतकाल तक टिकनेवाला अनुभव क्यों लगता है.

माना कि मैं अछूत हूं. त्याज्य हूं, पर मुझे अछूत बनाया किसने?

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पुनर्जन्म

श्रीधर सरकारी सेवा में रहते हुए भी भ्रष्ट सरकारी सेवकों के कुप्रभावों से अपने को दूर रखकर बड़ी ही ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा के साथ सरकारी कामकाज एवं दायित्वों को समय पर पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ता था. वह अपने बचे समय का उपयोग घर के लोगों को सदआचरण एवं कर्तव्यबोध से सराबोर कारनामें में किया करता था. उसके ही साथ सरकारी सेवा में आए मित्र रामदीन की माली हालत श्रीधर से कहीं ज्यादा अच्छी थी, जिसे देख उसकी पत्नी और बच्चे मन ही मन श्रीधर की नेक नियति को कोसा करते थे पर श्रीधर हर रोज की तरह आत्मविश्वास से लबरेज हो अपनी दिनचर्या का अनुसरण करता. उसे रामदीन की ठाटबाट से कभी भी ईर्ष्या नहीं होती. इसके विपरीत वह रामदीन को ही समझाता रहता कि वह अपने बाल बच्चों पर कम से कम अपना प्रभाव ना छोड़े वरना जब सच्चाई सामने आयेगी तब उनके बेटे-बेटियों भी कहीं उससे नफरत ना करने लगे. रामदीन को श्रीधर की बातें अटपटी लग रही थीं. वह कहता-आखिर तुम्हारे ईमानदार बने रहने से भ्रष्टाचार तो नहीं मिट सकते. फिर तुम इस आचरण को अपनाने में परहेज क्यों करते हो? जहाँ उपर से नीचे भ्रष्टाचार का बोलबाला हो वहाँ सिर्फ तेरे और सिर्फ तेरे भ्रष्टाचारी नहीं होने से क्या मानते हो सिस्टम सुधर जाएगा? कभी नहीं !

किसने कहा मैं सिस्टम में सुधर की बात करता हूँ-श्रीधर ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा. मैं तो वही करता हूँ जो सिस्टम कहता है, चाहता है. मैं तुम्हीं से पूछता हूँ कि क्या सिस्टम यह कहता है कि किसी व्यक्ति का काम हो भी जाए और जबतक उससे कुछ रूपये पैसे ना मिले तब तक यह कहो कि उसका तो काम हुआ ही नहीं, श्रीधर ने बेबाक लहजे में कहा.

अब छोड़ो भी, कहो कैसा चल रहा है? बच्चे सब ठीक-ठाक तो है ना? रामदीन बड़े व्यंग्य के लहजे में पूछा. सब ठीक-ठाक है. बस चाहता यही हूँ कि इसी तरह बाकी बची सेवा कट जाए फिर तो सेवानिवृति के दौरान आयी व्यस्तता में कमी को दूर करने के लिए अभी से ही कुछ साहित्यिक अभिव्यक्ति देने और उसे लिखने की आदत डालने की सोच रहा हूँ, श्रीधर ने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा.

मेरे पास तो तुम्हारे जैसा लिखने-पढ़ने का वक्त बचता ही नहीं है. अब देखो सीनियर आफीसर तो सभी लोगों से सीधे मुँह बात तो कर नहीं सकते. उनकी भी प्रतिष्ठा है. वे रिजर्व रहना ही ज्यादा पसंद करते हैं और इधर लोगों का काम भी होना है. आफीसर कब अंदर और कब बाहर है, इसकी तो मुझे ही जानकारी रखनी पड़ती है. लोगों के पेडिंग काम हो उसे भी आफीसर को देखते हुए मुझे ही खड़े होकर कराना पड़ता है. अगर इस एवज में कोई व्यक्ति मुझे उपकृत करता है तो इसमें किसका नफा और किसका नुकसान?

मेरा तो सारा समय समाज के लोगों के काम निवटाने में ही गुजर जाता है. यूं कहो कि समय ही कम पड़ जाता है. श्रीधर से रहा नहीं गया. वर्षों से वह रामदीन से एक सवाल पूछना चाहता था. आज उसे उस सवाल पूछने का अच्छा अवसर मानों मिल ही गया था. वह रामदीन से पूछ ही बैठा-अच्छा रामदीन बताओ, तुम जो कुछ भी करते हो चाहे वह अपने अफसरों की झूठी चापलूसी हो या फिर अवसरवादी बन सामान्य लोगों से रूपये-पैसे ऐंठने के काम, क्या यह सब अपने बाल बच्चों से या फिर अपनी पत्नी से कभी साझा करके देखा है?

अरे, क्या कहते हो? यह सब भला घर के लोगों के साथ साझा करने की बातें होती हैं? वह विस्मय में आकर बेल उठा. क्यों? आफीसरों से मिलकर उसकी काली कमायी में साझेदार बनकर हर रोज रूपये घर लाते हो और बड़े ही मासूमियत से उन पर झूठी सफेद चादर डाल अपनी भोली-भाली पत्नी के हाथों में डाल जाते हो और बड़े ही गर्व से कमाऊ पति होने का अहसास करा जाते हो. वह भी भोली सूरत लिए बिना कोई प्रश्न किये, पूछने की जरूरत भी नहीं समझती कि तुम रूपये लाए कहाँ से?

मुझे अब भी याद है कि एक बार भाभी के द्वारा इस पर सवाल किये जाने से तुमने उसे सदा के लिए छोड़ देने की धमकी तक दे डाली थी. उस दिन से भाभी तेरी आदत को नियति मान कर हर चीज स्वीकारती आ रही है. तेरी हरकतों का विरोध करने से ज्यादा उसे असहजता से ही सही पर सह लेना उसकी भी मानों नियति बन गई थी.

रामदीन की पत्नी राधा अपने पति की काली कमाई का उपयोग भूल से भी अपने बाल-बच्चों की भलाई में खर्च नहीं करती. रामदीन भले ही अपने मन से जो कुछ उपयोग की वस्तुएं घर लाता, वह अलग बात होती. पर महीने के अंत पर मिलने वाली पगार पर उसका ध्यान बरबस टिका रहता. कभी-कभी माहवारी वेतन देर से मिलने पर उसे असहजता का भी अनुभव होता पर उसे वह ये सोच सहजता से झेल जाती कि देर भले हो पर उसे मिलने में अंधेर तो नहीं ही थी. कुछ दिनों आगे-पीछे वह उसे रामदीन के माध्यम से मिल जाता था और वह महीने भर के बजट को अतिबुद्धिमता से व्यय करने में अपने आप पर गर्व महसूस करती. पर उसका मन हमेशा उद्धिग्न रहता. यह सोच कि कहीं वह भ्रष्ट आचरण में लिप्त रहते-रहते कानून की गिरफ्त में ना आ फंसे. तब क्या वह समाज में उसी तरह मुँह दिखाने के काबिल रह पायेगी? क्या उसके भोले-भाले बच्चे अपने साथियों के बीच उसी स्वाभिमान के साथ अपने सर उठाकर समाज और दुनिया में रह सकेंगे? मैं सोचती हूँ, रामदीन क्यों नहीं सोच पाता? मैं तो उससे कब का कह चुकी हूँ कि मुझे उसकी काली कमायी के रूपये नहीं चाहिए. मैं वैसे भी साधारण परिवार से ताल्लुकात रखती हूँ, पर प्रतिष्ठा की पूछो तो भूल से भी उस पर आँच न लगने दूँ. मैं तो घोर अचरज में पड़ जाती हूँ तब रामदीन अपने बेटों से बड़ी-बड़ी बातें करता है. बडे-बड़े सपने दिखाता है उसे कि वह मन से पढ़ाई कर देश और दुनिया का नाम रौशन करे. बुरी आदतें ना पालें वगैरह-वगैरह. बच्चों को रामदीन समझाने एवं अच्छी शिक्षा देने में कोई कंजूसी नही करता पर खुद वो वैसा करने में क्यों अपने को असहज पाता है, यह सब बातें उसकी पत्नी को हमेशा सालती रहती.

सरकार ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के वर्षों से खाली पड़े विभिन्न पदों की भर्ती का विशेष अभियान चला रखा था. सरकारी दफ्तरों में जाति प्रमाण पत्रों के बनवाने की मानो होड़ सी लग गयी थी. रिक्तियां जो ढ़ेर सारी थीं. इधर प्रमाण पत्र बनाने वालों की संख्या में सभी दफ्तरों में कमी देखी जा रही थी. कुछ लोग अगल-बगल तो कुछ नजदीक संबंधों की दुहाई देकर दफ्तरों में अपना काम समय रहते निकलवाने की जुगत में भिड़े थे. उसी जुगत में रामदीन के बड़े लड़के के दोस्त का बड़ा भाई रमेश भी था जिसने चार दिन पहले अपनी जाति का प्रमाण पत्र लेने के लिए दफ्तर में अर्जी दी थी परंतु अब तक उसे प्रमाण पत्र नहीं मिल पाया था. आज जब उसने दफ्तर में अपने प्रमाण पत्र के बारे में तहकीकात की तो उसे दफ्तर के ही एक कर्मचारी ने 200 रूपये की मांग की थी तो वह ठिठक गया था. उसे याद आया कि क्यों नहीं वह अपने छोटे भाई के दोस्त अनिल से इसमें मदद ली जाए. उसके पिता तो सुना है इसी दफ्तर में काम करते हैं. पर मैं उसे और वे मुझे पहचानेंगे कैसे, उस पर जब प्रमाण पत्र बनवाने वालों की इतनी भीड़ हो. और तो और दो सौ रूपये के लिए अगर मैं पने छोटे भाई का सहारा ले, थोड़ी बहुत पैरवी भी कराउं तो कहीं वे लोग ऐसा ना चोच लें कि हमारी औकात भी क्या इतनी नहीं? फिर कहीं मेरे छोटे भाई की उस परिवार से सहज और प्राकृतिक रूप से उपजी दोस्ती की फसल कहीं ना उजड़ जाए.

सुरेश का ह्दय जरूर विशाल था परंतु जीवन उतना ही कंटकपूर्ण. उसने मन बना ही लिया कि वह अपनी माँ के उसी दफ्तर से प्राप्त बृद्धापेंशन की राशि, जो अब तक पूरी तौर पर खर्च नहीं हो पायी थी, से दो सौ रूपये लेकर कल दफ्तर खुलते ही समय पर वहाँ पहुंचकर अपना काम करवा ही लेगा. सुरेश ने अपने मन की सारी बातें माँ से कह डाली. उधर उसका छोटा भाई पढ़ाई करने के साथ-साथ भाई और माँ के बीच हुए बार्तालाप को सुनता जा रहा था. उसने भी यह ठान लिया कि दोस्ती रहे या जाए पर वह माँ के पेंशन के रूपयों को यूं बर्बाद होने नहीं देगा.

सच कहा गया है कि मजबूरी इंसान को समय से पहले परिपक्व कर देती है जैसे एथीलीन कच्चे फलों को पका देता है. नौकरी के लिए दी जाने वाली अर्जी की अंतिम तिथि भी नजदीक आ चुकी थी. सुरेश माँ के बृद्धापेंशन के दौ सौ रूपये अपनी जेब में लिये पूरे आत्मविश्वास के साथ दफ्तर की ओर कूच कर चुका था. उधर उसका छोटा भाई भी अपनी योजनानुसार माँ के पेंशन के रूपये को बचाने की जुगत में जुट गया था. सुरेश दफ्तर पहुंचता है. जिस व्यक्ति ने उससे प्रमाण पत्र के एवज में रूपये मांगे थे, उसे ईमानदारी से रूपये थमाते हुए ज्यों ही प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए उसकी रजिस्टर में अपना हस्ताक्षर बना रहा था, उसका छोटा भाई देख रहा था. वह और कोई नहीं उसी के दोस्त का पिता था जिसने प्रमाण पत्र के एवज में उसे बडे भाई से दो सौ रूपये लिये थे. सुरेश की नजर अपने लक्ष्य पर थी वह प्रमाण पत्र को अपने सीने से यूं लगाते दफ्तर छोड़ चुका था मानों वह जाति प्रमाण पत्र नहीं उसकी अंतिम नियुक्ति का प्रमाण पत्र रहा हो.

इधर सुरेश के छोटे भाई का दोस्त अनिल उसके छोटे भाई के साथ अपने ही बाप की इस करतूत पर थू-थू कर रहा था. उसकी नजरें जमीन में गड़ी जा रही थीं. वह असहज महसूस कर रहा था मानों उसके पांव तले जमीन खिसक गई हो. वह अपने को कोसता हुआ अपने दोस्त के साथ घर वापस आ गया और सदा के लिए उस दोस्त से अलविदा कहने के अंदाज में अपने दिल की बात कह डाली-‘मुझे भूल जाओ मेरे दोस्त. किसी ने सच कहा है-दोस्ती बराबर वालों में टिकती है. तुम, तुम्हारा परिवार मुझसे कहीं ज्यादा महान है. तेरी और मेरी दोस्ती बराबरी की नही. मैं तुच्छ, तू श्रेष्ठ है.”

उसे अपने दोस्त से यह सब सुन कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. उधर रामदीन की पत्नी की तबीयत कुछ ठीक नहीं चल रही थी और फिर प्रमाण पत्रों के बनाने की भीड़ भी कम होने के चलते रामदीन वक्त से पहले, अपने आफिसर से छुट्टी ले घर लौट आया. घर पर उन बच्चों को देख सहज भाव से पूछ बैठा-अरे, तुमलोग आज स्कूल नहीं गए? इम्तिहान भी तो तुम लोगों के नजदीक हैं. यूं ही वक्त जाया नहीं करते. यह तो संयोग है कि मैं आज सबेरे ही आफिस से चला आया और तेरी चोरी पकड़ी गई. अभी से संभल जाओ वरना इम्तिहान में अच्छा ना कर पाओ तो हमें नहीं कोसना.

सच कहा बापू. यह संयोग है कि मेरी चोरी पकड़ी गई. पर उससे भी बड़ा संयोग….यह कहते उसने दफ्तर की सारी घटना उसे सुना दी. रामदीन को मानो सांप सूंघ गया हो. वह जितना अपने सर को छिपाना चाहता उतना ही बेपर्द होता जा रहा था. वह अपने किये पर खुद को धिक्कार रहा था. उसे रह-रह कर श्रीधर की बातें झकझोरती जा रही थी. उसने प्रायश्चित करने का ठान लिया कि वह तब तक दफ्तर नहीं जाएगा जब तक कि इस शहर से उसका स्थानांतरण ना हो जाए. उसने अपने बेटे और उसके दोस्त को गले लगा लिया और माफ कर देने एवं विनती के लहजे में, आँखों में प्रायश्चित के आंसुओं का समुद्र संजोये, अपनी पत्नी के कंधे पर अपना सिर इस तरह रख डाला मानों वह पुनर्जन्म की तलाश कर रहा हो.

राजेश कुमार पाठक
पॉवर हाउस के नजदीक
गिरिडीह-815301
झारखंड़

डायरी

ब देखो कुछ-न-कुछ लिखते ही रहते हो। कभी अपनी बेटी के बारे में भी सोचा करो। बड़ी हो रही है। घर से बाहर भी निकला करो, सरकारी कामकाज तो होने ही है। इसी काम-काज के बीच समय निकालकर रिश्ते तो ढूंढ़ो। समय पर सब कुछ हो जाय भला यह कौन नहीं चाहता ? पत्नी की रोज-रोज की यह नसीहत सुनकर रामेश्वर उब चुका था। मन ही मन सोचता, कहाँ जाऊं? किससे अपनी बेटी के लिए हाथ मांगूं ? हाथ भरे हों तो सबका साथ मिल जाये, ना हो तो अपने भी पराये नजर आते हैं। और तो और शादी के लिए पैसे कैसे जुटाऊं? लड़के वाले बिना कुछ लिए हां भी कह दे तो उनकी प्रतिष्ठा को ढंकने के लिए दो-चार लाख तो खर्च करने ही होंगे। मंहगाई भी तो सर चढ़ कर बोल रही है।

क्या सोचते हो ? मंहगाई है तो बेटी की शादी नहीं करोगे ! जिंदगी भर अपने ही घर रखोगे? अरे! बिना कुछ किये घर बैठे ही सब कुछ मान लेने से नहीं होता। कल रामदीन का फोन आया था। कह रहा था-दिल्ली में एक लड़का प्राइवेट कंपनी में तीस हजार माहवारी पर नौकरी में है। देखने-सुनने में भी अच्छा है। ममता पर खूब फबेगा। दोनों की जोड़ी अच्छी जमेगी। चाचा से कहो वे इस लड़के पर जरूर जायें। समय साथ दिया तो जोड़ी जरूर लगेगी।

सोचता हूँ कि पहले थोड़ा बहुत ही सही पर इतना तो इंतजाम कर ही लूं कि अगर लड़के वालों ने हां कर दिया तो थोड़ा वक्त लेकर रिश्ता कर जाऊँ। ”चिंता क्या करते हो ? आजकल तो लड़के वाले खुलकर दहेज की बात भी नहीं किया करते। उन्हें भी तो कानून से डर होता है। उस पर भी अजनबी अनजान लोगों से रिश्तों की बात करते”, पत्नी ने कहा।

सच कहती हो, डर तो उन्हें भी रहता है। पर बिन मांगे भी इतना कुछ मांग जाते है जिसे तुम सोच भी नहीं सकती।
वह कैसे ? पत्नी ने बड़े ही आश्चर्य से पूछा ।

बहुत नादान हो। पर वे नादान नहीं होते। बदल रही परिस्थितियों से वे बहुत ही सावधान रहते हैं। तुम क्या सोचती हो, मैं रिश्ते नहीं ढूंढ़ रहा। ढूंढ़ रहा हूँ। रामदीन जिसकी बात करता है उनसे मेरी बात भी हो चुकी है। बहुत ही प्रभावशाली लोग है। समाज में भी काफी पूछ है। उन्हें तिलक-दहेज में कुछ नहीं चाहिए। वे दहेज के विरोधी हैं। दहेज विरोधी संघ और संगठन भी चलाते हैं। खाता-पीता परिवार है। बेटी उस घर जाएगी तो समझो राज ही करेगी।

अरे! तब तो इससे अच्छा और कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता। कितना अच्छा है रामदीन। कितनी खबर रखता है। अभी मैं उसे फोन पर बताती हूँ।

इतनी भी जल्दी क्या है ? पूरी बात तो हो जाने दो।

अब कौन सी बात पूरी हो जाने दूं? अब क्या रामदीन को शादी हो जाने के बाद शादी की खबर दोगे? वह भी भला क्या सोचेगा? पत्नी ने बड़े कौतूहल से अपनी बात कह डाली।

रामेश्वर अपनी पत्नी के भोलेपन पर मन-ही-मन तरस खा रहा था। मन-ही-मन सोच रहा था, कितनी भोली है रे तू! इतनी भोली मानो एक हिन्दुस्तानी औसत पढ़ी लिखी लड़की शादी के बाद अपनी बचीखुची समझ भी अपने पति के दामन में भर जाती है और कर जाती है अपने को अपने देवता समान पति पर निढाल।

रामेश्वर अपनी पत्नी को सच्चाई बताते हुए आखिरकार कह ही जाता है कि लड़के वाले ने बिन मांगे बहुत कुछ मांगा है। लड़के वाले ने तो साफ-साफ सहज भाव से कह डाला है कि आजकल तो सौ ग्राम सोने के जेवर तो लड़की वाले बिना कुछ कहे बनवा ही देते है। अपनी बेटी से बाप कितना प्यार करता है यह तो अपनी बेटी को दिये जाने वाले कार के मॉडल से तो तय हो ही जाता है और सामाजिक प्रतिष्ठा किसे प्यारी नहीं होती। उसकी रक्षा और उसका मान तो हम भारतीय भली-भांति करना जानते ही है। मतलब यह कि बारातियों के रहने-खाने, आने-जाने की मुक्म्मल व्यवस्था से तो लड़की वालों की ही मर्यादा बढ़ती है। बारात में आए लोग उनकी अच्छी व्यवस्था को सदा ही याद रखते है, तारीफ करते है और तारीफ के लिए इतना कुछ किया जाना न बुरी बात है और ना ही बड़ी बात।

बस करो, मैं समझ सकती हूँ। कालचक्र कितना पीछे या फिर कितना आगे जा चुका है मैं कह नहीं सकती पर इतना सच है कि अब तुम्हारे अंदर उपज रही पीड़ा को मैं सह नहीं सकती। मैं भले तुम्हारी लिखी गंभीर बातों को पढ़कर भी नहीं समझ सकती पर बिना पढ़े ही समझ सकती हूँ, तेरे चेहरे पर समाये उस भाव को जो बरबस तुझे घाव दे जाता हो।

पर अंदर से रामेश्वर को वह रिश्ता पंसद था। रह गई बात रूपये-पैसों के इंतजाम की, तो वह आज नही तो कल तो करना ही था। भले कम या ज्यादा। वह सोचता- पता नहीं फिर आगे कोई बेहतर रिश्ता मिल पाये या ना मिल पाए। वह इस रिश्ते को अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहता था। रामदीन की मदद से शादी की तारीख भी तय हो गई। दो महीने बाद रामेश्वर के घर बारात आने वाली थी। वह तन-मन से उन सारी व्यवस्थाओं को पूरा करने में जुट गया जिसे पूरा किया जाना निहायत जरूरी था। अपनी तमाम व्यस्तता के बावजूद वह डायरी लिखना नहीं छोड़ता था। शादी की रात भी जब वह डायरी में कुछ लिख रहा था तभी उसकी पत्नी उसकी डायरी झटके में छीनती हुई आदेश के लहजे में बोल बैठी-आज ऐसा भी क्या जरूरी है कि डायरी लिखो।

आज मेरी बेटी की शादी है। क्या यह भी ना लिखूं? रामेश्वर ने बड़े ही कातर लहजे में अपनी पत्नी से कहा।

यह तो एक क्या अनेक जगहों पर लिखी हुई है, फिर डायरी में हर बात लिखी ही जाये यह क्या जरूरी है? यह कह कर रामेश्वर की पत्नी ने एक कमरे में उसकी डायरी छिपा दी।

रामेश्वर भी आगे बिना जिद किये लोगों की आवभगत में जुट गया। सब कुछ अच्छे से गुजर गया। शादी संपन्न हुई बारात भी बिदा हो गयी। बेटी की बिदाई का दर्द लिए रामेश्वर अपनी पत्नी की भावुक आँखों में खुद को भी निहारता रहा। अचानक उसे अपनी भावनाओं को डायरी में कैद करने की सूझी तो डायरी खोजने से भी नहीं मिल रही थी। शादी वाले घरों में कुछ दिनों तक सामानों के अस्तव्यस्त होने की स्थिति सामान्य तौर पर अधिकांश घरों में पायी जाती है। वैसी ही स्थिति रामेश्वर के घर की भी थी। डायरी नहीं मिल रही थी और रामेश्वर की बेचैनी उतनी ही बढ़ती जा रही थी।

आखिर क्या रखा है उस डायरी में? नहीं मिल पा रही है तो नयी खरीद लो। वैसे भी साल तो लगने वाला ही है। नयी तो खरीदनी ही है, पत्नी ने सहज भाव से कहा। कुछ महीने पहले भी तो तेरी डायरी गुम हो गई थी तो इतने बेचैन तो नहीं हुए थे। क्या कुछ खास है उस डायरी में? मुझे तो अब शक हो रहा है तेरी नेक नीयती पर। कहीं तुम वह सब तो नहीं लिख रहे जो बच्चे पढ़ जाएं तो तुझे तेरी ही नजरों में झुकना पड़ जाए? आखिर क्यों यह सब लिखते हो? अच्छी बातें लिखा करो। क्या अब प्यार-मोहब्बत की बातें लिखना शोभा देती है, तुम्हें? पर तुम हो कि मानते ही नहीं। अब मुझे बातें समझ में आ रही है कि जब भी मैं तेरे डायरी लिखते वक्त सामने आती थी तो तुम क्यों मुझे बहला-फुसलाकर मेरी दिशा ही मोड़ देते थे। पत्नी एक ही सांस में कह गयी।

रामेश्वर मन ही मन सोच रहा था कि अब भी कितनी नादान है मेरी पत्नी। मन ही मन कहता, वह तो सिर्फ और सिर्फ उसे ही प्यार करता रहा है। परिवार की परवरिश का बोझ तो उसकी यही नादानी और निश्छलता से हल्का करते आया हूँ पर वह भी बेचारी क्या करे।

उधर ब्याही गयी बेटी के ससुर दीनानाथ को वह डायरी हाथ लग जाती है। संयोगवश वह डायरी बेटी के सामान के साथ समधी के घर तक पहुंच गयी थी।

रामेश्वर की डायरी पढ़ते ही दीनानाथ अवाक हो गया। उसे लगा कि धरती पर रामेश्वर जैसे ही बाप होने चाहिए जिसने अपनी बेटी के लिए सर्वस्व लुटाते हुए भी स्वयं को उसका कर्जदार मान रहा है। दीनानाथ को अपने रसूखदार होने का भ्रम जाता रहा। असली रसूखदार होने का हकदार तो रामेश्वर है जिसने अपनी ममता के लिए बची-खुची सारी ममता ही मेरे घर भेज दी।

डायरी में जो बातें लिखीं थी वह यूं थी-”एक बाप ने अपनी बेटी को जन्म दिया, उसकी परवरिश की, पढ़ाया-लिखाया पर अब सामाजिक रिश्ता और बंधन की डोर में उसे बाँधा तो खुद ही कर्ज की डोर से बँध गया।

पर कर्ज की डोर में बँधकर भी बाप होने का फर्ज निभाने का सुखद अहसास उस कर्ज की डोर को झकझोर कर तोड़ देने की हमें ताकत देगी।

तुझे यह जानकर खुश होना चाहिए कि तेरा बाप अन्य सरकारी मुलाजिमों की तरह अनैतिक साधनों से धन-दौलत अर्जित न कर अपनी ईमानदारी एवं कर्तव्य-निष्ठा के साथ जीवन बिताया है। तुझे अभी उतना भी क्या मालूम कि यह सब चीजें कितनी ताकतवर होती हैं? आज उसी ईमानदारी और कर्तव्य-निष्ठा के चलते कुछ लोगों ने इस शादी में रूपये-पैसों से मदद की जिसे मैं उनका अपने ऊपर कर्ज मानता हूँ, भले ही वे इसे अपना फर्ज कह भूल जाना चाहते हों। मेरी इस डायरी के अंतिम पन्ने में कुछ लोगों के नाम-पता-संपर्क नंबर एवं उनके द्वारा प्रदत्त की गई राशियाँ अंकित की गई है जिसे मैं वक्त रहते वापस कर देने का पूरा प्रयास करूंगा अन्यथा सेवानिवृति के समय तो यह प्रयास हर हाल में पूर्ण हो जाएगा।

परंतु जिंदगी और मौत का क्या भरोसा? अपनी मौत से पहले अगर ऋणमुक्त हो सका तो समझूंगा कि मैं पुत्री ऋण से मुक्त हो सका अन्यथा मेरी मौत के बाद के धन का क्या जिसपर मेरा अधिकार ना हो और भले दुनिया उसे मेरी ही माने।

रोना नहीं। आंसुओं को बचाकर रखो। कहीं तेरे आंसुओं से उनके नाम न धुल जायें जिनके नामों को डायरी के अंतिम पन्ने में जाकर पढ़ना अभी शेष है।”

डायरी पढ़ने के बाद दीनानाथ ने रामेश्वर को अपने शुभचिंतकों से प्राप्त शादी के लिए रकम को लौटाने का मन बना लिया था। जितनी राशियाँ उस डायरी में लिखी थीं उतनी राशियाँ लेकर वह बिना विलंब किए उसके घर की ओर प्रस्थान कर चुका था। इधर रामेश्वर हर रोज की तरह समय पर अपने कार्यस्थल पर था। अचानक घर में दस्तक पर रामेश्वर की पत्नी ने जब दरवाजा खोला तो वह अपने घर पर नये समधी को पायी। दीनानाथ ने रामेश्वर के बारे में पूछा-कहाँ है रामेश्वर? रामेश्वर की पत्नी कुछ समझ नहीं पा रही थी कि आखिर नये संबंधी अचानक, बिना कोई सूचना दिए उसके यहाँ क्यों पधारें? ज्योंही दीनानाथ ने डायरी का उच्चारण किया, उसके पांव तले जमीन खिसक गई। उसे लगा कि प्यार-वार का राज खुल गया। अब वह किसे मुंह दिखयेगी। रूंधे स्वर में दीनानाथ से बैठने का आग्रह करती हुई अपने पति को फोन से उनके घर आने की सूचना दी। रामेश्वर आधी छुट्टी लेकर दौड़ा-दौड़ा घर आया। दीनानाथ रामेश्वर को गले लगा लिया। दीनानाथ के हाथ में डायरी देख, रामेश्वर को सभी स्थितियों का स्वतः अहसास हो गया था। रामेश्वर की पत्नी को यह सब कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह सब क्या हो रहा था। दीनानाथ रूपयों से भरे उस बैग को रामेश्वर के हाथों में जबरन थमाते हुए कहा कि वह कर्ज से अभी और इसी वक्त अपने को मुक्त समझे।

राजेश कुमार पाठक
पॉवर हाउस के नजदीक
गिरिडीह-815301
झारखंड

बंटवारा

विजय मैंट्रिक की परीक्षा पास कर अपने गांव के बगल वाले शहर से सटे कॉलेज में दाखिला लेना उचित समझा। कारण यह था कि ऐसा कर वह अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी दादी की देखभाल भी समुचित तरीके से कर सकता था। उसकी दादी मां भी ऐसी थी कि उसके बिना वह एक पल भी गुजारने में असहज महसूस करती थी। विजय के पिता गैर सरकारी स्कूल में काम चलाऊ पगार पर एक शिक्षक थे जो गांव से दूर एक शहर में स्थित था|

विजय के बड़े बाबूजी एवं उसके पिता के बीच घर एवं संपत्ति का बंटवारा हो चुका था। उसे अब भी याद है कि जब सारी साझी संपति का बंटवारा हो चुका था तो दादी मां ने गुस्से में आकर कहा था-‘सब कुछ जो साझा था उसका तो बंटवारा तुम दोनों ने कर डाला। मैं भी तो साझी हूँ। मां तो दोनों भाईयों की हूँ। बता मेरा बंटवारा कैसे करेगा ? क्या मुझे डगरे के बैगन की तरह कुछ दिन इसे और कुछ दिन उसके साथ बिताने कहोगे ? बंद करो यह सब। मैं बंटवारे को नहीं मानती। क्या सब बांटा तुम दोनों ने ? क्या-क्या किसके पल्ले पड़ा ? वही दो बीघे जमीन में एक बीघा छोटे को ओर एक बीघा बड़े को। और था ही क्या तेरे पास ? अब बता मुझे कैसे बांटेगा? क्या मेरे भी दो टुकड़े करेगा ?’ दादी मां की आँखें नम हो गयी थी। वह और भी कुछ बालना चाह रही थी पर रूँधे स्वर जुबान नहीं बन पा रहे थे।

मुझे याद है उन दोनों पर दादी मां के ह्दय में बंटवारे के चलते उमडी पीड़ा भी असहनीय दिख रही थी। बंटवारा होना था तो हुआ। पंचों ने फैसला देते हुए कहा कि मां किसकी ओर रहेगी यह लॉटरी बतायेगी। उसने दोनों बेटों के नाम के पुर्जे बनाए और एक छोटे नादान बच्चे से उस पुर्जे को उठा लेने को कहा। उठाये गए पुर्जे में विजय के पिता का नाम लिखा था। पंचों ने बंटवारे पर अंतिम मुहर लगाते हुए दो संयुक्त परिवार को अलग-अलग विखंडित कर अपने को सफल बंटवारा करवाने का गुमान पाले उस स्थान को छोड़ चला था। दादी मां के टुकड़े ना होकर भी विभाजन हुआ था।  अब वह और विजय उसके हिस्से आये एक कमरे में साथ-साथ रहने लगे। साथ खाना, साथ सोना। दोनों की यही दिनचर्या बनने लगी। दादी मां विजय को दादी और मां दोनों की ही ममता उंडेलते रहती। विजय भी खुश रहने लगा। दादी मां के हाथ की बनी सब्जी-रोटी हो या सिर्फ रोटी और उसमें लपेटी नमक-तेल उसे सब भाने लगा।

इधर विजय के बड़े बाबूजी अपने क्रूर स्वभाव को पाले जब-तब दादी मां को भी नहीं बख्शते थे। बात-बात में लड़ते रहते थे। बड़ी मां तो और उनके क्रोध के आग में चुगली की घी भर-भर कर दादी मां के विरूद्ध ज्वाला भड़काती रहती। बड़े बाबूजी का भी एक बेटा था-अजय। दुनिया को नहीं मालूम पर मुझे तो सब मालूम था कि दादी मां उसे भी उतना ही प्यार करती थी जितना कि वह मुझे। पर बड़ी मां थी कि वह अजय और दादी मां के मधुर संबंधों को भी कटुतापूर्ण एवं बढ़ा-चढ़ा के बड़े बाबूजी के पास रखती थी जिससे वे बड़े उद्वेलित होते रहते थे।

वक्त के साथ अजय और विजय को यह अहसास होने लगा था कि दादी मां उन दोनों को बेंइंतहा प्यार करती थी। उन्हें उन दानों में ही बेटे और पोते होने का सुकून मिलता था। दादी मां स्वस्थ रहे इसके लिए विजय के बाबूजी एक ग्वाले के यहाँ से आधा लीटर दूध नियमित पहुँचाने को कह रखा था। दादी मां को दूध में रोटियां डालकर खाने में अतिशय संतुष्टि मिलती थी। अजय के बाबूजी पूर्णरूप से खेती एवं कुछ लोगों के यहाँ पुरोहित वृति से अपना घर किसी तरह चला पा रहे थे। इधर कुछ मौसम की मार के चलते पैदावार भी मन लायक नहीं हो सकी थी। सच कहूँ तो उनकी माली हालत खस्ता होते जा रही थी पर दादी माँ को विजय के बाबूजी के चलते खान-पान जहाँ तक दूध आदि मिलने में कोई कोर कसर नहीं रह रही थी।

दादी मां मन ही मन सोचती अजय का इसमें क्या दोष? सो वह चोरी-छिपे ही सही अपने हिस्से वाले दूध से थोड़ा बहुत दूध अजय को पिला ही देती। ऐसा करने से उसे अजब का सुकून मिलता था। आखिर वह भी तो उसका पोता था। अजय के मना करने पर भी वह उसकी बात नहीं मानती थी। अजय कहता-‘दादी मां, यह सब क्यों करती हो ? यह दूध तो तेरे लिए आता है। फिर विजय भी तो दूध नहीं लेता है। उसे तो तुम दूध नहीं देती क्या ? तुम भूल गई हो कि तुम मेरे हिस्से नहीं पड़ी हो। पंचों ने तो तुम्हें विजय के बाबूजी के हिस्से डाल दिया है। छोटे बाबूजी को यह सब पता चला तो मुझे क्या, तुझे दूध मिलना भी बंद हो जाएगा।’

कैसे पता चलेगा ? मैं विजय को थोड़े ही बताती हूँ। वह तो पढ़ाकू है। पढ़ने-लिखने में ही इतना व्यस्त रहता है कि उसे पता ही नहीं चलता कब शाम और कब सुबह हुआ ? दादी मां ने बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा। पता चल भी जाए तो क्या होता है ? तू अपनी तुलना दो तोले दूध से करता है। मैं दूध छोड़ सकती हूँ, तुझे नहीं। पर मैं नहीं चाहता कि मेरे चलते तुम पर कोई आफत आए, अजय ने गंभीरता से कहा।

विजय अपनी पढ़ाई के साथ-साथ दादी मां और अजय के इस तरह वार्तालाप करते अक्सर  चोरी-छिपे देख-सुन ही लेता था। वह मन ही मन कहता-वाह री, दादी मां। कितना विशाल है तेरा ह्दय। तुझे क्या पता तेरी ऐसी हरकत से मुझे कितनी उर्जा मिलती है ? आज सचमुच में मुझे अहसास हो रहा है कि तन बंट सकता है, धन बंट सकता है पर मन अगर चाह ले तो वह नहीं बंट सकता। मुझे तो अब शक होने लगा है कि दोनों बापुओं के रगों में तेरा भी खून दौड़ता है या नहीं ? माफ करना दादी मां, यह सब मैं मन में सोचता हूँ। बोलकर पाक रिश्तों को नापाक करना नहीं चाहता। तुझे क्या पता मैं अजय से कितना प्यार करता हूँ। बस प्यार करता हूँ उसका इजहार नहीं कर पाता। डरता हूँ। बड़े बाबूजी इसे किस रूप में लेंगे। उन्हें तो पता चलते ही रहना चाहिए कि हम दोनों के बीच बंटवारा जो हुआ है।

हर रोज की तरह आज भी अजय दादी मां के साथ अपने मां-पिता से नजरें चुराये दूध-रोटी खा ही रहा था कि अचानक उसके कंठ में आयी हिचकी और उसके चलते उल्टी ने दादी मां को निष्प्राण कर दिया। अजय दूध के साथ खून की उल्टी करने लगा। दादी मां की आँखें फटी की फटी रह गयी। अजय परेशान हो विजय के घर से बाहर निकलकर मां, दादी मां कह कर चिल्लाना शुरू कर दिया। अगल-बगल, आस-पड़ोस के लोग वहां जुट गए। भीड़ लग गई। बड़े बाबूजी को यह समझते देर ना लगी कि अजय दादी मां के साथ दूध रोटी खाते-खाते ऐसी अचेतन अवस्था में आ चला था। अपने बेटे की ऐसी हालत देख बड़ी मां दादी मां पर बिफर पड़ी। कहने लगी-‘बड़ी शौक है छोटे बच्चे के साथ खेलने का तुझे। पैदा ही क्यों नहीं कर लेती है ? बूढ़ी हो चली है, पता भी है तुझे ? बच्चे को होने दो कुछ, फिर बताती हूँ। दूध रोटी दे देकर मेरे बच्चे को ही खा जाना चाहती हो ना ? तो खा जाओ। फिर देखना सरेआम तेरा सिर मुड़वाकर पूरे गांव में नहीं घुमाया तो मैं भी असली बाप की बेटी नहीं।’

बड़ी मां की ऐसी घटिया बोली सुन विजय का माथा सुन्न हो गया था। उसे अजय से ज्यादा दादी मां की चिंता होने लगी जिसे बड़ी मां की कटु बातें सुन कर काठ मार गया था। दादी मां को ऐसा लग रहा था कि धरती फटती और वह उसमें समा जाती। दादी मां की जिजीविषा मृतप्राय हो चली थी।

पड़ोस वालों की मदद से गांव के स्वास्थ्य उपकेन्द्र से डॉक्टर आ चुके थे। जाँच करने पर पता चला कि अजय को चोरी-छिपे मिट्टी खाने की आदत थी जिसके चलते उसके अंदर एक नई बीमारी ने अपना स्थान बना लिया था। उल्टी उसी नई बीमारी के चलते हुयी थी। पर बड़ी मां डॉक्टर के उस बात को मानने के लिए तैयार ना थी। उसे तो दादी मां का सिर नीचा दिखाना ही रह गया था सो वह उस पर दोषारोपण करती जा रही थी। अजय को दवा मिलने से कुछ राहत महसूस हो रही थी। इस घटना के बाद बड़ी मां का फरमान जारी हुआ कि आज से अजय दादी मां के दरवाजे नहीं चढ़ेगा।

इधर दादी मां अंदर ही अंदर बड़ी मां के अपशब्दों के वाण से मर्माहत हो चली थी, घर के एक कोने में बेसुध पड़ी विजय-विजय पुकार रही थी। विजय दौड़ा-दौड़ा दादी मां के पास गया। उसके हाथों को अपने गाल से लगाया तो अतिशय शीतलता महसूस की। शायद यह सच था कि दादी मां इस दुनिया में नहीं रही थी। विजय को लगने लगा कि काश उसे भी दादी मां के साथ दूध रोटी खाने का अवसर मिला होता। वह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसे दर्दनाक मोड़ पर वह किसका सहारा ढूँढ़े। क्या वह बड़े बाबूजी और बड़ी मां से कह डाले कि उसने उसकी दादी मां को सदा के लिए उससे छिन लिया ? रात्रि का समय था। विजय ने जैसे ही दादी मां की मौत की खबर बड़ी मां और बड़े बाबूजी को दी दोनों ही ने मां मां कह कर गगनभेदी स्वर में रोना चिल्लाना शुरू कर दिया। विजय सोच रहा था शायद उनके यह घड़ियाली आँसू रहें हों। जीते जी दादी मां तो आँसुओं की घूँट पीती रही, आपसी संबंधों और बंटवारे को लेकर और आज जब नहीं रही तो…..

सुबह दादी मां की अर्थी उठ रही थी और उधर दूधवाला हर रोज की तरह उस रोज भी दादी मां के लिए वही आधा लीटर दूध लेकर आ पहुँचा था। पर दूध कौन और किसके लिए ले। दादी मां तो सदा के लिए जा चुकी थी।

राजेश कुमार पाठक
प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक,
गिरिडीह-815301, झारखंड

बूटपालिश

एक गरीब लड़का था। चौदह साल की उम्र होते-होते उसके ऊपर मां-बाप का स्नेहिल साया उठ चुका था। अब वह और उसकी छोटी बहन किसी तरह अपनी जिंदगी आस-पड़ोस के लोगों की कृपा पर गुजारने को मजबूर हो गये थे। गांव का माहौल था। कोई शहरी संस्कृति थी नहीं। जीवनयापन के लिए गांव के लोगों द्वारा ही खाने-पीने, पहनने आदि में जो दिक्कतें उन्हें होती थी, उसे मिलजुल कर पूरा कर दिया जाता था। रोहित अपनी बहन रीना के साथ हर रोज स्कूल भी जाता था। मनोयोग पूर्वक दोनों पढ़ाई भी करते थे। पढ़ाई-लिखाई में वे दोनों भाई-बहन उतने तेज नहीं पर उतने भी कमजोर नहीं कि स्कूल के शिक्षक उन्हें भोंदू समझें।

मजबूरियां ही ऐसी थी कि दोनों भाई-बहन भविष्य में पढ़-लिखकर छोटी ही सही पर एक निश्चित आमदनी वाली सरकारी अथवा गैरसरकारी नौकरी प्राप्त करने की मंषा पालते हुए पूरी तन्मयता से पढ़ाई में जुटे रहते। रोहित का मन नहीं मान रहा था। उसे हर रोज आस-पड़ोस के लोगों पर बोझ बनकर जीवन गुजारने में कई बार हीन भावनाओं का भी शिकार होना पड़ रहा था। उसने इसी तरह ढ़ेर सारी बातें मन में लिए, सो रही अपनी छोटी बहन को जगाया और मन की बात कह डाली।

पर भैया, आखिर ऐसा भी तुम कौन सा काम कर पाओगे कि घर में उतने पैसे आ जाएं कि हम दोनों को अपने ही पड़ोसियों पर बोझ ना बनना पड़े, रीना ने पूछा। कुछ पैसे अगर कहीं से मिल जाते तो मैनें सोचा है कि बूट पाॅलिश का समान बगल के शहर से खरीद लूं और फिर सुबह और शाम वाली लोकल ट्रेनों के समय में लोगों के बूटों की पाॅलिश कर हर रोज कुछ-न-कुछ रूपये कमा लाउं। क्योंकि बापू के जूतों को हर रोज साफ करते रहने से मुझे इस काम को बखूबी कर पाने में कोई परेशानी नहीं होगी। तुम्हें यह पता तो होगा ही कि जब मैं बापू के जूतों को बिना पाॅलिश के ही इस कदर साफ कर देता था कि वे भी दंग रह जाते थे।

कहा करते थे-‘ऐसी चमक तो मोची के बूट पाॅलिश से भी नहीं आ सकती थी’, रोहित ने अपनी बहन के मन को टटोलते हुए कहा। वह सब तो ठीक है भैया, पर इसके लिए भी दो-चार सौ रूपये तो चाहिए ही। पाॅलिश, क्रीम, ब्रस और फिर उसके काठ के बक्से वगैरह के लिए। लोगों से तो रूपये मांगना ठीक नहीं। वे तो इतना ही रहम कर दे रहें है, वह कम थोड़े ही है ? रीना कुछ अफसोस जताते कह गई। पर इतना कहते ही उसे अपने पिता के बटुए की याद आई। वह खुशी से उछल पड़ी।

बोलने लगी-निराश मत हो भैया, बापू की थोड़ी बहुत बुरी आदतों पर उनके द्वारा किए जा रहे खर्चों से तंग आकर एक बार मां ने उनके बटुअे को ही घर में बेकार पड़े घड़े में छिपा कर रख दिया था। मां ने मुझसे कहा भी था कि मैं बापू को नहीं बताउं। मां भी तो भुलक्कड़ थी। मिल जाए तो शायद तेरे काम भर पैसे की जुगाड़ हो जाए। देखो, देखो, ढूंढो-रोहित ने कहा। रीना को वह बटुआ मिल चुका था। दोनों ने उस बटुए में पाए गए कुल 545 रूपये गिनकर निकाले। खुशी से झूम उठे दोनों। रविवार का दिन था।

सुबह-सुबह दोनों भाई-बहन बगल के बाजार से बूट पाॅलिश के सारे सामान खरीद लाए। समान खरीदने एवं उसे घर लाने तक में उस पर किसी आस-पड़ोस के लोगों की नजरें नहीं पड़ी। घर से लेकर गए पुराने थैले में भर कर जो ला रहे थे। अब रोहित हर रोज अपने गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर शहर के बीचों बीच स्थित रेलवे स्टेशन पर जाकर यात्रियों के बूट की पाॅलिश करता, कुछ भी हो पर वह हर रोज 15 से 20 जूतों की पाॅलिश कर ही देता था जिससे उसे सौ रूपये तक की कमाई हो जा रही थी अैर इस काम में समय भी दो घंटे से ज्यादा नहीं लगते थे। घर से निकलते, वापस होते एवं प्लेटफार्म पर बूट पाॅलिश करते वह हमेशा सचेत रहता कि उसे कोई चिरपरिचित या फिर गांव के जान-पहचान के लोगों से ना भेंट हो क्योंकि वह जानता था कि अगर गांव के या फिर आस-पड़ोस के लोग उसे बूट पाॅलिश करते देखेंगे तो उनके उच्च जाति के होने के चलते सगे-संबंधियों की मानहानि होगी।

पर स्थिति भी कुछ ऐसी थी कि वह इस काम को छोड़ना नहीं चाहता था। रोजी-रोटी का जो सवाल बन गया था। वैसे उसे पता था कि गांव के ही एक उच्च जाति के लोग कोलकाता में जूते का व्यवसाय करता था पर उसे तो लोग हेय दृष्टि से ना देखकर सम्मान से ही देखते थे। लोग उसके बूट पाॅलिश के काम को भला गिरी नजरों से क्यों देखेंगे ? इतना कुछ होने पर भी वह अपने झोले में रखे बूट पाॅलिश के सामान के उपर कुछ किताबें रख लिया करता था। जब कभी भी लोग आते-जाते पूछ भी बैठें या फिर झोले को देखना भी चाहें तो उसके उपर रखी किताबें ही नजर आए और फिर वह कह दे कि वह शहर के शिक्षक से ट्यूशन पढ़कर आ-जा रहा है।

समय बीतता गया। रोहित और उसकी बहन रीना दोनों खुश रहने लगे। बूट पाॅलिश करने के बाद रोहित घर लौटकर रीना के साथ मिलकर दोंनों अपने लिए खाना भी बना लेते। आस-पड़ोस के लोगों को यह सबकुछ समझ में नहीं आ रहा था। तब रोहित ने लोगों से स्पष्ट कह दिया कि वह शहर जाकर शाम में दो-तीन ट्यूशन अपने से जूनियर लड़कों का पकड़ रखा है जिससे उसे कामभर पैसे मिल जाते है। अब लोगों पर वह बोझ बनकर भी नहीं रहना चाहता है। वैसे वक्त बेवक्त वह अपने पड़ोसियों से कुछ मदद मिल जाये उससे भी वह गुरेज नहीं करता था। कारण था कि कहीं उनकी भावनाओं को ना ठेस पहुंच जाए कि बुरे वक्त में जब जरूरत थी तो लोगों की सहानुभूति ली और अब जबकि उसकी स्थिति अपने बूते ठीक होने लगी तो उन्हें वह भूल गया।

जाड़े का मौसम था। रोहित सर पर चादर ओढ़े था। वह बूट पाॅलिश के लिए अपने झोले से सामान निकाल ही रहा था कि एक व्यक्ति ने पूछा-बूट पाॅलिश करोगे क्या ? कितने लोगे ? देखा तो उसका सिर घूम गया। क्लास में उसे सबसे अधिक चाहने वाले शिक्षक रामप्रसाद खड़े थे। क्या सोचते हो ? क्या बूट पाॅलिश नहीं करोगे ? ट्रेन भी आने वाली है। हो सके तो जल्दी करो। अपनी पहचान छिपाये रोहित अपने गुरूजी के जूते को पाॅलिश पूरी तन्मयता से कर डाली। जब रामप्रसाद ने पैसे के बारे में पूछा तो रोहित ने अपनी आवाज में थोड़ा भारीपन लाते हुए कहा कि वह पहली पाॅलिश बिना कोई दाम लिए करता है।

आपके जूतों की पाॅलिश मेरी आज की पहली पाॅलिश है। अतः मैं उसके कोई दाम नहीं लूंगा, रोहित ने स्पष्ट कह दिया। रामप्रसाद को यह बात समझ में नहीं आ रही थी कि कोई भी व्यक्ति तो अहले सुबह या फिर अपने शुरू के कामों में तो बोहनी के नाम पर कुछ-न-कुछ तो लेता ही है। यह तो पहली दफा ही मैं सुन रहा हूं कि कोई अपने शुरू के काम में कुछ नहीं लेता है। खैर, जैसी तेरी मर्जी या फिर जैसा तेरा उसूल। यह कहकर रामप्रसाद अपने गंतव्य तक ले जाने वाली ट्रेन के डब्बे में अपने लिए जगह बनाने में जुट गया। इधर रोहित अपने गुरूजी के जूतों की पाॅलिश करते वक्त मन-ही-मन गुरू भक्ति के सागर में आकंठ डूबता चला गया था। उसे आज असीम आत्मिक सुख की अनुभूति हो रही थी। देखते ही देखते सचमुच में उसके पास जूतों की कतार लग गई थी।

आज उसे लग रहा था कि जल्दी से उन सारे जूतों में पाॅलिश करने में भी लगभग आधे घंटे का वक्त और लग जायेगा परंतु यह भी सच था कि आज उसे और रोज से दुगनी कमायी भी हो सकेगी। शायद गुरू कृपा का असर हो। वह अन्य दिन कुछ वक्त इंतजार करने पर भी उतनी कमाई नहीं कर पाता था परंतु आज मानों बहुत ही आसानी से उसे अपना काम मिल गया और वह उसे निबटाकर जल्द ही घर वापस लौट सकेगा। इसी बीच एक नवयुवक अनुनय करते हुए कि वह बहुत ही जल्दीबाजी में है, अगर हो सके तो उसके जूते की पाॅलिश वह सबसे पहले कर दे। ग्राहकों ने रोहित के विनय पर उस नवयुवक के जूतों की पाॅलिश उनसे पहले करने की इजाजत दे दी। तब रोहित ने उस नवयुवक को अपने जूते उतारने को कहा।

नवयुवक ने जल्दी-जल्दी बताते हुए कहा कि उसे जूते उतारने की जरूरत नहीं। यूं ही बिना उसे उतारे ही वह बूट पाॅलिश कर दे। रोहित को यह सब कुछ अटपटा लग रहा था। गौर से जब देखा तो वह नवयुवक कुछ असहज भी महसूस कर रहा था। नवयुवक ने कहा-पाॅलिश करने है तो करो वरना मैं चला। जूता नहीं उतारूंगा। रोहित भी थोड़ा अड़ा। कहा कि उन्हें जाने से किसने रोका है ? वह बिना पाॅलिश कराये, आ रही एक ट्रेन पर चढ़ गया। ट्रेन रूकी हुई थी। रोहित अपने बूट पाॅलिश के काम को छोड़ उस नवयुवक पर नजरें गड़ाये रहा। वह देख चुका था कि वह कहां बैठा है। वह दौड़ा-दौड़ा रेलवे पुलिस के पास गया।

अपनी शंका का कारण उन्हें बताया। पुलिस को सबकुछ समझते देर ना लगी थी। वह रोहित के बताये गए डब्बे में चढ़ा और उसकी पहचान पर उस नवयुवक को डब्बे से उतार अपने जूते उतारने को कहा। वह ना नुकुर करने लगा। पर ज्योंही पुलिस का डंडा उस पर पड़ा तो उसने जूते उतार दिये। जूते उतारते ही उसके हील के नीेचे और जूते के अंदर छिपाये गए नशे की वस्तु ‘कोकिन’ बाहर आ चुका था। पूछताछ करने पर नशे के एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश हो चुका था। अगले दिन के सभी अखबारों में रोहित का फोटो पूरी घटना के साथ छपा था वह भी मुख्य पृष्ठ पर। देश-दुनिया-गांव-गली हर जगह रोहित की ही चर्चा हो रही थी।

गांव के सभी लोग उसकी सूझ-बूझ पर फूले ना समा रहे थे। सबों को रोहित पर गर्व हो रहा था। उधर उसके गुरू रामप्रसाद को भी रोज ही अखबार पढ़ने की आदत थी। उसने जब ट्रेन से स्कूल वापस आते वक्त अखबार खरीदा तो मुख्य पृष्ठ पर छपी खबर एवं रोहित के फोटो ने बरबस उनका घ्यान उस ओर खींच लिये। वह रोहित के किये पर अंदर-ही-अंदर गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। उसकी बुद्धि, सूझ-बूझ, चपलता पर अपने को समर्पित कर खुशी के आंसू छलकाये जा रहे थे। उन्हें इसका भान होते देर ना लगी कि उसके जूतों की पाॅलिश भी रोहित ने ही की थी और धन्य है उसकी गुरू भक्ति ! कितनी चतुराई से वह बूट पाॅलिश के रूपये भी नहीं लिये थे। गुरू जो मैं ठहरा। उसने विद्यालय की शान को बढ़ाया है।

अखबार में सरकार से उसे पुरूस्कृत करने की अनुशंस की गई थी। रामप्रसाद ने भी समय पर स्कूल पहुंच रोहित के इस सुकृत्य पर विद्यालय में एक समारोह आयोजित कर उसे पुरूस्कृत करने की घोषणा की। पुरूस्कार के दिन रोहित कह रहा था-हर काम अपने आप में बस काम होता है। वह ना छोटा होता है ना बड़ा। छोटे कामों को भी अगर बड़े मंसूबे से किये जायें तो वह तुच्छ या छोटा नजर नहीं आता। गांव के लोग अब कहते है कि मुझे अब बूट पाॅलिश का काम छोड़ देना चाहिए। अब इसकी जरूरत नहीं रह गयी। पर मैं कहता हूं कि अब तो इसकी और भी मुझे जरूरत है। मेरी पहचान बन गई है-बूट पाॅलिश। ना भी करूं तो लोग मुझे बूट पाॅलिश करने वाले के रूप में ही जानेंगे। पुरूस्कार के बाद लोग रोहित में आए अंतर को देख पा रहे थे।

अब वह बूट पाॅलिश के सामान को झोले में छिपाकर नहीं बल्कि उसे अपने हाथों में लहराते हुए चला करता था। चादर से सिर भले ही सर्द मौसम में ढ़का रहता था पर उसका चेहरा साफ-साफ नजर आता था कि वह रोहित है।

राजेश कुमार पाठक
सांख्यिकी पर्यवेक्षक
गिरिडीह सदर प्रखंड
गिरिडीह-815301 (झारखंड)