बस यूँ ही! – ०२

राम-रहीम, गीता न कुरान लिखूंगा, मैं “सागर” अपनी कलम से सिर्फ हुन्दुस्तान लिखूंगा | दरिया ने गजब का शौक पाल रखा है, कश्ती डुबोकर

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फूल

-: फूल :- हुस्न मालिक तमाम फूलों का, इश्क भी है गुलाम फूलों का | एक तबस्सुम से बाँध लेती है, देखिये इन्तेजाम फूलों

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बस यूँ ही! – ०१

आज-कल-परसों, बीत गए बरसों | आप के वादों का हिसाब नहीं || कितनी मुश्किल में हाय मेरा दिल है | और फुरसत में थे

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प्यार की शुरुआत

| | प्यार की शुरुआत | | है अगर हिम्मत तो जाकर बात कर, वर्ना बस एक फूल से शुरुआत कर. झुक गई नजरें

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