बस यूँ ही! – ०२

राम-रहीम, गीता न कुरान लिखूंगा,
मैं “सागर” अपनी कलम से सिर्फ हुन्दुस्तान लिखूंगा |

दरिया ने गजब का शौक पाल रखा है,
कश्ती डुबोकर खुद को मौन रखा है |

ऐ कश्ती कहीं और चल,
इस “सागर” का कोई किनारा नहीं |

झील और तुम्हारी इन झील सी आँखों में खो जाने को जी चाहता है,
तुम्हें इस कदर देखकर, कश्ती से उतर जाने को जी चाहता है |

अमीरों के छतों बादलों की साजिशें होती है,
“सागर” फिर गरीबों के घरौंदों पर बारिशें होती हैं |

जलाकर आग सीने में, वे वतन गुणगान करते हैं,
जमे न खून सर्दी में, रब से वो फरियाद करते हैं |

मेरे ख़त को पढ़कर सीने से लगाने तो कभी हटाने की बात समझ नहीं आती,
तुम्हारे रूठ कर फिर मान जाने की बात समझ नहीं आती |
देखकर परदे में छिप जाने तो कभी न देखकर घबराने की बात समझ में नहीं आती,
मेरे दूर जाने पर तुम्हारे इशारों से बुलाने की बात समझ नहीं आती |

तू मेरा होकर भी मेरा हो न सका, ऐसे मेरे अल्फाज हैं,
कैसे कहूं कि तू मेरा हमसफ़र हमराज है |

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: नितेश कुमार श्रीवास्तव “सागर”
  महासचिव, राष्ट्रीय कवि संगम,
  बोकारो इकाई,
मो. 9204729272, 8217202135


फूल

-: फूल :-

हुस्न मालिक तमाम फूलों का,
इश्क भी है गुलाम फूलों का |

एक तबस्सुम से बाँध लेती है,
देखिये इन्तेजाम फूलों का |

कब्र पे रखिये या के डोली पे,
मुस्कुराना है काम फूलों का|

हमने खुशबू चुरा के जुल्फों से,
ले लिया इन्तेकाम फूलों का|

जिंदगी जियो तो दूसरों के लिए,
बस यही है पैगाम फूलों का |

बस यूँ ही! – ०१

आज-कल-परसों, बीत गए बरसों |
आप के वादों का हिसाब नहीं ||
कितनी मुश्किल में हाय मेरा दिल है |
और फुरसत में थे जनाब नहीं ||

ये तनहाइयाँ, ये यादों के मेले |
कभी भीड़ में, कभी हम अकेले ||

नींद आई नहीं, फिर भी सोया रहा |
मैं तुम्हारे ख़यालों में खोया रहा ||

मेरी आँखों में आके, दिल में उतरने वाले |
मुझे इतना तो बता, तेरा इरादा क्या है ||

सोचता है दिल जो, उसे कैसे मैं कहूं |
भूल जाऊं बातें सभी, होक रूबरू ||

गौर कर उस गरीब कि खुशियां,
कितने सदमो से भर गयी होंगी |
जिसे पैमाना-ए-दोस्ती देकर,
तेरी आँखे मुकर गयी होंगी ||

दिल धड़कने कि दुआ मांगता है |
ऐ मेरी जिंदगी! ये प्यार मेरा,
आपसे थोड़ी वफ़ा मांगता है ||

तुम ख्वाब थे एक, टूट जाना था |
पर मिले ही क्यों, गर रूठ जाना था ||
तुम the साक़ी मेरे, चाहे कुछ भी पिलाते |
जहर देते भी तो मुझे घूँट जाना था ||
मेरे दिल का खाजना था, तेरा सनम |
तेरे हाथों से ही, इसे लुट जाना था ||

: रविन्द्र कुमार ‘रवि’

 

प्यार की शुरुआत

| | प्यार की शुरुआत | |
है अगर हिम्मत तो जाकर बात कर,
वर्ना बस एक फूल से शुरुआत कर.
झुक गई नजरें अगर तो जान ले,
हाँ है उसकी और न सवालात कर.
है यकीं वो मान जायेगी मगर,
‘राज’ की ये बात है मुलाकात कर.
– शैलेश गुप्ता ‘राज’
नया रोड फुसरो

अर्ज किया है

चंद शेर…

न जाने क्या धुंध बगल-ए-गिरेबां में छाता जाता है |
शक के कोहरे में हर शख्स धुंधला नज़र आता है ||

उसके आंसू भी न किसी ने पोछे होंगे, हुस्न जब रो रहा होगा |
कसीदे भींग गए होंगे, सहर तब हो रहा होगा ||

ये तो शाख से पत्ता झरने का मंजर है |
हमने तो दरख्तों को गिरते देखा है ||

आजकल हर तरफ क़यामत के मंजर होते हैं |
मत भूलिए की फूलों में भी खंजर होते हैं ||

हमसे ना-उम्मीदी, की मत करो बातें |
हमने तो उनसे भी उम्मीद लगा रक्खी है, जिनकी कटती नहीं रातें.