वाह रे कैसी है सरकार

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रोज उखड़ती पटरी है

पर बुलेट ट्रेन तैयार,

वाह रे कैसी है सरकार,

डीजल-पेट्रोल लेने जाओ,

बढे दाम हर बार

वाह रे कैसी है सरकार,

घर से निकलो बाहर देखो

पता चलेगा यार,

वाह रे कैसी है सरकार,

मोदी को सोम को बुध कहे तो

कहते सभी बुधवार

वाह रे कैसी है सरकार,

अब विपक्ष कमजोर पड़ा है,

सुनु नहीं ललकार

वाह रे कैसी है सरकार,

रहे दवा पर मिले नहीं

सब दवा हुआ एक्सपायर

वाह रे कैसी है सरकार,

काम नहीं मिलता हो जब

तब उठा न ले हथियार

वाह रे कैसी है सरकार,

उचित दाम ना काम का मिलता

छोड़ रहा घर बार

वाह रे कैसी है सरकार,

कल नेता झोपड़ियों में थे

महल हुआ तैयार.

वाह रे कैसी है सरकार,

काम करे इक बार मगर

कहे उसे सौ बार

वाह रे कैसी है सरकार,

 

 

क्षणिकाएं : ०४

|| भगवान ||

भगवन इस संसार के कण-कण में तुम व्याप्त हो.

सर्वव्यापी, अंतर्गामी, फिर भी पहुँच के पार हो.

मैं वियोगी, प्रेमाभाव में माया-बद्ध जीवात्मा.

किस विधि मिलूं मैं काट के बंधन, दया करो परमात्मा.

योग न जानू, क्षेम न जानू, कर्म विधि न राग है.

न त्याग, ना ताप कि गरिमा, बड़ा कठिन वैराग्य है.

त्रिगुणित प्रकृतिप्राय तुम्हारी, पर गुणातिरेत समभाव है.

ताल विहीन बेसुर मैं प्राणी, मधुर प्रणय झंकार हो.

मैं मूढ़, विचलित मन मेरा, धीरज धर्म व ज्ञान हो.

भाव सागर बीच जीवन नैया , करुणा-सिन्धु पतवार हो.

चहुदिक हो धरा दिव्य सुवासित, अब तो वृष्टि समभाव हो.

ऐसी कृपा करो कृपानिधि, सत-पथ-गम संसार हो.

-: रचना :-
: रविन्द्र कुमार ‘रवि’ :
शिक्षक, कवि एवं संगीतज्ञ
नया रोड, फुसरो.

क्षणिकाएं : ०३

|| कर्मयोगी ||

दु:सह्य वेदना,

असाध्यप्राय कार्य,

श्याह लक्ष्य,

निष्फल चेष्टा.

शून्य प्रतिफल,

व्यथा तेरे अंतर्मन की.

हे! प्राण प्रतिष्ठित,

किंचित न हो व्यथित,

शांत कर उदवेदना,

लक्ष्य का आह्वान कर,

तू कर्मयोगी, माना भुक्तभोगी,

भाग्य का सत्कार कर.

क्या हुआ यदि गिर पड़ा,

चोटिल हो निष्प्राण नहीं.

चल उठ,

तोड़ अतीत की बेड़ियाँ,

नए शौर्य से हुंकार भर,

क्या भयभीत है?

नहीं,

असंयमित है.

निश्छल मन तेरा,

ज्यों दिव्य दर्पण,

भूल का संधान कर,

जीत तेरी निश्चित,

बस!

शोक त्याग,

शुभान्त कर.

क्षणिकाएं : ०२

|| वसुंधरा ||

सरस बरस रे मेघ तू, के रसहीन धरा हुई.

न ओज है, न तेज है, असुध वसुंधरा हुई.

कहाँ गई, मृदा की गंध, रंग की विचित्रता.

पवन में वह सौम्यता, और पुष्प में मृदुलता.

अतीत की घटामयी, सुखदायनी विस्मृतियाँ,

थीं विश्व में जो श्रेष्ठ, वो संस्कृतियाँ कहाँ गई.

ये कर्म क्षेत्र, जन्म भूमि, राम-कृष्ण-बुद्ध की,

आदि मानवता को ज्ञान दें, उन सैंकड़ो प्रबुद्ध की.

पुरुषार्थ में प्रवीणता, वो वीरता कहाँ गई.

-: रचना :-
: रविन्द्र कुमार ‘रवि’ :
शिक्षक, कवि एवं संगीतज्ञ
नया रोड, फुसरो.

क्षणिकाएं : ०१

|| यौवन ||

आरूढ़ रश्मि रथ पे, नवजीवन की किरण.

प्रफुल्लित मन मृदुल, तृप्त अनावृत यौवन.

उच्छृल नदी प्रतिविम्बित, समृद्ध रवि रक्त कण.

समीर मंद वेग में, उन्मत्त च्यूत जिर्ण पर्ण.

विस्तृत क्षिति निजभाववश, चहुँ दिक वृत्त नील वर्ण.

खग-वृंद श्रृंगकलवरत, मदसिक्त भू आसक्त मन.

संयुक्त मुक्त भुक्त है, हो रहा है चित्त हरण.

हर्षित प्रकृति रिक्त में, भरने लगी कर श्री वरण.

त्रिभुवन स्तब्ध है, संतप्त शक्त तत्व कण.

आकृष्ट हो निकृष्ट से, विभ्रांत दृष्टि आवरण.

-: रचना :-
: रविन्द्र कुमार ‘रवि’ :
शिक्षक, कवि एवं संगीतज्ञ
नया रोड, फुसरो.

अंतर्मन (१९६०)

|| अंतर्मन ||

अंतर्मन का सोया विषाद, क्यों चिल्लाता है बार-बार.

भगवान बोल, होता कैसा? जिस बेटे का लुट गया प्यार.

माँ-बाप हेतु बालक रोता, भगवान स्वर्ग में सोता है.

दुःख जलनिधि में लगता गोता, शैशव धरती पर सोता है.

चिंतित जीवन, धूमिल प्रभात, समता पर भीषण वज्रपात.

रहता है मौन वह दिन-रात, रटता है बालक, विगत बात.

माँ किधर गई? कहाँ तात? है तिमिर घोर पथ अज्ञात.

आँखों से झरता है प्रपात, अब होगी फिर क्या मुलाकात.

सुकुमार-सरलता-भोलापन, सब पर कठोरता का बंधन.

गर भरा धूल से यह चंदन, ईर्ष्या के सर्पों का दंशन.

गर उजड़ गया हँसता उपवन, होगा अनाथ यह जीवन धन.

बालक पर स्नेहिल छाया हो, घर-भर की ममता-माया हो.

गदगद शैशव की काया हो, जब सब अंचल की छाया हो.

अब आंसू से कर ले तर्पण, शव पर कर ले माला अर्पण.

कह बार-बार तू हरे-राम! माँ-बाप गए हैं अमर धाम.

कुलदीपक तू एकाकी है, कठिन परीक्षा बाकी है.

जग-ज्योति जलाना तुम बेटे, मत रहना तुम घर में लेटे.

संभव है उर पर लगे घाव, दे चला जमाना नया दाव.

खिल रहा कंटकों में गुलाब, मिल रहा स्नेह-संयत स्वभाव.

एकलौता बेटा धरती पर, भगवान नजर रखना उस पर.

बांका फिर बाल नहीं होगा, दुश्मन या काल कोई होगा.

बरसाता हूँ आशीष पुत्र, जीवन होगा तेरा पवित्र.

हे पुत्र! बड़ी दुनिया विचित्र, इस दुनिया के तुम बनो मित्र.

सद्भाव-सरलता-भोलापन, करवट लेता शत-शत हजार.

अंतर्मन का सोया विषाद, चिल्लाता है रे! बार-बार.

मित्रों का अलबम

|| मित्रों का अलबम ||

जीवन के बने अनेक चित्र,
कुछ नए-पुराने कुछ विचित्र.

मेरे अनेक मुंहलगे मित्र,
दिल की खूँटी पर टंगे मित्र.

कुछ भूल गए थे वे विचित्र,
कुछ लगते है अबतक सचित्र.

मिलता लेकर अरमान मित्र,
झिलमिल होती पहचान मित्र.

जीवन यौवन जंजाल मित्र,
‘भूदेव’ हुआ कंगाल मित्र.

दुश्मन देता है ताल मित्र,
दंशन का नित्य कमाल मित्र.

इस जीवन में सब टका मित्र,
वह सबका क्या हो सका मित्र.

दलबदलू और दलाल मित्र,
ओढें चाँदी का खाल मित्र.

उनके घर मालामाल मित्र,
जिनके घर मायाजाल मित्र.

जब गया द्वार, दरबार मित्र,
मिलती केवल फटकार मित्र.

दुःख में हैं दयानिधान मित्र,
सुख में शेखी-शैतान मित्र.

मेरे अनेक यजमान मित्र,
करते मेरा सम्मान मित्र.

आशीष-दुआ का दान मित्र,
निश्चय होगा कल्याण मित्र.

कुछ लोग यहाँ व्यवधान मित्र,
आगत-स्वागत जलपान मित्र.

जीवन की नौका टकराती,
जल के भीतर चट्टान मित्र.

तन रहे धनुष पर वाण मित्र,
ले रहे मित्र की जान मित्र.

कलियुग के द्रोणाचार्य मित्र,
हैं तितर-बितर परिवार मित्र.

मिथ्यावादी आचार्य मित्र,
आदत से हैं लाचार मित्र.

विद्या-मंदिर बीमार मित्र,
आहत अजगर खूंखार मित्र.

मंदिर सुन्दरतम है पवित्र,
पढ़ते भक्त प्रहलाद मित्र.

उर के अलबम में सजे चित्र,
सब मित्र मेरे अतिशय पवित्र.

वीर

|| वीर ||

नमन करो उन वीरों को जो लौट कभी ना आये |
आँखों में सपनों के आंसू ले कर दीप जलाएं ||

चलो फिर आज कहता हूँ, कहानी मैं जवानों की|
कहानी है यही इनकी, कहानी जो दीवानों की||
कहर बनकर के जा टूटे, जो इनपे वार करता है|
अगर दुश्मन झुकाए सर, तो उनसे प्यार करता है||

कहानी और भी इनकी सुनाने आज आया हूँ |
मेरे सीने में जो दिल है लुटाने आज आया हूँ ||
लुटाऊं आज मैं सब कुछ बढाऊं हौसले हरदम |
रहे जो फासले अबतक हुए वो फासले भी कम ||

दिखाई सरफरोशी दे तुम्हारी है यही दौलत |
दिखे दुश्मन तू देता है, नहीं थोरी सी भी मोहलत ||
तेरे अंदाज से दुश्मन को पानी भी नहीं मिलता |
हिला देते हमेशा तुम, हिलाए जो नहीं हिलता ||

अपने हाथ से ही अपनी तू तक़दीर लिख डालो |
कोई न गीत गता हो, अपना गीत खुद गा लो ||
कोई जब मांग बैठे तो, न अपना गीत लौटना |
छिड़े जब जंग दुश्मन से, हमेशा जीत कर आना ||

तुझे कहता है जो शीशा, उसे कहने दो तुम शीशा |
उसे मालूम ना है कि, तेरा शीशा भी है कैसा ||
तेरे दम से ही तो अब आज, सब गम दूर होता है |
चले शीशे पे जो पत्थर वो पत्थर चूर होता है ||

निशाँ कदमो के तेरे हों वहां तक दिख रहा भारत |
बढाओ आज क़दमों को, लिखो न आज कोई ख़त ||
मैं चाहूं नाप लो धरती, जो कब्जे में हैं दुश्मन के |
नहीं तो आज जा कह दो, रहें भारत के ही बनके ||

राजेश पाठक
प्रखण्ड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
गिरिडीह सदर प्रखण्ड.

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स्वच्छता का जन-गण-मन

|| स्वच्छता का “जन-गण-मन” ||

गन्दगी से मुक्त हो रही है देखो यह धरा,

जा रहे शौचालयों में छोटा हो या हो बड़ा,

अब हस्त साबुनों से साफ़ कर रहा,

तब स्वास्थ्य और समृद्धि उनके घर रहा,

स्वच्छता का हो रहा निवास जब,

गन्दगी की हो रही निकास तब,

स्वच्छता में ही छिपा विकास है,

तोड़ मत बहुत बड़ी ये आश है,

देश के समस्त गाँव-घर-गली,

स्वच्छता की राह पे है चल पड़ी,

स्वच्छता सुखी का देखो नाम है,

मिल गयी तो इसमें चारो धाम है,

स्वच्छता का हो रहा निवास जब,

बसता है भगवान् और वहीं पे रब,

स्वच्छता से बढ़ रही है शान अब,

हो रहा है देश भी महान तब,

सब जनों में आ रही है जागृति,

अब देश की बदल रही है आकृति,

: राजेश कुमार पाठक
प्रखण्ड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
सदर प्रखण्ड – गिरिडीह.

 

बेटियां

|| बेटियाँ ||

नहीं बचाओ बेटी केवल उसे आज पढने दो,

चढ़ती है चोटी पर तो उसे आज चढ़ने दो,

बेटियां ही शक्ति का स्वरुप है,

बेटियां बिन छांव भी कभी धूप है,

चाहते क्यों न इन्हें आँगन मिले,

चाह लो माँ का इन्हें दामन मिले,

गिर रही जब बेटियां तुम थाम लो,

गर तुम गिरो तो बेटियों का नाम लो,

तुम नाम ले के देखो वो आयें नजर,

है पुत्र तो वो भूलता तेरी डगर,

है बेटियां तो दिख रही है शान्ति,

हो पुत्र ही सदा मिटाओ भ्रान्ति,

बेटियां ही सृष्टि का स्वरुप है,

उष्णता में भी वृष्टि का भी रूप है,

बेटियां बढ़े तो सारा जग बढ़े,

तब एक ना समस्त देखो पग बढ़े,

बेटियां हैं दूर तो भी पास हैं,

जैसे हो न सांस फिर भी आश है,

तुम देख लो दसो दिशा में जा कभी,

हर दिशा में बेटियां ही मिल रही,

बेटियां बढ़ाती आज मान है,

बेटियां बढ़ाती आज शान है,

बेटियां नहीं किसी से कम रही,

शोहरतें न आज उनकी थम रही,

काम करती आज भी बड़े-बड़े,

पुत्र तो रहे सदा डरे-डरे,

जिनके घर में आ रही हों बेटियां,

भर रही तिजोरियों से पेटियां,

बेटियां मिटाती अन्धकार है,

क्यों नहीं फिर आज वो स्वीकार है,

जन्म से पहले ही क्यों मरी है वो,

गर बच गयी तो आज क्यों डरी है वो,

जन्म से पहले उन्हें क्यों मारते,

तब जीत कर भी जंग को तुम हारते,

मैं चाहता तुम हार कर भी जीतते,

तो बुरे दिन आज तेरे बीतते.

राजेश पाठक
प्रखण्ड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
सदर प्रखण्ड, गिरिडीह, झारखण्ड.