कविता
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क्षणिकाएं : ०४

|| भगवान || भगवन इस संसार के कण-कण में तुम व्याप्त हो. सर्वव्यापी, अंतर्गामी, फिर भी पहुँच के पार हो. मैं वियोगी, प्रेमाभाव में माया-बद्ध जीवात्मा. किस विधि मिलूं मैं काट के बंधन, दया करो परमात्मा. योग न जानू, क्षेम न जानू, कर्म विधि न राग है. न त्याग, ना …

कविता

क्षणिकाएं : ०३

|| कर्मयोगी || दु:सह्य वेदना, असाध्यप्राय कार्य, श्याह लक्ष्य, निष्फल चेष्टा. शून्य प्रतिफल, व्यथा तेरे अंतर्मन की. हे! प्राण प्रतिष्ठित, किंचित न हो व्यथित, शांत कर उदवेदना, लक्ष्य का आह्वान कर, तू कर्मयोगी, माना भुक्तभोगी, भाग्य का सत्कार कर. क्या हुआ यदि गिर पड़ा, चोटिल हो निष्प्राण नहीं. चल उठ, …

कविता

क्षणिकाएं : ०२

|| वसुंधरा || सरस बरस रे मेघ तू, के रसहीन धरा हुई. न ओज है, न तेज है, असुध वसुंधरा हुई. कहाँ गई, मृदा की गंध, रंग की विचित्रता. पवन में वह सौम्यता, और पुष्प में मृदुलता. अतीत की घटामयी, सुखदायनी विस्मृतियाँ, थीं विश्व में जो श्रेष्ठ, वो संस्कृतियाँ कहाँ …

कविता

क्षणिकाएं : ०१

|| यौवन || आरूढ़ रश्मि रथ पे, नवजीवन की किरण. प्रफुल्लित मन मृदुल, तृप्त अनावृत यौवन. उच्छृल नदी प्रतिविम्बित, समृद्ध रवि रक्त कण. समीर मंद वेग में, उन्मत्त च्यूत जिर्ण पर्ण. विस्तृत क्षिति निजभाववश, चहुँ दिक वृत्त नील वर्ण. खग-वृंद श्रृंगकलवरत, मदसिक्त भू आसक्त मन. संयुक्त मुक्त भुक्त है, हो …

कविता

अंतर्मन (१९६०)

|| अंतर्मन || अंतर्मन का सोया विषाद, क्यों चिल्लाता है बार-बार. भगवान बोल, होता कैसा? जिस बेटे का लुट गया प्यार. माँ-बाप हेतु बालक रोता, भगवान स्वर्ग में सोता है. दुःख जलनिधि में लगता गोता, शैशव धरती पर सोता है. चिंतित जीवन, धूमिल प्रभात, समता पर भीषण वज्रपात. रहता है …

कविता
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मित्रों का अलबम

|| मित्रों का अलबम || जीवन के बने अनेक चित्र, कुछ नए-पुराने कुछ विचित्र. मेरे अनेक मुंहलगे मित्र, दिल की खूँटी पर टंगे मित्र. कुछ भूल गए थे वे विचित्र, कुछ लगते है अबतक सचित्र. मिलता लेकर अरमान मित्र, झिलमिल होती पहचान मित्र. जीवन यौवन जंजाल मित्र, ‘भूदेव’ हुआ कंगाल …

कविता
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वीर

|| वीर || नमन करो उन वीरों को जो लौट कभी ना आये | आँखों में सपनों के आंसू ले कर दीप जलाएं || चलो फिर आज कहता हूँ, कहानी मैं जवानों की| कहानी है यही इनकी, कहानी जो दीवानों की|| कहर बनकर के जा टूटे, जो इनपे वार करता …

swakshata
कविता
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स्वच्छता का (जन-गण-मन)

|| स्वच्छता का “जन-गण-मन” || गन्दगी से मुक्त हो रही है देखो यह धरा, जा रहे शौचालयों में छोटा हो या हो बड़ा, अब हस्त साबुनों से साफ़ कर रहा, तब स्वास्थ्य और समृद्धि उनके घर रहा, स्वच्छता का हो रहा निवास जब, गन्दगी की हो रही निकास तब, स्वच्छता …

बेटी बचाओ बेटी पढाओ
कविता
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बेटियां

|| बेटियाँ || नहीं बचाओ बेटी केवल उसे आज पढने दो, चढ़ती है चोटी पर तो उसे आज चढ़ने दो, बेटियां ही शक्ति का स्वरुप है, बेटियां बिन छांव भी कभी धूप है, चाहते क्यों न इन्हें आँगन मिले, चाह लो माँ का इन्हें दामन मिले, गिर रही जब बेटियां …

शंखनाद
कविता

शंखनाद

क्या शेष समर रह जाएगा, क्या नहीं उबर वह पाएगा. यह सोच कृष्ण मायूस हुए, गम घटा के वे आगोश हुए. मन ही मन कुछ वे सोच रहे, अब लगा कि रण से लौट रहे. पर अनाहूत होता न कुछ, है पता मुझे अर्जुन का दु:ख . मैं बतलाता अब …