नाटक : भाग – २

दृश्य-दूसरा
(नवल और प्रकाश आपस में बातचीत करते आ रहे हैं)

नवल – प्रकाश! हमलोग चार हैं. मैं, तुम विमल और कमल. हमलोगों ने एक साथ विद्याध्ययन किये. सम्प्रति हमलोगों की हालत बिलकुल दयनीय है. पारिवारिक दिक्कतें जल प्रवाह कि भांति हमलोगों की ओर बढती आ रही हैं. हमलोगों के घर में माँ हैं, पिता हैं और भाई-बहने भी हैं. इन सबों का भरण पोषण कैसे हो?

 
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नाटक [ दृश्य – ०१ ]

नाटक
[ दृश्य-०१ ]
पर्दा उठता है.

मकान विमल का
(फूस का घर है, घर कि दीवारें चिकनी मिट्टी से पुती हैं. सर्वत्र स्वच्छता है. गन्दगी का कहीं नामो निशान नहीं. इसी घर में विमल एक दूसरी चटाई पर बैठा कुछ सोच रहा है. तभी कमल का प्रवेश कर रहा होता है.)

कमल – भाई विमल! जब-जब मैं यहाँ आता हूँ, तब-तब तुम्हे गंभीर चिंतन में देखता हूँ. क्या किसी अनुसन्धान के पीछे लगे हो?

विमल – हाँ, अनुसन्धान ही समझो.

कमल – क्या मैं जान सकता हूँ कि आखिर वह अनुसन्धान क्या है? विज्ञान तो तुम्हारा विषय नहीं था, फिर अनुसन्धान कैसा? तुम तो समाजशास्त्र के योग्य छात्र हो.

विमल – ‘विज्ञान’, का अध्ययन करने से ही अनुसंधान का कार्य होता है? समाजशास्त्र के विद्यार्थी को भी तो समाज कि रहस्यमयी स्थिति का अनुसन्धान करना है.

कमल – तो वर्तमान समाज की इस दयनीय स्थिति पर हम साथियों का कुछ विचार हो. थोड़ी देर ठहरो, मैं अभी नवल और प्रकाश को लाकर इसमें शामिल करता हूँ. (कमल जाता है.)

विमल – (स्वतः) कमल आया, चला गया. आज के समाज का वातावरण नीरस हो रहा है. मानवता की जगह पशुता ही बलवती है. धनी मानी मौज उड़ाते हैं. गरीब जुल्म की क्रूर चक्की में पिस जाते हैं. हमलोगों के साथ भी यही बातें हैं घर में एक दाने भी नहीं, जिससे माता पिता को भोजन करा सकूं. मुश्किल से पेट भरते हैं. कभी-कभी तो एकादशी व्रत ही रहा करते हैं. ओह! कलेवर शिथिल हुआ जाता है. (साहस करके) लेकिन नहीं. मैं साहस करूं. परिवार कि सहायता के लिए, गाँव एवं देश की सहायता के लिए कमर कसूं. (आकाश की ओर संकेत करके) ओ, निस्सीम व्योम में वास करने वाले देव, सुनो! तुम्हारी सृष्टि का यह भिखारी मानव निर्धनता के कठोर कारावास से मुक्त होने के लिए सहायता चाहता है. क्योंकि तुम दु:खहरण कहलाते हो. (माँ की आवाज सुनकर) हैं! यह किसकी आवाज है. (सामने देखकर) यह तो माता जी आ रही हैं. पुत्र के मुख पर उदासी देखकर वह स्वयं दुखी हैं. माता जी प्रणाम! (चरणों पर गिरता है).

कर्मवती – दीर्घायु हो बेटा!

विमल – माँ! क्या आज्ञा है?

कर्मवती – कुछ नहीं. सिर्फ कुछ खाने के लिए बुलाने आई हूँ. तुम बराबर दुखी क्यों रहा करते हो बेटा? भगवान ने जैसा चाह बनाया, इसकी चिंता ही क्या! चलो पिता जी बुला रहे हैं.

विमल – माँ! तुम धन्य हो. मेरे जीवन दे प्रारंभिक काल से आज तक वात्सल्य प्रेम दिखाने वाली जननी! तुम धन्य हो. तुम्हें करोड़ों प्रणाम है.

(दोनों जाते हैं, पर्दा गिरता है.)