अँधेरी रातों में!

अँधेरी रातों में,
सुनसान राहों की,
गन्दगी साफ़ करने को,
कुछ लोग निकलते हैं…

जी हाँ, उन्हें हम नगर परिषद् फुसरो के सफाई कर्मचारी कहते हैं.

नगर परिषद् फुसरो की ओर से पूरे शहर की सफाई इन दिनों जोर पर है. सड़क के दोनों ओर लगे तट संकेतक की जगमगाती लाल रोशनी से पूरे सड़क की खूबसूरती देखने लायक होती है. अभी हाल ही में सड़क विभाजक के छोर पर काली-पिली पट्टियों वाले स्तम्भ लगाये गए गए हैं. जिससे आवाजाही कर रहे वाहनों को विभाजक से टकराहट की संभावना कम हो सके. विगत दिनों कई वाहन, विशेष तौर पर शहर से बाहर के वाहन विभाजक से टकरा गए थे.

विगत दिनों उक्त सड़क तट संकेतकों के दोनों ओर जमा मिट्टी व धूल के कारण उनकी दृश्यता में कमी आ गयी थी जिससे आवाजाही में लोगों को परेशानी हो रही थी.   उपरोक्त के सन्दर्भ में कई सामाजिक संगठनों ने नगर परिषद् फुसरो का ध्यानाकर्षण करवाया था जिनमे कौटिल्य महापरिवार एवं युवा व्यवसायी संघ प्रमुख थे. उनके सुझाव पर अब फुसरो नगर परिषद् के कर्मचारियों ने शहर की सफाई का काम आरंभ कर दिया है.

फुसरो बाज़ार के मुख्य सड़क के दोनों ओर बसे फूटपाथ पर अपनी दुकान लगाने वाले वैसे छोटे व्यवसायी जो सुबह-सुबह अपनी दुकान सजाते थे और जहाँ कहीं भी अन्य दुकानदर अपना सामान नित्य अपनी दुकान के सामने लगाते थे वैसे व्यवसायियो को दिन के समय होने वाली साफ-सफाई पसंद नहीं आने लगी. जिस कारण समय के साथ-साथ इस काम की सफलता पर संदेह किया जाने लगा.

दरअसल दिन के समय फुसरो बाज़ार के नीचे बाज़ार से बैंक मोड़ होते हुए पुराना बी.डी.ओ. ऑफिस तक की मुख्य सड़क पर लोगों की आवाजाही बहुत होती है, यह इलाका ही सबसे सघन होता है, क्योंकि सभी मुख्य प्रतिष्ठान शहर के इसी हिस्से में अवस्थित हैं. धूल का उड़ना तथा ट्रैफिक की अधिकता व भीड़-भाड़ के चलते दिन के समय सफाई में कठिनाई होने लगी, जिसकी शिकायत बहुत से व्यवसायियो ने की.

कई गणमान्य लोगों के तथा युवा व्यवसायी संघ तथा नगर परिषद् फुसरो के बीच आपसे बातचित से इस समस्या का हल निकला गया और अब दिन की जगह रात में जब सभी दुकाने और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान लगभग बंद हो जाते हैं तो नगर परिषद फुसरो के सफाई कर्मचारी अपने दल-बल और साजो सामान के साथ शहर का चप्पा चप्पा चमकाने निकल पड़ते हैं.

इन दिनों जब आप सड़क पर पैदल अथवा वाहन से चलते हैं तो सड़क के दोनों ओर लगे तट संकेतकों की चमक अपने शहर की स्वच्छता का भान सीधे ही करा जाते हैं. उस पर अचानक नीली व लाल बत्तियां चमकाती पुलिस पेट्रोल की गाड़ी जब गुजरती है तो नजारा देखने लायक होता है. लगता है मानो कोई हॉलीवुड की मूवी के अन्दर हम भी एक किरदार हैं.

अभी पिछले महीने की बात है नगर परिषद् फुसरो के कार्यालय प्रांगण में ही सभी व्यवसायियो को एक बैठक आयोजित कर स्वच्छता के सन्दर्भ में शिकायत व उसके निपटारे से सम्बंधित स्वच्छता अनुप्रयोग (Mobile App) के बारे में जानकारी दी गयी, जिस app का प्रयोग कर लोग अपनी शिकायतों को उसमे पोस्ट कर सम्बद्ध विभाग को तुरंत प्रेषित कर सकते हैं, और जल्द ही उसके निपटारे की प्रक्रिया सम्बद्ध विभाग से आरंभ कर दी जायगी.

हमें भी एक स्वच्छ मानसिकता के साथ इस प्रयास में सहभागी बनना चाहिए और अपने शहर को स्वच्छ बनाने में सम्बद्ध विभाग की मदद करनी चाहिए. अभी सड़क के दोनों ओर उचित स्थान के कमी के कारण स्थायी कचरा-पात्र नहीं लगाया जा सका है, जिस कारण विभाग द्वारा चलंत कचरा निष्पादन के लिए वाहन का प्रयोग हो रहा है जिसके माध्यम से जगह-जगह जा कर कचरा उठा कर उसको निष्पादित किया जा रहा है, तो कहा जा सकता है कि शहर के शहंशाह यही हैं.

हम इस शुभ कार्य को निर्बाध रूप से चलते रहने की कामना करते हैं और नगर परिषद् फुसरो को उनके द्वारा किये जा रहे इस कार्य हेतु शुभकामनाएँ देते हैं.

संपादक
फुसरो ई-पत्रिका.

दुर्गा विसर्जन

वर्ष 1971 में अटल बिहारी वाजपेई विपक्ष के नेता थे और इंदिरा गांधी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री के तौर पर देश का नेतृत्‍व कर रही थीं।  अटल बिहारी वाजपेई ने विपक्ष के नेता के तौर पर एक कदम आगे जाते हुए इंदिरा को ‘दुर्गा’ करार दिया था.

|| प्रस्तुत है उस दिन का पूरा वृतांत ||

इंदिरा गांधी बोलीं, “मैं आज यहाँ हूँ. कल शायद यहाँ न रहूँ. मुझे चिंता नहीं मैं रहूँ या न रहूँ. मेरा लंबा जीवन रहा है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है. मैं अपनी आख़िरी सांस तक ऐसा करती रहूँगी और जब मैं मरूंगी तो मेरे ख़ून का एक-एक क़तरा भारत को मज़बूत करने में लगेगा.”

कभी-कभी नियति शब्दों में ढलकर आने वाले दिनों की तरफ़ इशारा करती है.

भाषण के बाद जब वो राजभवन लौटीं तो राज्यपाल बिशंभरनाथ पांडे ने कहा कि आपने हिंसक मौत का ज़िक्र कर मुझे हिला कर रख दिया.

इंदिरा गाँधी ने जवाब दिया कि वो ईमानदार और तथ्यपरक बात कह रही थीं.

उस रात इंदिरा जब दिल्ली वापस लौटीं तो काफ़ी थक गई थीं. उस रात वो बहुत कम सो पाईं.

सामने के कमरे में सो रहीं सोनिया गाँधी जब सुबह चार बजे अपनी दमे की दवाई लेने के लिए उठकर बाथरूम गईं तो इंदिरा उस समय जाग रही थीं.

सोनिया गांधी अपनी किताब ‘राजीव’ में लिखती हैं कि इंदिरा भी उनके पीछे-पीछे बाथरूम में आ गईं और दवा खोजने में उनकी मदद करने लगीं.

वो ये भी बोलीं कि अगर तुम्हारी तबीयत फिर बिगड़े तो मुझे आवाज़ दे देना. मैं जाग रही हूँ.

सुबह साढ़े सात बजे तक इंदिरा गांधी तैयार हो चुकी थीं. उस दिन उन्होंने केसरिया रंग की साड़ी पहनी थी जिसका बॉर्डर काला था.

इस दिन उनका पहला अपॉएंटमेंट पीटर उस्तीनोव के साथ था जो इंदिरा गांधी पर एक डॉक्यूमेंट्री बना रहे थे और एक दिन पहले उड़ीसा दौरे के दौरान भी उनको शूट कर रहे थे.

दोपहर में उन्हें ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री जेम्स कैलेघन और मिज़ोरम के एक नेता से मिलना था. शाम को वो ब्रिटेन की राजकुमारी ऐन को भोज देने वाली थीं.

उस दिन नाश्ते में उन्होंने दो टोस्ट, सीरियल्स, संतरे का ताज़ा जूस और अंडे लिए.

नाश्ते के बाद जब मेकअप-मेन उनके चेहरे पर पाउडर और ब्लशर लगा रहे थे तो उनके डॉक्टर केपी माथुर वहाँ पहुंच गए. वो रोज़ इसी समय उन्हें देखने पहुंचते थे.

उन्होंने डॉक्टर माथुर को भी अंदर बुला लिया और दोनों बातें करने लगे.

उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन के ज़रूरत से ज़्यादा मेकअप करने और उनके 80 साल की उम्र में भी काले बाल होने के बारे में मज़ाक़ भी किया.

नौ बजकर 10 मिनट पर जब इंदिरा गांधी बाहर आईं तो ख़ुशनुमा धूप खिली हुई थी.

उन्हें धूप से बचाने के लिए सिपाही नारायण सिंह काला छाता लिए हुए उनके बग़ल में चल रहे थे. उनसे कुछ क़दम पीछे थे आरके धवन और उनके भी पीछे थे इंदिरा गाँधी के निजी सेवक नाथू राम.

सबसे पीछे थे उनके निजी सुरक्षा अधिकारी सब इंस्पेक्टर रामेश्वर दयाल. इस बीच एक कर्मचारी एक टी-सेट लेकर सामने से गुज़रा जिसमें उस्तीनोव को चाय सर्व की जानी थी. इंदिरा ने उसे बुलाकर कहा कि उस्तीनोव के लिए दूसरा टी-सेट निकाला जाए.

जब इंदिरा गांधी एक अकबर रोड को जोड़ने वाले विकेट गेट पर पहुंची तो वो धवन से बात कर रही थीं.

धवन उन्हें बता रहे थे कि उन्होंने उनके निर्देशानुसार यमन के दौरे पर गए राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह को संदेश भिजवा दिया है कि वो सात बजे तक दिल्ली लैंड कर जाएं ताकि उनको पालम हवाई अड्डे पर रिसीव करने के बाद इंदिरा ब्रिटेन की राजकुमारी एन को दिए जाने वाले भोज में शामिल हो सकें.

अचानक वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मी बेअंत सिंह ने अपनी रिवॉल्वर निकालकर इंदिरा गांधी पर फ़ायर किया. गोली उनके पेट में लगी.

इंदिरा ने चेहरा बचाने के लिए अपना दाहिना हाथ उठाया लेकिन तभी बेअंत ने बिल्कुल प्वॉइंट ब्लैंक रेंज से दो और फ़ायर किए. ये गोलियाँ उनकी बग़ल, सीने और कमर में घुस गईं.

वहाँ से पाँच फुट की दूरी पर सतवंत सिंह अपनी टॉमसन ऑटोमैटिक कारबाइन के साथ खड़ा था.

इंदिरा गाँधी को गिरते हुए देख वो इतनी दहशत में आ गया कि अपनी जगह से हिला तक नहीं. तभी बेअंत ने उसे चिल्ला कर कहा गोली चलाओ.

सतवंत ने तुरंत अपनी ऑटोमैटिक कारबाइन की सभी पच्चीस गोलियां इंदिरा गाँधी के शरीर के अंदर डाल दीं.

बेअंत सिंह का पहला फ़ायर हुए पच्चीस सेकेंड बीत चुके थे और वहाँ तैनात सुरक्षा बलों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई थी.

अभी सतवंत फ़ायर कर ही रहा था कि सबसे पहले सबसे पीछे चल रहे रामेश्वर दयाल ने आगे दौड़ना शुरू किया.

लेकिन वो इंदिरा गांधी तक पहुंच पाते कि सतवंत की चलाई गोलियाँ उनकी जांघ और पैर में लगीं और वो वहीं ढेर हो गए.

इंदिरा गांधी के सहायकों ने उनके क्षत-विक्षत शरीर को देखा और एक दूसरे को आदेश देने लगे. एक अकबर रोड से एक पुलिस अफ़सर दिनेश कुमार भट्ट ये देखने के लिए बाहर आए कि ये कैसा शोर मच रहा है.

उसी समय बेअंत सिंह और सतवंत सिंह दोनों ने अपने हथियार नीचे डाल दिए. बेअंत सिंह ने कहा, “हमें जो कुछ करना था हमने कर दिया. अब तुम्हें जो कुछ करना हो तुम करो.”

तभी नारायण सिंह ने आगे कूदकर बेअंत सिंह को ज़मीन पर पटक दिया. पास के गार्ड रूम से आईटीबीपी के जवान दौड़ते हुए आए और उन्होंने सतवंत सिंह को भी अपने घेरे में ले लिया.

हालांकि वहाँ हर समय एक एंबुलेंस खड़ी रहती थी. लेकिन उस दिन उसका ड्राइवर वहाँ से नदारद था. इतने में इंदिरा के राजनीतिक सलाहकार माखनलाल फ़ोतेदार ने चिल्लाकर कार निकालने के लिए कहा.

इंदिरा गाँधी को ज़मीन से आरके धवन और सुरक्षाकर्मी दिनेश भट्ट ने उठाकर सफ़ेद एंबेसडर कार की पिछली सीट पर रखा.

आगे की सीट पर धवन, फ़ोतेदार और ड्राइवर बैठे. जैसे ही कार चलने लगी सोनिया गांधी नंगे पांव, अपने ड्रेसिंग गाउन में मम्मी-मम्मी चिल्लाते हुए भागती हुई आईं.

इंदिरा गांधी की हालत देखकर वो उसी हाल में कार की पीछे की सीट पर बैठ गईं. उन्होंने ख़ून से लथपथ इंदिरा गांधी का सिर अपनी गोद में ले लिया.

कार बहुत तेज़ी से एम्स की तरफ़ बढ़ी. चार किलोमीटर के सफ़र के दौरान कोई भी कुछ नहीं बोला. सोनिया का गाउन इंदिरा के ख़ून से भीग चुका था.

कार नौ बजकर 32 मिनट पर एम्स पहुंची. वहाँ इंदिरा के रक्त ग्रुप ओ आरएच निगेटिव का पर्याप्त स्टॉक था.

लेकिन एक सफ़दरजंग रोड से किसी ने भी एम्स को फ़ोन कर नहीं बताया था कि इंदिरा गांधी को गंभीर रूप से घायल अवस्था में वहाँ लाया जा रहा है.

एमरजेंसी वार्ड का गेट खोलने और इंदिरा को कार से उतारने में तीन मिनट लग गए. वहाँ पर एक स्ट्रेचर तक मौजूद नहीं था.

किसी तरह एक पहिए वाली स्ट्रेचर का इंतेज़ाम किया गया. जब उनको कार से उतारा गया तो इंदिरा को इस हालत में देख कर वहाँ तैनात डॉक्टर घबरा गए.

उन्होंने तुरंत फ़ोन कर एम्स के वरिष्ठ कार्डियॉलॉजिस्ट को इसकी सूचना दी. मिनटों में वहाँ डॉक्टर गुलेरिया, डॉक्टर एमएम कपूर और डॉक्टर एस बालाराम पहुंच गए.

एलेक्ट्रोकार्डियाग्राम में इंदिरा के दिल की मामूली गतिविधि दिखाई दे रही थीं लेकिन नाड़ी में कोई धड़कन नहीं मिल रही थी.

उनकी आँखों की पुतलियां फैली हुई थीं, जो संकेत था कि उनके दिमाग़ को क्षति पहुंची है.

एक डॉक्टर ने उनके मुंह के ज़रिए उनकी साँस की नली में एक ट्यूब घुसाई ताकि फेफड़ों तक ऑक्सीजन पहुंच सके और दिमाग़ को ज़िंदा रखा जा सके.

इंदिरा को 80 बोतल ख़ून चढ़ाया गया जो उनके शरीर की सामान्य ख़ून मात्रा का पांच गुना था.

डॉक्टर गुलेरिया बताते हैं, “मुझे तो देखते ही लग गया था कि वो इस दुनिया से जा चुकी हैं. उसके बाद हमने इसकी पुष्टि के लिए ईसीजी किया. फिर मैंने वहाँ मौजूद स्वास्थ्य मंत्री शंकरानंद से पूछा कि अब क्या करना है? क्या हम उन्हें मृत घोषित कर दें? उन्होंने कहा नहीं. फिर हम उन्हें ऑपरेशन थियेटर में ले गए.”

डॉक्टरों ने उनके शरीर को हार्ट एंड लंग मशीन से जोड़ दिया जो उनके रक्त को साफ़ करने का काम करने लगी और जिसकी वजह से उनके रक्त का तापमान सामान्य 37 डिग्री से घट कर 31 डिग्री हो गया.

ये साफ़ था कि इंदिरा इस दुनिया से जा चुकीं थी लेकिन तब भी उन्हें एम्स की आठवीं मंज़िल स्थित ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया.

डॉक्टरों ने देखा कि गोलियों ने उनके लीवर के दाहिने हिस्से को छलनी कर दिया था, उनकी बड़ी आंत में कम से कम बारह छेद हो गए थे और छोटी आंत को भी काफ़ी क्षति पहुंची थी.

उनके एक फेफड़े में भी गोली लगी थी और रीढ़ की हड्डी भी गोलियों के असर से टूट गई थी. सिर्फ़ उनका हृदय सही सलामत था.

अपने अंगरक्षकों द्वारा गोली मारे जाने के लगभग चार घंटे बाद दो बजकर 23 मिनट पर इंदिरा गांधी को मृत घोषित किया गया.

लेकिन सरकारी प्रचार माध्यमों ने इसकी घोषणा शाम छह बजे तक नहीं की.

इंदिरा गांधी की जीवनी लिखने वाले इंदर मल्होत्रा बताते हैं कि ख़ुफ़िया एजेंसियों ने आशंका प्रकट की थी कि इंदिरा गाँधी पर इस तरह का हमला हो सकता है.

उन्होंने सिफ़ारिश की थी कि सभी सिख सुरक्षाकर्मियों को उनके निवास स्थान से हटा लिया जाए.

लेकिन जब ये फ़ाइल इंदिरा के पास पहुंची तो उन्होंने बहुत ग़ुस्से में उस पर तीन शब्द लिखे,”आरंट वी सेकुलर? (क्या हम धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं?)”

उसके बाद ये तय किया गया कि एक साथ दो सिख सुरक्षाकर्मियों को उनके नज़दीक ड्यूटी पर नहीं लगाया जाएगा.

31 अक्तूबर के दिन सतवंत सिंह ने बहाना किया कि उनका पेट ख़राब है. इसलिए उसे शौचालय के नज़दीक तैनात किया जाए.

इस तरह बेअंत और सतवंत एक साथ तैनात हुए और उन्होंने इंदिरा गाँधी से ऑपरेशन ब्लूस्टार का बदला ले लिया.

साभार :
बीबीसी हिंदी
रेहान फ़ज़ल
बीबीसी संवाददाता,
1 नवंबर 2014

मजबूरीनामा

|| मजबूरीनामा ||

बापू से संबंधित जानकारी आपको इस इंटरनेट की दुनिया में बड़ी आसानी से उपलब्ध हो सकती है, पर आज हम उत्तर गांधी काल की दो अलग-अलग अवधारणाओं पर चर्चा करेंगे, जो आज के वर्तमान समाज की रूपरेखा को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित करती हैं. पहली अवधारणा गाँधी को अहिंसा के परम पुरोधा के रूप में प्रस्तुत करती है, वहीं दूसरी अवधारणा उन्हें भिरू स्वभाव का सिद्ध करती है जिसके कारण ही उन्होंने अन्यान्य अवसरों पर अपने मौन को न तोड़ना उचित समझा, जिस कारण अंततोगत्वा उनकी हत्या कर दी गई थी.

विचारकों के मतानुसार गांधी अपने आप में स्वयं एक अवधारणा के वाहक थे और कईयों के लिए शोध का विषय भी. अहिंसा के पुजारी के लिए अहिंसा से लेश मात्र भी अलग कोई भी व्यवहार हिंसा की श्रेणी में आता था, और उनके इसी सोच ने उनको समकालीन क्रांतिकारियों से अलग कर रखा था, जो किसी भी कीमत पर आजादी चाहते थे. नेहरू और जिन्ना दोनों ही प्रिय थे उनको, जैसे किसी पिता को अपनी संतान प्रिय होती है. परन्तु संतानों ने उनकी कितनी मानी ये पूरा विश्व जानता है. उनके जिद के आगे बापू ने घुटने टेक दिए थे, विभाजन का कलंक हमारे इतिहास के साथ जुड़ चुका था. देश आजाद तो हो चुका था पर यह उनके सपनो का भारत नहीं था.

 लोगों को कहीं न कहीं उनकी बातों में विरोधाभास भी देखने को मिलता है, एक ओर वे कहते थे की ‘अहिंसावादी बनो‘, दूसरी ओर “अन्याय न करो, और न ही सहो‘” तो, न करो तक तो ठीक, पर न सहो के फेर में लोग भ्रमित हो गए थे, उन्हें लगा की अनशन करना- अन्याय सहना है, और फिर कुछ लोगों की सहनशीलता जवाब दे गयी, और वे गाँधी मार्ग से अलग होते चले गए, अंततः देश के विभाजन का दंश उनकी समाधी में परिणत हुई. जहाँ एक ओर उत्तर गाँधी काल में बुद्धिजीवियों ने स्वयं को गाँधी का समर्थक और उनके विचारों का पोषक के रूप में प्रस्तुत किया वहीं दूसरी ओर युवाओं ने स्वयं को असहनशील रखा और गाँधीवाद को गांधीगिरी की संज्ञा दे डाली. अब “मैं गाँधी नहीं.”, मुझे गाँधी मत समझना, कोई एक गाल पर थप्पड़ जड़े तो तुम उसके दोनों गाल पर जड़ दो, आदि संवादों ने समाज में अपनी जगह बनानी शुरू की.

 इन सबसे अलग गाँधीवाद आज भी जिन्दा तो है परन्तु वह मात्र किताबों, विचारों, आदर्शो के गलियारों में भटकता हुआ. हम सभी तस्वीरों पर हार तो चढ़ा आते हैं पर उनके आदर्शों को अपनाने में हार जाते हैं, हम तो कृष्ण को भी चोर कह जाते हैं पर शायद यह नहीं सोचते की उनके द्वारा किये सत्कार्य का एक प्रतिशत भी कभी हम नहीं कर सकते, किंचित, नकारात्मकता अधिक आकर्षक होती है, रामायण के बारे में  बच्चे भी जानते हैं पर उनमें से बिरले ही राम की नक़ल उतारते नजर आते हैं अधिकतर तो रावण की हँसी को ही दुहराते दिख जाते हैं. हम एक पल के लिए गाँधी को उनके ही वाद का सही प्रतिरूप न माने, यह भले ही स्वीकार हो परन्तु यह क्या! हम तो अहिंसा को ही नकारते दिख रहे हैं.

 आज, यदि अहिंसा से कुछ प्राप्त नहीं होता दिख रहा तो भला कौन सा कार्य हिंसा (आतंकवाद/नक्सलवाद/अलगाववाद/उग्रवाद) से होता दिख रहा हो कोई बताये मुझे. अहिंसा कोई गाँधी की थाती नहीं थी, वे तो उसके समर्थक और प्रबल पोषक भर थे दीगर बात यह है की उसमे वो कितने सफल अथवा विफल रहे! अथवा प्रश्न यह होना चाहिए की हम अपने आपको कहाँ पाते हैं? सच पूछिये तो हम मौके के यार भर हैं, बाते तो खूब बड़ी-बड़ी करेंगे पर जब अपने पर आयगी तो निकल लेंगे. गाँधी नोट पर हैं. सच पूछिये अगर वो वहां नहीं होंगे तो कुछ दिन बाद लोग उनका नाम तक भूल जायेंगे, अवधारणाओं की तो बात ही क्या है. अब जहाँ साम-‘दाम’-दंड-भेद में से पहले पर बात नहीं बनती तो दूसरा विकल्प (मजबूरी) और फिर गाँधी जिन्दाबाद! तीसरे और चौथे तक जाने की नौबत ही नहीं आती है. प्रश्न है यह मजबूरी किसने बनायी? हम क्यों मजबूर हो गए और गाँधी को उसका प्रतिरूप बना बैठे.

 आवश्यकता, इस बात के अर्थ को समझने की है की किसी भी चीज का सही अनुप्रयोग कैसे, कब और कहाँ हो सकता है अथवा होना चाहिए इस बात के प्रति हमारी अपनी जागरूकता. हम जितने किसी भी चीज़ के प्रति जागरूक होंगे उतने ही हम उस चीज़ से लाभान्वित भी हो पाएंगे, यह अलग बात है की हम पहले तो जागरूक होना ‘चाहें’. भला ये कोई जबरदस्ती की चीज़ थोड़े ही है. बात गाँधी से से चल कर आगे दूसरी दिशा में न निकल जाये (लगभग निकला ही समझिये) इससे पहले साफ-साफ शब्दों में यही कहना चाहता हूँ की आज गाँधी जी हमारे बीच जिस रूप में भी हैं उन्हें स्वीकार करिए, स्वीकार करिए उनके आदर्शो को और ऐसे ही सलाह देते रहिये दूसरों को कि ‘वो‘ उनके आदर्शों को अपनाएँ, क्योंकि ‘आपने’ तो मजबूरीनामा पर पहले ही हस्ताक्षर कर दिए हैं.

“मजबूरी का नाम- महात्मा गाँधी”
आखिर क्यों जुड़ा बापू के नाम से यह अनचाहा तमगा?

जीविका के लिए जोखिम

मेलों में अक्सर देखने को मिल जाते हैं ऐसे कलाकारों के समूह जो आजीविका के लिए इतने जोखिम भरे व्यवसाय को अपनाते हैं. बहुत दुःख होता है की अपने देश में ऐसे कला की कोई कद्र नहीं. महज कुछ रुपये खर्च कर हम उस रोमांच का अनुभव तो कर लेते हैं परन्तु उसके पीछे के सत्य से मुह भी मोड़ लेते हैं.

14 वीं शताब्दी के रोम में/से लैटिन शब्द सर्कुलर लाइन से आहरित शब्द सर्कस एक सर्कुलर लाइन अर्थात रेखांकित घेरे के अन्दर किसी प्रतियोगिता अथवा करतब का आयोजन, सर्कस कहलाने लगा.

विदेशो खास कर रूस, चीन एवं जापान आदि में इसके लिए अलग, स्थायी रूप से निर्मित स्थान हैं जहाँ नित्य नए करतब दिखाए जाते हैं. वहां मनोरंजन के विशिष्ट साधन के रूप में इसे ख्याति प्राप्त है. अपने यहाँ सिनेमा घरों को छोड़ (अब पीवीआर) दूसरा सार्वजनिक मनोरंजन के नाम पर कोई विकल्प नहीं दिखता है, ऐसे में मेलों में अक्सर ऐसे व्यवसाय को ही लगाना पसंद किया जाता है जो कोई भी पूरे वर्ष चक्र में नहीं देख पाता हो, और लोग बरबस खिंचे चले जाते हैं.

ऐसे ही एक मेले में जो दुर्गा पूजा के अवसर पर सेंट्रल कॉलोनी, मकोली में इस वर्ष भी प्रतिवर्ष की भांति आयोजित हुआ जिसमे इस वर्ष बच्चों के पुरजोर आग्रह पर विवश होकर ‘दुर्गेश्वरी मारुती सर्कस‘ के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत ‘मौत का कुआँ’ देखने का अवसर (अवसर नहीं मैं तो सौभाग्य कहूँगा) प्राप्त हुआ तो मैं उसे अपने कमरे में रिकॉर्ड करने से खुद को नहीं रोक पाया. और बच्चो के आग्रह पर इसे आप सबके साथ अपने अनुभव को बाँटने से भला कैसे रोक पाता.

अंत में बस यही कहना चाहूँगा की महँगी-महँगी फिल्मो से जो मनोरंजन मिलता है उसकी एक अपनी अलग पहचान और महत्व है मैं कदापि उसे नकार नहीं रहा परन्तु जिस कला को आप सामने लाइव देखते हैं, उसका एक अलग ही आनंद है. तो आपको जब भी मौका मिले ऐसे अवसरों को मत चूकिए, क्योंकि ये आपका मनोरजन तो करते हैं पर अपनी जीविका के लिए जो जोखिम उठाते हैं उसका कोई सानी नहीं.

मन दुखी है!

आजकल के बच्चों को यह क्या होता जा रहा है कि पहले तो वो अपने स्कूल की जहाँ कि वो पढ़े हैं कभी या अभी भी पढ़ रहे हैं उनके पूर्व या वर्तमान में जो शिक्षक हैं उनके व्यंगात्मक फोटो व टिप्पणियों को खुलेआम धरल्ले से पोस्ट कर रहे हैं और उस पोस्ट को शेयर, फॉरवर्ड व लाइक किया जा रहा है. बिना इस बात की चिंता किये की इसके क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं?

चलिए धोड़ी देर के लिए इसे बच्चों द्वारा मन की खीज निकालने का माध्यम भर मान लेते हैं, पर यह कैसा बेबुनियाद आरोप है? और है तो कार्रवाई का यह कौन सा तरीका है? लोगो से बात की तो सबने सोशल मिडिया की ही बात की और कहा उन्हें यहीं से इसकी जानकारी हुई, और महज सोशल मिडिया पर यह बात फैला भर देने से हम भी किसी को कसूरवार मान ले यह तो कोई सभ्य समाज का लक्षण नहीं जान पड़ता. अब यदि तथाकथित रूप से उनपर यह आरोप लगा भी है तो क्यों नहीं यह मामला उचित कार्रवाई के रूप में सामने आया? इस रूप में क्यों भद्दे-भद्दे पोस्ट बनाकर उसे सोशल मिडिया पर पोस्ट किया जा रहा है?

विद्यालय के परीक्षा विभाग के प्रमुख एवं सेकंड इन कमांड पर लगाया गया तथाकथित आरोप न सिर्फ बेबुनियाद है बल्कि एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत बहुत बड़ी साजिश है. और इस साजिश को अंजाम तक पहुचाने का काम यहाँ के ही बच्चे कर रहे हैं और बड़ों को भी बरगला कर उनके सामाजिक पकड़ का फायदा उठाया रहे है और इस बात में साथ दे रहे हैं उस स्कूल के ही बच्चे जिन्होंने जैसे बीड़ा ही उठा रखा है की कौन दोषी है और उसको वो फेसबुक पर ही सजा दे डालेंगे.

स्पष्ट है कि अब तक आपके मन में यह विचार आ चूका होगा की आखिर क्यों? आखिर क्यों कोई भी इस प्रकार के दोषारोपण का दुस्साहस करेगा, वो भी समाज के किसी सम्मानित व्यक्ति के विरुद्ध. आपकी सोच को सलाम करते हुए यह बहुत ही स्पष्टता के साथ बताना चाहता हूँ की शिक्षक, जिनपर यह झूठा आरोप लगाया जा रहा है वे विगत २० से भी अधिक वर्षों से विद्यालय में कार्यरत हैं और अब कुछ गिने चुने वर्ष बचे हैं उनके कार्यकाल पूरे होने को, ऐसे में कोई शिक्षक इस तरह की हरकत करना तो दूर, सोच भी कैसे सकता है, विचारणीय है.

मेरे कार्यकाल में मैंने उन्हें कभी भी अभद्र भाषा तक का प्रयोग करते न तो देखा न सुना. यहाँ मेरे से तात्पर्य केवल मेरे नहीं बल्कि तत्संबधी जिन जिन लोगो से मैंने बात की उन्होंने इसे सोची समझी साजिश का ही नाम दिया और कहा की कई बार विद्यालय के लगभग पुराने शिक्षको में शुमार उनके नाम और समाज में लोगो से पहचान जान के कारण प्रायः लोग नामांकन के लिए उनसे संपर्क करने आ जाया करते थे.

यहाँ एक बात और स्पष्ट कर दूं की ऐसे लोगों में मैं स्वयम भी शामिल रहा, पर शिक्षक के सुझाये रास्ते अर्थात सामान्य प्रक्रिया का अनुसरण कर ही मैं चला और कई विद्यार्थियों के नामांकन करवाए भी जबकि बहुतों का नही भी हो सका. नामांकन के सिलसिले में उनसे तथाकथित व्यक्तियों द्वारा ऑफर्स भी दिए गए जिन्हें शिक्षक ने विनम्रता से अस्वीकार कर दिया था, परन्तु बहुत कहने पर भी जब उन्होंने प्रक्रिया से आने की सलाह दी तो उक्त लोगों द्वारा उन्हें धमकी भी दी गयी, पर शिक्षक ने उन्हें नजरंदाज कर दिया, क्योंकि यह उनके लिए दिनचर्या की बात थी, और अब ऐसे ही लोगों द्वारा अपनी दी गयी धमकी को सार्थक सिद्ध करने के लिए समाज के ही कमजोर/अबोध कड़ियों को कन्धा बनाकर शिक्षक के सम्मान की अर्थी उठाई जा रही है, और अब भी हम चुप बैठे तो वह दिन दूर नहीं जब आये दिन ऐसी शिकायतों को बतौर हथियार की तरह उपयोग में लाना आम बात हो जायगी. और शिक्षक जैसे सम्मानित और मर्यादित लोगों का समाज में जीना दूभर हो जायगा.

आग्रह है की ऐसे बच्चों के अभिभावाक जागें और देखें की उनके बच्चे जिन्हें वे प्रायः घर के अन्दर ही पाकर समझ लेते हैं की उनकी संगती अच्छी है, भ्रम में जी रहे हैं, सनद रहे की सोशल मिडिया के दुष्परिणाम से सम्बंधित अभी तक हजारो ऐसे मामले देखने को मिलते रहे हैं.

 मेरी समाज के सभी बुद्धिजीवियों से अपील है की वे आगे आयें और चाहे वह विद्यालय प्रशासन हो अथवा नागरिक प्रशासन उन पर यह दवाब बनायें की ऐसे अभद्र टिप्पणियों को सार्वजनिक कर किसी के मर्यादा को ठेस पहुचाने का काम कर रहे समाज के उन शरारती तत्वों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करे जिससे की आगे से कोई भी इस तरह की गैरजिम्मेदाराना हरकत करने से पहले सौ बार नहीं हजार बार सोचे.

हैप्पी बर्थ डे, डियर – हिंदी

यूं तो हिंदी भाषा का जन्म कब हुआ यह कोई नहीं बता सकता, फिर प्रश्न यह भी है कि फिर हम यह दिवस क्यों मानते हैं? तो इसके पीछे का तर्क यही दिया जा सकता है की इन दिवसों से हम किसी भी सम्बंधित चीज का इतिहास जान पाते हैं तथा उनकी उपयोगिता को पुनः स्थापित कर अपना हृदयोद्गार अभिव्यक्त कर पाते हैं, जिससे की भावी पीढियां उनके महत्व से अवगत होती रहें.

14 सितम्बर, 1949 को संविधान सभा में हिन्दी की स्थिति को लेकर हो रही बहस जो की 12 सितंबर, 1949 को 4 बजे दोपहर में शुरू हुई और दो दिन बाद अर्थात आज ही के दिन 14 सितम्बर 1949 को समाप्त हो सकी, जिस दौरान तत्कालीन प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने इसकी महत्ता को बताया वो भी अंग्रेजी में भाषा का प्रयुक्त करते हुए, अपने संक्षिप्त वक्तव्य में उन्होंने कहा कि:

“अंग्रेज़ी से हम नजदीक आए हैं, क्योंकि वह एक भाषा है. अंग्रेज़ी के जगह पर हमने एक भारतीय भाषा को अपनाया है. इससे अवश्य हमारे संबंध प्रगाढ़ होंगे, विशेषतः इसलिए कि हमारी परंपराएँ एक ही हैं, हमारी संस्कृति एक ही है और हमारी सभ्यता में सब बातें एक ही हैं. अतएव यदि हम इस सूत्र को स्वीकार नहीं करते तो परिणाम यह होता कि या तो इस देश में बहुत-सी भाषाओं का प्रयोग होता या वे प्रांत पृथक हो जाते जो बाध्य होकर किसी भाषा विशेष को स्वीकार करना नहीं चाहते थे. हमने यथासंभव बुद्धिमानी का कार्य किया है और मुझे हर्ष है, और मुझे आशा भी है कि भावी पीढ़ी इसके लिए हमारी सराहना करेगी.”

प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने भी संविधान सभा से भाषा संबंधी बहस में भाग लेते हुए कहा कि:

“किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता. क्योंकि कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती. भारत के हित में, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्मविश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिंदी को अपनाना चाहिए.”

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस निर्णय को ऐतिहासिक बताया और संविधान सभा से अनुरोध किया कि वह ‘इस अवसर के अनुरूप निर्णय करे और अपनी मातृभूमि में राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में वास्तविक सहयोग दे.”

इस प्रकार 14 सितंबर भारतीय इतिहास में हिन्दी दिवस के रूप में जाना जाने लगा.

ये तो हो गयी इसके दिवस के रूप में मनाये जाने की कहानी, अब बात करते हैं आज-कल की इसकी स्थिति के बारे में जिसमे हम पाते हैं की यूं तो इसे सभी कार्यालयों में चाहे वह सरकारी हो अथवा गैर सरकारी हो धरल्ले से इसका इस्तेमाल हो रहा है सभी कागजों में अनुवाद के रूप में वो भी पृष्ठों के पीछे की ओर, दरअसल समस्या हिंदी कि नहीं समस्या हमारी है कि हम व्यवहार में नहीं लाने के कारण या फिर जिस रूप में हम हिंदी को व्यवहृत करते हैं वो कार्यालयी कार्यों के निष्पादन में नहीं चलती.

मेरे विचार से इसका मूल कारण है कि जब वह अत्यधिक शुद्धता से प्रयुक्त होती है तो तत्सम के करीब चली जाती है और तद्भव में थोड़ा समझना तो आसन हो जाता है पर समझाने में हालत ख़राब हो जाती है. चलिए इसे एक उदाहरण से समझने का प्रयत्न करते हैं, क्योंकि जब आप इसे पढने यहाँ तक आये हैं तो हम आपकी बुद्धिमत्ता पर संदेह तो कदापि नहीं कर सकते.

आपको शायद याद हो वह सामाजिक सन्देश अग्रसारित करने वाला अनुप्रयोग जिसे आंग्ल भाषा में (whatsapp) कहा जाता है, बीते दिनों उस पर एक सन्देश हिंदी भाषा के प्रयोग में होने वाली कठिनाईयों को दर्शाने वाला व्यंग के रूप में प्रचारित किया गया जिसमे एक व्यक्ति ऑटो चालक से कहता है कि “हे! त्रिचक्रीय वाहन चालक, पूरे नगर के परिभ्रमण में कितनी मुद्राएँ व्यय करनी होंगी?” अब देखिये इन महाशय को, इन्होने हिंदी भाषा का प्रयोग इतने चरम पर किया कि सामने वाला सकपका के रह गया.

दरअसल हमें हिंदी कि व्यापकता को समझते हुए उसको प्रयोग में लाना होगा जैसा कि हम अन्य भाषाओं के साथ करते हैं, आप देखेंगे कि सामान्य अंग्रेजी और न्यायालयों में प्रयुक्त अंग्रेजी में भी तो फर्क होता है.  मेरे हिसाब से देखेंगे तो यही पाएंगे कि हिंदी का जो फैलाव है उसमे हमें उपयोग कि सीमा, स्थान व सामने वाले की पकड़ का ध्यान रखना होता है. यह नहीं कि बस झाडे चले गए, हमें भाषा का उद्देश्य समझना ही होगा कि भाषा का प्रयोग हम अपनी बातों के भावों को सामने वाले तक स्पष्टता के साथ पहुंचाने के लिए करते हैं न कि अपनी विद्वता दिखाने के लिए, हाँ, विद्वता भी दिखाएँ जहाँ आवश्यकता हो, वहां ऐसे-ऐसे हिंदी के क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग करें कि जो कोई अगर पढ़े अथवा सुने उसे बिना शब्दकोष के बात पल्ले ही न पड़े.

क्योंकि, अब यह हमारे ही उत्तरदायित्व के अंतर्गत है पूर्णरूपेण कि इसे इसका सम्मान मिल सके.

1949 से ही मान ले तो हिंदी अब तक वरिष्ठ नागरिक भाषा  बन चुकी है और हम अपने प्रयोग करने के तरीकों में यदि अब भी सुधार नहीं लाते तो जल्द ही यह बूढ़ी हो जायगी और इसी वर्ष की भांति प्रति वर्ष हम इसका दिवस ऐसे ही मानते भर रह जायेंगे.

 

बस हम ही नहीं बदले

सर्वप्रथम हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि, यह जो लेख यहाँ से नीचे तक जो भी लिखा है उसका किसी जाति अथवा धर्म से बिना किसी पूर्वाग्रह के/से प्रेरित हुए लिखा जा रहा है, यद्यपि किसी धर्म विशेष की धार्मिक भावना आहत होती हो तो हमें क्षमा करेंगे. मेरी जाति या धर्म क्या है इसे जाने बिना इस लेख को निष्पक्ष भाव से पढने की कृपा सराहनीय होगी.

उपर्युक्त वाक्यों को पढ़ कर आपसे यह अपेक्षा की जा सकती है कि अब आप पूर्णतया तैयार हैं. कुरआन-ए-शरीफ में ‘तीन तलाक’ को ‘पाप’ की संज्ञा दी गयी है, परन्तु फिर भी सदियों से एक परंपरा के रूप में इसको हम वहन करते रहे. तुलसीदास जी ने भी कह डाला था ‘ढोल, पशु अरु नारी, ये सब हैं तारण के अधिकारी’ तो क्या उनकी इस बात को हमारा समाज आज चरितार्थ करता है? जरा आज आप इस मान्यता के पक्ष में सरेआम बोल कर दिखा दें! सभी महिला अधिकार संरक्षण वाले आपको अदालत में ना घसीट डाले तो फिर कहें.

वैसे ही आज के समाज में चाहे वह ‘तीन तलाक’ का विषय हो अथवा ‘दहेज़-प्रथा’ या महिलाओं के किसी भी प्रकार के/से शोषण का मामला हो हमारा समाज चुप कैसे रह सकता है. आज हमारे समाज का एक वर्ग कहे की ‘दहेज़-प्रथा’ हमारे धार्मिक भावना से सम्बंधित है और हमारे धर्म में किसी की दखलंदाजी पसंद नहीं, तो हम समझते हैं की उससे जाहिल वर्ग और कोई दूसरा हो हो नहीं सकता, परन्तु फिर भी ‘दहेज़-प्रथा’ कमोवेश पूरे समाज में आज भी जिन्दा है, उसी प्रकार ‘तीन-तलाक’ (छः महीने के लिए पाबन्दी) भी छः महीने बाद यदि कोई कानून नहीं बन पाया तो फिर से जिन्दा होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

आज दिनांक 22-08-2017 के माननीय सर्वोच्च न्यायलय के पांच जजों के पीठ में से तीन जजों ने इसे असंवैधानिक बताया और कहा की यह संविधान की धारा 14 की अवमानना है तथा इससे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन होता है. जबकि दो जजों ने इसे धार्मिक भावना से सम्बंधित मामला बताकर संसद में कानून बनाने का सुझाव दिया है.

अब प्रश्न यह है की देश की 9 करोड़ महिलाएं अपने हक की आवाज किसे सुनाएँ, उन धर्म के ठेकेदारों को जो, जिनकी औलादें तो उच्च शिक्षा ग्रहण करती हैं पर उनके निगेहबानी में चल रहे मदरसों पर कडाई से धर्म के पालन पर बल दिया जाता है. ऐसा कतई नहीं की अन्य वर्ग की महिलाओं की स्थिति बहुत ही अच्छी है, पर ऐसा कहकर आप ‘तीन-तलाक’ को जायज तो नहीं कह सकते. समस्या विधवा विवाह को लेकर हमारे समाज में दोहरी राय रखने वालों से भी है. आज सायरा बानो की मेहनत रंग ले आयी, वो लगी रहीं अपने लक्ष्य को साधने में.

कुल मिलाकर आज की इस घटना ने पूरे समाज को आईना दिखा दिया की किसी भी काम को लगन से पूरा करने में जब आप लग जाते हैं तो पूरी कायनात आपके साथ हो लेती है. आखिर कब तक आप धर्म की आड़ में खुद को छिपाकर, खुद की रक्षा में लगे रहेंगे. ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ इसका अर्थ या यों कहे अनर्थ हम कब तक लगते रहेंगे? “धर्म उनकी ही रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करतें हैं.” तो, धर्म की रक्षा करना मतलब किसी धर्म में जो उनके/हमारे तथाकथित बाबा आदम ने कहा उसी से चिपके रहेंगे? आपने कभी किसी कंपनी का “जेनेरल टर्म्स एंड कंडीशन” यदि पढ़ा हो तो उसमे भी साफ़-साफ़ लिखा होता है, “किसी भी बिंदु पर समय-समय पर होने वाले परिवर्तन में आपको उसकी जिम्मेवारी स्वयं लेनी होगी”. ठीक उसी प्रकार, धर्म की रक्षा करना मतलब हथियार उठाकर सामने वाले को मार डालना नहीं होता है अपितु वैसों को धर्म की राह पर लाना होता है जो धर्म से भटक गए है.

धर्म में चलना (धर्मं चर) अर्थात वह सभी काम जिससे किसी का भला होता हो और साथ ही किसी का नुकसान भी न होता हो ऐसे कार्य ही धर्म की सूची में आ सकते है. ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए को हंसाया जाये’ तो भाई ये जिसने भी लिखा उसका तो फतवा बन भी गया होगा. भाई अगर ऐसा है तो आज से चाहे हम किसी भी वर्ग के हों अपनी धर्म नाम की गठरी अपने सर पर उठाकर नहीं चलें. उसे अपने घर के किसी कोने, न न, कोने नहीं, ऐसा भी क्या, किसी शानदार कोने में रख दे, क्योंकि जब आप अपने अपने घरों से बाहर होते हैं, तो आप सब का, हमारा भी एक ही धर्म होना चाहिए और वो है राष्ट्र धर्म सर्वोपरि.

वस्तुतः हमारे धर्म व धार्मिक पुस्तकें बहुत गूढ़ हैं हमारे समाज में उनका सही-सही विश्लेषण करने वालों के शख्त कमी है, जो जैसा चाहता है अपना नया अर्थ लगा लेता है, जिससे बेकार का विवाद उत्पन्न होता है, और हम जैसों को अवसर मिल जाता है कुछ कह ही डालने का, कि ठीक है ये सब पर अब क्या करें, “बस हम ही नहीं बदले, जमाना बदल गया.”

प्रस्तावना

हम फुसरो के लोग,
फुसरो को एक स्वच्छ, ईमानदार, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, नगर बनाने के लिए
तथा
उसके समस्त नगरवासियों को
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता  एवं विकास प्राप्त करने के लिए
तथा
उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और सामाजिक एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए कृत संकल्पित हैं.

प्रिय बंधुवर

सादर नमस्कार,

सर्वप्रथम आपका हमारे, (हम सबके) अपने एकमात्र क्षेत्रिय वेबसाइट पर सहृदय स्वागत है.

यहाँ क्षेत्रिय से सीधा तात्पर्य भाषा, धर्म, जाति, संस्कृति, इतिहास, दर्शन, शिक्षा, चिकित्सा, राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक वातावरण में जो बदलाव हो रहा तथा जिन बदलावों का हिस्सा हम दिनोंदिन बनते जा रहे हैँ उनसे है.

इस बदलते परिवेश में हम किस प्रकार व किस सीमा तक अपने को ढालने मे सक्षम पा रहे हैं, यह एक विचार-विमर्श की विषय-वस्तु है.

हालांकि, आज हमारे पास गूगल, फेसबुक, ट्विटर तथा व्हाट्सप जैसे कई सक्षम वैकल्पिक सामाजिक जुड़ाव के माध्यम उपलब्ध हैं, फिर भी इस भीड़ से इतर एक विकल्प की आवश्यकता हमें महसूस तो हो ही रही है, परन्तु न मालूम वजहों से हम अपने आप  को उससे अलग नहीं कर पा रहे हैं.

उपरोक्त से हमारा तात्पर्य, इनमें से किसी का विरोध करना कतई नहीं है, पर हमें यह समझना होगा कि इनका हमारे जीवनशैली में क्या प्रभाव अथवा दुष्प्रभाव प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पड़ रहा है? अतएव, इसकी विवेचना में आप सभी की भागीदारी वांछित है.

हमने इस वेबसाइट का नाम यह क्यों रखा है? इसके उत्तर में हम मात्र इतना ही कह सकते हैं कि, यह हमारा अपने क्षेत्र के व लोगों के प्रति आदर व लगाव का प्रतीक भर है. पूर्ण विश्वास के साथ और यह आशा करतें हुए कि आप सबका हमें साथ एवं स्नेह अवश्य ही प्राप्त होगा, आईये इसकी शुरुआत करते हैं.

स्नेहाकांक्षी

Team phusro.in